श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८१४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ब्राह्मणांस्तु महाभागान् कृतस्वस्त्ययना वयम्।
गोभूहिरण्यवासोभिर्गजाश्वरथवेश्मभिः ॥ ८॥
तदुपरान्त शांति के लिये वेदवेदांग परांगत शमदमादि तप से युक्त तथा स्वधर्म में तत्पर ब्राह्मणों की पूजा
करें। अरिष्ट की शान्ति के लिये जो स्वस्तिवाचन करें उन ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक दान दें, अत्यन्त श्रद्धा से
गोदान, भूमिदान, गजदान, अश्वदान, सुवर्णदान, तिलदान, वस्त्रदान, गृहदान आदि दान दें। रथ में घोड़े जोड़कर
वे रथ दान में दें; जिससे ब्राह्मणों को संतोष हो, वह सब कार्य करें। ब्राह्मणों को जो भी चाहिये, वह सब
श्रद्धायुक्त बुद्धि से अर्पण करें। ब्राह्मण जहाँ सन्तुष्ट रहते हैं, वहाँ विघ्न प्रवेश नहीं करते।
विधिरेष ह्यरिष्टघ्नो मङ्गलायनमुत्तमम्।
देवद्विजगवां पूजा भूतेषु परमो भवः ॥ ९॥
जहाँ हरि का देवतार्चन होता है; जहाँ शालिग्राम शिलार्चन होता है, जहाँ साधु संतों का सम्मान होता है;
वही अरिष्टनाशक महापूजा है। जहाँ श्रद्धा भक्ति से ब्राह्मणों की पूजा होती है, जहाँ श्रद्धापूर्वक गौ की पूजा होती
है; जहाँ पूर्ण भूतदया का वास होता है; वहाँ विघ्न कभी प्रवेश नहीं करते। अन्धे, अपाहिज, दुर्बल लोगों को जहाँ
अन्न मिलता है; जहाँ दीन-दुखी सुखी होते हैं, वहाँ विघ्नों की कभी बाधा नहीं होती। अलौकिक भूत दया यह
सकल अरिष्टों का निवारण करती है, तथा परम मंगलप्रकाशक तथा सभी दृष्टियों से सुखदायी है।
इति सर्वे समाकर्ण्य यदुवृद्धा मधुद्विषः।
तथेति नौभिरुत्तीर्य प्रभासं प्रययू रथैः ॥ १०॥
इस प्रकार मधुकैटभ का संहार करने वाले मधुसूदन मुरारी, परमात्मा श्रीकृष्ण ने सबको प्रभास जाने के
लिये कहा। यादवों में जो वृद्ध, ज्ञानी, पुत्र, मित्र, संबंधी और इष्ट लोग थे, उन्होंने श्रीकृष्ण का वचन बड़े आदर
से शिरसावंद्य किया। सारी सामग्री लेकर स्त्रियाँ, वृद्ध, बच्चे नौकाओं में बैठ कर शंखोद्धार की ओर चल पड़े।
रथ, हाथी आदि तैयार कर तथा चतुरंगी सेना के साथ कृष्ण के साथ सारे यादववीर चल पड़े।
तस्मिन् भगवताऽऽदिष्टं यदुदेवेन यादवाः।
चक्रुः परमया भक्त्या सर्वश्रेयोपबृंहितम् ॥ ११ ॥
यादव प्रभास गये और जितना श्रीकृष्ण ने बताया था उससे भी विशेष स्नान, दान आदि किया। सारे यादवों
ने मिलकर भोजन किया और विधिपूर्वक पारन किया। फिर मूल्यवान मद्य मँगवाकर मद्यपान करना प्रारम्भ
किया।
ततस्तस्मिन् महापानं पपुर्मैरेयकं मधु।
दिष्टविभ्रंशितधियो यद्द्रवैर्भ्रश्यते मतिः ॥ १२॥
तीर्थविधि करके अरिष्टों का निवारण करना था, लेकिन प्रारब्ध की गति कैसी विचित्र थी। इधर उन्होंने
मद्यपान शुरू किया। एक बार उसमें रुचि जगने पर लोग उस पर टूट पड़ते हैं। इसमें अत्यधिक उन्माद बढ़ता है।
ऐसा मद्य बच्चे और बड़ों ने साथ-साथ पीना शुरु किया। 'मैरेयक' नाम का अत्यन्त मधुर मद्य एक बार मुँह में
लगते ही सज्ञान को भी पागल कर देता है। उस मद्य का यादववीर डट कर पान करने लगे। छोटे-बड़े सभी
एक-दूसरे को आग्रह करके पीने लगे।