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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 827, कुल 869 में से

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पृष्ठ 827

तीसवाँ अध्याय ८९१
ब्रह्मशापोपसंसृष्टे स्वकुले यादवर्षभः।
प्रेयसीं सर्वनेत्राणां तनुं स कथमत्यजत् ॥ २ ॥
श्रीकृष्ण ने ब्रह्मशाप से अपने कुल का निःशेष विनाश किस प्रकार किया ? इसे निश्चित रूप से बतायें।
लोगों के नेत्रों को आह्लाद देने वाली कृष्ण की छवि अत्यन्त सुन्दर थी। उसे देखकर शंकर भी स्वानंद से झूमने
लगते थे। इतने मनोरम शरीर का श्रीकृष्ण ने कैसे त्याग किया ? ब्रह्मशाप के भय से उन्होंने अपना शरीर
किसलिये छोड़ा ? कृष्ण परिपूर्ण ब्रह्म था। उसे शाप बन्धन की बाधा होने लायक नहीं थी; लेकिन उसने भी
यादववंश का शरीर त्याग कर ब्रह्मशाप सच कर दिखाया। श्रीकृष्ण को केवल देखने भर से जीवप्राण आनन्द से
भर जाता था, उसके सौन्दर्य का वर्णन राजा स्वयं कर रहा है।
प्रत्याक्रष्टुं नयनमबला यत्र लग्नं न शेकुः कर्णाविष्टं न सरति ततो यत् सतामात्मलग्नम्।
यच्छ्रीर्वाचां जनयति रतिं किं नु मानं कवीनां दृष्ट्वाजिष्णोर्युधि रथगतं यच्च तत्साम्यमीयुः ॥ ३ ॥
जिसकी ग्यारहों इन्द्रियों को निरन्तर माधुर्य लगा रहता था और जिसे भोगते हुए उसकी माधुरी बढ़ती ही
जाती थी, जिससे कभी भी अरुचि या उकताहत नहीं होती थी, ऐसी उस कृष्ण की माधुरी असीम थी। बाला,
मुग्धा, प्रौढ़ा तथा प्रगल्भा ये चार प्रकार की स्त्रियाँ, एक बार श्रीकृष्ण की मूर्ति देखने पर उनकी दृष्टि पीछे की
ओर नहीं मुड़ती थी। जो स्त्रियाँ धार्मिक, धैर्यवान तथा पतिव्रता साध्वी थीं वे भी यदि एक बार कृष्ण की मूर्ति
देख लेतीं तो उनकी दृष्टि पीछे नहीं मुड़ती थी। जिन स्त्रियों ने काम को भोगा ही नहीं है या जो अत्यन्त वृद्ध हो
जाने के कारण अतिनिष्काम हो गयी हैं; वे भी यदि श्यामसुन्दर हरि का स्वरूप देखती हैं तो उनकी आँखें भी
हरिरूप में लुब्ध हो जाती हैं। पानी और नमक से एक बार मेल हो जाय, उसी प्रकार श्रीकृष्ण के प्रति स्त्रियों की
दृष्टि एक बार आकृष्ट हो जाय तो फिर वह टूटती ही नहीं थी। आँखों को श्रीकृष्ण दर्शन का पागलपन हो जाता
था। लेकिन बेचारी स्त्रियाँ ही क्यों ? जो संत, विरक्त और परमार्थी होते, उनके कान पर भी यदि कृष्ण कीर्ति की
बात आती थी तो उसकी मूर्ति उनके मन में भी बस जाती थी। कृष्ण की कीर्ति चित्तवृत्ति को इतना अधिक
आकर्षित कर लेती थी कि पूरा चित्त ही कृष्णस्वरूप हो जाता था। कृष्ण की कीर्ति संतों को आकर्षित कर लेती
थी, इसमें विशेष आश्चर्य नहीं है क्योंकि असंत भी उसकी कीर्ति सुनकर तद्रूप हो जाते थे। चन्दन की हवा
लगने से खैर तथा सागवान भी चन्दन हो जाते हैं उसी प्रकार कृष्ण कीर्ति सुनकर सभी का समानरूप से समाधान
हो जाता था। श्रीकृष्ण की कीर्ति भक्तिभाव से श्रवण करने से असंत भी संत का पद प्राप्त कर लेते हैं और फिर
संत और असंत ये भेद नष्ट होकर दोनों एक जैसे हो जाते हैं। महाकवि कृष्ण की कीर्ति का वर्णन कर परम
भाग्यशाली हो गये; ऐसी कृष्णकीर्ति का जो वर्णन करते हैं, वे भी वैसी ही शोभा प्राप्त करते हैं। महाकवियों को
नवरस में रँगने वाला एक ही पुरुष श्रीकृष्ण दिखायी देता है। वे जिस विशिष्ट रस का वर्णन करने लगते हैं, वह
रस कृष्ण स्वयं ही हो जाते हैं। महाकवि आदि से लेकर काव्यकर्त्ताओं की स्फूर्ति की जननी कृष्णकीर्ति ही है।
जो हरिकीर्तन में रंग जाते हैं, उनकी वाणी वंद्य हो जाती है। श्रीकृष्ण का गुणानुवाद गाते समय यदि कोई त्रुटि भी
हो जाती है तो भी उस वाणी को शंकर नमन करते हैं। यम और काल भी उनके चरण छूते हैं। जहाँ श्रीकृष्ण
कीर्ति का कीर्तन चलता है, वहाँ कर्माकर्म की समाप्ति होकर जन्म-मरण के साथ संसार की विदाई होती है। इस
प्रकार कीर्ति की महिमा सभी दृष्टियों से अगाध है। कृष्णकीर्ति का काव्य भी तीनों लोकों में अत्यन्त पावन है।
बड़े-बड़े कवियों द्वारा वर्णन की हुई कृष्ण की कीर्ति सुनने से श्रद्धा और प्रेम की वृद्धि होती है। इसकी कृष्ण