श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
७६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ब्रह्मस्थिति अत्यन्त कठिन है यह मर्म उद्धव के ध्यान में आया; इसलिये साधकों का काम हो जाय इसलिये वह
सरल उपाय पूछ रहा है। कृष्ण अब निजधाम जायेंगे और तब ब्रह्मप्राप्ति हाथ नहीं लगेगी; साधक संकट में पड़
जायेंगे फिर सही उपाय कौन बतायेगा ? इस प्रकार साधकों के हितों के प्रति विह्वल होकर, सुगम रीति से
ब्रह्मप्राप्ति हो सके ऐसा उपाय वह श्रीकृष्ण से पूछ रहा है। उन्नीसवें अध्याय में, ब्रह्मप्राप्ति का सुगम साधन,
अर्थात् जो सप्रेम भगवद्भजन है उसका लक्षण श्रीहरि बताने वाले हैं। जिससे दुर्बल अज्ञानियों को ब्रह्मप्राप्ति
सुलभ हो, वह रीति बतलाने के लिये उद्धव छः श्लोकों में भगवान से विनती कर रहा है।
उद्धव उवाच
सुदुश्चरामिमां मन्ये योगचर्यामनात्मनः ।
यथाञ्जसा पुमान् सिद्ध्येत् तन्मेब्रूह्यब्जसाच्युत ॥ १ ॥
पूर्वाध्याय में जिस ब्रह्मस्थिति का वर्णन किया उसे साध्य करना अत्यन्त कठिन है। दुर्बल, भोले भाले भक्त
इसे नहीं साध्य कर पायेंगे। ब्रह्म वस्तु व्यक्त भी नहीं है और अव्यक्त भी नहीं है; प्रकट भी नहीं है और गुप्त भी
नहीं है। वह मूर्त है वा अमूर्त है इसका पता नहीं चलता। वहाँ साधकों का प्रवेश कैसे होगा ? वह स्थूल भी नहीं
है और सूक्ष्म भी नहीं है; वह है यह कहना भी कठिन है और नहीं है यह कहना भी सम्भव नहीं है। जहाँ देखना
और देखने की वस्तु ये दोनों ही समाप्त हो जाते हैं वह साधकों को कैसे साध्य होगा ? जो दिखायी देता है उसी
को ब्रह्म कहें तो वह नाम और रूप से माया होगी; वह नहीं है यह मानकर छोड़ दें तो उससे साधकों का
नुकसान होगा। जो आकार वाला भी नहीं है और शून्य भी नहीं है; जिसमें ध्येय और ध्यान प्रवेश नहीं करता;
जिससे ज्ञेय और ज्ञान भी शरमाता है और साधन जिसे स्पर्श भी नहीं करता; जो शब्दों के हाथ नहीं लगता; जो
मौन में भी नहीं मिलता; जहाँ भीतर और बाहर नहीं है, वहाँ साधक बेचारा क्या करे ? जो विचारों के अन्दर भी
नहीं है और बाहर भी नहीं है; जिसका पूरी तरह निश्चय करने में बुद्धिमान को भी साहस नहीं होता; वहाँ
साधक किस तरह निश्चय करें ? जहाँ साधकों को अपना मन स्थिर करने के लिये कोई आधार ही नहीं दिखायी
देता; वहाँ अनात्मनिष्ट अज्ञानी लोगों के लिये क्या यह योग अत्यन्त कठिन नहीं है। तुम यदि निजधाम जाने की
जल्दी कर रहे हो तो अज्ञान लोगों के लिये तरने का सुलभ साधन बताओ। यह कह कर उसने साष्टांग दण्डवत
किया, दौड़कर श्रीकृष्ण के चरण पकड़ लिये और सुलभ साधन बताने की विनती की। नदी को तैरकर पार करने
की अपेक्षा उसे चलकर पार करना स्त्रियों और बच्चों को आसान रहता है। इसलिये हे श्रीकृष्ण ! कुछ ऐसा ही
उपाय बताइये। तुम्हारे प्रति सद्भाव तो पूरा है लेकिन शब्दज्ञान समझ में नहीं आता; ऐसे अज्ञानी लोगों को समझ
में आ सके ऐसा तैर कर पार जाने का सुगम साधन बताइये। मनोनिग्रह करना अत्यन्त कठिन है; वह साधकों को
पूरी तरह साध्य नहीं होता। इसी अर्थ का निरूपण अब उद्धव कर रहे हैं।
प्रायशः पुण्डरीकाक्ष युञ्जन्तो योगिनो मनः ।
विषीदन्त्यसमाधानान्मनोनिग्रहंकर्शिताः ॥ २ ॥
हे कमलनयन कृष्ण ! सुनो ! साधक साधना करके कितना भी थक जाये लेकिन वह मन का आकलन नहीं
कर पाता। साधक लोग मन का निग्रह करने के लिये प्राणापान साध्य करते हैं लेकिन मन उन्हें भी मूर्ख बनाकर
तत्काल चला जाता है। कुछ लोग एकांत में आसन लगाकर मनोनिग्रह के सम्बन्ध में बड़ी सावधानी दिखलाते हैं,
लेकिन उन्हें भी ठग कर मन अत्यन्त चपलता से वहाँ से निकल जाता है। मनोनिग्रह करने में हम बड़े निश्चयी
उनतीसवाँ अध्याय ७६९
हैं, यह कह कर गिरिकंदराओं में चले जाते हैं किन्तु मन उन्हें भी ठग कर सबके सामने चपलता से निकल जाता
है। कोई मन का निग्रह करने के लिये अन्न का त्याग करते हैं लेकिन उसका परिणाम विचित्र होता है। उनका
मन जागृति में और स्वप्न में अन्नमय ही हो जाता है। इस प्रकार मनोनिग्रह करते समय मन और भी अधिक क्षुब्ध
हो उठता है। इस प्रकार मन का नियमन करने वाले बड़े-बड़े ज्ञाता साधन करके थक जाते हैं। वायु को गठरी में
बाँध सकते हैं, अग्नि को भी एक बार में पी सकते हैं; समुद्र को भी निगल सकते हैं लेकिन यह मन कभी भी
आत्मस्वरूप में नहीं रह पायेगा। आकाश को तह करके रख सकते हैं; महामेरु को पुड़िया में बाँध सकते हैं;
शून्य का गला टीप सकते हैं लेकिन इस मन का नियमन असम्भव है। सचमुच काल पर भी विजय प्राप्त की जा
सकती है; त्रिभुवन की सत्ता भी प्राप्त की जा सकती है; परन्तु हे अच्युत ! मनोनिग्रह की बात तुम्हारे बिना कैसे
साध्य होगी? मन तपस्वी लोगों को तत्काल धोखे में डालता है; मन नेमी लोगों का नियम टालता है; इस प्रकार
यह मन बल से भी अधिक बलशाली है। वह धैर्य की राख कर देता है। मन इन्द्र को नीचा दिखाता है, ब्रह्मदेव
को भी हठ से अटकाता है; इस प्रकार मन की जिद बहुत खराब है; उसे साधक अपने वश में नहीं कर सकते।
साधना करके मन कितना भी थक जाय, लेकिन मन पर विजय नहीं प्राप्त होती। हे अच्युत ! तुम्हारे बिना यह
मन नियमित नहीं होता। यदि अत्यन्त प्रयास करने से मनोजय प्राप्त हो भी जाय तो सिद्धियों का ढेर लग जाता है
और उससे साधकों का मन असमंजस में पड़ जाता है। तुम्हारी कृपा हुए बिना साधक मन को कभी वश में नहीं
कर सकते। तुम जनार्दन यदि सन्तुष्ट हो जाओ तो मन स्वयं ही अपना मनपन भूल जाता है। सारांश, भक्तिभाव से
तुम्हारी शरण में गये बिना साधक अपने मन को वश में नहीं कर सकते। इसलिये मनोनिग्रह के लिये तुम्हारी
शरण में आना ही पड़ेगा।
अथात आनन्ददुधं पदाम्बुजं हंसाः श्रयेरन्नरविन्दलोचन।
सुखं नु विश्वेश्वर योगकर्मभिस्त्वन्माययामी विहता न मानिनः ॥ ३ ॥
हे कमलापति ! हे कमलवदन ! हे कमलालय ! हे कमलनयन ! नाभिकमल में वास करने वाले ब्रह्मदेव को
तुमने ही ब्रह्मज्ञान दिया है। तुम्हारे चरणों का चरणामृत तुम्हारी कृपा से जिसे प्राप्त होता है, उसका मनोजय
सुनिश्चित हो जाता है। वह सांसारिक सुख के प्रति विरक्त हो जाता है। तुम्हारे चरणामृत की माधुरी तत्काल
मनोजय का लाभ करा देती है। आधिव्याधियों का विनाश करती है जिससे साधकों को स्वानंद की राशि प्राप्त हो
जाती है। इसलिये इस सारे साधनों का सार, महासमर्थ सांख्य योग और विवेक का भी सार कहना चाहिये। हे
श्रीकृष्ण ! भक्ति को रहस्य जान कर हृदय के प्रेम के प्रति जो आकृष्ट हुए वे ही विज्ञानयुक्त राजहंस भजन सार
का सेवन करते हैं। जिनका काया, वाचा और मन सद्भाव से सदा सम्पन्न रहता है, ऐसे भक्तों को तुम्हारे चरण
परिपूर्ण स्वानंद प्रदान करने वाले हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये विधियुक्त साधनों से ही प्राप्त होते हैं। उन
साधनों में जरा भी कमी होने से साधकों की हानि होती है लेकिन तुम्हारी भक्ति वैसी नहीं है। जीव-भाव से तुम्हें
भजने से भजन करने वालों पर कोई विघ्न नहीं आता। इसके विपरीत भक्त ही विघ्नों का नुकसान करता है। सूर्य
और जुगनू की यदि आराम से भेंट होगी, तभी विघ्न भक्तों के पास आने का साहस करेंगे। सिंह की गन्ध आते
ही मदोन्मत्त हाथी भी भागने लगते हैं। उसी प्रकार तुम्हारे भक्तिभावयुक्त भजन से विघ्न भागने लगते हैं। ऐसे
निश्चय से सम्पन्न होकर जो तुम्हारे चरणों के पास अनन्य भाव से आते हैं, उन्हें जन्म-मरण भी स्पर्श नहीं
करता, फिर अन्य विघ्नों की क्या बिसात है? ऐसी भावना से जो तुम्हारी शरण में आते हैं, उन्हें तुम्हारे चरण,
कामधेनु जिस प्रकार वत्स को तृप्त करती है, उसी प्रकार स्वानंद से सदा तृप्त करते हैं। भक्तिरूप निर्मल सरोवर
७७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
में नवविधा रसों का मधुर जल होता है, उसमें डूबे हुए तुम्हारे चरणकमल भावार्थ सूर्य के उदय के साथ ही
विकसित होते हैं। उसमें स्वानुभवी भ्रमर उन कमलों पर झपट्टा मारकर, आहिस्ते से, केसर को धक्का दिये बिना
सौख्यरूपी मकरंद का सेवन करते हैं। वहाँ आत्मानात्मविवेक करने वाले परमहंस उस सरोवर के राजहंस हैं। वे
तुम्हारे चरणकमलों के सान्निध्य में रहकर सरस मकरंद का उपभोग करते हैं। आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी भक्त ही
क्यों न हों, वे भी उसी सरोवर में रहते हैं, लेकिन उन्हें कमल के मकरंद के बारे में मालूम नहीं रहता। वे कमल
के तल के पास क्रीड़ा करते रहते हैं। श्रीकृष्ण ! ऐसे भोले भक्तों को तुम तारते हो। इस प्रकार जो भी तुम्हारी
भक्ति करते हैं उनका कोई नुकसान नहीं होता। भक्तिभाव से तुम्हारा भजन करने से, उस भावार्थ से ही तुम प्रसन्न
होते हो और तुम्हारे प्रसन्न होते ही तुम्हारे चरण उस भक्त पर स्वानंद की परिपूर्ण वर्षा करने लगते हैं। तुम
विश्वमूर्ति और विश्वंभर हो; तुम ही ब्रह्मादि देवताओं के ईश्वर हो। तुम्हारा अभयहस्त एक बार मस्तक पर पड़ने
पर भक्तों को भवभार स्पर्श नहीं करता। तुम्हारी भक्ति ही तुम्हारा सत्कर्म है, तुम्हारा भाव ही उनका स्वधर्म है;
तुम्हें उत्तम नैवेद्य अर्पण करना यही भक्तों का बहुत बड़ा यज्ञ है। नित्य तुम्हारे नाम का स्मरण करना यही भक्तों
का जप है और तुम्हारा मनोरम कीर्तन करना यही भक्तों की परम समाधि है। इस प्रकार भक्त जो जो कर्म करते
हैं, वह कर्म तुम स्वयं ही हो जाते हो। तुम मेघश्याम श्रीकृष्ण जिस पर प्रसन्न होते हो उसे भवभ्रम स्पर्श नहीं
करता। इस प्रकार तुम भजन के द्वारा भक्तों को आत्मसुख देकर तारते हो और उनके सुख के आनन्द में झूमते
रहते हो। इस प्रकार भक्तों को अनपेक्षित ढंग से, निजसुख से परिपूर्ण करते हो। ऐसा होते हुए भी जो तुम्हारी
शरण में नहीं आते, वे माया के मोह में फँस जाते हैं। तुम्हारे चरणों से जो विमुख हो जाते हैं; वे स्वप्न में भी
सुख का दर्शन नहीं करते। वे सदा निरन्तर बढ़ने वाला दुःख ही भोगते रहते हैं। माया ने उन्हें इस सीमा तक मूर्ख
बनाया रहता है। तुम्हारे चरणों का ध्यान न कर योग यागादि साधन करने से वह साधकों के लिये बन्धन ही हो
जाता है क्योंकि ज्ञातापन की अकड़ से अभिमान क्षुब्ध होता है। पूर्वश्लोक का चरण, 'त्वन्माययाऽमी विहता न
मानिनः' यह श्लोक का अन्तिम चरण है। उसका विचार करने पर, उसमें पण्डितों का ज्ञानाभिमान और अभक्त
भाव ही प्रकट होता है। हम ज्ञाता, हम योगी, हम ही श्रोत्रिय सारे संसार में पवित्र; हमारा ही मार्ग अत्यन्त शुद्ध
है; लोग अज्ञानी हैं, वैसे हम नहीं हैं; हमारा वचन सबके लिये प्रमाण होना ही चाहिये। इस प्रकार ज्ञाता लोग
अपने मन में ऐसा ही समझते रहते हैं। इस ज्ञानाभिमान ने ही उन्हें मूर्ख बनाया रहता है। वे शब्द पांडित्य के
घमण्ड में अपार दुःख भोगते हैं। सारांश, संसार में अभिमान जैसा बैरी कोई और नहीं है। वह ज्ञानाभिमान से
सज्जनों को भी चक्कर में डाल देता है। खैर, इन अभक्तों की कथा रहने दीजिये। वे भक्तिमार्ग से भटके रहने के
कारण ही, देह के अहंकार से व्यर्थ नाना प्रकार की व्यथा भोगते हैं। लेकिन जो भक्ति पर अपना चित्त न्योछावर
कर तुम्हारी अनन्य शरण में आये हैं उनको तुम जगन्नाथ तारने वाले हो। तुम अपने भक्तों को आत्मसुख में रखते
हो। तुम्हारे जो भी भक्त हैं, जिन्होंने भक्ति पर ही अपने प्राण न्योछावर किये हैं, उन्हें बिना माँगे ही आत्मज्ञान की
प्राप्ति होती है। हे श्रीकृष्ण ! तुम्हारा भजन करते रहने से, विघ्न भक्तों को कभी पीड़ा नहीं देते। वे अत्यन्त
सुखसम्पन्न हो जाते है कैसा आश्चर्य है ! जो अनन्य रूप से तुम्हारी शरण में आते हैं, तुम सदा उनके अधीन रहते
हो। इसी अर्थ का निरूपण उद्धव स्वयं सुना रहा है।
किं चित्रमच्युत तवैतदशेषबन्धो दासेष्वनन्यशरणेषु यदात्मसात्त्वम्।
योऽरोचयत् सह मृगैःस्वयमीश्वराणां श्रीमत्किरीटतटपीडितपादपीठः ॥४॥
हे श्रीकृष्ण ! तुम्हारे भक्तों को विघ्नों की बाधा नहीं होती यह बहुत बड़ी बात नहीं है क्योंकि तुम भक्तों के
उनतीसवाँ अध्याय ७७१
प्रेम में भूलकर सदासर्वदा भक्तों के अधीन होकर रहते हो। तुमने अपने दासों के अधीन रह कर (द्रौपदी के लिये
दुर्वासा को) आधीरात को भी अन्न की आपूर्ति की। अन्त में तुम तो भूखे ही रह गये। तुम्हारे हिस्से में सब्जी का
पत्ता ही आया। दोनों सेनाओं के बीच शस्त्रों की झंकार में अर्जुन के रथ का सारथी बनकर तुमने कष्ट सहे। अन्त
में उनके घोड़ों की भी धुलाई की। तुम्हारे मुकुट का आकलन वेदों को भी नहीं होता। घोड़ों की लगाम खींच
कर तुम वहीं घोड़ों को धोने लगे। तुम्हें इसमें लाज भी नहीं आयी। तुम भक्तों के इतने अधीन हो जाते हो यह
निश्चित है। जिसे कारागार से छुड़ाया, उस उग्रसेन को तुमने राजा बनाया; धर्मराज के घर की तो तुमने जूठन
उठायी; और नन्द के गौओं की रक्षा की। अस्तु ! तुम बालगोपालों के साथ मिलकर उनके साथ खड़े-खड़े भात
खाते थे और उनकी ही ताल पर नाचते थे। छुआछूत की बात नहीं की; वे केवल चरवाहा थे लेकिन उनका
उच्छिष्ट खाकर तुम स्वानंद में झूमते रहे। द्रौपदी पर आये भीषण संकट के समय उसकी पहनने वाली साड़ी तुम
स्वयं ही बन गये। गोपियों के प्रति प्रेम के कारण तुम उनके साथ नानाप्रकार से नाचे। एक गोपी पानी से भरी
गगरी लेकर जा रही थी, उसके पैर में काँटा गड़ा तो तुमने दोनों हाथों से उसका पैर पकड़कर काँटा निकाल
दिया। दुर्वासा को तुमने कन्धे पर वहन किया; बली के तो तुम द्वारपाल बन गये। इस प्रकार तुम भक्तों के अधीन
रहकर उनकी बात मानते हो। भगवान आप कहेंगे कि केवल मैं ही तुम्हारे गोपालत्व को सत्य मानता हूँ लेकिन
ऐसी बात नहीं है क्योंकि देवताओं को भी तुम पूज्य हो। हे श्रीकृष्ण! इन्द्र, चन्द्र, महेन्द्र, ब्रह्मवेद, बृहस्पति और
शंकर ये जो पूज्य देवता हैं, वे भी तुम्हारे दास हैं। तुम्हें नमस्कार करने के लिये देवताओं की भीड़ एकत्र होती है
जिससे तुम्हारी आसनी पर उनके कोटि-कोटि मुकुटों का घर्षण होता है जिसकी तीव्र झंकार उठती है। तुम्हारी
आज्ञा का पालन न करने पर ब्रह्मदेव जैसे देवता के मस्तक पर भी प्रहार होता है। तुम्हारी आज्ञा के भय से वायु
भी नियम से प्राण का संचालन करता है। उसी प्रकार हे गोविन्द ! तुम्हारी आज्ञा के भय से ही सूर्य दिनमान
चलाता है। तुम्हारी ही आज्ञा के भय से समुद्र सीमा का उल्लंघन नहीं करता और तुम्हारी ही आज्ञा से मेघ
यथासमय जल की वृष्टि करता है। तुम्हारी आज्ञा की महानता अगाध है। उसे साक्षात मृत्यु भी शिरसा वन्दन
करता है। योग्य समय पर ही वह प्रलय लाता है। आज्ञा के विपरीत काम नहीं करता। (आशंका) हे मुरारी !
शायद तुम कहोगे-कि मैं तो नंद का चरवाहा हूँ, उग्रसेन की सेवा करता हूँ इसलिये मेरा यह बखान व्यर्थ है।
लेकिन ऐसी बात नहीं है। तुमने काल के भी दाँत तोड़ कर गुरु के पुत्र को जीवित किया; इन्द्र ने गोकुल पर
अतिवृष्टि की उस समय तुमने उसे अच्छा सबक सिखाया। औरों की क्या बात करें ? गोपालों के साथ वत्स
बनकर तुमने ब्रह्मदेव को भी पागल बना दिया, अन्त में नंद के चरवाहा ही बन कर रहे। बाणासुर की पैरवी
करने के लिये शंकर लाल-लाल आँखें दिखाते हुए आये थे, किन्तु हे शारंगपाणी! हे ईश्वरेश्वर! तुमने आधे ही
क्षण में उन्हें पराजित किया। तुमसे भेंट करने की उत्कंठा क्षीरसागर वाले नारायण को लगी हुई थी। वह ब्राह्मण
लड़के के बहाने तुमसे भेंट करने की इच्छा कर रहा था। तुम भक्तों का कार्य सिद्ध करने वाले सिंह हो। अर्जुन
की प्रतिज्ञा सत्य करने के लिये कृष्ण-नारायण ने क्षीरसागर से भेंट की। उन दोनों के मिलन का आनन्द या रहस्य
संत ही जानें। उन दोनों ने एक-दूसरे को प्रगाढ़ आलिंगन में बाँध लिया। उस समय निजात्मसुख की माधुरी
अभिन्न थी। कृष्ण में नारायण मिले या नारायण में कृष्ण लीन हुए, यह समझ में ही नहीं आया। दोनों का द्वैतभाव
जाकर परिपूर्ण एक ही स्वरूप रह गया। तब अर्जुन को व्यथा हुई। उसे लगा मैं व्यर्थ ही कृष्ण से दूर चला गया।
इतने में उसे शेषशय्या पर श्रीकृष्ण ही नारायण स्वरूप में दिखाई दिये। तो तुम इस प्रकार भक्तों की सहायता
करने वाले तथा लीला भय से शरीर अवतार लेने वाले पुरुष हो। हे दीनोद्धारक श्रीकृष्ण! तुम नाना प्रकार के
अवतार धारण करते हो। इस प्रकार हे ऋषीकेशी ! तुम्हारी महिमा अगाध है। यह बात तुम्हारे इसी अवतार में
समझ में आयी। अखण्ड ऐश्वर्य की स्थिति, माया के आवरण के बिना होने वाली ज्ञानस्फूर्ति, अद्वयानंद कभी
च्युत नहीं होता इसलिये तुम्हें 'अच्युत' कहते हैं। इस प्रकार तुम अनंत और अपार हो। नियंता ईश्वर के भी
ईश्वर हो; भक्तों पर करुणा करने वाले हो। उसके बारे में भी सुनो। देवताओं के नमस्कार के लिये भी दुर्लभ तुम
रामचन्द्र लीलावतार चरित्र में रीछ और वानर को आलिंगन दे रहे थे। तुमसे बात करने के लिये वेद भी प्रतीक्षा
करते रहते हैं और तुम वानरों के कान में कहानियाँ सुना रहे थे। तुम्हारा ज्ञान वेदशास्त्रों की भी समझ में नहीं
आता। तुम वानरों से सलाह ले रहे थे और उनकी सलाह पर चल रहे थे। यज्ञों की आहुति भी तुम सरलता से
नहीं लेते लेकिन तुम बड़े प्रेम से वानरों के दिये फल उन पर कृपा करने के लिये खा रहे थे। इस प्रकार तुम
भक्तों के प्रेम का ख्याल करते हो। तुझमें विषमभाव नहीं है। तुम सारे संसार के आत्माराम हो। तुम अंतर्यामी के
निजसखा हो। तुम हृदयस्थ परमात्मा हो। तुझ में भूतों और भौतिकों के प्रति भिन्न भाव नहीं है। तुम जड़ को
चेतनता प्रदान करते हो, मूढ़ को ज्ञान देते हो और समस्त प्राणिमात्र को आनन्द प्रदान करते हो; तुम्हारी चित्सत्ता
पर ही सारा संसार चल रहा है। माता-पिता के प्रेम में सांसारिक भावना रहती है। तुम हृदयस्थ निजसखा हो तथा
सभी को सुख प्रदान करने वाले हो। इस प्रकार तुम सबके हृदय में वास करते हो तथा समर्थ होने के कारण
सबको वंद्य हो। तुम दीनों के कृपालु स्वामी हो तथा उनका हृद्गत जानने वाले हो। इस प्रकार, हे श्रीकृष्ण ! तुम
भक्तों के दीनदयाल हो। ऐसे प्रभु को छोड़कर सम्पत्ति से उन्मत्त हुए लोगों का भजन कौन करेगा?
तं त्वाखिलात्मदयितेश्वरमाश्रितानां सर्वार्थदंस्वकृतविद् विसृजेत को नु।
को वा भजेत् किमपि विस्मृतयेऽनु भूत्यै किं वा भवेन्न तव पादरजोजुषां न ॥ ५ ॥
ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर ये मायागुणों के अवतार हैं और तुम माया का नियंता ईश्वर होकर भक्तों पर
करुणा करने वाले एवं सुखदाता हो। तुम्हारी भक्ति करने से चारों पुरुषार्थ और चारों मुक्ति भक्तों को दण्डवत
करती आती हैं। तुम भगवान सर्वज्ञ होने के कारण भक्तों का मनोगत जानते हो। इतना ही नहीं बल्कि उन्हें जो
चाहिये वह सब तुम उन्हें देते हो। भावार्थ का भोक्ता एक तुम श्रीकृष्ण ही हो। वह लक्षण तुम्हारे सिवा किसी
और पर लागू नहीं होता। तुम उत्तमोत्तम स्वामी हो, तुम्हारे कारण साधकों को अत्यन्त सुख प्राप्त होता है। तुम्हारे
जैसा कोई अन्य है ही नहीं। तुम पुरुषोत्तम सबके स्वामी हो। तुम सभी के स्वामी हो; किन्तु अपने भक्तों पर
कृपालु हो। अग्नि, विष आदि संकटों से तुमने ही प्रह्लाद को बचाया। तुम्हें भक्तों पर करुणा आती है; उत्तानपाद
राजा के नन्हे बालक को वैराग्य सम्पन्न कर, उस ध्रुव को तुमने अटल बना दिया। विभीषण शत्रु का भाई था
लेकिन अनन्य भाव से तुम्हारी शरण में आया, उस पर कृपा करने के लिये तुमने रावण का उसके कुल के साथ
उद्धार किया। तुमने बली को धोखा देकर बाँधा लेकिन अन्त में तुझमें इतनी अधिक करुणा उपजी कि तुम लाज
छोड़कर उसके घर के द्वारपाल बन गये। इस प्रकार तुम्हें भक्त पर करुणा हो आती है; तुम भक्त के हृदय की बात
जानते हो। ऐसे स्वामी को छोड़ धनांध लोगों की कौन सेवा करेगा ? देहेन्द्रियों को सुख का जो आभास होता है
वह तुम्हारे ही सुख का अंश होता है। इस प्रकार तुम अपने सारे सुखों की निधि के साथ अनायास ही अपने
भक्तों पर प्रसन्न होते हो। केवल साधु ही तुम्हारी महिमा जानते हैं, तुम ज्ञानी पुरुषों का अभेद आत्मा हो। हे
पुरुषोत्तम ! तुम भक्तप्रिय हो। तुम्हारे सुख का कोई अन्त नहीं है। तुम्हारी सेवा के प्रेम के कारण भक्त आत्मसुख
से सुखी होते हैं। दैहिक द्वंद्वों के अथवा जन्म-मरण के दुःख स्वप्न में भी उनके निकट नहीं आयेंगे। तुम्हारे भक्त
उनतीसवाँ अध्याय ७७३.
तुम्हारे भजनसुख के कारण विषयों के प्रति विरक्त होकर समुद्रवलयांकित पृथ्वी का राज्य भी तुच्छ मानकर त्याग
देते हैं। सारे ऐश्वर्य के साथ यदि स्वर्ग भी भक्तों के पास आ जाय, तो जिस प्रकार राजहंस कीचड़ का कुण्ड
छोड़ देते हैं, उसी प्रकार वे भी स्वर्ग की उपेक्षा करते हैं। जो भजन में तल्लीन हो जाते हैं उन्हें तुम सुख स्वरूप
बना देते हो और देह में होते हुए भी विदेही बना देते हो। ऐसे भक्त सर्वत्र समभाव रखते हैं। हे श्रीकृष्ण! तुम
सर्वश्रेष्ठ स्वामी इस प्रकार भक्तों पर सदा सन्तुष्ट रहते हो। तुम्हारी सेवा करना भी कठिन नहीं है। सेवा करने के
लिये परदेश जाने की आवश्यकता नहीं होती। उसी प्रकार सेवा के लिये किसी विशेष समय की आवश्यकता
नहीं होती। सबके हृदय में रहने वाले तुम रात-दिन भक्तों के पास ही रहते हो। तुम्हारी सेवा के लिये धन की
आवश्यकता नहीं होती, अथवा शारीरिक कष्ट की भी जरूरत नहीं होती। तुम्हारे चरणों में मन रखना ही पर्याप्त
है। इतने से ही तुम स्वानंदधन सन्तुष्ट होते हो। सन्तुष्ट होकर तुम प्रपंच का भ्रम दूर करते हो। त्रिगुणों के साथ
सारा त्रिकूट मिथ्या होकर नष्ट हो जाता है। तुम ऐसे सेवनीय तथा कृपालु और दीनदयालु स्वामी हो। जो तुम्हारी
सेवा का त्याग करता है वह संभ्रमित, मूर्ख और मन्दबुद्धि है। पलकों का झपकना भी तुम्हारी ही इच्छा से होता
रहता है। तुम्हारी सेवा से जो पुरुष विन्मुख रहते हैं, वे भाग्यहीन और अत्यन्त पामर हैं। तुम्हारी सेवा सुख
स्वरूप ही है। उसकी उपेक्षा कर जो सर्वदा विषयों की विषैली लहरों की इच्छा करता है वह मूर्ख है जिन
विषयों का विशय लेश पास के आत्मसुख का विनाश करता है और जन्म-मरण के फन्दे में फँसा कर दुःसह
दुःख भोगने को विवश करता है, उन विषयों के विषदाता इन्द्र-महेन्द्र आदि अत्यन्त कंजूस रहते हैं। जो विषय
स्वार्थ के लिये उन्हें भजते हैं वे भी सचमुच भाग्यहीन ही हैं। भगवन्! तुम्हारी कृपा से तुम्हारे भक्त अत्यन्त
सुखसम्पन्न, अत्यन्त समर्थ एवं संसार में रहकर भी विरक्त हो जाते हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। तुम्हारे
चरणरज की सेवा करने वाले जो पृथुजनकादि राजा हैं, उन्हें इन्द्रादिक देवता भी वन्दन करते हैं और ऋद्धि-
सिद्धि भी उनके चरण छूती हैं। आकल्प तपश्चर्या कर जिन सिद्धियों की प्राप्ति नहीं होती, वे भक्तों की शरण में
आती है, इतनी तुम्हारी भक्ति श्रेष्ठ है। अन्य साधनों की अपेक्षा तुम्हारे भजन में मन रखने से सारी सिद्धियाँ
स्वाभाविक रूप से भक्तों की शरण में आती हैं। इस प्रकार भक्तों पर तुम्हारे अपार उपकार होते रहते हैं। उस
श्रीहरि के चरणों में लीन होने पर ही उस उपकार से उऋण हुआ जा सकता है। विलीन होना उसी प्रकार जैसे
प्रतिबिम्ब बिम्ब से मिल जाय, अथवा घट का आकाश महादाकाश में प्रवेश करे। इस प्रकार यदि तुझमें विलीन
न हों तो तुम्हारे उपकार की परिपूर्ति नहीं होती क्योंकि जो हमारे सारे मनोरथ पूर्ण करता है, उसे भूलना
अधःपतन है।
नैवोपयन्त्यपचितिं कवयस्तवेश ब्रह्मायुषापि कृतमृद्धमुदः स्मरन्तः।
योऽन्तर्बहिस्तनुभृतामशुभं विधुन्वन्नाचार्यचैत्यवपुषा स्वगतिं व्यनक्ति ॥ ६॥
सचमुच, तुझमें विलीन न होकर जो पुरुष ब्रह्मायु होकर, योगयाग करके थक गये, फिर भी उससे तुम्हारे
उपकारों की पूर्ति नहीं हुई। अस्तु! ज्ञानसम्पन्न लोग नाना प्रकार के साधन करते हैं, फिर भी उससे तुम्हारे
उपकारों की पूर्ति रत्तीभर भी नहीं होती। वह उपकार कौन सा है? तो हे दयासागर! तुम अपने भक्तों के अन्तर
के और बाहर के पातक नष्ट कर देते हो। अंतःकरण के पातक अंतर्यामी के रूप में तथा बाहर के पातक सद्गुरु
के रूप से तुम संकल्प के साथ विलीन कर देते हो। अंतर्यामी और सद्गुरु इन दोनों रूपों से तुम्हीं करुणा कर
भक्तों का संसारभार दूर कर आत्मनिश्चय धारण कराते हो। आत्मनिश्चय होने का लक्षण यही है कि 'मैं' तू बन
सहज ही विलीन हो जाता है; देहाभिमान अपने आप दूर हो जाता है; और जन्म, जरा, मरण का ही विलय हो
७७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जाता है। जन्म, जरा, मरण समाप्त होने पर भक्त सहज ही आनंदघन होकर रहते हैं। तुम्हारी इस कृपा से भक्त
पूर्णरूप से उपकृत हो जाते हैं। हे कृपामूर्ति ! तुम अपनी ऐसी स्वरूपस्थिति भक्तों को अर्पण करते हो। हमारे
स्वामी तुम श्रीकृष्ण, त्रिभुवन में देवताओं के भी पूज्य हो। ऐसे तुम्हारे प्रसाद से भक्त स्वानंद से सुखी होते हैं
और शेष प्रारब्ध के अनुसार सदा स्वानंद बोध से विचरण करते हैं। वे देह में होते हुए विदेही और कर्म करते
हुए अकर्ता बने रहते हैं। इस प्रकार भक्तों पर तुम्हारे अनेक उपकार हैं। उनसे वे कैसे उबर पायेंगे ? उबर पाने के
लिये वे क्या करें ? क्योंकि मन को मनपन तुम्हारे ही कारण आता है। बुद्धि को निश्चय तुम्हारे ही योग से आता
है; और इन्द्रियों का स्फुरण तुम्हारे ही कारण होता है। आँखों का खुलना, बन्द होना तुम्हारे ही योग से होता है।
ऐसे तुम्हारे नित्य नये उपकार हैं। तुम्हारे उन उपकारों की पूर्ति मनुष्यों से कभी नहीं होगी। जो भी कोई साधन
करो वह तुम्हारी ही कृपा से सिद्ध होता है। इस प्रकार उपकार कर तुमने बड़े-बड़े लोगों का उद्धार किया है।
लेकिन जिससे भोले-भाले लोग सुलभ तरीके से यह संसारसमुद्र तर सकें ऐसा उपाय बताओ। हे कृपामूर्ति
श्रीकृष्ण ! भले, श्रद्धालु स्वस्वरूप की प्राप्ति सुगम रीति से कर सकें ऐसा उपाय बताओ। तुम्हारे निजधाम जाने
के बाद, हे मेघश्याम ! हे पुरुषोत्तम ! जिससे दीन दुर्बल तर कर जा सकें ऐसा उपाय मुझे बता कर रखिये। यह
कहकर उद्धव ने दण्डवत किया और श्रीकृष्ण के चरण मस्तक से लगाकर बोला, गरीब श्रद्धालु लोगों के तरने
का उपाय बताइये। उद्धव ने दीनजनों का तथा त्रिभुवन का भी उद्धार हो इसलिये प्रार्थना की। उसे सुनकर
कृपासागर श्रीकृष्ण सन्तुष्ट हुए। उद्धव ने इस प्रकार श्रीकृष्ण की प्रार्थना की यह देखकर शुक्राचार्य को भी मन
ही मन आनन्द हुआ और आनन्द के उसी आवेग में उन्होंने कहा, हे राजा परीक्षित ! ध्यानपूर्वक सुनो। त्रिभुवन
का उद्धार करने के लिये सुगम उपाय बताने के लिये उद्धव ने श्रीकृष्ण से बिनती की, इससे दयासागर श्रीकृष्ण
सन्तुष्ट हुए। संसाररूपी समुद्र को तारने के उपाय का बीज जिस मार्ग से सुलभ रीति से साध्य होगा, उसे श्रीकृष्ण
अब बताएंगे। श्रीकृष्णनाथ निजधाम को चले जाने के बाद सारे दुर्बल लोगों को तरने के लिये तथा ब्रह्म प्राप्ति के
लिये उद्धव ने यह सेतु ही बना दिया है। उद्धव ही इस प्रश्नोत्तरी से शुक्राचार्यजी को भी अत्यन्त आनन्द हुआ
और उसी का निरूपण वे परीक्षित को सुना रहे हैं।
श्रीशुक उवाच
इत्युद्धवेनात्यनुरक्तचेतसा पृष्टो जगत्क्रीडनकः स्वःशक्तिभिः ।
गृहीतमूर्तित्रय ईश्वरोश्वरो जगाद सप्रेममनोहरस्मितः ॥ ७ ॥
जो ज्ञानियों का शिरोमणि है, जो ब्रह्मचारियों का मुकुटमणि है, योगियों में जो अग्रगण्य है, जिन्हें सिद्ध भी
वन्दन करते हैं; जो ब्रह्मज्ञान का निजनिधि है, जो स्वानंदबोध का समुद्र है, जो भूतदया का क्षीराब्धि है, वह शुक
स्वानुभव से बताने लगा। हे भाग्यवान परीक्षित ! पाण्डव कुल की तुम अगाध कीर्ति हो, कौरव कुल में तुम्हारे
रूप से भक्ति कायम है। त्रिभुवन में आजकल धर्म संस्थापक तुम ही हो। मेरी बात सुनो। संसार का जो यह
अद्भुत रूप दिखायी देता है, वह उसकी लीला का एक खिलौना है। वह खिलौना भी वह स्वयं ही बनकर,
अलिप्त होकर खेलाता है। अद्भुत दिखायी देने वाला यह संसार, उसकी सत्ता से क्रीड़ा करता है और यह सारा
संसार ही जिसका क्रीड़ास्थल है, उसके कारण ही संसार को संसारपन प्राप्त हुआ है। इस प्रकार जगद्रूप से
क्रीड़ा करने वाला श्रीकृष्ण, जो ईश्वर का भी ईश्वर है; मायादि तीनों गुण उसके ही योग से प्रकाशित होते हैं।
मायागुणों के अवतार जो उत्पत्ति, स्थिति और संहार करने वाले ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं वे भी उसके
उनतीसवाँ अध्याय ७७५
आशाधारी हैं। श्रीकृष्ण से अनेक लोगों ने प्रार्थना की थी, लेकिन वह सब उनके अपने कार्य तक सीमित थी
किन्तु उद्धव ने नम्रतापूर्वक जो प्रश्न पूछा वह संसार के उद्धार के लिये उपकारी था। उस प्रश्न से श्रीकृष्ण को
अत्यन्त संतोष हुआ वे अब सुगम उपाय से ब्रह्मप्राप्ति का साधन बतायेंगे। इसलिये, जिससे भोले-भाले
श्रद्धालुजन तत्काल समाधान प्राप्त कर सकें ऐसा सरल ब्रह्मज्ञान श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं। ज्ञानमार्ग के राही
यदि जीवभाव से छलांग लगायेंगे तो उद्धव के प्रश्न की चाह से उन्हें भी सुलभ रीति से ब्रह्मज्ञान प्राप्त होगा।
मोहमाया की जंजीर पहनकर जो अहंकार के कारागार में पड़े हुए हैं, उन्हें भी तत्काल छुटकारा प्राप्त हो, इसकी
उद्धव के मन में चिन्ता थी। उद्धव भाग्यवान था, उसने संसार का उपकार करने के लिये प्रश्न किया; इसलिये
श्रीकृष्ण सन्तुष्ट होकर, अत्यन्त आदर के साथ बोलने लगे। श्रीकृष्ण का मुख वैसे भी सुन्दर था, तिस पर मनोहर
हास्ययुक्त हो जाने के कारण वह और भी अधिक रमणीय दिखायी देने लगा। श्रीकृष्ण उल्हास से, गम्भीर वाणी
में बोलने लगे।
श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि मम धर्मान् सुमङ्गलान्।
याञ्छ्रद्धयाऽऽचरन् मर्त्यो मृत्युं जयति दुर्जयम्॥८॥
जो प्रणव का शुद्ध सार है, जो ज्ञान की सच्ची लगन है, जो चैतन्य का मानों चमत्कार हैं और जो परावाणी
से भी परे है, वे श्रीकृष्ण मेघसमान गम्भीर वाणी से गर्जना करते हुए स्वानंद से बोले, उद्धव! तुम्हारी वाणी धन्य
है। तुम्हारे प्रश्न से मुझे समाधान हुआ। यदि भोले-भाले लोगों को सुगमरीति से ब्रह्मप्राप्ति होनी है तो उसके
लिये मेरी भक्ति समर्थ है। मैं श्रीकृष्ण सदा उसके ही वश में रहता हूँ। मेरा अनन्य भाव से भजन करने से मैं
सदा भक्त के अधीन रहता हूँ। उसमें जाति, गोत्र, ज्ञातापन, ऊँच-नीच, वर्ण आदि मैं कुछ भी नहीं देखता। अब
जिससे उत्तम भजन हो सके, वह भागवत धर्म तुम्हें बताता हूँ। इससे कर्माकर्म आदि सब नष्ट होकर जन्म-मरण
का भी नाश होता है। उस धर्म का स्वयं आचरण करने से भवव्यथा समूल खन कर बाहर निकल आती है। उस
धर्म के योग से साधकों को स्वभावतः सुख सम्पत्ति प्राप्त होती है। जिस धर्म का स्तवन करने से असत्यादि दोषों
का निर्मूलन होता है, जिस धर्म का निष्ठापूर्वक श्रवण करने से विषयवासना का नाश होता है, वे मेरे धर्म अत्यन्त
पवित्र हैं तथा कलियुग के पातकों और दोषों को नष्ट करने वाले हैं; उनके भजन से मंगल का भी मंगल होता
है। मेरे धर्म का श्रद्धापूर्वक आचरण करने से मेरे स्वरूप के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है और उससे भवभ्रम नष्ट
होकर जन्म-मरण चूक जाता है। जो मृत्यु ब्रह्मदेव को भी निगल लेता है; हरिहर का भी संहार करता है, वह
मृत्यु संसार में अत्यन्त असाध्य है। देवदानव भी उससे थर-थर काँपते हैं। उस मृत्यु का भय खनकर बाहर
निकालकर, कलिकाल के दाँत तोड़कर; मेरे भक्त अद्वय भजन से संसार में सुखपूर्वक रहते हैं। उद्धव! तुम मेरे
निजसखा हो, इसलिये मेरे भजन का सामर्थ्य उसकी पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर संक्षेप में बताता हूँ, सुनो।
कोटि-कोटि शस्त्रों का घाव शरीर पर लगने पर भी वीर योद्धा उसमें से बच जाता है लेकिन वही मर्म पर एक
ही प्रहार होने पर तत्काल मर जाता है। उसी प्रकार नानाप्रकार के साधन करने से भी जन्म-मरण नहीं टलता
लेकिन मेरा थोड़ा-सा भी भजन करने से उनका समूल विनाश हो जाता है। शुक्राचार्य एकनाथ के मुख से बोलते
हैं। घनश्याम मेघ यही एक बड़ा मेघ है; उसने उद्धवरूपी चातक के लिये स्वानंदरूपी जीवन की वृष्टि की
जिससे त्रिभुवन सुखी हुआ। वर्षाकाल समाप्त होने पर शरदऋतु का जल अत्यन्त मनोरम दिखायी देता है, उसी
७७६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रकार यह उनतीसवाँ अध्याय भजन से समर्थ होने के कारण उसमें सुख के कल्लोल सुनाई देते हैं। एकादश
स्कंध के अन्त में सुगम रीति से ब्रह्मप्राप्ति हो इसलिये श्रीकृष्ण स्वमुख से भक्ति के उत्तम से उत्तम प्रकार बता
रहे हैं।
कुर्यात् सर्वाणि कर्माणि मदर्थं शनकैःस्मरन् ।
मय्यर्पितमनश्चित्तो मद्धर्मात्ममनोरतिः ॥ ९॥
देशाचार, कुलाचार अथवा वृद्धाचार आदि के अनुसार प्राप्त हुए वेदोक्त नित्यनैमित्तिकादि कर्तव्यों को
'कर्म' कहते हैं। इसी में मेरे सन्दर्भ में किये हुए कर्म को 'साधारण' मदर्पण कहते हैं और कर्म के अन्दर बाहर
मैं ही हूँ यह जानकर किये हुए कर्म को 'मुख्य-मदर्पण' कहते हैं और यह बिना प्रयास किये होता है। सारा कर्म
मेरे ही कारण प्रकाशित होता है; कर्म क्रिया मेरे ही कारण भासित होती है; इस दृष्टि से जहाँ समूल कर्म को
देखा जाता है वह अनायास होने वाला मदर्पण है। कर्म का आदि मैं; कर्मकर्ता मैं; कर्म में कर्मसिद्धि का दाता मैं;
कर्म में कर्म का फलभोक्ता भी मैं, इसी को कर्म का 'कृष्णार्पण' कहते हैं। परन्तु सहसा मन ऐसा नहीं करता।
इसके लिये धीरे-धीरे अनुसंधान अखण्ड चालू रखने से मन स्वस्वरूप में प्रवीण अर्थात् तल्लीन होता रहता है।
लेकिन जब मन को यह अनुसंधान अच्छा न लगने लगे, उस समय मेरा नामस्मरण करें। मेरे स्मरण से मन मेरे
भजन में अनुसंधान करने लगता है। भजन का इस प्रकार अभ्यास बढ़ने पर, मन को आत्मस्वरूप से प्रीति होने
लगती है और फिर बुद्धि भी वहीं डुबकी लगाती है और अभिमान भी देह की अहंता छोड़ देता है। मन को मेरे
स्वरूप से अलग कोई स्थान नहीं है। इस प्रकार मन मेरे प्रति रहने से उसे 'मदर्पण' कहते हैं। इस प्रकार
मत्स्वरूप में मन निमग्न हो जाय तभी उसे मेरा भजन अच्छा लगा ऐसा समझना चाहिये। मेरी भक्ति से ही मेरे
भक्त परम पावन होते हैं। तुम कहोगे कि विषयनिष्ठ मन भजन का अनुसंधान कभी नहीं करेगा। उसके लिये भी
श्रीकृष्ण उत्तम उपाय बता रहे हैं।
देशान् पुण्यानाश्रयेत मद्भक्तैः साधुभिः श्रितान् ।
देवासुरमनुष्येषु मद्भक्ताचरितानि च ॥ १० ॥
कुरुक्षेत्र यह पवित्र देश है; अयोध्या भी पवित्र देश है। गंगायमुना के दोनों किनारों पर के प्रदेश और
अर्बुदाचल भी अत्यन्त पवित्र है। कलापग्राम, नंदिग्राम, बद्रिकाश्रम देश भी अत्यन्त पवित्र हैं। पंचवटी का श्रीराम
का आश्रम और गोदावरी तट भी अत्यन्त पवित्र है। जहाँ श्रीराम ने अपने चरण रखे थे वह दण्डकारण्य भी
अत्यन्त पवित्र देश है। मथुरा, गोकुल, वृन्दावन और ब्रह्मगिरी भी अत्यन्त पावन हैं। पांडुरंग क्षेत्र भी अत्यन्त
पावन है, उसी को दक्षिण द्वारावती भी कहते हैं। वहाँ विठ्ठल की मूर्ति है जहाँ पंढरी का जयघोष होता है।
पंचक्रोशी काशी तो सभी पातकों का संहार करती है। वाराणसी यह देश पुण्यकारक होते हुए साधकों के लिये
अत्यन्त सहायक है। जहाँ पवित्र नदियाँ बहती हैं, वह प्रदेश भी साधकों के लिये पवित्र है। गंगा, यमुना,
सरस्वती, साबरमती, वैतरणी, गंडकी, नर्मदा, तापी, गोदावरी, भीमा, कृष्णा, वेण्या, तुंगभद्रा, गोमती ये नदियाँ
तथा श्रीशैलस्थान भी पावन है। कावेरी के दोनों तट तथा चिदम्बर क्षेत्र भी पवित्र है। प्रतीची नदी भी उसी प्रकार
पवित्र है। उसके जल से मनुष्य पावन होते हैं। कृतमाला, पयस्विनी, अत्यन्त पवित्र ताम्रपर्णी, उसी प्रकार
नैमिषार अरण्य के पवित्र प्रदेश ये सब साधकों के सेवन के लिये सुयोग्य स्थल हैं। इस पवित्रता की महिमा
छोड़िये। पवित्रता की अपेक्षा भी एक और बात है। जहाँ सज्जन भक्त रहते हैं, वह देश भी सभी दृष्टियों से
उनतीसवाँ अध्याय ७७७
पवित्र है। जिस गाँव में मेरे भक्त रहते हैं, उनकी संगति से वह गाँव भी पवित्र हो जाता है और जिस देश में
साधु-महात्मा रहते हैं, उनकी संगति से वह देश भी पवित्र हो जाता है। भक्तों की हवा जिधर भी लगती है उधर
पवित्रता होने लगती है। वह सत्संगति जिन्हें प्राप्त होती है उनमें भी पवित्रता आती है। चंदन की संगति से बैर,
बबूल भी सुवासिक हो जाते हैं और उन्हें देवता तथा ब्राह्मण मस्तक पर धारण करते हैं। उसी प्रकार सत्संग भी
साधकों को सर्ववंद्य कर देता है। इस प्रकार शुष्क काष्ठ भी संगति से मूल्यवान हो जाता है; अमीर उन्हें पसन्द
करते हैं और वह हरिहर के मस्तक पर भी चढ़ता है। भाग्य यदि अनुकूल हो तभी सत्संगति प्राप्त होती है;
सत्संग से साधक पवित्र हो जाते हैं, यह निश्चित जान लो। जिसका चित्त भजनयुक्त होकर मुझमें रम जाता है,
उसी को भक्त कहना चाहिये और वे ही संत सज्जन हैं। मेरे भक्तों के आचरण को सुर, नर और असुर भी वंदन
करते हैं; साधकों को भी निश्चित रूप से इसी की साधना करनी चाहिये। नारद, प्रह्लाद, अंबरीष आदि श्रेष्ठ
लोगों ने जिस भक्ति का अनुसरण किया वही भक्ति साधकों को भी रात-दिन सद्भावपूर्वक साधनी चाहिये।
पृथक्सत्रेण वा मह्यं पर्वायात्रामहोत्सवान्।
कारयेद गीतनृत्याद्यैर्महाराजविभूतिभिः ॥ ११ ॥
प्रतिवर्ष यात्राओं का आयोजन करें, पर्वकाल की पूजा में गरुड़ध्वजांकित चिह्नों से युक्त छत्रचामरादि
राजोपचार भक्तिभाव से श्रीकृष्ण को अर्पण करें। इस प्रकार के सार्वभौम राजैश्वर्य का भोग श्रद्धापूर्वक भगवान
को अर्पण करें, भजन के प्रति रात-दिन मन में अदम्य उल्हास रखें। अश्व, हाथी अथवा शेष, गरुड़ आदि वाहनों
पर अथवा पालकी में उनकी शोभायात्रा निकालें। उसी प्रकार रथोत्सव भी करें। करताल, मृदंग, झण्डे, शंख,
झांझ आदि वाद्यों का गजर ऐसे करें कि आकाश में उसका स्वर गूँज उठे, जयजयकार की गर्जना करें। गायन
और नृत्य का कार्यक्रम करें, पोवाड़े गायें, प्रेमपूर्वक कीर्तन करें। उसी प्रकार भगवान के सामने उछलकूद करते
हुए कीर्तन करें, मुँह टेढ़ाकर भगवान के साथ मसखरी करें; सभा में गर्जना कर भगवान का गुणगान करें।
गोपालकाला और रासक्रीड़ा का खेल करें। अनेक प्रकार के कौशल से दण्ड, छाती, मस्तक आदि की टक्कर से
शरीर की स्वस्थता का प्रदर्शन करें। कुवलयापीड नामक मत्त हाथी के दाँत उखाड़कर गोपालकृष्ण के वेश में
झूमते हुए सभा में प्रवेश करें। भगवान की महानता की स्तुति का पाठ करें। यदि धन की समर्थता हो तो उत्सव
स्वयं ही करें अन्यथा लोगों के साथ मिलजुल कर उत्सव करें। इस प्रकार एकनिष्ठ प्रेम से और चाव से भजन
करने से मेरी भक्ति की चाह बढ़ती है और सहज ही हरि का प्रेम उत्पन्न होता है। सप्रेम भक्ति करने से 'मैं' भक्तों
पर प्रसन्न होता हूँ और मेरे भक्त को अंतरंग भजन स्वयमेव प्राप्त होता है। अब 'अंतरंग भक्ति' के बारे में पूछोगे
तो उसका लक्षण उद्धव को श्रीकृष्ण स्वयं अपने मुख से बता रहे हैं।
मामेव सर्वभूतेषु बहिरन्तरपावृतम्।
ईक्षेतात्मनि चात्मानं यथा खममलाशयः॥ १२॥
श्रद्धायुक्त भक्ति करने से चित्तवृत्ति शुद्ध होती है और उससे गुरुकृपा से मेरे भक्तों को आत्मदृष्टि की स्थिति
प्राप्त होती है। उस आत्मदृष्टि से देखने से समस्त प्राणिमात्र भीतर उसे मैं ही दिखायी देने लगता हूँ, अन्दर में मैं
हूँ ऐसा निश्चय जो करता है तभी प्राणिमात्र के बाहर भी मैं ही उसे दिखायी देने लगता हूँ। पर और अवर से परे
रहने वाला अनंत, मैं भगवान प्राणिमात्र के अन्दर-बाहर रहता हूँ। मेरा भक्त मैं बनकर ही मद्रूप से मुझमें आकर
मिलता है। जितनी और जैसी मेरी व्याप्ति होती है उसी के अनुसार मेरे भक्त की स्थिति होती है। इसलिये वह
७७८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जिस व्यक्ति को भी देखता है, उसमें उसे मेरे स्वरूप का अनुभव होता है। जिस प्रकार घट में घटाकाश रहता है
और वही घर के भीतर-बाहर महदाकाश के रूप में रहता है, उसी प्रकार मैं चित्स्वरूप प्राणीमात्र के भीतर-बाहर
आत्मस्वरूप बनकर रहता हूँ। निश्चयपूर्वक तथा आत्मप्रतीति से समस्त प्राणिमात्र के प्रति भगवद्भावना रखना
यही भक्तों के भगवद्भजन करने की पद्धति है। उसी को श्रीकृष्ण यथार्थ रूप से बताते हैं।
इति सर्वाणि भूतानिमद्भावेन महाद्युते।
सभाजयन् मन्यमानो ज्ञानं केवलमाश्रितः ॥ १३॥
उद्धव ! तुम बहुत भाग्यवान हो। तुम ज्ञान के निधि तथा कैवल्य के दीप हो। समस्त प्राणिमात्र में रहने
वाला मेरा रूप वास्तव में सबाह्य व्यापने वाला चित्स्वरूप है। इस प्रकार समस्त प्राणिमात्र में मेरा स्वरूप समाया
हुआ है, इस भावना से जो मेरी भक्ति करता है, वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को समदृष्टि से देखता है। भिन्न रूप,
भिन्न नाम, भिन्न स्थिति, भिन्न कर्म, इस प्रकार यह संसार विषम दिखाई देते हुए भी मेरे भक्तों के प्रति मेरी भावना
सर्वत्र सम ही रहती है। भिन्न-भिन्न प्राणियों को देखकर भी जिसका ज्ञान भिन्न नहीं होता, जो मेरी भावना से
सबकी समान रूप से सेवा करता है, उस पर मेरी भक्ति प्रसन्न होती है और मेरी भक्ति जिस पर प्रसन्न रहती है
उसका मैं श्रीकृष्ण आज्ञाधारक रहता हूँ क्योंकि वह सभी भूतों में निश्चित भगवद्भावना धर कर उपासना करता
है। (आशंका) तुम्हारे वेदों की आज्ञा तो माननी ही चाहिये। उसमें कहा गया है कि ब्राह्मण को अत्यन्त पूज्य
मानें, असुरों की अर्थात् दुष्टों की उपेक्षा करें। चाण्डालों को अत्यन्त निंद्य समझें। जो भी कर्मभ्रष्ट हो उनका मुँह
भी न देखें। यह निष्ठुर वेदमर्यादा तुमने ही बना दी है। अतः सारे प्राणी एकसमान हैं इस दृष्टि से
भगवद्भजन कैसे सम्भव है ? यदि ऐसा विकल्प तुम्हारे मन में आ रहा हो तो भक्ति की महिमा सुनो। जब तक
घनी अँधेरी रात रहती है, तभी तक दीपक की प्रतिष्ठा है। सूर्योदय के उपरान्त दीपक का प्रकाश नहीं के बराबर
होता है। उसी प्रकार जब तक दृढ़ अज्ञान है, तभी तक वेदाज्ञा प्रमाण है; किन्तु जिसे मेरा अभेद भजन प्राप्त हो
उसे वेद स्वयं प्रणाम करता है। बेचारे वेद की क्या बिसात है ? जिसे मेरी अभेद भक्ति प्राप्त हुई हो, उसे मैं
श्रीकृष्ण भी वन्दन करता हूँ और सदा उसके वश में होकर रहता हूँ। जहाँ पूर्ण अभेद भक्ति रहती है उसके घर मैं
सेवक बनकर रहता हूँ। उसके संसार की देखरेख मुझ पर निर्भर होने के कारण मैं उसका योगक्षेम चलाता हूँ।
अभेद भक्ति की महिमा ही ऐसी है कि आत्मज्ञान उसके चरण छूता है। वहाँ वंद्य-निंद्य एक समान रहते हैं।
विषम में भी मन में विकार उत्पन्न नहीं होता।
ब्राह्मणे पुल्कसे स्तेने ब्रह्मण्येऽर्के स्फुलिंगके।
अक्रूरे क्रूरके चैव समदृक् पण्डितो मतः ॥ १४॥
जिनके पदरज का वंदन करने से हम पवित्र होते हैं, ऐसे पुण्यपूज्य ब्राह्मण, जिनका चरण श्रीहरि ने अपने
हृदय पर धारण किया है, ऐसे अत्यन्त वन्दनीय ब्राह्मण, और चाण्डालों में भी अत्यन्त निंद्य पुल्कस भी उस श्रेष्ठ
ब्राह्मण की ही तरह हरिरूप है ऐसा जो भक्त समझता है, सुवर्ण का विष्णु हो और सुवर्ण का ही श्वान हो तो
उसमें से एक वंदनीय और दूसरा निंदनीय लगता है लेकिन बाजार में बेचने जाओ तो दोनों का एक ही मूल्य
मिलता है। उसी प्रकार आत्मस्वरूप में निंद्य और वंद्य दोनों एक समान हैं। पुल्कस और ब्राह्मण जातिभेद के
अनुसार विषम हैं किन्तु आत्मदृष्टि से देखने पर दोनों ही चिद्रूप में समान हैं। जो जानबूझकर ब्राह्मण का धन
चुराता है और वह जो ब्राह्मण पर उपकार करता है, वे दोनों ही आत्मदृष्टि से सम हैं तथा मद्रूप दिखाई देते हैं।
उनतीसवाँ अध्याय ७८९
ऐतैर्दोषैर्विहीनाय ब्रह्मण्याय प्रियाय च।
साधवे शुचये ब्रूयाद् भक्तिः स्याच्छूद्रयोषिताम् ॥ ३१ ॥
उपदेश देने के लिये पूर्ण अधिकार यह है कि उसमें प्रखर वैराग्य हो। वह भी पिशाच वैराग्य नहीं, बल्कि
विवेक सम्पन्न तथा शास्त्र शुद्ध वैराग्य चाहिये। अन्यथा चार दिन वैराग्य धारण करेगा और तत्काल विषयों की
ओर मुड़ जायेगा। ऐसे को उपदेश करना, दूध पिलाने की तरह है क्योंकि वैराग्य चला जाने के बाद केवल ज्ञान
का अभिमान शेष रहता है। उस अभिमान से यह क्या करता है ? तो श्रेष्ठ लोगों के गुणदोष देखता है।
कनिष्ठोंकी अवहेलना कर उनकी निन्दा करना तथा श्रेष्ठ लोगों के गुणदोष देखना। वैराग्य क्षीण होने पर इस
प्रकार का ज्ञानाभिमान जागृत होता है। उद्धव ! इस संसार में केवल दो ही अवस्थाएँ हैं। पहली विरक्ति तथा
दूसरी विषयासक्ति तीसरी कोई अवस्था होती ही नहीं। जहाँ विवेक से विषय क्षीण होते हैं वहाँ परिपूर्ण वैराग्य
बढ़ता है और जहाँ विवेक के साथ वैराग्य क्षीण होता है, वहाँ ज्ञानाभिमान से विषयाचरण होने लगता है।
इसलिये ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने तक पूर्णरूप से वैराग्य कायम रखता है तथा वैराग्य युक्त होकर अनन्य भाव से गुरु
की शरण में जाता है वही उपदेश के लिये अधिकारी रत्न है, ऐसा समझना चाहिये। पिछले श्लोक में दोषों का
निरूपण वैराग्य के लिये समझना चाहिये। इन दोषों से जो रहित होता है, वही सच्छिष्य है। जो ब्राह्मणों की
ब्रह्मभाव से भक्ति करता है, जो भूतों को अनन्य भगवद् भाव से भजता है, उसकी भक्ति और विरति दासी बन
जाती हैं। उसे ही सचमुच अधिकारी समझना चाहिये। गुरु का अत्यन्त प्रिय भी हो लेकिन यदि अभक्त हो तो
भजन करने तक उसे भी ब्रह्मज्ञान नहीं प्राप्त होगा। गुरु को प्रिय तथा भजनशील और दोषरहित हो तो ऐसे शिष्य
की विरक्ति को अटल बनाकर उसे पूर्ण ईमानदारी से इस गुप्त ज्ञान का उपदेश करना चाहिये। स्वपत्नी तथा
स्वधन का जिसे अत्यन्त लोभ हो तो उसे न स्वर्ग मिलेगा, न मुक्ति ही। असीम जन्म-मरण अवश्य भोगना
पड़ेगा। परस्त्री और पराया धन को जिसका मन कभी स्पर्श नहीं करता, ऐसे पवित्र व्यक्ति को इस ज्ञान का
उपदेश करना चाहिये। जो वैराग्य के साँचे में ढला हुआ है, विवेक से जो परिपूर्ण है, जीवभाव से जो सद्गुरु की
सेवा के लिये समर्पित है और अनन्यभाव से उनके चरणों पर गिरा हुआ है; उसी प्रकार अपनी महानता भूलकर
जो गुरु सेवा के लिये रंक होने को तत्पर है, ऐसी सेवा के प्रति जिसका पूर्ण सद्भाव रहता है, इन्द्र जैसे बड़े-बड़े
देवतागण को भी जो सद्गुरु का दास मानता है और सद्गुरु की अपेक्षा हरिहर को भी श्रेष्ठ नहीं मानता; जिसमें
न गर्व है न मद, जिसमें कामक्रोध नहीं है, जिसे विकल्प भेद पसन्द नहीं है, उसी शिष्य को पूर्णरूप से परमार्थी
समझना चाहिये। काया, वाचा, मन, धन छोड़ तथा बड़प्पन की अकड़ छोड़कर जो अनन्य भाव से सद्गुरु की
शरण में जाता है, उसे ही साधुत्व की दृष्टि से सच्छिष्य समझना चाहिये। लोक लज्जा को छोड़कर जो ब्रह्मज्ञान
का याचक बनता है और सद्गुरु के उपदेश के लिये चातक बनकर रहता है, उसे अवश्य उपदेश करना चाहिये।
जो तीन वर्णों से अलग हैं, वेदों ने जिन्हें अपने से दूर करके रखा है, जिन्हें मंत्रों का अधिकार नहीं है, जो श्रवण
के भी अधिकारी नहीं हैं, जिनका आश्रमधर्म नहीं है, वैदिक कर्म नहीं है, जप अथवा होम नहीं है, जो अधमवर्ण
के कारण नीच हैं, ऐसे शूद्रादि लोग, उनमें भी इस ग्रन्थ का ज्ञान पढ़कर जन्म-मरण निवारण करने के लिये तीव्र
वैराग्य उत्पन्न होता है। ऐसे लोगों को मन से विषयों से घृणा होती है और वे काया, वाचा तथा मन से सद्गुरु को
अनन्य भाव से शरण जाते हैं। गुरु से किस तरह प्रश्न किया जाय, यह भी उनकी समझ में नहीं आता। जन्म-
मरण से मुक्ति पाने के लिये वे भक्ति से साष्टांग दण्डवत करते हैं। परमार्थ के प्रति उन्हें शुद्ध और परिपूर्ण श्रद्धा
रहती है। ऐसे लोग भले ही शूद्र क्यों न हों लेकिन उन्हें ब्रह्मज्ञान का उपदेश करने से कभी दोष नहीं लगता। मेरे
७८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
है। अरे! मनुष्य देह में ही जो ब्रह्मस्वरूप की भावना रखता है, वही सच्चा भाग्यवान है। चारों मुक्ति का राजा
संसार में निश्चित रूप से वही है। समस्त प्राणियों में भगवद्भाव रखना यही जिसका अखण्ड साधन है, उस पुरुष
का देहाभिमान एक क्षण में, अपने आप निकल जाता है। देह का अहंकार निकल जाता है, उस समय वह स्पर्धा,
ईर्ष्या, तिरस्कार आदि परिवार के साथ समूल बाहर निकलता है। देह पर ममता करना यही 'अभिमान' है। अपने
साथ वाले लोगों के ज्ञान की भर्त्सना करना, इसी का नाम 'स्पर्धा' है और अपनी अपेक्षा दूसरे का ज्ञान अधिक
है, यह जानकर भी उसके गुणों में दोष खोजना इसी का नाम 'ईर्ष्या' है। श्रद्धालु साधकों की साधना को छल
करके नष्ट करना, उनका धिःकार कर उनकी पूर्ण भर्त्सना करना इसका नाम 'तिरस्कार' है। देखो! सारे भूतों में
भगवद्भाव देखने से उपर्युक्त सारे दोष लेकर अहम्भाव भागने लगता है। समस्त प्राणियों के प्रति समदृष्टि रखकर
भजना, यह साधन ही सबमें श्रेष्ठ है। इसके योग से ही पूर्ण ब्रह्म हाथ लगता है और यह लाभ नरदेह में ही होता
है। ममत्व को दूर करें, महानता की आकांक्षा छोड़ दें, लोकलज्जा पर पानी छोड़ें, सभी ब्रह्म सायुज्यता का लाभ
होता है। देह का अहंकार छोड़ दें, सम्मान और अहंता का त्याग करें, महानता और घमण्ड का त्याग करें, तभी
ब्रह्मसायुज्यता प्राप्त होती है। तत्काल पूर्णब्रह्म होने का यह सुलभ साधन है लेकिन वह किसी से भी नहीं हो
पाता क्योंकि लोगों में लौकिक की प्रबल इच्छा रहती है। वर्ण का अभिमान त्याग दें, स्वयं ही ज्ञातापन को दूर
कर दें और अणुरेणु को भी नमस्कार करें तभी परब्रह्म की प्राप्ति होती है। लौकिक की लज्जा जो छोड़ता है,
उसका काम तत्काल होता है। उसी विषय का गुप्त रहस्य श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
विसृज्य स्मयमानान् स्वान् दृशं व्रीडां च दैहिकीम्।
प्रणमेद् दण्डवद् भूमावाश्वचाण्डालगोखरम्॥ १६ ॥
नाते रिश्तेवालों के सामने दण्डवत करने से वे हँसेंगे इसलिये परदेश में जाकर गौ, गधे तथा कुत्तों के
सामने साष्टांग नमस्कार करें। यदि लोगों की लज्जा करें तो कार्य पूरा नहीं होगा इसलिये खूब दण्डवत करें और
लोकलज्जा का ख्याल न कर नाते-रिश्तेदारों के सामने खूब नाचें। सास, ससुर, दामाद, इष्ट, मित्र, समधी, भाई
आदि को देखने से मनुष्य मन ही मन लज्जा से नत हो जाता है। इसलिये उनके सामने ही लज्जा छोड़ कर
चांडालादि हीन जाति को तथा गौ, गधा तथा श्वान को भी वंदन करें। वह वन्दन भी साष्टांग दण्डवत के समान
हो। अगर वहाँ ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण हों अथवा नीच जाति अंत्यज हो, उन्हें भी सद्भावनापूर्वक दण्डवत् करें। अपने
कार्य पूरा करने के लिये लोकलज्जा को निर्मूल हटा दें। गाय, गधा आदि की चरण रज का वंदन करने से
भगवद्भजन का तेज प्रकट होता है। इसलिये स्वजनों की लज्जा का त्याग कर सबको दण्डवत् करें। संशय,
वैषम्य आदि छोड़ लोकलज्जा को लात मारकर भगवद्बुद्धि से समस्त प्राणियों को दण्डवत करें। इसकी मर्यादा
भगवान बता रहे हैं।
यावत् सर्वेषु भूतेषु मद्भावो नोपजायते।
तावदेवमुपासीत वाङ्मनःकायवृत्तिभिः॥ १७॥
अपने देह के साथ जो भी प्राणी अपने दृष्टि पथ में आये, उस पर जब सहज ही भगवत्स्वरूप की भावना
अंकित होगी; उसी प्रकार दृष्टि से देखते समय जिस-जिस चीज का आभास होता है अथवा दृष्टि के बिना जो-
जो दिखायी देता है वह सब जब उसे सहज ही चिद्रूप स्फुरने लगे; मन की कल्पना में जो भी आये अथवा जो
कल्पना के बाहर का हो, वह सब मद्रूप से मेरा ही स्वरूप है, ऐसा अनुभव होगा; देह से होने वाला कर्म का
उनतीसवाँ अध्याय ७८१
आचरण अथवा वैदिक और लौकिक आचार, ये सारे व्यापार तथा चराचर भी उसे मद्रूप से मदाकार ही दिखायी
देंगे; जागृति, स्वप्न तथा सुषुप्ति में जो सुख हम देखते हैं या भोगते हैं, वह सब मद्रूप ही है ऐसा जब मन में
निश्चित रूप से बैठ जाएगा, अथवा देह में जो स्वाभाविक असंख्य व्यापार उत्पन्न होते हैं, वे भी सचमुच मद्रूप
ही रहते हैं; यह निश्चय जिसका नहीं ढलेगा, सारांश, इतनी अवस्था प्राप्त होने तक सर्वभूतों में भगवद्भावना
धारण कर निजस्वार्थ के लिये भजन करें। भजन का यह प्रकार छोड़कर अनेक प्रकार के साधनों का प्रयास करने
पर, मेरे अनुभव की बात कल्पांत में भी नहीं प्राप्त होगी। यही जानकर निश्चयपूर्वक समस्त प्राणिमात्र में
परमेश्वरस्वरूप ही है इस भावना का ज्ञान अथवा भाषण छोड़कर समस्त प्राणिमात्र में भगवद्भावना धारण करने
से ही मेरी प्राप्ति सुगम है, यह जान लो। उद्धव, यही ब्रह्मप्राप्ति का सच्चा उपाय है। यही मेरे जीव की पहचान
है। इसके योग से ज्ञान सुगम होता है; इसके योग से ही मेरी भक्ति सुगम होती है; और हे उद्धव! इसके योग से
ही मेरी प्राप्ति सुगम है, यह निश्चित रूप से जान लो। समस्त प्राणिमात्र के प्रति ब्रह्मभावना की स्थिति जिन्हें
निश्चित रूप से प्राप्त हो गयी, उनकी भजनवृत्ति भी समाप्त हो जाती है।
सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्ममनीषया।
परिपश्यन्नुपरमेत् सर्वतो मुक्तसंशयः॥ १८॥
काया, वाचा तथा मन से जो सर्वभूतों में मद्भाव रख कर मेरा भजन करते हैं, उन्हें सभी भूत भगवत्स्वरूप
हैं इस बात का निश्चय होता है। इसलिये 'मैं एक यहाँ सारे प्राणियों को भगवद्रूप देखता हूँ' यह भी उसकी वृत्ति
समाप्त हो जाती है और वह अपने चारों ओर परब्रह्म ही देखने लगता है। इसके उपरान्त जिस प्रकार घृत का रवा
पिघलने के बाद घी का रूप प्राप्त कर लेता है उसी प्रकार वह सर्वत्र परब्रह्म देखने वाली वृत्ति भी ब्रह्म में
विलीन हो जाती है। (यही अंतिम स्थिति है) तब सर्वत्र परिपूर्ण ब्रह्म ही भरा हुआ है यह स्फूर्ति भी शेष नहीं रह
जाती। 'मैं' 'तू' का निगल कर ब्रह्मस्वरूप ब्रह्म में ही एकरूप हो जाता है। तब हेतु, भाषण, दृष्टांत, वेद के साथ
शास्त्रार्थ आदि सारी बातें समाप्त हो जाती हैं। देवता और भक्त ये भाव भी समाप्त हो जाते हैं। केवल अद्वय और
अखण्ड परब्रह्म ही शेष रह जाते हैं। रस्सी और सर्प का भ्रम समाप्त होने पर रस्सी पूरी तरह रस्सी के ही रूप में
शेष रह जाती है अथवा सर्प का भास होने पर भी रस्सी में रस्सी ही अवशिष्ट रहती है। उसी प्रकार अविद्या के
कारण से प्रपंच नष्ट होते ही सर्वत्र परिपूर्ण ब्रह्म ही शेष रहता है; अथवा प्रपंच का भान होने पर भी ब्रह्म के
स्थान पर शुद्ध ब्रह्मत्व ही रहता है। इसलिये हे उद्धव! समस्त प्राणियों के प्रति भगवद्भावना धारण कर मेरी
भक्ति करने से साधकों को इतना लाभ होता है, यह जान लो। पूर्ण ब्रह्म की शीघ्र प्राप्ति के लिये गुणदोष छोड़कर
सारे भूतों में भगवद्भाव रखकर भजन करना यह प्रमुख साधन है। इससे श्रेष्ठ साधन और कोई नहीं है। यही
परम साधन है। निश्चित रूप से यह मुझे भी मान्य है।
अयं हि सर्वकल्पानां सधीचीनो मतो मम।
मद्भावः सर्वभूतेषु मनोवाक्कायवृत्तिभिः॥ १९॥
समस्त प्राणियों को भगवद्दृष्टि से देखना यही एक पूँजी मेरे पास है और इसी पूँजी के सहारे कोटि-कोटि
सृष्टि की रचना करके भी मैं अकर्त्ता ही रहता हूँ। आत्मदृष्टि से मेरी ओर देखने पर सभी भूतों के प्रति
भगवद्दृष्टि रखना यही मेरी सुन्दर भक्ति है और वह कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड को तारने वाली है। सभी भूतों के प्रति
भगवद्भावना रखना यही भक्ति मैंने कल्प के आरम्भ के समय नाभाकमल से उत्पन्न हुए ब्रह्मदेव को उपदेश के
७८२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
रूप में बतायी। व्रत, तप, दान अथवा योग, याग, ध्यान करके यदि वेदशास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया तो भी वह मेरी
भक्ति के बराबर नहीं होगा। साधक अट्टहास कर नाना प्रकार के साधन भले ही कर लें लेकिन मेरी भक्ति के
बिना, मेरे प्रेम की वार्ता उन्हें नहीं मिलेगी। मेरे भक्तों की संगति से ही साधकों को मेरी भक्ति प्राप्त होती है।
उद्धव! अभेद भजन से ही मेरी प्राप्ति होती है यह निश्चित रूप से जान लो। सर्वभूतों के प्रति भगवद्भजन करने
का लक्षण सुनो। प्राणी भले ही भिन्न-भिन्न स्वभाव के हों लेकिन उनके प्रति मन में परिपूर्ण ब्रह्मभावना रखनी
चाहिये। दुष्ट, दुरात्मा, अपरिचित, नष्ट, चाण्डाल, पतित के प्रति भी निर्मल ब्रह्मभावना रखना यह 'मानसिक'
भजन है। समस्त प्राणिमात्र में परिपूर्ण भगवंत समाया हुआ है यह जानकर वह किसी से निष्ठुर भाषण नहीं
करता। भले ही वहाँ प्राण चले जाएँ लेकिन फिर भी उद्धव! वह लोगों के गुण-दोषों का उच्चार नहीं करता। यह
सचमुच 'वाचिक' भजन है। प्राणियों का जिससे उपकार हो, ऐसा ही देह व्यापार वह करता है; कोई उसका
मर्मभेद भी करे तो भी वह उसके अपकार के लिये हाथ नहीं उठता। बल्कि अपकार करने वाले का वह उपकार
ही करता है। यह सचमुच 'कायिक' भजन है। इस प्रकार काया, वाचा तथा मन से समस्त भूतों में भगवद्भजन
करना यही मुख्य रूप से श्रेष्ठ साधन है, इसे ज्ञानी भक्त जानते हैं। ब्रह्मप्राप्ति का परम कारण यही एक सुगम
साधन है। उद्धव! देवकी की शपथ लेकर कहता हूँ कि इसे मैं भी मानता हूँ। यह भजनधर्म अत्यन्त शुद्ध है तथा
इसमें विघ्नों का संबंध अथवा पीड़ा प्रवेश नहीं कर सकती। यही बात श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं।
न ह्यङ्गोपक्रमे ध्वंसो मद्धर्मस्योद्धवाण्वपि।
मया व्यवसितः सम्यङ् निर्गुणत्वादनाशिषः ॥ २० ॥
मनु आदि शास्त्रकारों ने नाना प्रकार के शास्त्रार्थों में अनेक साधन बताये हैं; किन्तु साधकों को सर्वभूतों में
भगवद्भक्ति यही सर्वोत्तम साधन है। इस भक्ति की यही श्रेष्ठता है कि इसके प्रारम्भ से ही साधक को बाधा
पहुँचाने के लिये विघ्न नहीं आ सकता। इस भक्ति का लक्षण यही है कि इसका मूल आरम्भ ही निर्गुण होने के
कारण इसमें विघ्न प्रवेश करने का साहस ही नहीं करता। गरुड़ के झपट्टे के साथ जिस प्रकार सर्प के शरीर के
टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं, उसी प्रकार इस भक्ति के पास विघ्नों की अपने आप ही होली जल जाती है। मेरे
केवल नाम के सामने विघ्न बेचारा खड़ा नहीं रह पाता। इस प्रकार यह भक्ति समर्थ है। उद्धव! तुम्हारा भाग्य
अच्छा है कि मैंने तुम्हें अपना यह गुप्त भण्डार खोलकर असली रहस्य तुम्हें बताया। मेरी निष्काम भक्ति में
विघ्नों की गड़बड़ी नहीं चलती तथा साधकों को परब्रह्म स्वरूप की सुलभ रीति से प्राप्ति होती है। हेतु मन में
रखकर किया हुआ कर्म हो या अहेतुक कर्म हो, वह सारा कर्म जो कृष्णार्पण करेगा, वही मेरी उत्तम भक्ति है।
उसी का निरूपण श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
यो यो मयि परे धर्मः कल्प्यते निष्फलाय चेत्।
तदायासो निरर्थः स्याद् भयादेरिव सत्तम॥ २१॥
व्यवहार के लिये जो कुछ प्रयत्न किया वह फलित न होकर व्यर्थ गया; उसे भी यदि ब्रह्मार्पण किया तो
सद्भाव के कारण वह भी मेरे भजन में जुट जाता है। होली का त्योहार बहुत बड़ा होता है; उसमें आपने जो खेल
खेला हो, वह भी यदि कृष्णार्पण कर दिया जाय तो वह भक्ति भी मुझे ही अर्पित होती है। चोर के भय से कोई
जंगल की ओर भाग जाय और वहाँ उसे अनायास ही खजाना मिल जाय; उसी प्रकार निरर्थक किया हुआ कर्म
भी यदि मुझे अर्पण किया जाय तो वह भी मेरे भजन में लग जाता है और उससे बड़ा लाभ होता है। लोग सड़ा-
उनतीसवाँ अध्याय ७८३
गला जमीन पर फेंक देते हैं; लेकिन यदि साधक उसे दृढ़ निश्चय से ब्रह्मार्पण मान ले तो वह भी मेरी भक्ति में
जमा होता है। इतना ही नहीं बल्कि कडुए कद्दू की खीर जिसे श्वान और सुअर भी नहीं खायेंगे, वह भी यदि
आनन्द से कृष्णार्पण करें तो वह कर्म भी ब्रह्मार्पण होता है। जो खोयी हुई वस्तु न मिल रही हो, वह भी
कृष्णार्पण करने से अनायास मुझे मदर्पण होती है। सारांश यही है कि प्रत्येक कर्म कृष्णार्पण करें। उसे
मनःपूर्वक अर्पण करने का ही नाम है 'सद्बुद्धि'।
एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम्।
यत् सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाप्नोति मामृतम्॥२२॥
मन में तो विषय की आसक्ति है और ऊपरी मन से ब्रह्मार्पण करें, ऐसे लोग अनेक दृष्टि से फँस जाते
हैं। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं। कुछ लोग अत्यन्त बुद्धिमान रहते हैं, वे अपनी बुद्धि हाथ में लेकर अन्त में
विषय का स्वार्थ सिद्ध करने में लग जाते हैं। वह अपनी देहममता के कारण अवश्य ही फँस जाते हैं। किसी
की बुद्धि अत्यन्त उत्तम रहती है, वेदशास्त्र में वे अत्यन्त पारंगत रहते हैं; किन्तु गर्व अभिमान के कारण ज्ञान
के गर्व में फँस जाते हैं। कुछ बुद्धिमान योगाभ्यास में पारंगत रहते हैं। वे अभ्यास से प्राणायाम साध्य कर
योगरूप किले में घुस जाते हैं और वहाँ की सिद्धि के वैभव की बलि चढ़ते हैं। कुछ लोग कर्म को श्रेष्ठ
मानते हैं और कर्म का हो-हल्ला मचाते हैं। विधि निषेध से ही उनका मार्ग अवरुद्ध हो जाने के कारण लोग
कर्म में ही डूब जाते हैं। इस प्रकार नाना प्रकार के प्रयास कर कितने लोग फँस गये हैं उनकी कोई गिनती
नहीं है। लेकिन मेरी भक्ति वैसी नहीं है। वह केवल भाग्यवान को ही प्राप्त होती है जिसका सर्वभूमि
भगवद्भजन रहता है, उसकी बुद्धि की बुद्धि मैं स्वयं बन जाता हूँ। वह बुद्धि कौन सी होती है? तो कर्म
को ब्रह्मार्पण करना यही 'महाबुद्धि' है। समस्त प्राणियों के प्रति मेरा भजन और सभी कर्म मदर्पण यही बुद्धि
की 'महाबुद्धि' है। इसी के योग से वे स्वयं पूर्णब्रह्म होते हैं। चतुर लोगों की चातुरी इसे ही कहनी चाहिये।
क्योंकि वे मिथ्या देह के योग से भजन कर स्वयं सत्य सनातन ब्रह्म बन जाते हैं। पहले तो माया ही मिथ्या
है और उस माया से कल्पित देह भी मिथ्या! लेकिन देखो। उसी देह का कर्म मुझे अर्पण करने से वे स्वयं
ही ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं। मिथ्या देह के भजन से स्वयं सत्यस्वरूप परब्रह्म होना यह भूसा देकर अनाज की
ढेर लेने की तरह है। अथवा फूटी कौड़ी देकर चिन्तामणि गठियाने की तरह है। उसी प्रकार मिथ्या देह का
कर्माचरण जिसके योग से जीव को दृढ़तर बन्धन प्राप्त होता, उसे ही अर्पण कर वे स्वयं परिपूर्ण ब्रह्म बन
जाते हैं। अनित्य देह के कारण ही नित्य वस्तु प्राप्त होती है। यही बुद्धिमानों की श्रेष्ठ बुद्धि है। इसी को
'ज्ञान का संतोष' कहते हैं। इस प्रकार परमशुद्ध परमार्थ श्रीकृष्ण ने अपने मुख से सुनाया। उस ग्रन्थ की अब
परिसमाप्ति करने के लिये उपसंहार के रूप में निरूपण सुनाते हैं।
एष तेऽभिहितः कृत्स्नो ब्रह्मवादस्य संग्रहः।
समासव्यासविधिना देवानामपि दुर्गमः ॥२३॥
अनेक मत-मतान्तरों को छोड़कर, कहीं संक्षेप में तो कहीं विस्तार में मैंने अत्यन्त शुद्ध ब्रह्मज्ञान तुम्हें
बताया। मैंने तुम्हें इसे अत्यन्त सुगम बनाकर बताया, अन्यथा यह ब्रह्मादि देवताओं के लिये भी दुर्लभ है। जो
आगम निगम शास्त्र का अध्ययन करते हैं उनके लिये तो यह और भी असाध्य है। वस्तु का साक्षात्कार न कर
अनेक प्रकार के शास्त्रार्थों का खोखले शब्दों से साक्षात्कार करते रहते हैं। ब्रह्म का वाद करते समय वेद भी
७८४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
'नेति' शब्द से निःशब्द हो गये हैं। उसी आत्मज्ञान का सार तथा परमार्थ का गुप्त भण्डार और मुझ परमात्मा का
अंतःकरण खोल कर तुम्हें बताया है।
अभीक्ष्णशस्ते गदितं ज्ञानं विस्पष्टयुक्तिमत्।
एतद् विज्ञाय मुच्येत पुरुषो नष्टसंशयः ॥ २४॥
जो वेदशास्त्रों के लिये कठिन है, जिसे शब्दों में वर्णन करना कठिन है, वह ज्ञान मैंने तुम्हें चुनकर बताया
है और वह ज्ञान तुम्हारे मन पर अंकित हो, इसलिये उसे अनेक प्रकार की युक्ति-प्रयुक्तियों से बार-बार बतलाया
है। तुम्हें अधिक प्रयास न करना पड़े और तुम्हें अधिक कष्ट न हो, इस दृष्टि से सारे संशय निर्मूल करते हुए
तुम्हें स्पष्ट ज्ञान दिया है। इस ज्ञान को जानने से सारे संशय जल जाते हैं और साधक ब्रह्मसम्पन्न होकर निरन्तर
स्वानंद में तृप्त रहते हैं। उद्धव ! मैंने यह जो गुप्तज्ञान बताया, उस एकादश स्कंध के निरूपण का श्रवण, पठन
और मनन जो करेगा वह धन्य है।
सुविविक्तं तव प्रश्नं मयैतदपि धारयेत्।
सनातनं ब्रह्मगुह्यं परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ २५ ॥
ज्ञाता तर जाएँ तो इसमें कैसा आश्चर्य है ? लेकिन जो भोले-भाले और अज्ञानी हैं, उनका भी उद्धार करने
के लिये तुमने प्रश्न पूछा है। उस प्रश्न के अनुसार मैंने स्वयं सन्तुष्ट होकर तुम्हें गुप्त ज्ञान अर्थात् परम कारण जो
परब्रह्म है, उसके सम्बन्ध में बताया। जिस प्रकार बछड़े की हुँकार से गाय के स्तन में दूध उतरता चलता है, उसी
प्रकार तुम्हारे प्रश्न के आदर से मैं भी स्वानंद से भर गया। कछुए के पिल्लों को उनकी माँ बिन माँगे ही अपने
नेत्रों के द्वारा अमृतपान कराती है। उसी प्रकार तुम्हें देखते ही मेरे हृदय में जो ब्रह्मज्ञान था वह पूरी तरह उफन
कर बाहर आ गया, वही यह निरूपण है। उसी निरूपण के बहाने मैंने तुम्हें स्वानंद रस से युक्त परमामृत का पान
कराया। समुद्र मेघ को पानी पिलाता है और उस जल से मेघ संसार को तृप्त करता है; उसी प्रकार उद्धव को
प्राप्त ब्रह्मपद से मूढ़ जीवों का भी उद्धार होने वाला है। बछड़े के प्रेम के कारण गाय के स्तन में दूध उतरता है,
वह दूध पूरे परिवार का पोषण करता है, उसी प्रकार उद्धव के आग्रहपूर्वक किये गये प्रश्न से संसार का अनायास
ही उद्धार होने वाला है। वह प्रश्नोत्तरी कथाभाग अर्थात् मेरा और तुम्हारा ब्रह्मसंवाद-एकादश स्कंध के निरूपण
का अर्थबोध जो ध्यान में रखेगा अथवा इस निरूपण का अर्थ जो श्रवण करेगा, वे श्रोता और वक्ता दोनों ही स्वयं
ही सनातन ब्रह्म हो जायेंगे। संसार में ब्रह्म परिपूर्ण भरा रहने पर भी वह मन को, बुद्धि को और इन्द्रियों को नहीं
दिखायी देता। जहाँ वेद भी मौन हो जाते हैं, वहाँ यह ब्रह्मज्ञान उपयोगी होगा। (उन श्रोता वक्ताओं के लिए)
एक बार यह ज्ञान प्राप्त होने पर वह टस से मस नहीं होता। एकादश स्कंध का अर्थ मन में धारण करने से
परमपद की अटल प्राप्ति होगी। इस एकादश स्कंध से श्रोताओं और वक्ताओं को इतना बड़ा पद प्राप्त होता है,
तब मेरे भक्तों को जो प्रेमपूर्वक इस ज्ञान का उपदेश करेंगे, उन्हें किस फल की प्राप्ति होती है वह तथा ज्ञानोपदेश
की शुद्ध स्थिति उद्धव को श्रीकृष्ण अत्यन्त प्रेम से स्वमुख से बता रहे हैं।
य एतन्मम भक्तेषु सम्प्रदद्यात् सुपुष्कलम्।
तस्याहं ब्रह्मदायस्य ददान्यात्मानमात्मना ॥ २६ ॥
काया, वाचा, मन, घरबार, पत्नी, बच्चे, धन और प्राण आदि जो मुझे निष्काम बुद्धि से अर्पण करते हैं, वे
ही मेरे अनन्य भक्त हैं। ऐसे भक्तों को इस ज्ञान का अवश्य उपदेश करें। उस उपदेश का भी परिपक्व तथा पूर्ण
उनतीसवाँ अध्याय ७८५
लक्षण इस प्रकार है। साधक का मन जिधर भी जाता है, वहाँ परिपूर्ण ब्रह्म रहता ही है; वहाँ से मन हटकर कहीं
और जाने के लिये खाली स्थान ही नहीं है ऐसा अनुसंधान मन में करने से मन चैतन्य में समरस हो जाता है।
इसी को 'पुष्कल ज्ञान' कहते हैं, और इसी का नाम है 'पूर्ण उपदेश'। इस प्रकार का सम्पूर्ण ब्रह्मज्ञान जो मेरे
भक्तों को दान करेगा, उसका हे उद्धव ! मैं पूर्णरूप से ब्रह्मऋणी होकर रहता हूँ। उसके उपकार की पूर्ति करने के
लिये मेरी गाँठ में कुछ नहीं है। इसलिये मेरा आत्मरूप उसे देकर मैं रात-दिन उसकी सेवा के लिये खड़ा रहता
हूँ। जो शिष्य को ब्रह्मज्ञान देता है, उसके अधीन मैं परमात्मा रहता हूँ और उस ब्रह्मज्ञान देने वाले के शब्द से ही
मैं शूद्र आदि का उद्धार करता हूँ। परब्रह्म देकर जो भक्तों को निष्कर्म कर देता है; वह मुझे अत्यन्त प्रिय है और
मैं पुरुषोत्तम उसका दास बनकर रहता हूँ। उद्धव ! मेरे भक्तों को जो ब्रह्मज्ञान देता है, उससे अधिक लाडला मेरा
कोई नहीं है यह तुम निश्चित रूप से जान लो। वह आत्मा और मैं शरीर हूँ और वह शरीर भी मैं स्वयं ही बनता
हूँ; उसी प्रकार उसका जो भी कर्माचरण रहता है, वह भी पूरी तरह मैं ही रहता हूँ। जैसे मैं अवतारधारी हूँ, उसी
प्रकार यह भी अवतारधारी है। उसमें और मुझमें तिलमात्र का भी अन्तर नहीं है। जो इस ब्रह्मज्ञान का दान करेगा,
उसे मैं स्वयं इस प्रकार अपना आत्मा अर्पण करता हूँ, फिर भी उसकी पूर्ति नहीं होती। इसलिये मैं शरीर से
विचरण करते हुए भी उसकी अखण्ड सेवा करता हूँ। उसके प्रेम के खातिर ही मैं उसे अपना आत्मा अर्पण कर
सदा उसके घर में रहता हूँ। उस पर जो भी संकट आये, वह सब मैं अपने ऊपर ले लेता हूँ। मेरे चैतन्य साम्राज्य
का वैभव उसके घर में निरन्तर रहता है। इस एकादश स्कन्ध के ब्रह्मज्ञान का उपदेश कर मेरे भक्तों को जो
ज्ञानदान देगा, उसे मैं इस प्रकार अपना आत्मा अर्पण करता हूँ। अस्तु ! यह ब्रह्मज्ञान यदि साध्य न हो सके, तो हे
उद्धव ! इस ग्रन्थ का जो सावधानीपूर्वक सर्वकाल पठन करेगा वह भी परम पावन होगा।
य एतत् समधीयीत पवित्रं परमं शुचि।
स पूयेताहरहर्मां ज्ञानदीपेन दर्शयन् ॥ २७ ॥
तुम्हारा और मेरा यह संवाद शुद्ध ब्रह्मज्ञान है। इसका जो भी कोई श्रद्धालु पुरुष ध्यानपूर्वक, आदरपूर्वक
श्रवण करेगा, जो निरन्तर बढ़ते प्रेम से शुद्ध सात्त्विक श्रद्धा मन में दृढ़ कर, पग-पग पर नित्य नयी बात पढ़ने की
चाह उत्पन्न करेगा, वाणी के कसोरे में श्रद्धा का तेल डालकर तथा जिह्वा की बाती बनाकर जो इस ज्ञानज्योति को
प्रज्वलित करेगा, जो इस एकादश स्कंध की ज्ञानज्योति से एकादश इन्द्रियों की बाती बनाकर और उन्हें प्रज्वलित
कर मेरी आरती उतारेगा, उन्हें मैं कितना पवित्र कह कर पुकारूँ? इस प्रकार का ग्रन्थ पठन मेरा ज्ञान-दीप है।
उस ज्ञानदीप से जो मेरा स्वरूप प्रकाशित करता है, उनकी संगति में जो रहते हैं, उन्हें ब्रह्मादि देवता भी वन्दन
करते हैं। उद्धव ! सचमुच, उनके कारण त्रिभुवन पावन होता है, यह निश्चित रूप से जान लो। अस्तु ! जो इसका
पठन नहीं कर सकता, वह यदि श्रद्धापूर्वक इसका श्रवण करे तो उसे भी संसार बन्धन की बाधा नहीं होगी। उसी
का निरूपण श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
य एतच्छ्रद्धया नित्यमव्यग्रः शृणुयान्नरः।
मयि भक्तिं परां कुर्वन् कर्मभिर्न स बध्यते ॥ २८ ॥
यदि अध्ययन नहीं कर सकता तो कोई हर्ज नहीं, श्रद्धा से, ध्यानपूर्वक जो एकादश स्कंध का श्रवण करेगा
उसे कर्मबन्धन बाधक नहीं होगा। अत्यन्त श्रद्धा से श्रवण करने पर भी, उससे अधिक मनन करना चाहिये। मनन
के बिना किया गया श्रवण नपुंसक है। क्योंकि उससे ब्रह्मप्राप्ति पूरी तरह फलदायी नहीं होगी। कथा सुनना भले
७८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ही समाप्त हो जाय किन्तु मनन समाप्त नहीं होना चाहिये। लालची आदमी को जिस प्रकार मन में धन की याद
रहती है, उसी प्रकार कथा का मन में स्मरण रहना चाहिये। मनन करने से भजन और पराभक्ति उत्पन्न होती है।
ऐसा करने से आर्त, जिज्ञासु तथा अर्थार्थी इनकी स्थिति छोड़कर मेरी चौथी भक्ति बढ़ती है। इसी को ज्ञाता
‘पराभक्ति’ कहते हैं। पराभक्ति से मेरा भजन करने से तत्काल आत्मदर्शन होता है। इससे मेरे भक्तों को कर्मबन्धन
की बाधा नहीं होती। यह अत्यन्त गुप्त बात है; इस एकादश स्कंध का श्रवण कर ‘मैं तरूँगा’ ऐसा विश्वास
जिसने अंतःकरण में दृढ़ कर लिया और इस प्रकार जो श्रवण के प्रति लुब्ध हो गया, वह यदि मेरी भक्ति को घर
से बाहर निकालने का भी प्रयास करे तो भी वह उसके घर में घुस आयेगी। वह भक्ति घर में घुस कर निष्काम
भक्तों के सारे कर्मों का नाश करती है। इसी का नाम है ‘पराभक्ति’। यह श्रोताओं का विश्राम मन्दिर है। एकादश
स्कंध का श्रद्धापूर्वक श्रवण करने से इतना लाभ होता है। श्रवण के योग से मेरा भजन उत्पन्न होता है और भजन
से भक्तजन मुक्त होते हैं। खैर यह तो औरों की बात हुई लेकिन तुम्हें जो ज्ञानकथा मैंने सुनायी, वह तुम्हारा
निश्चय दृढ़ होने के लिये सुनायी, उसका तत्त्वबोध तुम्हें हो ही गया होगा।
अप्युद्धव त्वया ब्रह्म सखे समवधारितम्।
अपि ते विगतो मोहः शौकश्चासौमनोभवः ॥ २९ ॥
हे उद्धव ! तुम्हारा प्रेम देखकर मैंने तुम्हें अत्युत्तम गुप्त ज्ञान अर्थात् शुद्ध जो परब्रह्म है उसे सम्पूर्ण बताकर,
उसे सुगम बनाकर उसका निरूपण किया। यह ज्ञान का शुद्ध सार तथा वेदों का विश्राम स्थल है। अविद्या का
पराभव इसी से होता है तथा जीव शिव का समाधान भी यही है। यह गुप्त ज्ञान मन, बुद्धि तथा वाणी को
अगम्य होते हुए भी तुम्हारी पूर्ण श्रद्धा देखकर तुम्हें बताया। एक घनिष्ठ मित्र जिस प्रकार अपनी सम्पत्ति अपने
मित्र को अर्पण करता है, उसी प्रकार यह ब्रह्मस्थिति मैंने तुम्हारे हाथ में दी है। मैंने जो परम रहस्य तुम्हें बतलाया
वह परब्रह्म तुम्हारी समझ में आ गया न ? यदि समझ में नहीं आया हो तो अधिक सुगम करके बताऊँगा।
अंतःकरण में चैतन्य जमकर बैठ गया हो और जहाँ ब्रह्मस्थिति प्राप्त हो गयी हो, वहाँ मोह ममता की बस्ती
बिलकुल नहीं होनी चाहिये। ब्रह्मज्ञान का आकलन होने का लक्षण यही है कि उसके बाद संकल्प विकल्प के
विचार मन में नहीं आते। ब्रह्म को पूरी तरह जान लेने के बाद ‘मैं’ और ‘तू’ का भाव नहीं उत्पन्न होता, ध्येय,
ध्याता, ध्यान नहीं रह जाता और कर्मठता भी शेष नहीं बचती। जिसने ब्रह्मज्ञान जान लिया, उसे कर्मबन्धन की
बाधा नहीं होती क्योंकि कर्म का जो आचरण है, वह मूलतः मायिक ही है। जिस प्रकार पुरुष के योग से छाया
हिलती है लेकिन पुरुष उसका लोभ नहीं करता, उसी प्रकार ब्रह्मज्ञानी भी देह को चलाता है किन्तु वह
देहाभिमानी नहीं होता। सूर्य के सामने जिस प्रकार अन्धकार क्षणभर की भी प्रतीक्षा नहीं करता, उसी प्रकार
ब्रह्मज्ञानी को भी कर्म का आदर जरा भी नहीं रहता। इसका कारण यही है कि कर्म का कर्मबन्धन यह केवल
मन का संकल्प है। किन्तु जहाँ मन का मनपन ही टूट जाता है, वहाँ कर्माचरण भी बीजरहित हो जाता है।
ब्रह्मवस्तु नित्य निर्विकल्प है। वहाँ संकल्प विकल्प नहीं है। यही परब्रह्म का सच्चा स्वरूप है और उसी का
स्वानुभव होता रहता है। इस प्रकार स्वयं ही ब्रह्मरूप होने के बाद, ‘मैं एक उद्धव हूँ’ इस प्रकार का उद्धव का
ठौर ही नहीं रह जाता। फिर वहाँ शोक और मोह किस बात का? उद्धवपन की बस्ती में शोकमोह की उत्पत्ति
होती थी; किन्तु ब्रह्म की प्राप्ति होने के बाद वह उद्धवपन याद ही नहीं आता। देव का यह भाषण सुनकर उद्धव
का उद्धवपन उड़ गया। वह स्वानंद में लीन हो गया और उसका वाचालपन बन्द हो गया। अपने आत्मस्वरूप पर
उनतीसवाँ अध्याय ७८७
पहुँचते ही उद्धव का उद्धवपन लुप्त हो गया; देह की अहंता नष्ट होकर वह स्वानंद में तल्लीन हो गया। वहाँ
देवता ने जो प्रश्न किया उसका उत्तर कौन देगा ? कृष्ण के साथ उद्धवपन का विलय होकर वह पूर्ण वस्तुरूप बन
गया था। उद्धव की वह अवस्था देखकर श्रीकृष्ण के ध्यान में आ गया कि वह निजात्मज्ञान से ब्रह्मरूप हो गया।
श्रीकृष्ण प्रत्यक्ष हृदयस्थ होने के कारण, यह न जान सके ऐसी कौन सी बात है ? शिष्य को सच्चा अनुभव प्राप्त
होने पर, जिस प्रकार बच्चे की तृप्ति का सुख माँ अनुभव करती है, उसी प्रकार सद्गुरु सुख के शिखर पर
पहुँचते हैं। शत्रु सेना पर विजय प्राप्त करते देख राजा को अत्यन्त सन्तोष होता है और वह ध्वजा पताकाओं के
साथ समारोह की धूम मचा देता है। बच्चों से किस प्रकार लाड़ किया जाता है यह प्रसूति की वेदना सहन करने
वाली माँ ही जानती है। उसी प्रकार शिष्य को स्वानुभव प्रदान करना केवल सद्गुरु ही जानते हैं। पुत्र का
खजाना मिलने पर जिस प्रकार पुत्र को संतोष होता है, उसी प्रकार उद्धव के अनुभव से श्रीकृष्ण को भी संतोष
हुआ। कृष्ण तो नित्य से ही सुखस्वरूप था, शिष्य के अनुभव से वह सुख के चरमोत्कर्ष पर पहुँचा। गुरु की
बात गुरु ही जाने, दूसरे के लिये वह अगम्य है। शिष्य को उपदेश करते समय यदि गुह्य को सुख न हुआ होता
तो इस लोक में उपदेश परम्परा का अस्तित्व ही नहीं रहा होता। गुरु यदि ऊब कर उपदेश करे तो वह शिष्य की
समझ में ही नहीं आयेगा। फिर उसकी आत्मानुभव से कैसे भेंट होगी ? जिस प्रकार बालक को अलंकार पहनाने
से उसे कुछ अनुभव नहीं होता लेकिन उसकी माँ को प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार शिष्य को आत्मानुभव प्राप्त
होने पर वास्तव में सद्गुरु को आनन्द होता है। उसी प्रकार उद्धव को ब्रह्मस्थिति पर पहुँचा देखकर श्रीकृष्ण को
अत्यन्त आनन्द हुआ। उन्हें लगा कि अब मेरे उद्धव का सन्देह दूर हो गया। उसे ब्रह्मस्वरूपानुभव हुआ। उसकी
ब्रह्मनिष्ठ स्थिति देखकर उसे आत्मस्वरूपानुभव प्राप्त हुआ है इसका श्रीकृष्ण को अनुभव हुआ। अब उसे दूसरे
को उपदेश करना सिखाते हैं। तुमने ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लिया है। अब शिष्योपदेश करने का ढंग तथा शिष्य का
अधिकार कैसे पहचानते हैं, वह सुनो।
नैतत्त्वया दाम्भिकाय नास्तिकाय शठाय च।
अशुश्रूषोरभक्ताय दुर्विनीताय दीयताम्॥ ३०॥
धूर्त, नास्तिक, ढोंगी, सेवा न करने वाला तथा भक्तिहीन, उसी प्रकार उद्धत स्वभाव के शिष्य को छोड़
देना चाहिये। जिससे अधिक से अधिक लोग एकत्रित हों ऐसे पर्याप्त मात्रामें मिलने की इच्छा करने वाले, ऐसे
ढोंगियों का भजन, उन्हें यह एकादश स्कंध का ज्ञान स्वप्न में बड़बड़ाते हुए भी नहीं देना चाहिये। मोह ममता
के प्रावल्य के कारण जिसकी आस्तिकता का लय हो गया हो, वेद और शास्त्र के प्रति जो पूरी तरह नास्तिक
हों; देवता का अस्तित्व ही न मानते हों; इस प्रकार नास्तिकता का बिगुल बजाने वाले जो लोग हों, उनके कान
में इस ज्ञान का एक भी शब्द नहीं पड़ना चाहिये क्योंकि नास्तिकता के कारण उनकी श्रद्धा शुष्क हो जाती है।
नास्तिकवाद के आगे ज्ञान की क्या कीमत है ? अनीश्वरवाद का विद्रोह अत्यन्त कठिन होता है। ऐसे
नास्तिकवादी लोगों को तत्काल छोड़ देना चाहिये। अनन्यभाव से शरण न आकर, मीठी-मीठी बातें कर धूर्तता
से ज्ञान प्राप्त करने का जो प्रयत्न करता है, ऐसे धूर्तों का भी त्याग करना चाहिये। धूर्त दूसरों से अपने मतलब
की बात निकाल लेते हैं और अपनी बात या युक्ति दूसरों को नहीं बताते। काया, वाचा मन और धन इस
सम्बन्ध में जो गुरु से छल करता है और उसके गुण-दोष देखता है उस धूर्त का भी पूर्णरूप से त्याग करना
चाहिये। मेरी योग्यता बहुत अधिक है, मैं स्वयं गुरु की सेवा कैसे करूँ? मेरा बड़प्पन कम होगा। इस भय से