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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 794, कुल 869 में से

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पृष्ठ 794

७७८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जिस व्यक्ति को भी देखता है, उसमें उसे मेरे स्वरूप का अनुभव होता है। जिस प्रकार घट में घटाकाश रहता है
और वही घर के भीतर-बाहर महदाकाश के रूप में रहता है, उसी प्रकार मैं चित्स्वरूप प्राणीमात्र के भीतर-बाहर
आत्मस्वरूप बनकर रहता हूँ। निश्चयपूर्वक तथा आत्मप्रतीति से समस्त प्राणिमात्र के प्रति भगवद्भावना रखना
यही भक्तों के भगवद्भजन करने की पद्धति है। उसी को श्रीकृष्ण यथार्थ रूप से बताते हैं।
इति सर्वाणि भूतानिमद्भावेन महाद्युते।
सभाजयन् मन्यमानो ज्ञानं केवलमाश्रितः ॥ १३॥
उद्धव ! तुम बहुत भाग्यवान हो। तुम ज्ञान के निधि तथा कैवल्य के दीप हो। समस्त प्राणिमात्र में रहने
वाला मेरा रूप वास्तव में सबाह्य व्यापने वाला चित्स्वरूप है। इस प्रकार समस्त प्राणिमात्र में मेरा स्वरूप समाया
हुआ है, इस भावना से जो मेरी भक्ति करता है, वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को समदृष्टि से देखता है। भिन्न रूप,
भिन्न नाम, भिन्न स्थिति, भिन्न कर्म, इस प्रकार यह संसार विषम दिखाई देते हुए भी मेरे भक्तों के प्रति मेरी भावना
सर्वत्र सम ही रहती है। भिन्न-भिन्न प्राणियों को देखकर भी जिसका ज्ञान भिन्न नहीं होता, जो मेरी भावना से
सबकी समान रूप से सेवा करता है, उस पर मेरी भक्ति प्रसन्न होती है और मेरी भक्ति जिस पर प्रसन्न रहती है
उसका मैं श्रीकृष्ण आज्ञाधारक रहता हूँ क्योंकि वह सभी भूतों में निश्चित भगवद्भावना धर कर उपासना करता
है। (आशंका) तुम्हारे वेदों की आज्ञा तो माननी ही चाहिये। उसमें कहा गया है कि ब्राह्मण को अत्यन्त पूज्य
मानें, असुरों की अर्थात् दुष्टों की उपेक्षा करें। चाण्डालों को अत्यन्त निंद्य समझें। जो भी कर्मभ्रष्ट हो उनका मुँह
भी न देखें। यह निष्ठुर वेदमर्यादा तुमने ही बना दी है। अतः सारे प्राणी एकसमान हैं इस दृष्टि से
भगवद्भजन कैसे सम्भव है ? यदि ऐसा विकल्प तुम्हारे मन में आ रहा हो तो भक्ति की महिमा सुनो। जब तक
घनी अँधेरी रात रहती है, तभी तक दीपक की प्रतिष्ठा है। सूर्योदय के उपरान्त दीपक का प्रकाश नहीं के बराबर
होता है। उसी प्रकार जब तक दृढ़ अज्ञान है, तभी तक वेदाज्ञा प्रमाण है; किन्तु जिसे मेरा अभेद भजन प्राप्त हो
उसे वेद स्वयं प्रणाम करता है। बेचारे वेद की क्या बिसात है ? जिसे मेरी अभेद भक्ति प्राप्त हुई हो, उसे मैं
श्रीकृष्ण भी वन्दन करता हूँ और सदा उसके वश में होकर रहता हूँ। जहाँ पूर्ण अभेद भक्ति रहती है उसके घर मैं
सेवक बनकर रहता हूँ। उसके संसार की देखरेख मुझ पर निर्भर होने के कारण मैं उसका योगक्षेम चलाता हूँ।
अभेद भक्ति की महिमा ही ऐसी है कि आत्मज्ञान उसके चरण छूता है। वहाँ वंद्य-निंद्य एक समान रहते हैं।
विषम में भी मन में विकार उत्पन्न नहीं होता।
ब्राह्मणे पुल्कसे स्तेने ब्रह्मण्येऽर्के स्फुलिंगके।
अक्रूरे क्रूरके चैव समदृक् पण्डितो मतः ॥ १४॥
जिनके पदरज का वंदन करने से हम पवित्र होते हैं, ऐसे पुण्यपूज्य ब्राह्मण, जिनका चरण श्रीहरि ने अपने
हृदय पर धारण किया है, ऐसे अत्यन्त वन्दनीय ब्राह्मण, और चाण्डालों में भी अत्यन्त निंद्य पुल्कस भी उस श्रेष्ठ
ब्राह्मण की ही तरह हरिरूप है ऐसा जो भक्त समझता है, सुवर्ण का विष्णु हो और सुवर्ण का ही श्वान हो तो
उसमें से एक वंदनीय और दूसरा निंदनीय लगता है लेकिन बाजार में बेचने जाओ तो दोनों का एक ही मूल्य
मिलता है। उसी प्रकार आत्मस्वरूप में निंद्य और वंद्य दोनों एक समान हैं। पुल्कस और ब्राह्मण जातिभेद के
अनुसार विषम हैं किन्तु आत्मदृष्टि से देखने पर दोनों ही चिद्रूप में समान हैं। जो जानबूझकर ब्राह्मण का धन
चुराता है और वह जो ब्राह्मण पर उपकार करता है, वे दोनों ही आत्मदृष्टि से सम हैं तथा मद्रूप दिखाई देते हैं।