श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
है। अरे! मनुष्य देह में ही जो ब्रह्मस्वरूप की भावना रखता है, वही सच्चा भाग्यवान है। चारों मुक्ति का राजा
संसार में निश्चित रूप से वही है। समस्त प्राणियों में भगवद्भाव रखना यही जिसका अखण्ड साधन है, उस पुरुष
का देहाभिमान एक क्षण में, अपने आप निकल जाता है। देह का अहंकार निकल जाता है, उस समय वह स्पर्धा,
ईर्ष्या, तिरस्कार आदि परिवार के साथ समूल बाहर निकलता है। देह पर ममता करना यही 'अभिमान' है। अपने
साथ वाले लोगों के ज्ञान की भर्त्सना करना, इसी का नाम 'स्पर्धा' है और अपनी अपेक्षा दूसरे का ज्ञान अधिक
है, यह जानकर भी उसके गुणों में दोष खोजना इसी का नाम 'ईर्ष्या' है। श्रद्धालु साधकों की साधना को छल
करके नष्ट करना, उनका धिःकार कर उनकी पूर्ण भर्त्सना करना इसका नाम 'तिरस्कार' है। देखो! सारे भूतों में
भगवद्भाव देखने से उपर्युक्त सारे दोष लेकर अहम्भाव भागने लगता है। समस्त प्राणियों के प्रति समदृष्टि रखकर
भजना, यह साधन ही सबमें श्रेष्ठ है। इसके योग से ही पूर्ण ब्रह्म हाथ लगता है और यह लाभ नरदेह में ही होता
है। ममत्व को दूर करें, महानता की आकांक्षा छोड़ दें, लोकलज्जा पर पानी छोड़ें, सभी ब्रह्म सायुज्यता का लाभ
होता है। देह का अहंकार छोड़ दें, सम्मान और अहंता का त्याग करें, महानता और घमण्ड का त्याग करें, तभी
ब्रह्मसायुज्यता प्राप्त होती है। तत्काल पूर्णब्रह्म होने का यह सुलभ साधन है लेकिन वह किसी से भी नहीं हो
पाता क्योंकि लोगों में लौकिक की प्रबल इच्छा रहती है। वर्ण का अभिमान त्याग दें, स्वयं ही ज्ञातापन को दूर
कर दें और अणुरेणु को भी नमस्कार करें तभी परब्रह्म की प्राप्ति होती है। लौकिक की लज्जा जो छोड़ता है,
उसका काम तत्काल होता है। उसी विषय का गुप्त रहस्य श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
विसृज्य स्मयमानान् स्वान् दृशं व्रीडां च दैहिकीम्।
प्रणमेद् दण्डवद् भूमावाश्वचाण्डालगोखरम्॥ १६ ॥
नाते रिश्तेवालों के सामने दण्डवत करने से वे हँसेंगे इसलिये परदेश में जाकर गौ, गधे तथा कुत्तों के
सामने साष्टांग नमस्कार करें। यदि लोगों की लज्जा करें तो कार्य पूरा नहीं होगा इसलिये खूब दण्डवत करें और
लोकलज्जा का ख्याल न कर नाते-रिश्तेदारों के सामने खूब नाचें। सास, ससुर, दामाद, इष्ट, मित्र, समधी, भाई
आदि को देखने से मनुष्य मन ही मन लज्जा से नत हो जाता है। इसलिये उनके सामने ही लज्जा छोड़ कर
चांडालादि हीन जाति को तथा गौ, गधा तथा श्वान को भी वंदन करें। वह वन्दन भी साष्टांग दण्डवत के समान
हो। अगर वहाँ ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण हों अथवा नीच जाति अंत्यज हो, उन्हें भी सद्भावनापूर्वक दण्डवत् करें। अपने
कार्य पूरा करने के लिये लोकलज्जा को निर्मूल हटा दें। गाय, गधा आदि की चरण रज का वंदन करने से
भगवद्भजन का तेज प्रकट होता है। इसलिये स्वजनों की लज्जा का त्याग कर सबको दण्डवत् करें। संशय,
वैषम्य आदि छोड़ लोकलज्जा को लात मारकर भगवद्बुद्धि से समस्त प्राणियों को दण्डवत करें। इसकी मर्यादा
भगवान बता रहे हैं।
यावत् सर्वेषु भूतेषु मद्भावो नोपजायते।
तावदेवमुपासीत वाङ्मनःकायवृत्तिभिः॥ १७॥
अपने देह के साथ जो भी प्राणी अपने दृष्टि पथ में आये, उस पर जब सहज ही भगवत्स्वरूप की भावना
अंकित होगी; उसी प्रकार दृष्टि से देखते समय जिस-जिस चीज का आभास होता है अथवा दृष्टि के बिना जो-
जो दिखायी देता है वह सब जब उसे सहज ही चिद्रूप स्फुरने लगे; मन की कल्पना में जो भी आये अथवा जो
कल्पना के बाहर का हो, वह सब मद्रूप से मेरा ही स्वरूप है, ऐसा अनुभव होगा; देह से होने वाला कर्म का