श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 795, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंउनतीसवाँ अध्याय ७८९
ऐतैर्दोषैर्विहीनाय ब्रह्मण्याय प्रियाय च।
साधवे शुचये ब्रूयाद् भक्तिः स्याच्छूद्रयोषिताम् ॥ ३१ ॥
उपदेश देने के लिये पूर्ण अधिकार यह है कि उसमें प्रखर वैराग्य हो। वह भी पिशाच वैराग्य नहीं, बल्कि
विवेक सम्पन्न तथा शास्त्र शुद्ध वैराग्य चाहिये। अन्यथा चार दिन वैराग्य धारण करेगा और तत्काल विषयों की
ओर मुड़ जायेगा। ऐसे को उपदेश करना, दूध पिलाने की तरह है क्योंकि वैराग्य चला जाने के बाद केवल ज्ञान
का अभिमान शेष रहता है। उस अभिमान से यह क्या करता है ? तो श्रेष्ठ लोगों के गुणदोष देखता है।
कनिष्ठोंकी अवहेलना कर उनकी निन्दा करना तथा श्रेष्ठ लोगों के गुणदोष देखना। वैराग्य क्षीण होने पर इस
प्रकार का ज्ञानाभिमान जागृत होता है। उद्धव ! इस संसार में केवल दो ही अवस्थाएँ हैं। पहली विरक्ति तथा
दूसरी विषयासक्ति तीसरी कोई अवस्था होती ही नहीं। जहाँ विवेक से विषय क्षीण होते हैं वहाँ परिपूर्ण वैराग्य
बढ़ता है और जहाँ विवेक के साथ वैराग्य क्षीण होता है, वहाँ ज्ञानाभिमान से विषयाचरण होने लगता है।
इसलिये ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने तक पूर्णरूप से वैराग्य कायम रखता है तथा वैराग्य युक्त होकर अनन्य भाव से गुरु
की शरण में जाता है वही उपदेश के लिये अधिकारी रत्न है, ऐसा समझना चाहिये। पिछले श्लोक में दोषों का
निरूपण वैराग्य के लिये समझना चाहिये। इन दोषों से जो रहित होता है, वही सच्छिष्य है। जो ब्राह्मणों की
ब्रह्मभाव से भक्ति करता है, जो भूतों को अनन्य भगवद् भाव से भजता है, उसकी भक्ति और विरति दासी बन
जाती हैं। उसे ही सचमुच अधिकारी समझना चाहिये। गुरु का अत्यन्त प्रिय भी हो लेकिन यदि अभक्त हो तो
भजन करने तक उसे भी ब्रह्मज्ञान नहीं प्राप्त होगा। गुरु को प्रिय तथा भजनशील और दोषरहित हो तो ऐसे शिष्य
की विरक्ति को अटल बनाकर उसे पूर्ण ईमानदारी से इस गुप्त ज्ञान का उपदेश करना चाहिये। स्वपत्नी तथा
स्वधन का जिसे अत्यन्त लोभ हो तो उसे न स्वर्ग मिलेगा, न मुक्ति ही। असीम जन्म-मरण अवश्य भोगना
पड़ेगा। परस्त्री और पराया धन को जिसका मन कभी स्पर्श नहीं करता, ऐसे पवित्र व्यक्ति को इस ज्ञान का
उपदेश करना चाहिये। जो वैराग्य के साँचे में ढला हुआ है, विवेक से जो परिपूर्ण है, जीवभाव से जो सद्गुरु की
सेवा के लिये समर्पित है और अनन्यभाव से उनके चरणों पर गिरा हुआ है; उसी प्रकार अपनी महानता भूलकर
जो गुरु सेवा के लिये रंक होने को तत्पर है, ऐसी सेवा के प्रति जिसका पूर्ण सद्भाव रहता है, इन्द्र जैसे बड़े-बड़े
देवतागण को भी जो सद्गुरु का दास मानता है और सद्गुरु की अपेक्षा हरिहर को भी श्रेष्ठ नहीं मानता; जिसमें
न गर्व है न मद, जिसमें कामक्रोध नहीं है, जिसे विकल्प भेद पसन्द नहीं है, उसी शिष्य को पूर्णरूप से परमार्थी
समझना चाहिये। काया, वाचा, मन, धन छोड़ तथा बड़प्पन की अकड़ छोड़कर जो अनन्य भाव से सद्गुरु की
शरण में जाता है, उसे ही साधुत्व की दृष्टि से सच्छिष्य समझना चाहिये। लोक लज्जा को छोड़कर जो ब्रह्मज्ञान
का याचक बनता है और सद्गुरु के उपदेश के लिये चातक बनकर रहता है, उसे अवश्य उपदेश करना चाहिये।
जो तीन वर्णों से अलग हैं, वेदों ने जिन्हें अपने से दूर करके रखा है, जिन्हें मंत्रों का अधिकार नहीं है, जो श्रवण
के भी अधिकारी नहीं हैं, जिनका आश्रमधर्म नहीं है, वैदिक कर्म नहीं है, जप अथवा होम नहीं है, जो अधमवर्ण
के कारण नीच हैं, ऐसे शूद्रादि लोग, उनमें भी इस ग्रन्थ का ज्ञान पढ़कर जन्म-मरण निवारण करने के लिये तीव्र
वैराग्य उत्पन्न होता है। ऐसे लोगों को मन से विषयों से घृणा होती है और वे काया, वाचा तथा मन से सद्गुरु को
अनन्य भाव से शरण जाते हैं। गुरु से किस तरह प्रश्न किया जाय, यह भी उनकी समझ में नहीं आता। जन्म-
मरण से मुक्ति पाने के लिये वे भक्ति से साष्टांग दण्डवत करते हैं। परमार्थ के प्रति उन्हें शुद्ध और परिपूर्ण श्रद्धा
रहती है। ऐसे लोग भले ही शूद्र क्यों न हों लेकिन उन्हें ब्रह्मज्ञान का उपदेश करने से कभी दोष नहीं लगता। मेरे