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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 798, कुल 869 में से

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पृष्ठ 798

७८२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
रूप में बतायी। व्रत, तप, दान अथवा योग, याग, ध्यान करके यदि वेदशास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया तो भी वह मेरी
भक्ति के बराबर नहीं होगा। साधक अट्टहास कर नाना प्रकार के साधन भले ही कर लें लेकिन मेरी भक्ति के
बिना, मेरे प्रेम की वार्ता उन्हें नहीं मिलेगी। मेरे भक्तों की संगति से ही साधकों को मेरी भक्ति प्राप्त होती है।
उद्धव! अभेद भजन से ही मेरी प्राप्ति होती है यह निश्चित रूप से जान लो। सर्वभूतों के प्रति भगवद्भजन करने
का लक्षण सुनो। प्राणी भले ही भिन्न-भिन्न स्वभाव के हों लेकिन उनके प्रति मन में परिपूर्ण ब्रह्मभावना रखनी
चाहिये। दुष्ट, दुरात्मा, अपरिचित, नष्ट, चाण्डाल, पतित के प्रति भी निर्मल ब्रह्मभावना रखना यह 'मानसिक'
भजन है। समस्त प्राणिमात्र में परिपूर्ण भगवंत समाया हुआ है यह जानकर वह किसी से निष्ठुर भाषण नहीं
करता। भले ही वहाँ प्राण चले जाएँ लेकिन फिर भी उद्धव! वह लोगों के गुण-दोषों का उच्चार नहीं करता। यह
सचमुच 'वाचिक' भजन है। प्राणियों का जिससे उपकार हो, ऐसा ही देह व्यापार वह करता है; कोई उसका
मर्मभेद भी करे तो भी वह उसके अपकार के लिये हाथ नहीं उठता। बल्कि अपकार करने वाले का वह उपकार
ही करता है। यह सचमुच 'कायिक' भजन है। इस प्रकार काया, वाचा तथा मन से समस्त भूतों में भगवद्भजन
करना यही मुख्य रूप से श्रेष्ठ साधन है, इसे ज्ञानी भक्त जानते हैं। ब्रह्मप्राप्ति का परम कारण यही एक सुगम
साधन है। उद्धव! देवकी की शपथ लेकर कहता हूँ कि इसे मैं भी मानता हूँ। यह भजनधर्म अत्यन्त शुद्ध है तथा
इसमें विघ्नों का संबंध अथवा पीड़ा प्रवेश नहीं कर सकती। यही बात श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं।
न ह्यङ्गोपक्रमे ध्वंसो मद्धर्मस्योद्धवाण्वपि।
मया व्यवसितः सम्यङ् निर्गुणत्वादनाशिषः ॥ २० ॥
मनु आदि शास्त्रकारों ने नाना प्रकार के शास्त्रार्थों में अनेक साधन बताये हैं; किन्तु साधकों को सर्वभूतों में
भगवद्भक्ति यही सर्वोत्तम साधन है। इस भक्ति की यही श्रेष्ठता है कि इसके प्रारम्भ से ही साधक को बाधा
पहुँचाने के लिये विघ्न नहीं आ सकता। इस भक्ति का लक्षण यही है कि इसका मूल आरम्भ ही निर्गुण होने के
कारण इसमें विघ्न प्रवेश करने का साहस ही नहीं करता। गरुड़ के झपट्टे के साथ जिस प्रकार सर्प के शरीर के
टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं, उसी प्रकार इस भक्ति के पास विघ्नों की अपने आप ही होली जल जाती है। मेरे
केवल नाम के सामने विघ्न बेचारा खड़ा नहीं रह पाता। इस प्रकार यह भक्ति समर्थ है। उद्धव! तुम्हारा भाग्य
अच्छा है कि मैंने तुम्हें अपना यह गुप्त भण्डार खोलकर असली रहस्य तुम्हें बताया। मेरी निष्काम भक्ति में
विघ्नों की गड़बड़ी नहीं चलती तथा साधकों को परब्रह्म स्वरूप की सुलभ रीति से प्राप्ति होती है। हेतु मन में
रखकर किया हुआ कर्म हो या अहेतुक कर्म हो, वह सारा कर्म जो कृष्णार्पण करेगा, वही मेरी उत्तम भक्ति है।
उसी का निरूपण श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
यो यो मयि परे धर्मः कल्प्यते निष्फलाय चेत्।
तदायासो निरर्थः स्याद् भयादेरिव सत्तम॥ २१॥
व्यवहार के लिये जो कुछ प्रयत्न किया वह फलित न होकर व्यर्थ गया; उसे भी यदि ब्रह्मार्पण किया तो
सद्भाव के कारण वह भी मेरे भजन में जुट जाता है। होली का त्योहार बहुत बड़ा होता है; उसमें आपने जो खेल
खेला हो, वह भी यदि कृष्णार्पण कर दिया जाय तो वह भक्ति भी मुझे ही अर्पित होती है। चोर के भय से कोई
जंगल की ओर भाग जाय और वहाँ उसे अनायास ही खजाना मिल जाय; उसी प्रकार निरर्थक किया हुआ कर्म
भी यदि मुझे अर्पण किया जाय तो वह भी मेरे भजन में लग जाता है और उससे बड़ा लाभ होता है। लोग सड़ा-