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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 793, कुल 869 में से

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पृष्ठ 793

उनतीसवाँ अध्याय ७७७
पवित्र है। जिस गाँव में मेरे भक्त रहते हैं, उनकी संगति से वह गाँव भी पवित्र हो जाता है और जिस देश में
साधु-महात्मा रहते हैं, उनकी संगति से वह देश भी पवित्र हो जाता है। भक्तों की हवा जिधर भी लगती है उधर
पवित्रता होने लगती है। वह सत्संगति जिन्हें प्राप्त होती है उनमें भी पवित्रता आती है। चंदन की संगति से बैर,
बबूल भी सुवासिक हो जाते हैं और उन्हें देवता तथा ब्राह्मण मस्तक पर धारण करते हैं। उसी प्रकार सत्संग भी
साधकों को सर्ववंद्य कर देता है। इस प्रकार शुष्क काष्ठ भी संगति से मूल्यवान हो जाता है; अमीर उन्हें पसन्द
करते हैं और वह हरिहर के मस्तक पर भी चढ़ता है। भाग्य यदि अनुकूल हो तभी सत्संगति प्राप्त होती है;
सत्संग से साधक पवित्र हो जाते हैं, यह निश्चित जान लो। जिसका चित्त भजनयुक्त होकर मुझमें रम जाता है,
उसी को भक्त कहना चाहिये और वे ही संत सज्जन हैं। मेरे भक्तों के आचरण को सुर, नर और असुर भी वंदन
करते हैं; साधकों को भी निश्चित रूप से इसी की साधना करनी चाहिये। नारद, प्रह्लाद, अंबरीष आदि श्रेष्ठ
लोगों ने जिस भक्ति का अनुसरण किया वही भक्ति साधकों को भी रात-दिन सद्भावपूर्वक साधनी चाहिये।
पृथक्सत्रेण वा मह्यं पर्वायात्रामहोत्सवान्।
कारयेद गीतनृत्याद्यैर्महाराजविभूतिभिः ॥ ११ ॥
प्रतिवर्ष यात्राओं का आयोजन करें, पर्वकाल की पूजा में गरुड़ध्वजांकित चिह्नों से युक्त छत्रचामरादि
राजोपचार भक्तिभाव से श्रीकृष्ण को अर्पण करें। इस प्रकार के सार्वभौम राजैश्वर्य का भोग श्रद्धापूर्वक भगवान
को अर्पण करें, भजन के प्रति रात-दिन मन में अदम्य उल्हास रखें। अश्व, हाथी अथवा शेष, गरुड़ आदि वाहनों
पर अथवा पालकी में उनकी शोभायात्रा निकालें। उसी प्रकार रथोत्सव भी करें। करताल, मृदंग, झण्डे, शंख,
झांझ आदि वाद्यों का गजर ऐसे करें कि आकाश में उसका स्वर गूँज उठे, जयजयकार की गर्जना करें। गायन
और नृत्य का कार्यक्रम करें, पोवाड़े गायें, प्रेमपूर्वक कीर्तन करें। उसी प्रकार भगवान के सामने उछलकूद करते
हुए कीर्तन करें, मुँह टेढ़ाकर भगवान के साथ मसखरी करें; सभा में गर्जना कर भगवान का गुणगान करें।
गोपालकाला और रासक्रीड़ा का खेल करें। अनेक प्रकार के कौशल से दण्ड, छाती, मस्तक आदि की टक्कर से
शरीर की स्वस्थता का प्रदर्शन करें। कुवलयापीड नामक मत्त हाथी के दाँत उखाड़कर गोपालकृष्ण के वेश में
झूमते हुए सभा में प्रवेश करें। भगवान की महानता की स्तुति का पाठ करें। यदि धन की समर्थता हो तो उत्सव
स्वयं ही करें अन्यथा लोगों के साथ मिलजुल कर उत्सव करें। इस प्रकार एकनिष्ठ प्रेम से और चाव से भजन
करने से मेरी भक्ति की चाह बढ़ती है और सहज ही हरि का प्रेम उत्पन्न होता है। सप्रेम भक्ति करने से 'मैं' भक्तों
पर प्रसन्न होता हूँ और मेरे भक्त को अंतरंग भजन स्वयमेव प्राप्त होता है। अब 'अंतरंग भक्ति' के बारे में पूछोगे
तो उसका लक्षण उद्धव को श्रीकृष्ण स्वयं अपने मुख से बता रहे हैं।
मामेव सर्वभूतेषु बहिरन्तरपावृतम्।
ईक्षेतात्मनि चात्मानं यथा खममलाशयः॥ १२॥
श्रद्धायुक्त भक्ति करने से चित्तवृत्ति शुद्ध होती है और उससे गुरुकृपा से मेरे भक्तों को आत्मदृष्टि की स्थिति
प्राप्त होती है। उस आत्मदृष्टि से देखने से समस्त प्राणिमात्र भीतर उसे मैं ही दिखायी देने लगता हूँ, अन्दर में मैं
हूँ ऐसा निश्चय जो करता है तभी प्राणिमात्र के बाहर भी मैं ही उसे दिखायी देने लगता हूँ। पर और अवर से परे
रहने वाला अनंत, मैं भगवान प्राणिमात्र के अन्दर-बाहर रहता हूँ। मेरा भक्त मैं बनकर ही मद्रूप से मुझमें आकर
मिलता है। जितनी और जैसी मेरी व्याप्ति होती है उसी के अनुसार मेरे भक्त की स्थिति होती है। इसलिये वह