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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

बाईसवाँ अध्याय ५८९
सच मान लेता है, उसी प्रकार देह भी मिथ्या और काल्पनिक है। लेकिन अज्ञानी लोग उसी को सच मानते हैं।
जो देह और बुद्धि दोनों को ही मिथ्या मानता है, उसे भविष्य में जन्मसिद्धि की क्या चिन्ता है? क्योंकि
मिथ्यारूपी पदार्थों की वृद्धि होती ही नहीं है। इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण बताते हैं।
मा स्वस्य कर्मबीजेन जायते सोऽप्ययं पुमान्।
म्रियते वामरो भ्रान्त्या यथाग्निर्दारुसंयुतः ॥ ४५ ॥
देहात्मवाद से देहाभिमान उत्पन्न होता है, जिससे लोगों में गूढ़ वासनाबीज उत्पन्न होता है और अपनी
वासनाओं के संकल्प से ही मनुष्य स्वयं मिथ्या जन्म-मरण को ही सत्य मानने लगता है। उस देहाभिमान के
कारण ही क्रिया चरण करने वाला कर्मकर्ता मैं हूँ यह मान कर निष्कर्म को कर्मबन्धन है और अमर को जन्म-
मरण है, यह मान लेता है। गड्ढे में एकत्र पानी में सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखायी देता है, इसलिये वहीं सूर्य का
जन्म हुआ और पानी जब सूख जाता है तो सूर्य का जीवन समाप्त हो गया, ऐसा बालक कहता है। उसी प्रकार
अजन्मा को जन्म-कर्म है ऐसा मानना केवल माया का भ्रम है। इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण सरल दृष्टांत देते हैं।
वास्तव में अग्नि अजन्मा होने के कारण अव्यक्त है, लेकिन वह लकड़ी में ही उत्पन्न हुआ ऐसा कहा जाता है।
वह उस लकड़ी के आकार का ही दिखायी देता है। इसलिये लकड़ी समाप्त होने पर अग्नि नष्ट हो गया ऐसा
कहते हैं। उस लकड़ी की ही तरह यहाँ जन्म और विनाश ये दोनों देह के ही लिये हैं। दृष्टांत के अग्नि की ही
तरह आत्मा नित्य और अविनाशी है। उस देह की नौ अवस्थाएँ होती हैं, जिनका वर्णन श्रीकृष्ण स्वयं करते हैं।
निषेकगर्भजन्मानि बाल्यकौमारयौवनम्।
वयोमध्यं जरामृत्युरित्यवस्थास्तनोर्नव ॥ ४६ ॥
देह की नौ अवस्थाएँ हैं, उनकी भी स्थिति सुनो। उन भिन्न-भिन्न अवस्थाओं का विस्तार भी सुनो। पिता के
देह में शुक्लरूप प्राप्त कर माता के उदर में प्रवेश करने को 'निषेक' कहते हैं। यही उस देह की पहली अवस्था
है। फिर माता के उदर में रक्तयुक्त संचित होकर, पिण्ड बनता है और धीरे-धीरे बड़ा होकर उसे 'गर्भ' का
स्वरूप आता है। यह देह की दूसरी अवस्था है। फिर प्रसूति वायु के आघात से पेट से बाहर आना, इसे 'जन्म'
कहते हैं। यह देह की तीसरी अवस्था है, यह अच्छी तरह जान लो। स्तनपान ही सबसे अच्छा लगता है, माता
ही सबसे श्रेष्ठ तथा रोने में ही सारा बल दिखायी देता है यह देह की चौथी 'बाल्यावस्था' है। केवल अज्ञान के
कारण मलमूत्र में लोटता है, सारे इन्द्रियों की शक्ति गुप्त रहती है, विचार करने की बिलकुल शक्ति नहीं रहती,
मधुर, कोमल, तुतला कर बोलता यह पंचवार्षिक 'बाल्यावस्था' है। फिर इन्द्रियों की शक्ति बढ़ती जाती है, किन्तु
शरीर में विषय का स्वार्थ नहीं होता, खेल पर ही मन आसक्त रहता है, यह उस देह की पाँचवीं 'कुमारावस्था'
है। इसके बाद 'युवावस्था' उसमें इन्द्रियों में परिपूर्ण शक्ति आती है और मन में बुद्धिमान होने का अभिमान
हिलोरें मारने लगता है। उस समय मन में स्त्री की वासना उत्पन्न होने लगती है, धन का लोभ बढ़ने लगता है,
घर-बार से प्रेम होने लगता है और समाज में नाम रूप की कीर्ति बढ़ने लगती है। सम्पत्ति के मद से मन में
अहंकार भरा रहता है, बाल-बच्चों में ही मन रमता है। बढ़ती आशा के कारण अधिक से अधिक भोग भोगने की
चाह होती है; और काम क्रोध का बड़ा-सा चक्र चारों ओर घूमता रहता है। कोई अपमान करता है तो वह सहन
नहीं होता। कोई 'तू' कहता है तो तैश में उठ कर खड़ा हो जाता है। ऐसी अनर्थकारी 'यौवनावस्था' देह की
छठवीं अवस्था है। पन्द्रह से पचीस वर्ष तक पूर्ण यौवन का जोर रहता है। उसमें नाना प्रकार के विकारों से

व्याप्त हुआ मन पर्याप्त देहाभिमान एकत्र कर लेता है। फिर चालीस से साठ वर्ष तक देह की उतरती कला पूर्ण
होकर शरीर पर झुर्रियाँ आने लगती हैं और काल उन इन्द्रियों की शक्ति नष्ट करने लगता है। जब काल शरीर को
क्षीण करना प्रारम्भ करता है, वह देह की सातवीं 'उत्तरावस्था' है। इस अवस्था का हाथ पकड़ कर आने वाली
'वार्धक्यावस्था' बड़े-बड़े शूरवीरों को भी विचलित कर देती है। इन्द्रियों के सुख विलास के व्यापार और
उत्तमोत्तम आहार शरीर को सहन नहीं होते। उस जरा ने शरीर की रचना अस्तव्यस्त कर दी होती है। दाँत टूट
कर वहाँ गड्ढे बन जाते हैं, भय से केश सफेद हो जाते हैं और मस्तक काँपने लगता है। वार्धक्य शरीर को
बिलकुल क्षीण कर देता है, फिर भी विषयों की इच्छा प्रबल रहती है। चिन्ता अपार और भयंकर ! आशा तो पूर्ण
नहीं होती। आँखों का तेज जाता रहता है, कानों से सुनायी नहीं पड़ता, मुँह से लार गिरने लगती है, फिर भी वह
देहाभिमान को बढ़ाता ही रहता है। समय आने पर मानसिक और शारीरिक रोग प्रकट होने लगते हैं, महामोह से
बुद्धि भ्रमित हो जाती है और विचार करने की शक्ति तो बिलकुल नष्ट हो जाती है। चलते समय पैर आपस में
लड़खड़ाने लगते हैं और सहारे के लिये लाठी लेनी पड़ती है। जीभ भारी हो जाती हे और शब्द स्पष्ट सुनाई नहीं
पड़ते। होंठ चूहे की तरह हिलते रहते हैं। आँखों से कीचड़ निकलता है, मुँह में लार भर जाती है, नाक से
निकलने वाला मल होठों पर बहने लगता है। मुख का चुम्बन भी कोई नहीं माँगता क्योंकि वह देने वाली स्त्री
थूक देख कर दूर भाग जाती है। खाँसी के कारण क्षण भर के लिये विश्राम नहीं मिलता, साँस फूलती है और
खाँसी का दौर चलता रहता है। शरीर काँपता रहता है, फिर भी देहाभिमान कम नहीं रहता। 'कल के बच्चे'
कहकर वह लोगों को पुरानी बातें सुनाने बैठ जाता है। अपानवायु का वाद्य तो निरन्तर बजने लगता है। इस
प्रकार जीवित अवस्था में ही जीव का उपहास करने वाली वह 'जरा' इस देह की आठवीं अवस्था है। जिस
प्रकार सुई के पीछे धागा रहता है, उसी प्रकार 'जरा' के साथ 'मरण' लगा हुआ है। जरा जब शरीर को क्षीण
करता है तो मृत्यु का झंडा लहराने लगता है। देह की नाड़ियाँ पोली होने लगती हैं, आवाज लड़खड़ाने लगती है,
फिर देह का आकर्षण रहता ही है। स्त्री और बच्चों की चाहत पहले से अधिक बढ़ने लगती है। मेरे बाद ये
अनाथ हो जायेंगे, इन्हें कौन सँभालेगा ? इस विचार से वह बच्चों को गले लगा कर फुक्का फाड़ कर रोने लगता
है। धन का लोभ तो बहुत कठिन है। अन्तकाल में भी वह स्वयं खर्च नहीं करता। औरों को दूर रखकर, केवल
अपने ही विश्वासपात्र लोगों को अपने खजाने की जानकारी देता है। वासना का चमत्कार आश्चर्यजनक है। देह
का विस्मरण कर जिस बात का सर्वाधिक स्मरण होता है, उसी वस्तु से वह तद्रूप हो जाता है। इस देह की
सम्पूर्ण स्मृति तत्काल नष्ट हो जाती है, और चेतना के साथ प्राण निकल जाता है। इसी का नाम है देह की मृत्यु।
यह नौवीं अवस्था है। इस प्रकार गर्भ से लेकर मृत्यु तक देह की नौ अवस्थाएँ हैं। जो विकारी होता है उसी को
देह की अवस्थाएँ होती हैं। आत्मा अविकारी होने के कारण अलिप्त ही रहता है। अब तुम कहोगे कि देह तो
जड़ है, उसमें विकार कैसे होता है ? सूर्य स्वयं होकर किसी को नहीं जगाता। उसके उदय होते ही लोग अपने
आप जग जाते हैं। इसलिये इन लोगों का क्रिया कर्म सूर्य के शरीर को स्पर्श नहीं करता। उसी प्रकार विकार
प्रकट कर आत्मा अलिप्त ही रहता है। सूर्य किरण निकलते ही जिस प्रकार सूर्यकान्त मणि अपने शरीर से अग्नि
उत्पन्न करने लगता है, फिर उस अग्नि से यज्ञकार्य भी होते हैं और आग भी लगती है, किन्तु उस कर्म से सूर्य
अलग ही रहता है। उसी प्रकार चैतन्य के प्रकाश से मन शुभ-अशुभ कर्म करता रहता है। लेकिन चैतन्यपूर्ण
आत्मा उस मनोविकार से अलिप्त ही रहता है। इसलिये ये सारे विकार मन के ही किये हुए हैं। कर्माकर्म भी मन
ने ही किये हैं, यह जान लो। जन्म-मरण भी मन की ही क्रिया है और स्वर्ग या नरक में जाना यह भी मन की

ही क्रिया है। लक्ष्यालक्ष्य भी मन ने ही किया है और बंध तथा मोक्ष भी मन ने ही किये हैं। यही निरूपण साक्षात
श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
एता मनोरथमयीर्ह्यन्यस्योच्चावचास्तनूः ।
गुणसङ्गादुपादत्ते क्वचित् कश्चिज्जहाति च ॥ ४७ ॥
अभिमान से युक्त मन, संस्कार विकार का आभास कराता है और स्वर्ग और नरक में जाना यह भी
देहाभिमान के कारण होता है। इससे आत्मा स्वभावतः भिन्न है। वह ज्ञानमय तथा ज्ञानस्वरूप है। उसे मन स्पर्श
भी नहीं कर सकता और शुद्ध तत्त्व में अभिमान भी नहीं रहता। मन और अभिमान को माया ही उत्पन्न करती है,
अभिमान ने ही गुणों को उत्पन्न किया है और उन गुणों ने मायात्मक विकार सामग्री के साथ यह देह तैयार किया
है। देह के पास जिस प्रकार छाया रहती है, उसी प्रकार आत्मस्वरूप में मिथ्यारूप माया रहती है। ऐसे
आत्मस्वरूप में जन्म-मरण के साथ इस देह के प्रवेश के लिये स्थान ही नहीं है। आत्मा शुद्ध और देह मलिन है।
उसी प्रकार देह जड़ तथा आत्मा चैतन्यस्वरूप है। आत्मा अजन्मा, अव्यय और परिपूर्ण है। जन्म-मरण केवल
देह को है। तीन गुण, तीन अवस्था, कार्य, कर्म, मैं कर्त्ता यह अभिमान, ये सब देहाभिमान के विकार हैं। आत्मा
सर्वथा अलिप्त ही है। इस प्रकार आत्मा स्वभाव से ही चैतन्यस्वरूप होने के कारण, विकारों से भिन्न ही है। अब
तुम कहोगे कि 'जीव को ही देहाभिमान है', तो उसके बारे में भी सुनो। जीव माया के गुणों से अलिप्त रहता है।
स्फटिक जिस रंग पर रखिये, उस रंग का वह दिखायी देता है। लेकिन स्फटिक मूलतः शुद्ध होने के कारण वह
उस रंग से भिन्न रहता है। उसी प्रकार सत्त्वादि गुणों में खेलते हुए भी जीव सचमुच अलिप्त ही रहता है।
स्फटिक को काजल पर रखो तो वह काला दिखाई देता है किन्तु वह कालेपन से भिन्न रहता है। उसी प्रकार
तमोगुण से जीव मलिन दिखाई दे, फिर भी वह तमोगुण से अलग रहता है। उसी स्फटिक को यदि लाल रंग पर
रख दिया जाय तो उसकी प्रभा लाल दिखायी देती है, लेकिन फिर भी वह लाल रंग से अलग रहता है। जीव
रजोगुण में रहकर भले ही राजसी लीलाएँ करे फिर भी वह सब भोग कर जीवात्मा अलग ही रहता है। श्वेत रंग
पर स्फटिक रखने से उसका रंग श्वेत दिखायी देता है लेकिन वह श्वेत रंग से बिलकुल अलग रहता है। उसी
प्रकार जीवात्मा सत्वगुण में रहने पर बड़ा ज्ञानसम्पन्न दिखायी देता है, लेकिन वह गुण और ज्ञान से अलग रहता
है। इस प्रकार जीव तीन गुणों से किस प्रकार अलिप्त रहता है, यह तुम्हें बताया। अब वह देह में रहते हुए भी
किस प्रकार युक्त रहता है, यह बताता हूँ। जिस प्रकार घट में रहने वाला पानी चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब घट में लाता
है, उसी प्रकार जीवत्व शुद्ध आत्मा को देह में देहाभिमान के रूप में देखता है। घट निश्चल हो तो बिम्ब भी
निश्चल रहता है। घट हिलता है तो बिम्ब भी हिलता है। उसी प्रकार ये सारी अवस्थाएँ देह की हैं लेकिन
जीवात्मा उसे अपनी ही मानता रहता है। घट में काजल घोलने से पूरा पानी काला हो जाता है लेकिन उसके
अन्दर के बिम्ब को अथवा प्रतिबिम्ब को कालिख नहीं लगती। उसी प्रकार देह के सुख-दुःख की अथवा पाप
पुण्य की बात जीव के अथवा आत्मा के माथे पर नहीं आती। अहंकार के कारण देह ही वह सब कुछ भोगता
रहता है। इस घड़े का पानी उस घड़े में भर दें तो उसमें भी चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब दिखायी ही देता है। उसी
प्रकार इस देह का जीव उस देह में चला जाता है, इसीलिये उसे जीवात्मा कहते हैं। चन्द्रमा आकाश में अलिप्त
ही रहता है। वह मिथ्या ही प्रतिबिम्ब रूप में घट में भासमान होता है। उसी प्रकार आत्मतत्व परब्रह्मस्वरूप में
स्थिर रहता है तथा देहात्मसंयोग से ही उसे जीव की चाह लगी रहती है। इस प्रकार देह धारण करने वाला जीव

५९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तीन गुणों से भिन्न होकर देहसंग से भी अलिप्त रहता है। इस प्रकार मैंने जीव और शिव का साद्यंत दर्शन करा
दिया। लेकिन यह सब लोगों की समझ में न आने के कारण देहात्मवाद से वे भ्रांति में पड़े हैं। इससे अभिमान
उन्हें स्वर्ग-नरक के चक्र में डालकर नाना प्रकार की योनियों का भ्रमण कराता है। द्विज देह से प्रारम्भ कर
परमेष्ठी देह तक जाते हैं और सभी प्रकार के स्वर्गसुख को भोगते हैं। लेकिन जो पापी होता है वह अधोमुख
होकर ब्राह्मण से नीचे की जाति में जन्म लेकर अनेक प्रकार की दुःख योनियों को भोगता है। पाप और पुण्य का
कर्माचरण ही जन्म-मरण बढ़ाता है। उसमें भी जन्म-मरण के चक्र को काटने वाला कोई विरला भाग्यवान होता
है। जिन्होंने इच्छारहित रह कर पुण्य की राशियाँ बटोरी हैं, जिन्होंने स्वधर्म का जोड़ प्राप्त किया है, जिनके
अंतःकरण में प्राणिमात्र के प्रति दया रहती है और ब्राह्मण भजन में जिन्हें प्रेम रहता है, जो अहिंसा का मैका है,
'वसुधैव कुटुम्बकं' जिनका मन अद्वैतयुक्त है, जो सारासार राजहंस हैं और जो जीवन-मरण के चक्र से ऊब चुके
हैं जो उपनिषदों का अर्थ चातक की तरह ग्रहण करते हैं जो जीव के उत्पादक का संशोधन करते हैं, जो
आत्मतत्त्व के साधक हैं और जो सचमुच ही भावार्थी हैं, संतचरणों पर जिनकी पूर्ण भक्ति है और जो गुरुवचन
पर बिक चुके हैं, वे मेरी कृपा से इसी देह में विदेहता प्राप्त करते हैं। वे ही आत्मज्ञान के योग से देह का बन्धन
तोड़कर, जन्म-मरण के करोड़ों फेरे बचाकर सायुज्य की पताका लहराते हैं और उस पार पहुँचते हैं। जिस प्रकार
मृगजल में डूबने का भय नहीं है, उसी प्रकार संसाररूपी भँवर उन्हें बचाकर निकल गये। लेकिन मुक्त पुरुष
संसार में बहुत कम ही दिखायी देते हैं। सारा संसार ढूँढ़ने पर एकआध ही कोई दिखायी देता है। अस्तु ! लेकिन
यदि ऐसा कोई दिखायी दिया तो उसे पहचानेगा कौन ? क्योंकि उद्धव ! वहाँ भी आत्मा दिखायी नहीं देता।
ज्ञानसम्पन्न व्यक्ति यदि पास आकर मिला भी और उसका देह प्रपंच में व्यवहार करते दिखायी भी दिया तो भी
उसके भीतर का आत्मा किसी को दिखायी नहीं देता। आत्मा आया-गया ऐसा कहते अवश्य हैं किन्तु उसका
आना-जाना कोई देखता नहीं है। उसी की उत्पत्ति श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
आत्मनः पितृपुत्राभ्यामनुमेयौ भवाप्ययौ।
न भवाप्ययवस्तूनामभिज्ञो द्वयलक्षणः ॥ ४८ ॥
पिता का आत्मा गया इसलिये पिता का देह नष्ट हो गया ऐसा कहते हैं लेकिन उसे जाते हुए कोई नहीं
देखता। कोई कहता है, पुत्र का जन्म होते ही आत्मा का जन्म होता है। लेकिन पुत्रोत्सव मनाते समय उसके देह
का ही गौरव किया दिखाई देता है। आत्मा दुर्गम ही रहता है, वह दिखायी नहीं देता। इसलिये इस संसार में
आत्मा का आना-जाना वास्तव में नहीं होता। इस दृष्टांत से सिद्ध होता है कि जन्म और मरण देह के ही लिये
है। आत्मा साक्षीरूप में अविनाशी ही है। इसी अर्थ का विवेचन श्रीकृष्ण विशद करके बता रहे हैं।
तरोर्बीजविपाकाभ्यां यो विद्वाज्जन्मसंयमौ।
तरोर्विलक्षणो द्रष्टा एवं द्रष्टा तनोः पृथक् ॥ ४९ ॥
पर्वत पर बीज की उत्पत्ति और वृद्धि होने के कारण पर्वत उस वृक्ष का साक्षी होता है। लेकिन उस वृक्ष
को काटने से पर्वत को कोई दुःख नहीं होता। उसी प्रकार द्रष्टा देह का साक्षी है। प्रत्येक देह को द्रष्टा साक्षी है
किन्तु इस देह के धर्म द्रष्टा पर लागू नहीं होते। वह देह में रहते हुए भी विदेही ही रहता है। इसलिये उसे
संसारबंधन का स्पर्श नहीं होता। लेकिन यह रहस्य न जानकर लोग इस संसार से जुड़े हुए हैं। यही बात स्वयं
श्रीकृष्ण पाँच श्लोकों में वर्णन कर रहे हैं।

बाईसवाँ अध्याय ५९३
प्रकृतेरेवमात्मानमविविच्यबुधः पुमान्।
त्वेन स्पर्शसम्मूढः संसारं प्रतिपद्यते॥५०॥
कर्म, अकर्म अथवा कर्त्तापन आत्मा के लिये नहीं है। इस अर्थ का निरूपण पहले ही आ चुका है। आत्मा
इनमें से किसी भी गुण का स्पर्श नहीं करता। देह में रहने वाला आत्मा देह से बिलकुल भिन्न रहता है क्योंकि
पुरुष प्रकृति से भिन्न है। यह आत्मज्ञान जिसे नहीं होता वही व्यक्ति संसार में घरजमाई बन कर बैठ जाता है।
उसने देहाभिमान से सामंजस्य स्थापित कर लिया है। विषय का सुख यही उसका पुरुषार्थ है, ऐसा दृढ़ निश्चय
होने के कारण वही इस संसार में शुभाशुभ कर्म के योग से नाना योनि का भोग भोगने को बाध्य करता है। विषय
सुख के अभिमान से देहाभिमान ही पुनः जन्म और पुनः मरण इस प्रकार नाना प्रकार की योनियों में फेरे लगाने
को बाध्य करता है। लेकिन उन अनेक योनियों में गर्भवास का दुःख मूर्ख लोग देहाभिमान के कारण ही भोगते
हैं। इसलिये उन नाना तत्त्वों का रूपक श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
सत्त्वसङ्गादृषीन् देवान् रजसासुरमानुषान्।
तमसा भूततिर्यक्त्वं भ्रामितो याति कर्मभिः॥५१॥
उद्धव! देहाभिमान के कारण इन तीन गुणों के कर्म घटते रहते हैं और उनके योग से तीन प्रकार के संसार
पीछे लग जाते हैं। वे इस प्रकार हैं—कृष्णार्पण किये बिना सात्त्विक कर्म करने से सत्त्वगुण क्षुब्ध होकर उत्तम देह
में जन्म होता है और उस सत्त्वगुण का अत्यन्त उत्कर्ष होने पर देवर्षि, ब्रह्मर्षि होकर उस सत्त्वगुण की समसाम्य
स्थिति से वे अजानबाहु तथा कल्प तक जीवित रहने वाले दीर्घायुषी हो जाते हैं। सत्त्वगुण युक्त कर्म घटने पर वे
स्वर्ग के देवता बन कर रहते हैं और वहाँ का भोग भोगने के बाद पुण्य समाप्त होने पर उनका अधःपात हो जाता
है और वे पुनः इस योनी में जन्म लेकर सत्त्वगुणसम्पन्न बन जाते हैं। राजस लोग रजोगुण का आश्रय लेकर राजसी
कर्म का आचरण करते हैं और जब राजसगुण क्षुब्ध हो जाता है तो वह किस योनी में जन्म दिलाता है? तो जो
लोग राजस कर्म ब्रह्मार्पण कर देते हैं, वे दैत्य जन्म लेकर भी भगवद्भक्त होते हैं और जो रजोगुण के उत्कर्ष से
सुखोपभोग की इच्छा करते हैं, वे महायोद्धा असुर होते हैं। जो रजोगुण से ही स्वकर्माचरण करते हैं, वे उस कर्म
के कारण ही ब्राह्मणजन्म पाते हैं और इसी रजोगुण के कम या अधिक परिमाण से चारों वर्णों का जन्म होता है।
तामस की संगति से तामस कर्माचरण करने से तमोगुण क्षुब्ध होता है, जो भयंकर नीच योनी में जन्म दिलाता है
और भूत, प्रेत, पिशाच, पक्षी, पाषाण आदि अनगिनत योनी के भोग भोगने को बाध्य करता है। (आशंका) कर्म
वास्तव में त्रिगुणात्मक है, किन्तु कर्मफलों का भोक्ता ईश्वर है यह निश्चय वेदशास्त्रों के आधार पर आपने कर ही
लिया। देह का साक्षी वह आत्मा निराला ही है, ऐसा सिद्धान्त आपने पिछले श्लोक में निश्चित किया था तो
कर्मफलों का भोक्ता यदि कर्म से अलग है तो फिर वह कर्मों का फल कैसे भोगता है? इस प्रकार की आशंका से
युक्त उद्धव का अंतःकरण जानकर श्रीकृष्ण इसी अर्थ का उत्तर विशद करके बता रहे हैं।
नृत्यतो गायतः पश्यन् यथेवानुकरोति तान्।
एवं बुद्धिगुणान् पश्यन्ननीहोऽप्यनुकार्यते ॥५२॥
सभापति यदि कला-कौशल में निपुण हो और उसके सामने नृत्य और संगीत का कार्यक्रम हो रहा हो तो
नाचने-गाने वाले के सुर पर वह भी ताल देने लगता है। अब यदि यह पूछोगे कि वह ताल कैसे देता है, तो
प्रकृति केवल जड़ का अंश है और आत्मा ज्ञाता है। इसीलिये उसे भोक्ता कहते हैं। सभा में जो शांत बैठा रहता

५९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है, वह भी नृत्यगायन के सुरों पर ठेका देता रहता है। इस प्रकार प्रकृति से अलग होते हुए भी पुरुष प्रकृति की
लीला का अनुसरण करता है। (आशंका) प्रकृति का अनुकरण कर यदि आत्मा सचमुच नित्यमुक्तता नष्ट हो
जायेगी क्योंकि जो कर्मफल का उपभोग करेगा, उसी पर कर्म का बन्धन लागू होगा और उस कर्म से आत्मा को
भी जन्म-मरण लगा हुआ है, यह कहना पड़ेगा और यदि वैसा हुआ तो आत्मा नित्यमुक्त और विकारातीत है यह
बात बहुत दूर चली गयी। अर्थात् आत्मा सांसारिक, गुणविकारी तथा बद्ध है। उद्धव! ऐसी शंका तुम करोगे।
किन्तु आत्मा गुणकर्म से अलिप्त है यह बात श्रीकृष्ण और दृष्टांत देकर बताते हैं।
यथाम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव।
चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते भ्रमतीव भूः॥५३॥
जिस प्रकार कोई आदमी नदी के किनारे पर के वृक्ष को पानी में बहते हुए देखता है, उसी प्रकार माया के
गुणों के संसर्ग से आत्मा में भी विकार का आभास होता है। जिसकी आँखों के आगे चक्कर आता है उसे सारी
पृथ्वी के ही घूमने का आभास होता है। उसी प्रकार इस माया के विकारों का समुदाय भी आत्मा के लिये मिथ्या
ही है। जो घोड़े पर बैठकर पानी के प्रवाह की ओर देखता है उसे स्वयं पानी में ही बहने का आभास होता है।
इस प्रकार आत्मा नित्य और निर्विकार है और उसमें अनेक गुण हैं जो मायात्मक हैं। वे वास्तव में कल्पनामय
होने पर भी, लोग उन्हें सच मान लेते हैं, ब्रह्मदेव से लेकर तृण तक जो असंख्य योनी हैं, वे विकारयुक्त हैं और
उनमें कर्म, क्रिया, फल का भोग ये सारी बातें मन से ही उत्पन्न हुई हैं। भगवान की ये बातें सुनकर उद्धव को
अतीव आनन्द हुआ और उस आनन्द के आवेग में वह भी वैसी ही लीलायें करने लगा। उद्धव के मन का ताप
दूर करने के लिये सर्वज्ञ श्रीकृष्ण स्वयं ज्ञानोपदेश कर रहे थे। इसलिये. जिससे उद्धव को आनन्द प्राप्त हो ऐसा
ही निरूपण श्रीकृष्ण करते थे।
यथा मनोरथधियो विषयानुभवो मृषा।
स्वप्नदृष्टाश्च दाशार्ह तथा संसार आत्मनः ॥५४॥
आत्मा नित्ययुक्त और अविकृत ही है। लगता है वह संकल्प से ही विकारी हो गया है। वास्तव में वह
असंसारी ही है किन्तु मनोविकारों से ही उसे संसारी कहते हैं। इस प्रकार वहाँ दूसरा कोई न होने के कारण कथा
वार्त्ता कुछ भी नहीं कहा जा सकता। श्रोता और वक्ता अलग-अलग हों तभी यह सम्भव है। अकेला आदमी
चलते-चलते थक जाने पर स्वयं ही राजा बन जाता है और अपना मनोराज्य चलाता है और शत्रु के आने की
कल्पना कर युद्ध के लिये तैयार होता है और उस युद्ध के लिये उसमें इतना अधिक स्फुरण होता है कि वह
अपने ही स्थान पर उछलने-कूदने लगता है। इतने में पैर किसी वस्तु में फँस कर वह लड़खड़ा कर गिर पड़ता
है। इस प्रकार वह मिथ्या भ्रम और भ्रान्ति में पड़ जाता है और चलते-चलते मृगजल से उस पार जाने के लिए
उसमें कूद पड़ता है। आकाश में जब बड़े-बड़े बादल एकत्र हो जाते हैं तो उसमें बड़े-बड़े, महल और
अट्टालिकाएँ दिखायी देने लगती हैं लेकिन जोर की हवा चलने पर वहाँ शून्याकार हो जाता है। इस प्रकार यह
संसार ही काल्पनिक होने के कारण उसके सुख-दुःख भी मेरे भक्तों को मायिक मालूम होते हैं। दाशार्ह वंश में
जन्म लेकर तुम उत्तम स्थिति तक पहुँचे हो। स्वप्न के सुखोपभोगों को जिस प्रकार हम स्वप्न में ही सच मानते
हैं, उसी प्रकार संसार एक दीर्घ स्वप्न है, इसलिये वह केवल मिथ्या और मायिक है। जागृत होने पर जिस प्रकार
स्वप्न मिथ्या मालूम होता है, उसी प्रकार निरहंकार में स्वप्न भी मिथ्या ही है। उद्धव! ब्रह्मज्ञान की यही प्रमुख

बाईसवाँ अध्याय ५९५
बात है, जिसे ध्यान में रखो। सूर्य जिस प्रकार मृगजल की सृष्टि करता है, उसी प्रकार आत्मा संसार करता है।
संसार केवल कल्पनामय है और आत्मा निर्विकार और ज्ञानरूप है। इस पर उद्धव ! तुम शायद यह कहोगे कि
जब संसार मिथ्या ही है तब साधन करने के फेर में क्यों पड़ें ? बाँझ स्त्री के लड़के के विवाह के लिये जैसे कोई
प्रयास नहीं करता या मृगजल पर बाँध बनाकर कोई नहर नहीं निकालता, उसी प्रकार यदि संसार बंधन मिथ्या है
तो फिर श्रवण, मनन, चिंतन, विवेक, वैराग्य, ध्यान आदि का व्यर्थ प्रयास लोग क्यों करते हैं ? उद्धव ! देखा
जाय तो बगुले का भय मिथ्या ही होता है, किन्तु बालक को यह सच ही लगता है। उसी प्रकार संसार के मिथ्या
संकट से ही जीव को बन्धन प्राप्त होता है। इसी अर्थ का सिद्धान्त श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं क्योंकि संसार के
सम्बन्ध में जो दुःख हैं, वे भ्रमिष्ट लोगों को भ्रम के ही कारण पीड़ा देते हैं।
अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते।
ध्यायतो विषय्यनस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ ५५ ॥
विचार किया जाय तो स्वप्न मिथ्या ही रहता है किन्तु उसमें के विषय सेवन से सुख-दुःख की अत्यन्त
बाधा होती है। स्वप्न में पुत्र प्राप्ति होती है, अथवा राजा के हाथों सत्कार होता है लेकिन उसी आनन्द में स्वप्न
देखने वाला मस्त होता रहता है अथवा स्वप्न में ही सारा धन चला गया इस दुःख से वह रोने लगता है।
इसलिये, उद्धव ! उसे यदि जागृत न किया जाय तो स्वप्न की सुख-दुःख की पीड़ा कभी समाप्त नहीं होती।
जो लोग विषयासक्त होते हैं जिन्हें निरन्तर विषय का ही ध्यान रहता है, देहाभिमान जिन्हें सदा विषय में ही
पिरोता रहता है, उनकी विषयासक्ति दूर करने के क्या उपाय हैं ? इसी अर्थ का सिद्धान्त श्रीकृष्ण उद्धव को बता
रहे हैं। यदि श्रवण और मनन न करें, विचारों का ज्ञान नहीं साधा, अथवा परिपूर्ण वैराग्य नहीं धारण किया तो
संसार का भय समाप्त नहीं होता। लेकिन संसार मिथ्या है इतना कह भर देने से सुख-दुःख का भय समाप्त
नहीं होता, जन्म-मरण का चक्र तथा अहंममता नहीं छूटती। ऐसे जो अज्ञानी लोग हैं, उन्हें अवश्य ही साधन
करने चाहिये। विवेक से परिपूर्ण वैराग्य धारण करने से संसार का बंधन नष्ट होता है। इसलिये उद्धव ! सभी
साधनों का मूल और जिससे ब्रह्मज्ञान हाथ लगता है उस वैराग्य को पूर्ण रूप से साध्य करें। अब विरक्ति के
मार्ग के बारे में सुनो। तो जिस प्रकार आग धधकती है, उसी प्रकार देह में वैराग्य दहकना चाहिये। तभी
ब्रह्मप्राप्ति का अधिकार प्राप्त होता है। ऐसे जो पूर्ण मुमुक्षु लोग होते हैं और जिनकी कृपा से सद्गुरु थपथपा
कर जागृत करते हैं, जो देहादिक के अभेद भाव से पुष्ट रहते हैं, माया के गुणों की त्रिपुटी जिन्हें मिथ्या लगती
है, ब्रह्मावंड से सृष्टि भर जाती है, ऐसा अप्रत्याशित लाभ जिस वैराग्य विवेक से हाथ लगता है, उसी वैराग्य
का वर्णन श्रीकृष्ण उद्धव से कर रहे हैं।
तस्मादुद्धव मा भुङ्क्ष्व विषयानसदिन्द्रियैः ।
आत्माग्रहणनिर्भातं पश्यवैकल्पिकं भ्रमम् ॥ ५६ ॥
विषय की आसक्ति ही परमार्थ के लिये बाधक होती है। इसलिये विषय को ही त्याग दो और पुनः उसे
स्पर्श न करो। वृत्ति आसक्त होने पर इन्द्रियों से चिपक जाती है और उसे अत्यन्त लुब्ध होने के कारण विषयों के
भोग भोगने की इच्छा होती है। यही संसार का बड़ा रोग है। इसलिये उसका त्याग करना चाहिये। उत्तम पकवान
हो लेकिन उसमें यदि विष पड़ा हो तो उसका एक ग्रास खाते ही प्राण निकल जाता है। लेकिन विष से प्राण एक
ही बार जाता है और विषय बार-बार प्राण लेते रहते हैं। अब तुम कहोगे कि प्रारब्ध के अनुसार भोग आते हैं,

५९६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
फिर उनका त्याग कैसे होगा ? और विषय त्याग का उपाय खोजने से वैराग्य कैसे प्राप्त होगा ? प्रारब्ध से ही
विषयभोग आते हैं और वही साधक को दुःख देते हैं। दावानल में फँसे हिरन जिस प्रकार झुलस जाते हैं उसी
प्रकार उन्हें भी वह स्थिति भोगनी पड़ती है। बाघ के मुँह में गाय पड़ जाय, उसी प्रकार जब विषयों का भोग
करने वाला छटपटाता है तभी उस अनुताप से वैराग्य उत्पन्न होता है। सच्चा वैराग्य उत्पन्न होने पर सद्गुरु की
कृपा हाथ लगती है और गुरुकृपा के प्रभाव से ही द्वंद्व के साथ सारा संसार समाप्त हो जाता है। गुरुकृपा प्राप्त
होने पर चारों ओर परब्रह्म ही दिखायी देने लगता है। फिर वहाँ कर्म कैसा और जन्म-मरण भी कैसा ? संसार
भ्रम का नाम पता ही नहीं रह जाता। उस समय दीपक की सहायता से देखने पर भी संसार नहीं दिखाई देता
जिस प्रकार भ्रम नष्ट हो जाने के बाद रस्सी का सर्प नहीं दिखायी देता, अथवा लट्टू जब तक घूमता रहता है
तब तक वह सीधा ही दिखायी देता है, उसी प्रकार जब तक भ्रम का साम्राज्य रहता है, तब तक संसार सत्य ही
मालूम होता है। बिलकुल परिपूर्ण जो भ्रम है उसी का नाम संसार है। वैसे, परब्रह्म तो शुद्ध ही है। वहाँ जन्म भी
नहीं है और कर्म भी नहीं है। इस प्रकार का ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो भी जाय तो भी चाक से मटका निकाल लेने पर
जिस प्रकार चाक घूमता ही रहता है, उसी प्रकार प्रारब्ध का भोग भोगना ही पड़ता है। वृक्ष को समूल उखाड़ा
जा सकता है लेकिन उसकी आर्द्रता को उखाड़ नहीं सकते। उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान होने पर भी प्रारब्ध उसे नहीं
छोड़ता। उस प्रारब्ध के अनुसार यदि विषयभोग आ भी जाएँ तो उसका प्रतिकार करने का प्रयत्न नहीं करना
चाहिये। उसे शान्तिपूर्वक सहन करना चाहिये। जो विवेक सम्पन्न और क्षमाशील साधु होते हैं, वे विषयभोग आने
पर देह में परिपूर्ण शान्ति रख कर आनन्दपूर्वक आचरण करते हैं। उसी शान्ति का लक्षण श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
शान्ति से हमारा जो कल्याण होता है, जिसके कारण जीव को समाधान प्राप्त होता है, उसका सुमधुर निरूपण
श्रीकृष्ण दो श्लोकों में कर रहे हैं।
क्षिप्तोऽवमानितोऽसद्भिः प्रलब्धोऽसूयितोऽथवा।
ताडितः संन्निबद्धो वा वृत्त्या वा परिहापितः ॥५७॥
निष्ठितो मूत्रितो वाज्ञैर्बहुधैवं प्रकम्पितः।
श्रेयस्कामः कृच्छ्रगत आत्मनाऽऽत्मानमुद्धरेत् ॥५८॥
देहाभिमान रखने वाले जो तामसी, दुष्ट और दुर्जन होते हैं, वे यदि साधुओं का छल करते हैं तो साधु
शान्त होने के कारण कभी क्रोध के अधीन नहीं होते हैं। जो ज्ञानसम्पन्न होते हैं, वे छोटे-मोटे उपद्रव में क्रुद्ध
नहीं होते। अत्यधिक छल होने पर भी वे अति कोपायमान नहीं होते। कायिक, वाचिक और मानसिक आदि
तीन प्रकार की पीड़ायें हैं। किन्तु साधु पुरुष अपनी अटल शान्तवृत्ति के कारण अपने विवेक से सब कुछ सहन
करते हैं। साधु यदि युक्तिपूर्वक सरल ढंग से भाषण करता है लोग उस पर आक्षेप लेकर उसका उपहास करते
हैं, उसे झटक कर उसकी भर्त्सना करते हैं, इतना ही नहीं, अपितु भरी सभा में उसका अपमान करते हैं। शब्दों
का ही छल कर उसे दुष्ट, दुर्जन, दुःशील, अपवित्र और अमंगल चांडाल कहते हैं। ऐसे दुर्जन कितना ही दुष्ट
भाषण क्यों न करें, लेकिन अपनी शांत वृत्ति से वह सब सहन करता है। उस शान्ति के उत्पन्न होने के कारण
और विवेक के स्वरूप के बारे में सुनो। दूसरे की जीभ और होंठ जो हिलते हैं वे मेरे शरीर पर प्रहार नहीं
करते, ऐसी उसकी समझ होने के कारण उसके मन में क्रोध आता ही नहीं है। उसकी शान्ति भी नहीं ढलती।
सभा में मान के साथ उसकी पूजा की अथवा आसन के नीचे गिरा दिया, उसे लतियाया, उसका अपमान कर

एक ओर ढकेल दिया तो वह कहता है कि जहाँ ले जाकर सम्मान के साथ मेरी पूजा करते हैं, वहाँ भी पृथ्वी
ही रहती है और अपमान करके जहाँ ढकेल देते हैं, वहाँ भी वही पृथ्वी रहती है। ऐसी स्थिति में मान हो या
अपमान हो, वह तो मन की कल्पना ही है। ऐसा विचार कर सज्जन पुरुष शान्त वृत्ति के कारण किसी का द्वेष
नहीं करता। अनेक प्रकार की युक्ति-प्रयुक्तियों से साधु को लोभ के पीछे लगाकर लोग उसे फँसाते हैं और
उसका धन छीनकर, उलटे उसकी भर्त्सना करते हैं। उनकी निन्दा करने से मुझे दोष लगेगा इसलिये उसके मन
में क्रोध नहीं आता और उसकी पूर्ण शान्ति में अन्तर नहीं पड़ता। साधु यह समझ लेता है कि 'अर्थ है वहाँ
अनर्थ' है यह तो शास्त्रवचन है फिर उस अनर्थ से जो साधु को निवृत्त करता है, उसका द्वेष करते हैं वे लोग
मूर्ख हैं। अज्ञानी लोग सद्गुणों पर दोषारोपण करते हैं, निन्दा करते हैं, इसमें ही हमारा हित है ऐसा समझते हैं।
वही सचमुच मेरे तारनहार हैं। माता के हाथ तो केवल बाहर का मल धोते हैं लेकिन ये तो मेरे बाप के समान
हैं क्योंकि ये मेरा भीतर का और बाहर का मल भी अपने जिह्वाग्र से धो देते हैं। ऐसे लोगों का छल करने से
तो मेरा ही अहित होगा। ऐसा विचार कर वह साधु के गुण अथवा दोषों का उच्चार नहीं करता। इसीलिये
उसके शरीर की शान्ति बढ़ जाती है। जिससे आजीविका चलती है, वह धन, अथवा जमीन छल या जबर्दस्ती
से कोई छीन लेता है, तो भी साधु को क्रोध नहीं आता। इस लोक में लाभ होना या न होना केवल दैव के
अधीन है, उन्हें देने वाला और लेने वाला वही है यह कह कर वह किसी का द्वेष नहीं करता और शान्ति का
गुण नहीं छोड़ता। दुष्ट लोग साधु की जमीन-जायदाद से ही संतोष नहीं करते। वह बहुत बड़ा अन्यायी है, यह
कह कर उसे बाँधते हैं, उसके मुँह पर थूकते हैं और जो अत्यन्त दुष्ट होते हैं वे उसके सिर पर मूतते हैं। कोई
मारता है, कोई गिराता है, कोई अनेक प्रकार का छल करता है लेकिन सज्जन पुरुष में विवेक होने के कारण
उसके मन की शान्ति नहीं ढलती। थूक और मूत दोनों देह से ही निकलते हैं और देह पर ही पड़ते हैं, उस पर
गुस्सा क्यों किया जाय ? साधु को कोई पकड़ता है या मारता है तो वह कहता है, "देखो ! देह पंचमहाभूतों से
ही उत्पन्न हुआ है अर्थात्, मारने वाला और मार खानेवाला दोनों एक ही हैं। तो कौन किसके लिये दुःख करे ?
ऐसे विचारों से जिसे शान्ति प्राप्त होती है, उसके पास चारों युक्तियाँ दासी बन कर रहती हैं। मैं श्रीकृष्ण भी
उसका चाकर बनता हूँ। इससे अधिक और क्या लाभ होगा ? उसमें भी जो मोक्षार्थी है उसे सभी प्रकार से
शान्ति का पालन करना चाहिये। वही दुःखरूपी समुद्र से सुरक्षित उस पार पहुँचायेगा। वैराग्य, योग, ज्ञान
अथवा ध्यान इनका जो फल है, वही शान्ति है। उस शान्ति को पूर्ण रूप से साध कर ही साधु अपना उद्धार
कर लेते हैं। इसलिये उद्धव ! शीत-ऊष्ण, सुख-दुःख आदि द्वंद्वों में जो कठोरता है उसे सहन कर परिपूर्ण
शान्ति साधनी चाहिये और पूर्ण ब्रह्मस्वरूप तक पहुँचना चाहिये। पूर्णब्रह्म तक पहुँचने के बाद जन्म-मरण की
बात ही समाप्त हो जाती है और परमानन्द के गले लगते ही संसारभय नष्ट हो जाता है। श्रीकृष्ण का यह
भाषण सुनकर उद्धव आश्चर्यचकित हो गया। उसने कहा, यह जो अभी सुख दुःखादि द्वंद्वों की पीड़ा सुनी वह
मुझे सहन नहीं होगी। ऐसी शान्ति की बातें हमने कभी सुनी भी नहीं है, देखने की कौन कहे ? ऐसी शान्ति
जिसके अंतःकरण में होगी, ऐसा पुरुष सारी पृथ्वी में भी नहीं होगा। हे कृष्ण! जो न कभी देखी और न सुनी
ऐसी शान्ति तुम कहाँ से ले आये ? तुम्हारा यह भाषण सुनकर मेरी बुद्धि तो भय से कुंठित हो गयी है। ऐसी
शान्ति जिसे प्राप्त हुई है ऐसा कोई न पहले कोई हुआ है और आगे भी नहीं होगा। भगवान ने जो निग्रह
बतलाया वह हमारे लिये असाध्य है जिन द्वंद्वों का तुमने वर्णन किया है वे योगियों के सहने लायक भी नहीं
हैं। फिर हम कैसे सहन करेंगे ? यही बात भगवान से पूछ रहे हैं।"

५९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उद्धव उवाच
यथैवमनुबुध्येयं वद नो वदतां वर।
सुदुःसहमिमं मन्ये आत्मन्यसदतिक्रमम्॥५९॥
विदुषामपि विश्वात्मन् प्रकृतिर्हि बलीयसी।
ऋते त्वद्धर्मनिरतान् शान्तांस्ते चरणालयान्॥६०॥
जो लोग वेदशास्त्र का अर्थ पूर्णरूप से जान कर उसे बता सकते हैं वही सच्चे वक्ता हैं। उन वक्ताओं में
तुम श्रेष्ठ हो। क्योंकि वेदों का प्रमुख वक्ता तुम ही हो। तुम्हारी ही युक्ति ले कर शास्त्र तुम्हारा वर्णन करते हैं,
लेकिन परोक्षवाद से वे भी कुंठित हो जाते हैं। वेद तो 'वह नहीं, वह नहीं' कह कर पीछे हट जाते हैं। वह
तुम्हारे ही मुखसे तुम्हारे ही ज्ञान की उक्ति, हे कृपामूर्ति! तुम्हारी कृपा से सुनने को मिलती है। मैं अपने कानों का
भाग्य किन शब्दों में व्यक्त करूँ? जो सुनते हैं, वे धन्य हैं। इस प्रकार अनेक युक्तियों से उद्धव ने श्रीकृष्ण की
प्रार्थना और अत्यन्त प्रेम से हाथ जोड़ कर विनती की। भगवान ने जो भाषण दिया वह अत्यन्त गहन है। यह
भाषण अत्यन्त पवित्र है। लेकिन मेरे अंतःकरण में उसका बोध नहीं होता क्योंकि दूसरों के अपराध कौन सहन
करेगा? यह कर्म अत्यन्त कठिन और मानव स्वभाव के विरुद्ध है। इसलिये इस महान उपदेश पर आचरण करना
नितांत कठिन है क्योंकि कोई द्वंद्व किस उपाय से सहन कर सकता है? यदि कोई बड़ा आदमी कभी-कभार कोई
अपराध करता है तो करोड़ लोगों में से कोई तो उसका अपराध सहन करेगा। लेकिन किसी नीच द्वारा किया गया
छल कोई, कभी सहन नहीं करेगा। जिसका मुँह कभी न देखना पड़े उसे नमस्कार करना भी उचित नहीं है, फिर
उसकी लात कौन सहन करेगा? जिसके शरीर में प्राण जरा भी शेष न हो वही ऐसा अपमान सहन करेगा।
लेकिन जो जीवित है वह इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा। लेकिन जो सचमुच ज्ञानी होते हैं वे भी अपनी किसी
आज्ञा का उल्लंघन सहन नहीं करते, फिर अपमान कौन सहन करेगा? कपिल महामुनि को भी क्रोध हुआ था
इसलिये उन्होंने सगरों को शाप देकर उन्हें भस्म कर दिया। नारद ने कुबेर के लड़के को शाप देकर वृक्ष बनाकर
छोड़ा। दुर्वासा की कथा तो बहुत लम्बी है। शृंगी ऋषि के अंतःकरण में क्रोध हुआ और उसने पिता के गले में
मृतसर्प डालने वाले परीक्षित को शाप दिया। सनकादिक वस्तुतः शान्त थे लेकिन वैकुण्ठ पहुँचने पर जयविजय
ने उनका रास्ता रोका इसलिये उन्होंने क्रोध में आकर जय विजय को शाप दिया। जब ज्ञानसम्पन्न लोगों की यह
स्थिति है, तो औरों की क्या स्थिति होगी? गोविन्द दूसरों का अपराध सहन करने की शक्ति त्रिभुवन में भी दुर्लभ
है। प्रकृति अपने गुणों से प्रबल हुई है। वह जरा से कारण से भी गुणों को तत्काल क्षुब्ध करती है। जो पूर्ण साधु
और सज्जन होते हैं, उन्हें भी क्रोध विकल कर देता है। जिसे तुम्हारी परिपूर्ण भक्ति प्राप्त होती है जिसे तुम्हारी
कृपा का पूर्ण लाभ होता है, तुम्हारे चरणों में जो अत्यन्त लीन रहता है, उसे ही ऐसी शान्ति प्राप्त होती है। तुम तो
त्रिभुवन में विश्वात्मा हो। तुम्हारे सामने मैं कोई बात चुरा कर नहीं रख सकता। मैं सच कहता हूँ कि यह
दूजाभाव और द्वंद्व मैं सहन नहीं कर सकता। श्रीकृष्ण, यह तुम भी जानते हो। शान्ति अत्यन्त पवित्र वस्तु है और
क्रोध नितान्त निन्दनीय है इसका प्रतिपादन बुद्धिमान लोग भी करते हैं किन्तु उन्हें भी द्वंद्व सहन नहीं होते। द्वंद्व
वास्तव में दुःसह ही हैं। इसलिये हे कृपामूर्ति! द्वंद्व सहन करने का उपाय मुझे बताइये। अन्य साधनों को साध्य
किया जा सकता है लेकिन यह सहिष्णुता मेरे मन को नहीं भाती। इसीलिये मुझे भी वैसी शान्ति प्राप्त हो ऐसी
मुझ पर कृपा कीजिये। शान्ति के योग से प्राप्त होने वाले कल्याण का मुझे लाभ हो ऐसी पूर्ण कृपा मुझ पर करें।

बाईसवाँ अध्याय ५९९
कहकर उद्धव ने भक्तिभाव में श्रीकृष्ण के चरण पकड़ लिये। उद्धव की विनती सुनकर श्रीकृष्ण को बहुत सन्तोष
हुआ और चातक की तृषा के लिये मेघ जिस प्रकार गर्जना कर त्रिभुवन को पर्जन्यवृष्टि से तृप्त करता है, उसी
प्रकार भक्त की विनती सुनते ही प्रफुल्लित होने वाला श्रीकृष्ण उद्धव के अंतःकरण पर शान्ति का ठप्पा कैसे
लगायेंगे ? उदार, सुन्दर और गुण गम्भीर शार्ङ्गधर अब शान्ति का भण्डार खुला कर स्वयं उद्धव के प्रश्न का उत्तर
देंगे। श्रीकृष्ण की वर्णन करने की पद्धति आश्चर्यजनक होगी। युक्ति और चातुर्य के वैभव की वर्षा ही होगी।
जिससे शान्ति गले लग जाय ऐसी अपूर्व युक्ति वह बतायेगा। श्रीकृष्ण के मुख से ज्ञानपूर्ण शब्द सुनकर शान्ति
स्वयं ही साक्षात प्रकट होती है। इसलिये ऐसा भाषण सुनने के लिये उद्धव भी सावधान होकर बैठ गया। जिस
प्रकार हाथी को पकड़ने के लिये शेर सावधान होकर बैठता है उसी प्रकार शान्ति का लाभ लेने के लिये उद्धव
भी तैयार होकर बैठ गया। उसी 'भिक्षुगीता' का निरूपण श्रीकृष्ण अगले अध्याय में करेंगे और जिससे
अंतःकरण में परिपूर्ण शान्ति अंकित हो सके ऐसे लक्षण बतायेंगे। जिन्हें परमार्थ की इच्छा हो, उन्हें अन्य साधनों
के द्वार छोड़ कर इस शान्ति साधन पर ही दृढ़ श्रद्धा रखनी चाहिये। अब श्रीकृष्ण शान्ति का विस्तार वर्णन करेंगे
इसलिये उद्धव भी ध्यान लगाकर बैठेगा। इसलिये जनार्दनरूपी एकनाथ भी श्रोताओं से विनती करते हैं कि वे भी
मेरी ओर ध्यान दें।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादश स्कंधे एकाकार टीकायां
श्रीकृष्ण उद्धव संवादे द्वाविंशतितमोध्यायः ॥ २२॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु।

तेईसवाँ अध्याय
हे ओंकाररूप, विश्वरूपा सद्गुरु ! तुम्हें नमस्कार है। तुम ज्ञानस्वरूप हो और विश्व के भीतर-बाहर केवल
तुम ही हो। तुम्हारे स्वरूप का यदि विचार किया जाय तो तुम निर्गुण होते हुए अव्यय हो। यह जो साक्षात् चराचर
है, वह तुम्हारे निर्गुण स्वरूप के अवयव हैं। जीव और शिव तुम्हारी तुम्हारी माया है। अद्वैत यही तुम्हारा सच्चा
वैभव है। घृत की गुड़िया साकार दिखायी देती है लेकिन केवल घृत के रूप में ही उसे देखने पर वह निराकार
ही है। उसी प्रकार तुम अविनाशी और अविकारी होकर संसार के आकार में भासित होते हो। संसार का यह जो
रूप दिखायी देता है वह तुम्हारा ही स्वरूप है और तुम्हारे अंग को देखा जाय तो तुम अनंग हो। लेकिन उस
अनंग का (अर्थात् काम का) तुझमें स्पर्श भी नहीं है। जो कुछ दृष्टि को दिखायी देता है, वह तुम नहीं हो। जो
नहीं दिखायी देता वह तुम हो। होना न होना तुम्हारे पास नहीं है। तुम संसार के ऐसे जगद्गुरु हो। शब्द तुमसे दूर
है। लेकिन शब्द के अन्तर्बाह्य तुम ही हो। चराचर में बोलने वाले तुम हो और वेदशास्त्रों का वक्ता भी तुम ही
हो। ईख की मधुरता निकलती है। ईख के भीतर-बाहर मधुरता ही रहती है लेकिन मधुरता में ईख नहीं होती।
तुम्हारा और वेद का नाता वैसा ही है। वेदों के वक्ता तुम ही हो और वेदों में तुम्हारा ही प्रतिपादन किया हुआ है।
गुरुराया ! तुम निःशब्द में ही रहते हो, इसलिये अंत में वेदों को भी तुम्हारा आकलन नहीं हो पाता। जिस प्रकार
अनाहत ध्वनि निःशब्द होकर प्रत्येक ध्वनि से मिला हुआ रहता है लेकिन वही अनाहत (वाद्य पर बिना आघात
किये होने वाला ध्वनि) बजा सके ऐसा कोई वाद्ययंत्र संसार में नहीं है। उसी प्रकार तुम समस्त वेदों के वक्ता
हो, सारे शास्त्रों को युक्ति बताने वाले हो लेकिन वेदशास्त्रों से सम्मत तुम्हारा वर्णन नहीं किया जा सकता।
इसलिये यदि तुम्हें निःशब्द कहा जाय तो निःशब्द और 'सशब्द यह कहना भी मायिक ही है। सारांश, तुम्हारा
स्वरूप समझ में नहीं आता। लेकिन इस प्रकार तुम ज्ञाता हो यह सिद्ध करने जाओ तो फिर अज्ञान शेष ही नहीं
रहता। फिर, जहाँ अज्ञान है ही नहीं, वहाँ ज्ञाता कौन है और ज्ञातापन किस चीज का है? जहाँ शादी लायक
लड़की ही नहीं है, वहाँ उसके लिये दूल्हा खोजने के लिये कौन कहेगा ? तुम ज्ञानी हो और अज्ञानी भी नहीं हो।
तुम बोलने वाले भी नहीं हो और न बोलने वाले भी नहीं हो। तुम अनेक भी नहीं हो और एक भी नहीं हो।
तुम्हारे अतर्क्य स्वरूप के सम्बन्ध में कोई तर्क ही नहीं चलता। तुम शब्दातीत हो, विकारातीत हो, तुम निर्गुण हो,
तुम निरहंकार हो यह कहने में भी विचार करना पड़ता है। क्योंकि जगदाकार और जगदात्मा तो तुम ही हो। सारे
जगत के आकार में तुम प्रसिद्ध हो, अतः किसका द्वंद्व किसे बाधा पहुँचायेगा? जब दूसरा कोई है ही नहीं तो
फिर दूसरे के अपराध किसे विरुद्ध मालूम होंगे? हे सद्गुरुनाथा ! इस प्रकार तुम्हारे चरणों में द्वंद्वों की एकात्मता
हो जाने के कारण ही ऐक्य भावना से, अपनी ही कथा श्री भागवत सुनाते हो। उसी भागवत के बाईसवें अध्याय
के अन्त में, उद्धव ने आपसे शान्ति कैसे प्राप्त होगी और ये द्वंद्व कैसे टूटेंगे इसका उपाय पूछा था। जिसके योग
से ब्रह्मज्ञान की इच्छा पूर्ण हो ऐसा महत्त्वपूर्ण प्रश्न उद्धव ने पूछा था। श्री शुक्राचार्यजी को तो वह बहुत अच्छा
लगा और इससे राजा परीक्षित की इच्छा भी पूर्ण हुई। उद्धव का यह प्रश्न सुनकर शुक्राचार्य आनन्द से डोलने
लगे। वे परीक्षित से बोले, राजा ! सावधान हो जाओ। उद्धव पर श्रीभगवान प्रसन्न हो उठे हैं। ब्रह्मज्ञान की अन्तिम
स्थिति मुख्यरूप से शान्ति ही है। इसलिये शान्ति और निवृत्ति का ही निरूपण वह अब चार अध्याय में करेंगे।

तेईसवाँ अध्याय ६०१
हे राजा परीक्षित ! वही मैं तुम्हें बताता हूँ। हे पाण्डव कुलदीपक ! हे कौरव कुल तिलक ! सुनो। तुम आत्मसुख के
साधक हो इसलिये शान्ति के सच्चे अधिकारी तुम ही हो। ब्रह्मप्राप्ति साध्य करने के लिये तुम जलपान भी
छोड़कर भगवत्कथा श्रवण के लिये बैठे हो। इसलिये हे राजा ! श्रीकृष्ण की बतायी हुई शान्ति और निवृत्ति के
बारे में सुनो। तेईसवें अध्याय का विषय इस प्रकार है कि दुर्जन यदि मन को क्षुब्ध करे तो उस मन को पूर्ण क्षमा
करने का उपाय श्रीकृष्ण बतायेंगे। भिक्षुगीत का संरक्षण ही मनोजय का लक्षण है और प्रकृति पर किस प्रकार
विजय प्राप्त की जाय इसका निरूपण चौबीसवें अध्याय में हुआ है। तीन प्रकार के तीन गुण बताकर उसमें स्वयं
को निर्गुण बताकर, गुणजय का उत्तम निरूपण पच्चीसवें अध्याय में किया है। अब इसमें जो छब्बीसवाँ अध्याय
है वह ज्वलंत विरक्ति का है। उसमें ऐलगीत सुनाकर स्त्रियादिक सारे विषयों का त्याग करने को कहा गया है।
गुण, विषय, प्रकृति और मन इन चारों का समाधान श्रीकृष्ण अपने मुख से चार अध्यायों में बतायेंगे। इस प्रकार
राजा परीक्षित को सावधान कर श्री शुकयोगीन्द्र कथा का निरूपण करने लगे।
बादरायणिरुवाच
स एवमाशंसित उद्धवेन भागवतमुख्येन दाशार्हमुख्यः ।
सभाजयन् भृत्यवचो मुकुन्दस्तमाबभाषे श्रवणीयवीर्यः ॥ १ ॥
शुक्राचार्य बोले, हे परीक्षित! उद्धव की यह विनती सुनकर, उसके भाषण से श्रीकृष्ण को संतोष हुआ
और वह उद्धव को आगे उपदेश करने लगा। करोड़ों जन्मों के बाद ही अन्त में ब्राह्मण के उत्तम कुल में जन्म
प्राप्त होता है। वह महापुण्य का फल है। लेकिन यदि हरिभक्ति न हो तो वह भी निष्फल है। आम का
एकआध वृक्ष सदा फलद्रूप होने वाला होता है लेकिन यदि उस पर विष की बेल उग आये तो वह भी
निष्फल सिद्ध होता है। उसी प्रकार उत्तम लोग भी भजन के बिना व्यर्थ हो जाते हैं। लेकिन उद्धव की बात
वैसी नहीं थी। वह यादवों के उत्तम वंश में जन्म लेकर भी, श्रेष्ठता प्राप्त कर भी सम्पत्ति के मद में नहीं
भूला। हे महाराजा! राज्य-वैभव प्राप्त होने पर भी जो भगवद्गीता को नहीं छोड़ता उसे ही भगवद्भक्तों में
श्रेष्ठत्व का लाभ अवश्य मिलता है। सद्गुण वाली, सुन्दर और पतिव्रता स्त्री अनुकूल मिलने पर भी जो
भक्तिमार्ग नहीं छोड़ता वही है श्रेष्ठ भगवद्भक्त! उद्धव तो इन गुणों से परिपूर्ण था। विचारों से तो वह अत्यन्त
विरक्त था और श्रीकृष्ण के चरणों में तो अत्यन्त अनुरक्त था। इसीलिये उद्धव ही श्रेष्ठ भगवद्भक्त है। उम्र से
और सम्पत्ति से जो वरिष्ठता आती है, उसे गौण समझना चाहिये क्योंकि भगवद्भक्ति ही सब में श्रेष्ठ है। उसे
वैभव से उद्धव परिपूर्ण था। वह श्रीकृष्ण का अत्यन्त विश्वस्त था। श्रीकृष्ण जिसके साथ अंतरंग थे, जिसे
गुह्यज्ञान बताते थे उसके भाग्य का किस प्रकार वर्णन किया जाय ? साक्षात परब्रह्म ही उद्धव के हाथ लग गया
था। इतना ही नहीं, अपितु परब्रह्मरूपी श्रीकृष्ण उसके कहने के अनुसार चलता था। इसलिये सच्चा
भाग्यशाली तो वही है। इस प्रकार उद्धव के भाग्य का वर्णन करते-करते शुक्राचार्य भाव विह्वल हो गये।
उसके अंतःकरण में आनन्द की ऐसी बाढ़ आ गयी कि वह तटस्थ हो कर बैठ गया। यह देखकर राजा
परीक्षित को भी आश्चर्य लगा। उसने मन ही मन कहा, जिसके भाग्य का वर्णन कर श्रीशुक्राचार्य भी भाव
विह्वल हो गये, वह उद्धव वास्तव में भाग्यवान है। मेरे लिये भी वह सभी प्रकार से पूज्य है। इतने में
शुक्राचार्य ने राजा से कहा, राजा! उस उद्धव का भाग्य सचमुच अत्यन्त अलौकिक है। उसने विनती करते ही
श्रीकृष्ण सन्तुष्ट हो गया। उद्धव को शान्ति की ही इच्छा थी और वही, प्रश्न श्रीकृष्ण को भी बहुत अच्छा

६०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
लगा इसलिये उसका हेतु पूरा करने के लिये वह उसका विस्तृत निरूपण करेगा। सचमुच, उस श्रेष्ठ शान्ति के
अधिकारी एक तुम ही हो, ऐसा कह कर श्रीकृष्ण उद्धव को प्रेमपूर्वक सुनाने लगे।
श्री भगवानुवाच
बार्हस्पत्य स वै नात्र साधुर्वै दुर्जनेरितैः ।
दुरुक्तैर्भिन्नमात्मानं यः समाधातुमीश्वरः ॥ २॥
उद्धव! तुमने जो कुछ भी कहा उसे मैं सच ही मानता हूँ। दुर्जनों द्वारा अपमानित होने पर उसे सहन करने
लायक शान्ति किसी में भी नहीं होती। देव भी जिसकी पादुकाएँ मस्तक पर धारण करते हैं, मुख्य इन्द्र भी
जिसका चरण स्पर्श करते हैं, अष्ट महासिद्धि जिसकी बनकर रह गयी हैं और ब्रह्मज्ञान जिसका अंकित होकर
रह गया है ऐसे देवों के गुरु बृहस्पति के तुम शिष्य हो, साक्षात् विवेकमूर्ति हो। इसलिये शान्ति साध्य करने के
उपाय तुम्हारी समझ में आ सकेंगे। उद्धव को शान्ति का रहस्य समझ में आ जाय इसलिये श्रीकृष्ण ने उसे
गौरवान्वित किया और उसके ही भाषण का अनुमोदन करते हुए श्रीकृष्ण शुद्ध शान्ति का स्वरूप बताने लगे।
निन्दा, अवज्ञा, उपहास आदि मार्गों से दुर्जनों द्वारा किया गया अपमान जो सहन करेगा, वह साक्षात् ईश्वर ही है,
यह ध्यान में रखो। वह आत्मज्ञान से पूरी तरह मद्रूप ही हो जाता है। प्राणिमात्र में आत्मस्वरूप देखने की बात
जिसे स्वीकार है, वह दुर्जनों के आघात को भी आनन्दपूर्वक सहन करता है। जो स्वयं ही सारा जगत बनकर
रहता है उसे कितना ही उपद्रव क्यों न हो लेकिन क्रोध का उबाल नहीं आता। वह जरा भी उद्विग्न हुए बिना वे
उपद्रव आनन्दपूर्वक सहन करता है। अपना ही एक हाथ शरीर पर कहीं लग जाय तो जिस प्रकार हमारे मुख से
क्रोध या द्वेष का शब्द नहीं निकलता, उसी प्रकार चराचर को जो आत्मस्वरूप से ही देखता है, उसके घर में
शान्ति स्वयमेव प्रवेश करती है। उद्धव! जिसे ऐसा आत्मज्ञान हुआ है, उसे ही साधु समझा जाय। वही दूसरे का
अपराध सहन करता है। वही एक शान्ति के योग से पवित्र हुआ रहता है। यह आत्मज्ञान जिसकी समझ में नहीं
आता ऐसे जो अन्य ज्ञानसम्पन्न विद्वान हैं, वे भी द्वंद्व सहन नहीं कर सकते, यह भी तुम्हें कह देता हूँ।
न तथा तप्यते विद्धः पुमान् बाणैः सुमर्मगैः ।
यथा तुदन्ति मर्मस्था ह्यसतां परुषेषवः ॥ ३॥
लोहे के अत्यन्त प्रखर बाण होते हैं, जिनके प्रहार से प्राण विह्वल हो जाते हैं लेकिन दुर्जनों के वाग्बाण
शरीर में उससे भी अधिक गहरे धँस जाते हैं। लोहे के बाण शरीर पर जिस स्थान पर लगते हैं उसने ही अवयव
के जख्मी होने से मनुष्य विह्वल हो उठता है लेकिन वाग्बाण का सामर्थ्य उससे अधिक है। उनके प्रहार से पूर्वज
भी जख्मी होते हैं। लोहे के बाण का घाव पेड़-पौधों के पत्तों से ठीक हो जाता है लेकिन वाग्बाण का दर्द
जीवनपर्यन्त कष्ट देता है। दूसरों का मर्म निकालने के लिये विषैली भावना से सने हुए निन्दा के वाग्बाण जब
शरीर में घुसते ही अंतःकरण को चीर देते हैं तो शरीर में जैसे आग लग जाती है। ऐसे दुर्जनों के वचन और
अपमान का औद्धत्य सहन करने की शान्ति साधारण व्यक्ति में नहीं होती। इस प्रकार उद्धव का मनोगत ध्यान में
रखकर श्रीकृष्णनाथ शान्ति का निर्णय सुना रहे हैं। पूर्व में जिस शान्ति का वर्णन किया था, उसे शीघ्र साध्य करो,
ऐसा श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा। लेकिन उसे वह व्यर्थ लगेगा और उसके मन में संकोच होगा क्योंकि शान्ति
असाध्य है ऐसा उद्धव के मन में था। इसे ध्यान में रखकर श्रीकृष्ण भिक्षुगीत (एक संन्यासी द्वारा गाये हुए
विचार) उसके सम्पूर्ण इतिहास के साथ बता रहे हैं।

तेईसवाँ अध्याय ६०३
कथयन्ति महत्पुण्यमितिहासमिहोद्धव।
तमहं वर्णयिष्यामि निबोध सुसमाहितः ॥४॥
शान्ति भंग होकर क्षोभ से उत्पन्न होने वाले चित्त के मैल को तत्काल नष्ट करने के लिये योग्य जो इतिहास
गंगा है, वही अत्यन्त निर्मल और कृष्णोक्ति है। श्रीकृष्णमुखरूपी ब्रह्मगिरी पर्वत पर श्रीभागवतरूपी औदुंबर के
नीचे शान्ति गोदावरी का उद्गम हुआ, इसीलिये वह मूल से ही अत्यन्त निर्मल है। वही गुप्त प्रवाह से उद्धव
गंगाद्वार पर व्यासमुख से प्रकट हुई और वही शुक्राचार्य के मुखरूपी कुशावर्त्त में पवित्रता से सहसा प्रकट हुई।
उस पवित्र प्रवाह के साथ श्रद्धा, धृति और भक्ति इस क्रम में अरुणा, वरुणा और सरस्वती ये नदियाँ यहाँ
मिलकर उनका संगम हुआ है। इसलिये शान्तिरूपी गंगा में बाढ़ आकर वह अत्यन्त उत्कर्ष से बहती चली जा
रही है। उसमें जो श्रवणार्थी डुबकी लगाते हैं वे अपनी ही क्षमा से पवित्र हो जाते हैं। वह शान्तिरूपी अत्यन्त
प्रसिद्ध गंगा उद्धव को पुनीत करने के लिये श्रीकृष्ण ने भिक्षुगीत वर्णन से प्रकट की है।
केनचिद् भिक्षुणा गीतं परिभूतेन दुर्जनैः।
स्मरता धृतियुक्तेन विपाकं निजकर्मणाम् ॥५॥
उद्धव! एक संन्यासी था। उसे दुर्जनों ने अत्यन्त कष्ट दिया तो वह कहता था कि उनके उपद्रवों से मेरे
दुष्कर्मों का क्षय होगा। इसी आनन्द से वह अपने मन में दुर्जनों के प्रति क्षमाशील हो गया। हमारे शरीर का मल
कोई निकाल कर साफ कर रहा है इस पर जो क्रोध करता है वह मूर्ख और आत्मघाती है। जिन्हें लोग दुर्जन
कहते हैं उनके बारे में वह संन्यासी कहता है कि 'ये मेरे स्वजन हैं क्योंकि मेरे दोषों का नाश इनके ही धर्म के
कारण होता है।' कोई उसके सामने उसकी निन्दा करता है तो वह मन ही मन अत्यन्त प्रसन्न हो उठता है। वह
कहता है, श्रीकृष्ण मुझ पर प्रसन्न हो गया क्योंकि मेरे पापों का नाश अपने आप ही हो रहा है। सचमुच, इन
विचारों से वह शान्ति को कभी ढलने नहीं देता। अपने धैर्य की चोटी पर खड़े होकर उसने जो गाथा गायी उसे
सुनो। श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा, उद्धव! ध्यान देकर सुनो। जो नितांत लोभी था वह किस प्रकार विरक्त हो गया
उसकी कथा सुनो।
अवन्तिषु द्विजः कश्चिदासीदाढ्यतमः श्रिया।
वार्तावृत्तिः कदर्यस्तु कामी लुब्धोऽतिकोपनः ॥६॥
मालव देश की अवंती नामक नगरी में एक ब्राह्मण रहता था। वह अपने घर के ओसारे में बैठता था। खेती
और व्यापार से वह अपनी आजीविका चलाता था। उसके घर धन-धान्य की विपुलता थी। लेकिन बुद्धि से
कंजूस होने के कारण वह भरपेट खाता भी नहीं था। मोटा अनाज, वह भी अपर्याप्त। अर्थात् उसके बाल-बच्चे,
नौकर-चाकर भी पेटभर भोजन नहीं करते थे। वह कभी भी नित्य-नैमित्तिक कर्म नहीं करता था। धर्मकृत्य की
जानकारी तो उसे स्वप्न में भी नहीं थी। देव, ब्राह्मण और अतिथि उसके घर से विमुख ही लौटते थे। कहीं किसी
दिन एक आध कौड़ी की प्राप्ति होने वाली हो और उसी दिन माँ-बाप का श्राद्ध हो तो वह उसे छोड़कर, लाभ
के लिये महार के घर भी जाता था। छुआछूत का भय तो मन में आता ही नहीं था। धनलोभ के आगे वह ऊँच-
नीच की बात ही भूल जाता था। हाथ में पैसा आ रहा है यह देख कर वह हीन के हाथ का अन्न भी ग्रहण कर
लेता था। द्रव्य लोभ के आगे पाप अथवा महादोष की बात मन में भी नहीं लाता था। कौड़ी के लोभ ने उसे
इतना मूर्ख बना दिया था कि जिससे वह नरक अथवा अधःपतन की बात ही भूल गया था। इस प्रकार वह

६०४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
क्रियानष्ट ब्राह्मण दुष्कर्म करता रहता था। वह महाठग, अत्यन्त कपटी, नीच और धन का लोभी था। इसके धन
लोभ में कोई रुकावट आती तो वह क्रोध से उबल उठता और गोहत्या, ब्रह्महत्या करने तक के लिये भी तत्पर हो
उठता था। धनलोभ के पीछे क्रोध की बस्ती रहती है—धन के पीछे पाप भी रहते हैं। धन के लोभ पर ही
जिसका मन रहता है उस वृत्ति का नाम है कृपणता। जिसने धन का ढेर इकट्ठा कर लिया हो उसे यदि खर्च
करने की नौबत आये तो उसके प्राण निकलने लगते हैं। बन्दर के गाल में जब तक चना छिपा हुआ है, तब तक
वह उसे हाथ नहीं लगाने देता, उसी प्रकार धन खर्च करने में ही कृपण की मृत्यु है।
ज्ञातयोऽतिथयस्तस्य वाङ्मात्रेणापि नार्चिताः।
शून्यावसथ आत्मापि काले कामैरनर्चितः॥७॥
घर का थोड़ा भात खर्च होगा, इसलिये वैश्वदेव भी नहीं करता, फिर अतिथि की कब और कौन पूजा
करेगा ? इतने पर भी यदि कोई अतिथि आ ही जाय तो उसके साथ वह ऐसा भाषण करेगा कि जिससे उसके प्राण
ही निकल जायें। फिर उसके पास दाना-पानी कौन माँगेगा? उसका घर देखकर ब्रह्मचारी उदास हो जाते।
संन्यासियों ने तो, जिस प्रकार राजहंस गोबर की आशा छोड़ देते हैं, उसी प्रकार उसके घर की आशा छोड़ दी थी।
भिखारियों ने तो उसका द्वार वर्जित कर दिया था। अतिथि उसके द्वार से आगे निकल जाते थे। कोई मेहमान आता
तो वह कहीं और आसरा लेता। पितर तो उससे हमेशा के लिये निराश हो गये थे। चूहे भी घर छोड़ कर चले गये।
कौवे, चिड़िया और चींटियों ने भी दूसरे घर में अपनी व्यवस्था कर ली थी। जो स्वयं भी पेटभर नहीं खाता था,
तो दूसरों की क्या बात करें? पत्नी और बच्चे भी भूख के आगे तड़प उठते। कुलगुरु का सम्मान करना, नाते-
रिश्तेदारों को खाने पर बुलाना या समधी और दामाद का सम्मान करने जैसी बातें धन का लोभी कभी नहीं करता।
मौसम में पर्याप्त फल पैदा होते हैं लेकिन वे केवल बाजार में दिखाई देते हैं लेकिन चाहे प्राण भी क्यों न जाये वह
उनमें से एक भी फल नहीं चखता। माँ का जो दूध पिया वही अंतिम था, उसके बाद उसने दूध वर्जित ही कर
दिया। रस सचमुच रसना का मायका है लेकिन रस के बिना वह बहुत दुःखी है क्योंकि उसका द्रव्यलोभ अत्यन्त
निष्ठुर था। उसकी जीभ कितना भी प्रयास क्यों न करे लेकिन वह उससे रस की भेंट नहीं होने देता था। शरीर पर
जो कपड़े पहनता वह भी अत्यन्त मैले-कुचैले और जगह-जगह फटे होते थे। मस्तक तो सदा गन्दा ही रहता था।
मुँह से बास आती थी लेकिन कभी पान नहीं खाता था। दीपावली, दशहरा जैसा कोई त्योहार आता तो घर में
पुरानी जोनरी ले आता। बाल-बच्चों को भी खाने-पीने से वंचित रखता था। इसी का नाम है सच्चा कृपण। इस
प्रकार उस द्रव्यलोभी को धर्महीन हुआ देख तथा उसका कृपण व्यवहार देखकर उसके स्वजन भी उसे छोड़ कर
चले गये। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।
दुःशीलस्य कदर्यस्य द्रुह्यन्ते पुत्रबान्धवाः।
दारादुहितरो भृत्या विषण्णा नाचरन् प्रियम्॥८॥
स्वधर्माचरण में जिसका जरा भी मन नहीं है, जो दानधर्म बिलकुल बन्द कर देता है, जिसे केवल धन का
लोभ रहता है, उसे 'दुःशील' कहते हैं। अन्न वस्त्र के लिये जो अपने परिवारजनों को और स्वयं को कष्ट सहने के
लिये बाध्य करता है उसका नाम है 'कृपण'। ऐसे कृपण मनुष्य का साथ पहले उसकी स्त्री छोड़ती है और फिर
इष्ट मित्र, नौकर-चाकर और पुत्र भी उसके विरुद्ध हो जाते हैं। अपने सगे-सम्बन्धी भी विरोध करने लगते हैं
और धन के बँटवारे को लेकर विवाद और गृहकलह प्रारम्भ हो जाता है। पास में अकूत धन होते हुए भी वह

तेईसवाँ अध्याय ६०५
लड़कियों को मैके नहीं बुलाता। तीज-त्योहार मनाना आदि नहीं करता इसलिये लड़कियाँ भी उसे शाप देती हैं।
भाई तो सदा यही मनाते हैं कि एक बार यह मर जाये तो उसके नाम से मिठाई खायें। सब लोग उसके बुरे की ही
कामना करते हैं। जिसके धन को धर्म का संरक्षण नहीं प्राप्त होता उसका धन थोड़े ही समय में क्षयग्रस्त हो जाता
है। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।
तस्यैवं यक्षवित्तस्य च्युतस्योभयलोकतः।
धर्मकामविहीनस्य चुक्रुधुः पञ्चभागिनः॥९॥
न खाता है, न भोजन करता है और न धन को स्पर्श ही करता है, इस प्रकार जैसे कोष के पास भूत
बैठता है, उसी प्रकार यह भी अपने यक्षवित्त की किसी ग्रह की तरह रक्षा करता है। ऐसे धर्मेच्छा विरहित,
केवल भूत की तरह धन की रक्षा करने वाला द्रव्यलोभी को 'यक्ष वित्त' कहते हैं। धन उसे प्राणों से भी अधिक
प्रिय लगता है। शरीर का सुखोपभोग नहीं करता इसलिये इहलोक शून्य हो जाता है और स्वधर्म कर्म, पंचमहायज्ञ
नहीं करता इसलिये परलोक भी शून्य हो जाता है। यज्ञ का हविर्भाग लेने वाले पाँच लोग रहते हैं, उन्हें उनका
हिस्सा नहीं मिलता इसलिये वे पाँचों क्षुब्ध होकर उसके द्रव्यनाश के लिये उद्यत हो जाते हैं। श्रेष्ठ ब्राह्मण जन्म
लेकर जो धन के लोभ में स्वधर्म से भ्रष्ट होता है वह दोनों लोकों से च्युत होता है और कृपणता के कारण कष्ट
अवश्य भोगता है। अत्यन्त कष्ट कर काफी धन प्राप्त करने पर भी अधर्म से उसका नाश होता है। उसके बारे में
भी श्रीकृष्ण बताते हैं।
तदवध्यानविस्रस्तपुण्यस्कन्धस्य भूरिद।
अर्थोऽप्यगच्छन्निधनं बह्वायासापरिश्रमः ॥१०॥
पंचमहायज्ञ के जो देवता हैं, उनकी वह पूर्ण उपेक्षा करता है। इसलिये द्रव्यलाभ का मूल जो पुण्य है,
उसका देवता ने ही क्षय कर दिया ऐसा समझ लो। द्रव्य प्राप्ति का पुण्यरूप सूर्य ही जब अस्त हो जाता है, तो
द्रव्यक्षय का ही अन्धकार छाने लगता है। जहाँ प्रयास से सम्पत्ति एकत्र की जाती है, वहाँ जब अधर्मरूप अँधेरी
रात आती है तो पाँचों यज्ञमूर्ति क्षुब्ध होकर पाँच प्रकार के महानाश होते हैं। जो परिवार को भी सुख नहीं देता
अथवा स्वयं भी सुखों का उपभोग नहीं करता, जो धर्म पर धन नहीं खर्च करता, उस पर ये पाँचों हिस्सेदार
नाराज हो जाते हैं। भाई, चोर, राजा, अग्नि और अधर्म से शरीर में रोग होता है और इन पाँच रूपों में वे पाँच
हिस्सेदार धन का विनाश करने के लिये प्रवृत्त हो जाते हैं। जहाँ श्रद्धा से ब्राह्मण की पूजा नहीं होती जहाँ उचित
लौकिक कर्म नहीं होता, जहाँ वेदों में कहे अनुसार दानादि धर्म नहीं होते, वहाँ निश्चित रूप से धन का नाश
होता है। जहाँ बड़ों का सम्मान नहीं होता, जहाँ पंचमहायज्ञ नहीं होते, जहाँ गुरु से ही अहंकार किया जाता है
वहाँ उद्धव ! धन का नाश तो होना ही है यह ध्यान में रखो। जो निरन्तर दूसरों का द्वेष करते हैं, जो दूसरे की
निन्दा करते हैं, सम्पत्ति के अहंकार से मदोन्मत्त होते हैं, वहाँ हे उद्धव ! धन का क्षय तो होना ही है। श्रीकृष्ण
भक्तों के प्रति पूर्ण दयालु होने के कारण वे धन के क्षय का लक्षण ग्रन्थों के आधार पर बता रहे हैं।
ज्ञातयो जगृहुः किंचित् किंचिद् दस्यव उद्धव।
दैवतः कालतः किंचिद् ब्रह्मबन्धोर्नृपार्थिवात् ॥ ११ ॥
पत्नी और लड़कों ने मिलकर काफी धन गायब कर दिया। भाईयों ने जबर्दस्ती से अपना हिस्सा ले लिया।
चोरों ने सेंध मारकर भण्डार लूट लिया। घर में आग लग जाने से अनगिनत वस्तुएँ जल गयीं। खेत में, फसल में

६०६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
रोग लगने से सारा सत्यानाश हो गया। व्यापार भी जहाँ का तहाँ डूब गया। जो विश्वासपात्र थे उन्होंने ही चीजें
हड़प लीं और नकदी कागज पुर्जे खो गये। बर्तन में रखा हुआ कपूर उड़ जाता है, समुद्र में जाने वाला जहाज
डूब जाता है; उसी प्रकार व्यापार में सहयोगियों पर भी आपदा आयी और चारों ओर से विनाश हो गया। ठग
आये और एकान्त में खोटे सिक्के दे गये और ब्याज के लालच में इसने अपनी सम्पत्ति उसे दे दी। तभी लड़ाई
शुरू हुई और अफरातफरी में कुदाल से पूरा मकान खन डाला गया और उसमें जो भी धन छिपाकर रखा था उसे
लोग टोकरी भर-भर कर ले गये। जहाँ बीज रखा था वहाँ पानी घुस गया और बीज सड़ गये। किसी जबर्दस्त ने
खेत भी छीन लिये। इस प्रकार वह कंगाल हो गया। गाय-भैंस के बाड़े में रोग फैल गया और कितने ही जानवर
मर गये, जो लोग माँगकर घोड़े ले गये थे वे सभी युद्ध में मारे गये। जो लोग जमीन में धन गाड़कर रखते हैं,
उनके भाग्य में मिट्टी ही आती है। कितना ही गुप्त धन जमीन स्वयं ही निगल लेती है क्योंकि जब भाग्य पलट
जाता है तो जहाँ धन रखा था वह स्थान ही भूल जाता है। अधर्म से प्रारब्ध का नाश हुआ और देह पर भी
निस्तेजता आ गयी। वह देखने में ब्राह्मण भी नहीं लगता था। कोई उससे जाति पूछता तो वह अपने को ब्राह्मण
बताता था लेकिन किसी को उसकी बात पर विश्वास नहीं होता था क्योंकि उसके ब्रह्मतेज का ही अस्त हो गया
था। इस प्रकार उसका धन भी पूरी तरह नष्ट हो गया और उसका ब्राह्मण होने का तेज भी समाप्त हो गया। तब
वह निस्तेज चेहरा लिये, दुःख से खिन्न होकर हाय-हाय करने लगा।
स एवं द्रविणे नष्टे धर्मकामवर्जितः।
उपेक्षितश्च स्वजनैश्चिन्तामाप दुरत्ययाम्॥ १२॥
खेत गये तो खेती चली गयी, परचक्र में घर चला गया, सारा धन चला गया, एक कौड़ी भी नहीं बची।
यह दशा केवल अधर्म के कारण हुई। स्वधर्म नहीं किया, दान नहीं दिया, आवश्यक सुख का भी उपभोग नहीं
किया इसलिये उस धन के लोभी का धन स्वप्न में भिखारी होने वाले की तरह धूल में मिल गया। भाग्य फिरने
से उस अभागे पुरुष की क्या स्थिति हो गयी। स्त्री और बच्चे दूर हो गये और उन्होंने उसे घर से बाहर कर दिया
और सुनो। धन के लोभी के इष्टमित्र पहले से ही नहीं होते और भाइयों को भी उससे क्या सुख था? इसलिये
उन्होंने उसकी उपेक्षा कर उसे त्याग दिया। लोग सरेआम मुँह पर ही उसका निन्दा करने लगे। विधवा, बच्चे
उसके मुँह पर थूकने लगे। खाने के लिये तो कुछ भी नहीं रहा। कोई भीख भी नहीं दे रहा था। जहाँ कहीं भी
वह भीख माँगने जाता तो लोग कहते, यह कलमुँहा यहाँ क्यों आया? धन के लोभ में वह किस प्रकार पागल
था। ईश्वर ने उसे पूरा कंगाल बना दिया। इन शब्दों में लोग उसकी भर्त्सना करने लगे और वह तो शुद्ध भिखारी
बन गया और चिन्ता सागर में डूबने-उतराने लगा।
तस्यैवं ध्यायतो दीर्घं नष्टरायस्तपस्विनः।
खिद्यतो बाष्पकण्ठस्य निर्वेदः सुमहानभूत्॥ १३॥
धनलोभी का धन भले ही चला जाय लेकिन उसकी याद नहीं जाती। धन की याद आते ही उसका मन
उद्विग्न हो जाता है और असह्य दुःख से वह छटपटाने लगता है। सर्प के मस्तक में काँटा घुस जाय या सँपोले की
पूँछ कट जाय अथवा मछली को पानी से बाहर किया जाय तो वह जिस असह्य दुःख से छटपटाती है, उसी
प्रकार पूर्व के धन का स्मरण होते ही वह मन ही मन सुबकने लगता है। आँखों से अविरल आँसुओं की बरसात
होने लगती है और हर क्षण वह मूर्च्छित होकर गिरने लगता है। धरती पर लोटने लगता है और चीखने लगता है।

तेईसवाँ अध्याय ६०७
कहता है, "हाय रे मेरा भाग्य ! आखिर, मुझे भिखारी बना दिया। हे दुष्ट ब्रह्मदेव ! मेरे भाग्य में यह क्या लिख
दिया ? मुझे कहीं ठौर नहीं और क्या किया जाय यह भी समझ में नहीं आता।" इस प्रकार जो बड़ा दुःख सामने
आ गया है, उसके विचार से वह महादुःखी होकर रोने लगता है। "यह दुःख तो कम है लेकिन मुझे आगे बहुत
बड़ा दुःख भोगना है। यम जब निर्दयता से मुझे प्रताड़ित करेगा, उस समय मुझे वहाँ कौन छुड़ाएगा ? मैंने कभी
दानधर्म नहीं किया, नारायण का स्मरण भी नहीं किया, इसलिये मेरे भाग्य में नरक ही आयेगा वहाँ मुझे कौन
छुड़ायेगा? मैंने पंचमहायज्ञ नहीं किये, अतिथियों को अन्न नहीं दिया, पितरों का तर्पण नहीं किया, अब मेरे
दुःखों का निवारण कौन करेगा ? मैंने ब्राह्मण की पूजा नहीं की, परमेश्वर का भजन नहीं किया, भगवद्भक्तों की
चरणधूलि का वंदन नहीं किया, अब मेरे दुःखों का नाश कौन करेगा ? सदा अकर्म करने के कारण मैं अघोर
नरक में डूब रहा हूँ। हे श्रीहरि ! दौड़कर मेरे पास आओ और मेरा उद्धार करो। हे कृष्ण ! हे माधव, हे मुरारी ! हे
अच्युत ! हे अनंत ! हे श्रीहरि ! हे गरुड़ध्वज ! हे गोवर्धनधारी ! मुझ गरीब का उद्धार करो। तुमने प्रह्लाद की रक्षा
की, अम्बरीष को गर्भवास से मुक्त किया, उदर में परीक्षित का संरक्षण किया, उसी प्रकार मुझ गरीब का उद्धार
करो। तुमने अहिल्या को तारा, पातकी अजामिल का उद्धार किया और गजेन्द्र को संकट से बचाया, उतनी ही
शीघ्रता से मुझे उबारो। सारे पापों की खान, उस वेश्या को भी तुमने नामस्मरण से मुक्त किया। हे चक्रपाणि !
उतने ही चातुर्य से मुझ दुष्ट का भी उद्धार करो। इस धनेच्छा को आग लगे जिसके कारण मेरा जन्म व्यर्थ गया।
मुझ जैसे अधम ने राम का नाम भी नहीं लिया जिसके लिये धन की आवश्यकता नहीं होती। रामनाम के प्रभाव
से महान पापों की राशियाँ जल जाती हैं। फिर भी मैं मुख से राम का नाम नहीं लेता।" इस प्रकार जब वह
अपने अपराधों का स्मरण कर पश्चात्ताप कर रहा था, तभी उसके अंतःकरण में तीव्र वैराग्य उत्पन्न हुआ। उसी
का वर्णन श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
स चाहेदमहो कष्टं वृथाऽऽत्मा मेऽनुतापितः।
न धर्माय न कामाय यस्यार्थायास् ईदृशः ॥ १४॥
वह ब्राह्मण हाथ मल कर कहता है—"हाय ! ब्राह्मण देह तो मोक्ष प्राप्ति का ही साधन है। वह प्राप्त होने
पर भी मैं कैसा कंगाल रह गया और धन लोभ के कारण व्यर्थ नष्ट हो गया। जिस देह के योग से मोक्ष का सुख
मिलता है उसी देह को मैंने दुःख दिया। मैं धन का लोभी अत्यन्त मूर्ख आदमी हूँ। मुझ जैसा मूर्ख और कोई नहीं
होगा। धर्म के नाम पर धन न खर्च कर मैंने बड़े प्रयास से धन जमा कर रखा, और उस धन की तो ऐसी अवस्था
हुई कि उसने मुझे दुःख का फल दिया। द्रव्य लोभ का आश्चर्य बड़ा विलक्षण है। उसके आगे न इहलोक है न
परलोक है। जो सुलभ मोक्षसुख था, उससे भी हाथ धो बैठा। वह लोभ मुझे नरक तक पहुँचा गया। जहाँ नरक
में कल्प तक डूबने पर भी ठौर नहीं मिलता वहाँ यह धनलोभ जीव को ले जाता है। वही मैंने इस नरदेह में
पाया। जो ब्राह्मणदेह में जन्म लेता है, वह तीनों लोकों में पूज्य होता है। मोक्ष उसके चरणों पर होता है। ऐसा
ब्राह्मणदेह का मैंने दुर्भाग्य से नाश कर दिया। लोभ से मैंने जिस धन का संग्रह किया, वह सब तो नष्ट हुआ ही
लेकिन उसने मुझे अत्यन्त दुःखी किया और मुझे घोर नरक में डाल दिया। धीरे-धीरे जीवन बीतता गया और मैं
पश्चात्ताप से संतप्त हो गया। धन लोभ में मेरे सारे प्रयास व्यर्थ गये लेकिन विवेक के साथ मुझमें अत्यन्त पवित्र
वैराग्य उत्पन्न हुआ। द्रव्यलोभी व्यक्ति दुःख का भण्डार ही है।" जो धन के बन्धन में रहता है, वह पापी है। इस
प्रकार वह अपने ही मुँह से अपनी निन्दा करने लगा।

६०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रायेणार्थं कदर्याणां न सुखाय कदाचन।
इह चात्मोपतापाय मृतस्य नरकाय च॥ १५॥
सम्भवतः जो धन के लोभी होते हैं, उन्हें इहलोक का सुख रहता ही नहीं है क्योंकि उस धन का संरक्षण
करने में ही उन्हें अत्यधिक दुःख होता है और वह धन चले जाने पर मरणान्त दुःख ही आ जाता है। धन अर्जित
करने में नितांत कष्ट होते हैं, उसे सँभालने में कलह हो जाते हैं और उस धन का नाश होने पर सीना फट जाता
है। इहलोक में इस प्रकार का दुःख होता है और अधर्म होता है इसलिये परलोक भी दूर हो जाता है। इसलिये
मरते समय धन के लोभी को नरक का सामना करना पड़ता है। जो धर्म नहीं करता और स्वयं भी कुछ नहीं
खाता और जो मुझ जैसा कृपण हो जाता है उसे सर्वाधिक दुःख होता है। जहाँ लोभ की बस्ती रहती है वहाँ
स्वप्न में भी सुख का निवास नहीं होता। देखो! लोभ अत्यन्त निंद्य है। वह ब्राह्मण ही अपने मुख से यह कह
रहा है।
यशो यशस्विनां शुद्धं श्लाघ्या ये गुणिनां गुणाः।
लोभः स्वल्पोऽपि तान् हन्तिश्वित्रो रूपमिवेप्सितम् ॥ १६ ॥
समरभूमि में आगे का योद्धा धराशायी होने पर जो योद्धा स्वयं आगे बढ़कर शत्रु का सामना करता है और
शत्रु के घेरे में फँसे राजा को कन्धे पर डाल कर ले आता है, ऐसा यश प्राप्त करने के बाद यदि उसके अन्तःकरण
में उस वीरता के बदले कुछ पुरस्कार का लोभ होता है तो इससे उसका अपयश होता है और सारा संसार उसकी
मूर्खता का उपहास करता है क्योंकि राजा उसके कुछ कहे बिना ही उसे अपने समकक्ष लाने का विचार करता
रहता है। राजा के इस विचार में इस लोभ के कारण रुकावट आ गयी और उस लोभ के कारण उसकी मूर्खता
प्रस्थापित हो गयी। स्वयं कन्यादान करने से सारा कुल पवित्र हो जाता है लेकिन यदि उस कन्या के ऐवज में
उसने धन लिया तो उस धन के लोभी का अधःपतन हो जाता है। इस प्रकार लोभ दान में भी लांछनास्पद है।
वेदशास्त्रों का अध्ययन कर जो बड़े ज्ञान सम्पन्न हो गये उनका भी धन के लोभ के कारण बहुत छल होता है
क्योंकि उनमें ज्ञान का दृढ़ अभिमान रहता है। देह की सत्यता सिद्ध करने के लिये पण्डितों में विवाद शुरू हो
जाता है और उनमें विरोध होने पर वे छलवादी भाषण करने लगते हैं। इस प्रकार ज्ञाता भी लोभ के चक्कर में आ
जाते हैं। विचारसम्पन्न एवं ज्ञानसम्पन्न पण्डित को भी लोभ निन्दा का पात्र बना देता है फिर औरों की क्या
बिसात ? लोभ पवित्र मनुष्य को भी अपवित्र बना देता है। जहाँ लोभ रहता है वहीं निंदा का बसेरा रहता है। वही
प्रसिद्ध दृष्टांत इस ब्राह्मण ने स्पष्ट करके बतलाया। कन्या कुलवान हो, सुशील हो, सुकुमार हो, स्वरूप से सर्वांग
मनोहर हो और फिर यदि उसके नाक पर कोढ़ का हल्का-सा भी दाग हो तो इतनी सुन्दर होने पर भी वह निंद्य
है। उसी प्रकार मन में जरा सी भी लोभ की बस्ती हो तो वह सारे गुण, औदार्य, यश, कीर्ति आदि सबका नाश
करती है। इसलिये लोभ जैसा अपयश देने वाला, त्रिभुवन में और कोई नहीं है। धन के लोभ के कारण सदा
एक-दूसरे में विरोध रहता है। धन का लोभ इष्टमित्रों में भी दूरी उत्पन्न करता है। इतना बाधक और ऐसा
अमंगल दूसरा कोई भी नहीं है।
अर्थस्य साधने सिद्धे उत्कर्षे रक्षणे व्यये।
नाशोपभोग आयासस्त्रासश्चिन्ता भ्रमो नृणाम् ॥ १७ ॥
पहले धन प्राप्त करने के लिये प्रयास करो, फिर उसे बढ़ाने के लिये परिश्रम करो और इतना करके वह