श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
क्रियानष्ट ब्राह्मण दुष्कर्म करता रहता था। वह महाठग, अत्यन्त कपटी, नीच और धन का लोभी था। इसके धन
लोभ में कोई रुकावट आती तो वह क्रोध से उबल उठता और गोहत्या, ब्रह्महत्या करने तक के लिये भी तत्पर हो
उठता था। धनलोभ के पीछे क्रोध की बस्ती रहती है—धन के पीछे पाप भी रहते हैं। धन के लोभ पर ही
जिसका मन रहता है उस वृत्ति का नाम है कृपणता। जिसने धन का ढेर इकट्ठा कर लिया हो उसे यदि खर्च
करने की नौबत आये तो उसके प्राण निकलने लगते हैं। बन्दर के गाल में जब तक चना छिपा हुआ है, तब तक
वह उसे हाथ नहीं लगाने देता, उसी प्रकार धन खर्च करने में ही कृपण की मृत्यु है।
ज्ञातयोऽतिथयस्तस्य वाङ्मात्रेणापि नार्चिताः।
शून्यावसथ आत्मापि काले कामैरनर्चितः॥७॥
घर का थोड़ा भात खर्च होगा, इसलिये वैश्वदेव भी नहीं करता, फिर अतिथि की कब और कौन पूजा
करेगा ? इतने पर भी यदि कोई अतिथि आ ही जाय तो उसके साथ वह ऐसा भाषण करेगा कि जिससे उसके प्राण
ही निकल जायें। फिर उसके पास दाना-पानी कौन माँगेगा? उसका घर देखकर ब्रह्मचारी उदास हो जाते।
संन्यासियों ने तो, जिस प्रकार राजहंस गोबर की आशा छोड़ देते हैं, उसी प्रकार उसके घर की आशा छोड़ दी थी।
भिखारियों ने तो उसका द्वार वर्जित कर दिया था। अतिथि उसके द्वार से आगे निकल जाते थे। कोई मेहमान आता
तो वह कहीं और आसरा लेता। पितर तो उससे हमेशा के लिये निराश हो गये थे। चूहे भी घर छोड़ कर चले गये।
कौवे, चिड़िया और चींटियों ने भी दूसरे घर में अपनी व्यवस्था कर ली थी। जो स्वयं भी पेटभर नहीं खाता था,
तो दूसरों की क्या बात करें? पत्नी और बच्चे भी भूख के आगे तड़प उठते। कुलगुरु का सम्मान करना, नाते-
रिश्तेदारों को खाने पर बुलाना या समधी और दामाद का सम्मान करने जैसी बातें धन का लोभी कभी नहीं करता।
मौसम में पर्याप्त फल पैदा होते हैं लेकिन वे केवल बाजार में दिखाई देते हैं लेकिन चाहे प्राण भी क्यों न जाये वह
उनमें से एक भी फल नहीं चखता। माँ का जो दूध पिया वही अंतिम था, उसके बाद उसने दूध वर्जित ही कर
दिया। रस सचमुच रसना का मायका है लेकिन रस के बिना वह बहुत दुःखी है क्योंकि उसका द्रव्यलोभ अत्यन्त
निष्ठुर था। उसकी जीभ कितना भी प्रयास क्यों न करे लेकिन वह उससे रस की भेंट नहीं होने देता था। शरीर पर
जो कपड़े पहनता वह भी अत्यन्त मैले-कुचैले और जगह-जगह फटे होते थे। मस्तक तो सदा गन्दा ही रहता था।
मुँह से बास आती थी लेकिन कभी पान नहीं खाता था। दीपावली, दशहरा जैसा कोई त्योहार आता तो घर में
पुरानी जोनरी ले आता। बाल-बच्चों को भी खाने-पीने से वंचित रखता था। इसी का नाम है सच्चा कृपण। इस
प्रकार उस द्रव्यलोभी को धर्महीन हुआ देख तथा उसका कृपण व्यवहार देखकर उसके स्वजन भी उसे छोड़ कर
चले गये। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।
दुःशीलस्य कदर्यस्य द्रुह्यन्ते पुत्रबान्धवाः।
दारादुहितरो भृत्या विषण्णा नाचरन् प्रियम्॥८॥
स्वधर्माचरण में जिसका जरा भी मन नहीं है, जो दानधर्म बिलकुल बन्द कर देता है, जिसे केवल धन का
लोभ रहता है, उसे 'दुःशील' कहते हैं। अन्न वस्त्र के लिये जो अपने परिवारजनों को और स्वयं को कष्ट सहने के
लिये बाध्य करता है उसका नाम है 'कृपण'। ऐसे कृपण मनुष्य का साथ पहले उसकी स्त्री छोड़ती है और फिर
इष्ट मित्र, नौकर-चाकर और पुत्र भी उसके विरुद्ध हो जाते हैं। अपने सगे-सम्बन्धी भी विरोध करने लगते हैं
और धन के बँटवारे को लेकर विवाद और गृहकलह प्रारम्भ हो जाता है। पास में अकूत धन होते हुए भी वह