श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
लगा इसलिये उसका हेतु पूरा करने के लिये वह उसका विस्तृत निरूपण करेगा। सचमुच, उस श्रेष्ठ शान्ति के
अधिकारी एक तुम ही हो, ऐसा कह कर श्रीकृष्ण उद्धव को प्रेमपूर्वक सुनाने लगे।
श्री भगवानुवाच
बार्हस्पत्य स वै नात्र साधुर्वै दुर्जनेरितैः ।
दुरुक्तैर्भिन्नमात्मानं यः समाधातुमीश्वरः ॥ २॥
उद्धव! तुमने जो कुछ भी कहा उसे मैं सच ही मानता हूँ। दुर्जनों द्वारा अपमानित होने पर उसे सहन करने
लायक शान्ति किसी में भी नहीं होती। देव भी जिसकी पादुकाएँ मस्तक पर धारण करते हैं, मुख्य इन्द्र भी
जिसका चरण स्पर्श करते हैं, अष्ट महासिद्धि जिसकी बनकर रह गयी हैं और ब्रह्मज्ञान जिसका अंकित होकर
रह गया है ऐसे देवों के गुरु बृहस्पति के तुम शिष्य हो, साक्षात् विवेकमूर्ति हो। इसलिये शान्ति साध्य करने के
उपाय तुम्हारी समझ में आ सकेंगे। उद्धव को शान्ति का रहस्य समझ में आ जाय इसलिये श्रीकृष्ण ने उसे
गौरवान्वित किया और उसके ही भाषण का अनुमोदन करते हुए श्रीकृष्ण शुद्ध शान्ति का स्वरूप बताने लगे।
निन्दा, अवज्ञा, उपहास आदि मार्गों से दुर्जनों द्वारा किया गया अपमान जो सहन करेगा, वह साक्षात् ईश्वर ही है,
यह ध्यान में रखो। वह आत्मज्ञान से पूरी तरह मद्रूप ही हो जाता है। प्राणिमात्र में आत्मस्वरूप देखने की बात
जिसे स्वीकार है, वह दुर्जनों के आघात को भी आनन्दपूर्वक सहन करता है। जो स्वयं ही सारा जगत बनकर
रहता है उसे कितना ही उपद्रव क्यों न हो लेकिन क्रोध का उबाल नहीं आता। वह जरा भी उद्विग्न हुए बिना वे
उपद्रव आनन्दपूर्वक सहन करता है। अपना ही एक हाथ शरीर पर कहीं लग जाय तो जिस प्रकार हमारे मुख से
क्रोध या द्वेष का शब्द नहीं निकलता, उसी प्रकार चराचर को जो आत्मस्वरूप से ही देखता है, उसके घर में
शान्ति स्वयमेव प्रवेश करती है। उद्धव! जिसे ऐसा आत्मज्ञान हुआ है, उसे ही साधु समझा जाय। वही दूसरे का
अपराध सहन करता है। वही एक शान्ति के योग से पवित्र हुआ रहता है। यह आत्मज्ञान जिसकी समझ में नहीं
आता ऐसे जो अन्य ज्ञानसम्पन्न विद्वान हैं, वे भी द्वंद्व सहन नहीं कर सकते, यह भी तुम्हें कह देता हूँ।
न तथा तप्यते विद्धः पुमान् बाणैः सुमर्मगैः ।
यथा तुदन्ति मर्मस्था ह्यसतां परुषेषवः ॥ ३॥
लोहे के अत्यन्त प्रखर बाण होते हैं, जिनके प्रहार से प्राण विह्वल हो जाते हैं लेकिन दुर्जनों के वाग्बाण
शरीर में उससे भी अधिक गहरे धँस जाते हैं। लोहे के बाण शरीर पर जिस स्थान पर लगते हैं उसने ही अवयव
के जख्मी होने से मनुष्य विह्वल हो उठता है लेकिन वाग्बाण का सामर्थ्य उससे अधिक है। उनके प्रहार से पूर्वज
भी जख्मी होते हैं। लोहे के बाण का घाव पेड़-पौधों के पत्तों से ठीक हो जाता है लेकिन वाग्बाण का दर्द
जीवनपर्यन्त कष्ट देता है। दूसरों का मर्म निकालने के लिये विषैली भावना से सने हुए निन्दा के वाग्बाण जब
शरीर में घुसते ही अंतःकरण को चीर देते हैं तो शरीर में जैसे आग लग जाती है। ऐसे दुर्जनों के वचन और
अपमान का औद्धत्य सहन करने की शान्ति साधारण व्यक्ति में नहीं होती। इस प्रकार उद्धव का मनोगत ध्यान में
रखकर श्रीकृष्णनाथ शान्ति का निर्णय सुना रहे हैं। पूर्व में जिस शान्ति का वर्णन किया था, उसे शीघ्र साध्य करो,
ऐसा श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा। लेकिन उसे वह व्यर्थ लगेगा और उसके मन में संकोच होगा क्योंकि शान्ति
असाध्य है ऐसा उद्धव के मन में था। इसे ध्यान में रखकर श्रीकृष्ण भिक्षुगीत (एक संन्यासी द्वारा गाये हुए
विचार) उसके सम्पूर्ण इतिहास के साथ बता रहे हैं।