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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 621, कुल 869 में से

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पृष्ठ 621

तेईसवाँ अध्याय ६०५
लड़कियों को मैके नहीं बुलाता। तीज-त्योहार मनाना आदि नहीं करता इसलिये लड़कियाँ भी उसे शाप देती हैं।
भाई तो सदा यही मनाते हैं कि एक बार यह मर जाये तो उसके नाम से मिठाई खायें। सब लोग उसके बुरे की ही
कामना करते हैं। जिसके धन को धर्म का संरक्षण नहीं प्राप्त होता उसका धन थोड़े ही समय में क्षयग्रस्त हो जाता
है। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।
तस्यैवं यक्षवित्तस्य च्युतस्योभयलोकतः।
धर्मकामविहीनस्य चुक्रुधुः पञ्चभागिनः॥९॥
न खाता है, न भोजन करता है और न धन को स्पर्श ही करता है, इस प्रकार जैसे कोष के पास भूत
बैठता है, उसी प्रकार यह भी अपने यक्षवित्त की किसी ग्रह की तरह रक्षा करता है। ऐसे धर्मेच्छा विरहित,
केवल भूत की तरह धन की रक्षा करने वाला द्रव्यलोभी को 'यक्ष वित्त' कहते हैं। धन उसे प्राणों से भी अधिक
प्रिय लगता है। शरीर का सुखोपभोग नहीं करता इसलिये इहलोक शून्य हो जाता है और स्वधर्म कर्म, पंचमहायज्ञ
नहीं करता इसलिये परलोक भी शून्य हो जाता है। यज्ञ का हविर्भाग लेने वाले पाँच लोग रहते हैं, उन्हें उनका
हिस्सा नहीं मिलता इसलिये वे पाँचों क्षुब्ध होकर उसके द्रव्यनाश के लिये उद्यत हो जाते हैं। श्रेष्ठ ब्राह्मण जन्म
लेकर जो धन के लोभ में स्वधर्म से भ्रष्ट होता है वह दोनों लोकों से च्युत होता है और कृपणता के कारण कष्ट
अवश्य भोगता है। अत्यन्त कष्ट कर काफी धन प्राप्त करने पर भी अधर्म से उसका नाश होता है। उसके बारे में
भी श्रीकृष्ण बताते हैं।
तदवध्यानविस्रस्तपुण्यस्कन्धस्य भूरिद।
अर्थोऽप्यगच्छन्निधनं बह्वायासापरिश्रमः ॥१०॥
पंचमहायज्ञ के जो देवता हैं, उनकी वह पूर्ण उपेक्षा करता है। इसलिये द्रव्यलाभ का मूल जो पुण्य है,
उसका देवता ने ही क्षय कर दिया ऐसा समझ लो। द्रव्य प्राप्ति का पुण्यरूप सूर्य ही जब अस्त हो जाता है, तो
द्रव्यक्षय का ही अन्धकार छाने लगता है। जहाँ प्रयास से सम्पत्ति एकत्र की जाती है, वहाँ जब अधर्मरूप अँधेरी
रात आती है तो पाँचों यज्ञमूर्ति क्षुब्ध होकर पाँच प्रकार के महानाश होते हैं। जो परिवार को भी सुख नहीं देता
अथवा स्वयं भी सुखों का उपभोग नहीं करता, जो धर्म पर धन नहीं खर्च करता, उस पर ये पाँचों हिस्सेदार
नाराज हो जाते हैं। भाई, चोर, राजा, अग्नि और अधर्म से शरीर में रोग होता है और इन पाँच रूपों में वे पाँच
हिस्सेदार धन का विनाश करने के लिये प्रवृत्त हो जाते हैं। जहाँ श्रद्धा से ब्राह्मण की पूजा नहीं होती जहाँ उचित
लौकिक कर्म नहीं होता, जहाँ वेदों में कहे अनुसार दानादि धर्म नहीं होते, वहाँ निश्चित रूप से धन का नाश
होता है। जहाँ बड़ों का सम्मान नहीं होता, जहाँ पंचमहायज्ञ नहीं होते, जहाँ गुरु से ही अहंकार किया जाता है
वहाँ उद्धव ! धन का नाश तो होना ही है यह ध्यान में रखो। जो निरन्तर दूसरों का द्वेष करते हैं, जो दूसरे की
निन्दा करते हैं, सम्पत्ति के अहंकार से मदोन्मत्त होते हैं, वहाँ हे उद्धव ! धन का क्षय तो होना ही है। श्रीकृष्ण
भक्तों के प्रति पूर्ण दयालु होने के कारण वे धन के क्षय का लक्षण ग्रन्थों के आधार पर बता रहे हैं।
ज्ञातयो जगृहुः किंचित् किंचिद् दस्यव उद्धव।
दैवतः कालतः किंचिद् ब्रह्मबन्धोर्नृपार्थिवात् ॥ ११ ॥
पत्नी और लड़कों ने मिलकर काफी धन गायब कर दिया। भाईयों ने जबर्दस्ती से अपना हिस्सा ले लिया।
चोरों ने सेंध मारकर भण्डार लूट लिया। घर में आग लग जाने से अनगिनत वस्तुएँ जल गयीं। खेत में, फसल में