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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 617, कुल 869 में से

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पृष्ठ 617

तेईसवाँ अध्याय ६०१
हे राजा परीक्षित ! वही मैं तुम्हें बताता हूँ। हे पाण्डव कुलदीपक ! हे कौरव कुल तिलक ! सुनो। तुम आत्मसुख के
साधक हो इसलिये शान्ति के सच्चे अधिकारी तुम ही हो। ब्रह्मप्राप्ति साध्य करने के लिये तुम जलपान भी
छोड़कर भगवत्कथा श्रवण के लिये बैठे हो। इसलिये हे राजा ! श्रीकृष्ण की बतायी हुई शान्ति और निवृत्ति के
बारे में सुनो। तेईसवें अध्याय का विषय इस प्रकार है कि दुर्जन यदि मन को क्षुब्ध करे तो उस मन को पूर्ण क्षमा
करने का उपाय श्रीकृष्ण बतायेंगे। भिक्षुगीत का संरक्षण ही मनोजय का लक्षण है और प्रकृति पर किस प्रकार
विजय प्राप्त की जाय इसका निरूपण चौबीसवें अध्याय में हुआ है। तीन प्रकार के तीन गुण बताकर उसमें स्वयं
को निर्गुण बताकर, गुणजय का उत्तम निरूपण पच्चीसवें अध्याय में किया है। अब इसमें जो छब्बीसवाँ अध्याय
है वह ज्वलंत विरक्ति का है। उसमें ऐलगीत सुनाकर स्त्रियादिक सारे विषयों का त्याग करने को कहा गया है।
गुण, विषय, प्रकृति और मन इन चारों का समाधान श्रीकृष्ण अपने मुख से चार अध्यायों में बतायेंगे। इस प्रकार
राजा परीक्षित को सावधान कर श्री शुकयोगीन्द्र कथा का निरूपण करने लगे।
बादरायणिरुवाच
स एवमाशंसित उद्धवेन भागवतमुख्येन दाशार्हमुख्यः ।
सभाजयन् भृत्यवचो मुकुन्दस्तमाबभाषे श्रवणीयवीर्यः ॥ १ ॥
शुक्राचार्य बोले, हे परीक्षित! उद्धव की यह विनती सुनकर, उसके भाषण से श्रीकृष्ण को संतोष हुआ
और वह उद्धव को आगे उपदेश करने लगा। करोड़ों जन्मों के बाद ही अन्त में ब्राह्मण के उत्तम कुल में जन्म
प्राप्त होता है। वह महापुण्य का फल है। लेकिन यदि हरिभक्ति न हो तो वह भी निष्फल है। आम का
एकआध वृक्ष सदा फलद्रूप होने वाला होता है लेकिन यदि उस पर विष की बेल उग आये तो वह भी
निष्फल सिद्ध होता है। उसी प्रकार उत्तम लोग भी भजन के बिना व्यर्थ हो जाते हैं। लेकिन उद्धव की बात
वैसी नहीं थी। वह यादवों के उत्तम वंश में जन्म लेकर भी, श्रेष्ठता प्राप्त कर भी सम्पत्ति के मद में नहीं
भूला। हे महाराजा! राज्य-वैभव प्राप्त होने पर भी जो भगवद्गीता को नहीं छोड़ता उसे ही भगवद्भक्तों में
श्रेष्ठत्व का लाभ अवश्य मिलता है। सद्गुण वाली, सुन्दर और पतिव्रता स्त्री अनुकूल मिलने पर भी जो
भक्तिमार्ग नहीं छोड़ता वही है श्रेष्ठ भगवद्भक्त! उद्धव तो इन गुणों से परिपूर्ण था। विचारों से तो वह अत्यन्त
विरक्त था और श्रीकृष्ण के चरणों में तो अत्यन्त अनुरक्त था। इसीलिये उद्धव ही श्रेष्ठ भगवद्भक्त है। उम्र से
और सम्पत्ति से जो वरिष्ठता आती है, उसे गौण समझना चाहिये क्योंकि भगवद्भक्ति ही सब में श्रेष्ठ है। उसे
वैभव से उद्धव परिपूर्ण था। वह श्रीकृष्ण का अत्यन्त विश्वस्त था। श्रीकृष्ण जिसके साथ अंतरंग थे, जिसे
गुह्यज्ञान बताते थे उसके भाग्य का किस प्रकार वर्णन किया जाय ? साक्षात परब्रह्म ही उद्धव के हाथ लग गया
था। इतना ही नहीं, अपितु परब्रह्मरूपी श्रीकृष्ण उसके कहने के अनुसार चलता था। इसलिये सच्चा
भाग्यशाली तो वही है। इस प्रकार उद्धव के भाग्य का वर्णन करते-करते शुक्राचार्य भाव विह्वल हो गये।
उसके अंतःकरण में आनन्द की ऐसी बाढ़ आ गयी कि वह तटस्थ हो कर बैठ गया। यह देखकर राजा
परीक्षित को भी आश्चर्य लगा। उसने मन ही मन कहा, जिसके भाग्य का वर्णन कर श्रीशुक्राचार्य भी भाव
विह्वल हो गये, वह उद्धव वास्तव में भाग्यवान है। मेरे लिये भी वह सभी प्रकार से पूज्य है। इतने में
शुक्राचार्य ने राजा से कहा, राजा! उस उद्धव का भाग्य सचमुच अत्यन्त अलौकिक है। उसने विनती करते ही
श्रीकृष्ण सन्तुष्ट हो गया। उद्धव को शान्ति की ही इच्छा थी और वही, प्रश्न श्रीकृष्ण को भी बहुत अच्छा