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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 622, कुल 869 में से

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पृष्ठ 622

६०६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
रोग लगने से सारा सत्यानाश हो गया। व्यापार भी जहाँ का तहाँ डूब गया। जो विश्वासपात्र थे उन्होंने ही चीजें
हड़प लीं और नकदी कागज पुर्जे खो गये। बर्तन में रखा हुआ कपूर उड़ जाता है, समुद्र में जाने वाला जहाज
डूब जाता है; उसी प्रकार व्यापार में सहयोगियों पर भी आपदा आयी और चारों ओर से विनाश हो गया। ठग
आये और एकान्त में खोटे सिक्के दे गये और ब्याज के लालच में इसने अपनी सम्पत्ति उसे दे दी। तभी लड़ाई
शुरू हुई और अफरातफरी में कुदाल से पूरा मकान खन डाला गया और उसमें जो भी धन छिपाकर रखा था उसे
लोग टोकरी भर-भर कर ले गये। जहाँ बीज रखा था वहाँ पानी घुस गया और बीज सड़ गये। किसी जबर्दस्त ने
खेत भी छीन लिये। इस प्रकार वह कंगाल हो गया। गाय-भैंस के बाड़े में रोग फैल गया और कितने ही जानवर
मर गये, जो लोग माँगकर घोड़े ले गये थे वे सभी युद्ध में मारे गये। जो लोग जमीन में धन गाड़कर रखते हैं,
उनके भाग्य में मिट्टी ही आती है। कितना ही गुप्त धन जमीन स्वयं ही निगल लेती है क्योंकि जब भाग्य पलट
जाता है तो जहाँ धन रखा था वह स्थान ही भूल जाता है। अधर्म से प्रारब्ध का नाश हुआ और देह पर भी
निस्तेजता आ गयी। वह देखने में ब्राह्मण भी नहीं लगता था। कोई उससे जाति पूछता तो वह अपने को ब्राह्मण
बताता था लेकिन किसी को उसकी बात पर विश्वास नहीं होता था क्योंकि उसके ब्रह्मतेज का ही अस्त हो गया
था। इस प्रकार उसका धन भी पूरी तरह नष्ट हो गया और उसका ब्राह्मण होने का तेज भी समाप्त हो गया। तब
वह निस्तेज चेहरा लिये, दुःख से खिन्न होकर हाय-हाय करने लगा।
स एवं द्रविणे नष्टे धर्मकामवर्जितः।
उपेक्षितश्च स्वजनैश्चिन्तामाप दुरत्ययाम्॥ १२॥
खेत गये तो खेती चली गयी, परचक्र में घर चला गया, सारा धन चला गया, एक कौड़ी भी नहीं बची।
यह दशा केवल अधर्म के कारण हुई। स्वधर्म नहीं किया, दान नहीं दिया, आवश्यक सुख का भी उपभोग नहीं
किया इसलिये उस धन के लोभी का धन स्वप्न में भिखारी होने वाले की तरह धूल में मिल गया। भाग्य फिरने
से उस अभागे पुरुष की क्या स्थिति हो गयी। स्त्री और बच्चे दूर हो गये और उन्होंने उसे घर से बाहर कर दिया
और सुनो। धन के लोभी के इष्टमित्र पहले से ही नहीं होते और भाइयों को भी उससे क्या सुख था? इसलिये
उन्होंने उसकी उपेक्षा कर उसे त्याग दिया। लोग सरेआम मुँह पर ही उसका निन्दा करने लगे। विधवा, बच्चे
उसके मुँह पर थूकने लगे। खाने के लिये तो कुछ भी नहीं रहा। कोई भीख भी नहीं दे रहा था। जहाँ कहीं भी
वह भीख माँगने जाता तो लोग कहते, यह कलमुँहा यहाँ क्यों आया? धन के लोभ में वह किस प्रकार पागल
था। ईश्वर ने उसे पूरा कंगाल बना दिया। इन शब्दों में लोग उसकी भर्त्सना करने लगे और वह तो शुद्ध भिखारी
बन गया और चिन्ता सागर में डूबने-उतराने लगा।
तस्यैवं ध्यायतो दीर्घं नष्टरायस्तपस्विनः।
खिद्यतो बाष्पकण्ठस्य निर्वेदः सुमहानभूत्॥ १३॥
धनलोभी का धन भले ही चला जाय लेकिन उसकी याद नहीं जाती। धन की याद आते ही उसका मन
उद्विग्न हो जाता है और असह्य दुःख से वह छटपटाने लगता है। सर्प के मस्तक में काँटा घुस जाय या सँपोले की
पूँछ कट जाय अथवा मछली को पानी से बाहर किया जाय तो वह जिस असह्य दुःख से छटपटाती है, उसी
प्रकार पूर्व के धन का स्मरण होते ही वह मन ही मन सुबकने लगता है। आँखों से अविरल आँसुओं की बरसात
होने लगती है और हर क्षण वह मूर्च्छित होकर गिरने लगता है। धरती पर लोटने लगता है और चीखने लगता है।