श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 616, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेईसवाँ अध्याय
हे ओंकाररूप, विश्वरूपा सद्गुरु ! तुम्हें नमस्कार है। तुम ज्ञानस्वरूप हो और विश्व के भीतर-बाहर केवल
तुम ही हो। तुम्हारे स्वरूप का यदि विचार किया जाय तो तुम निर्गुण होते हुए अव्यय हो। यह जो साक्षात् चराचर
है, वह तुम्हारे निर्गुण स्वरूप के अवयव हैं। जीव और शिव तुम्हारी तुम्हारी माया है। अद्वैत यही तुम्हारा सच्चा
वैभव है। घृत की गुड़िया साकार दिखायी देती है लेकिन केवल घृत के रूप में ही उसे देखने पर वह निराकार
ही है। उसी प्रकार तुम अविनाशी और अविकारी होकर संसार के आकार में भासित होते हो। संसार का यह जो
रूप दिखायी देता है वह तुम्हारा ही स्वरूप है और तुम्हारे अंग को देखा जाय तो तुम अनंग हो। लेकिन उस
अनंग का (अर्थात् काम का) तुझमें स्पर्श भी नहीं है। जो कुछ दृष्टि को दिखायी देता है, वह तुम नहीं हो। जो
नहीं दिखायी देता वह तुम हो। होना न होना तुम्हारे पास नहीं है। तुम संसार के ऐसे जगद्गुरु हो। शब्द तुमसे दूर
है। लेकिन शब्द के अन्तर्बाह्य तुम ही हो। चराचर में बोलने वाले तुम हो और वेदशास्त्रों का वक्ता भी तुम ही
हो। ईख की मधुरता निकलती है। ईख के भीतर-बाहर मधुरता ही रहती है लेकिन मधुरता में ईख नहीं होती।
तुम्हारा और वेद का नाता वैसा ही है। वेदों के वक्ता तुम ही हो और वेदों में तुम्हारा ही प्रतिपादन किया हुआ है।
गुरुराया ! तुम निःशब्द में ही रहते हो, इसलिये अंत में वेदों को भी तुम्हारा आकलन नहीं हो पाता। जिस प्रकार
अनाहत ध्वनि निःशब्द होकर प्रत्येक ध्वनि से मिला हुआ रहता है लेकिन वही अनाहत (वाद्य पर बिना आघात
किये होने वाला ध्वनि) बजा सके ऐसा कोई वाद्ययंत्र संसार में नहीं है। उसी प्रकार तुम समस्त वेदों के वक्ता
हो, सारे शास्त्रों को युक्ति बताने वाले हो लेकिन वेदशास्त्रों से सम्मत तुम्हारा वर्णन नहीं किया जा सकता।
इसलिये यदि तुम्हें निःशब्द कहा जाय तो निःशब्द और 'सशब्द यह कहना भी मायिक ही है। सारांश, तुम्हारा
स्वरूप समझ में नहीं आता। लेकिन इस प्रकार तुम ज्ञाता हो यह सिद्ध करने जाओ तो फिर अज्ञान शेष ही नहीं
रहता। फिर, जहाँ अज्ञान है ही नहीं, वहाँ ज्ञाता कौन है और ज्ञातापन किस चीज का है? जहाँ शादी लायक
लड़की ही नहीं है, वहाँ उसके लिये दूल्हा खोजने के लिये कौन कहेगा ? तुम ज्ञानी हो और अज्ञानी भी नहीं हो।
तुम बोलने वाले भी नहीं हो और न बोलने वाले भी नहीं हो। तुम अनेक भी नहीं हो और एक भी नहीं हो।
तुम्हारे अतर्क्य स्वरूप के सम्बन्ध में कोई तर्क ही नहीं चलता। तुम शब्दातीत हो, विकारातीत हो, तुम निर्गुण हो,
तुम निरहंकार हो यह कहने में भी विचार करना पड़ता है। क्योंकि जगदाकार और जगदात्मा तो तुम ही हो। सारे
जगत के आकार में तुम प्रसिद्ध हो, अतः किसका द्वंद्व किसे बाधा पहुँचायेगा? जब दूसरा कोई है ही नहीं तो
फिर दूसरे के अपराध किसे विरुद्ध मालूम होंगे? हे सद्गुरुनाथा ! इस प्रकार तुम्हारे चरणों में द्वंद्वों की एकात्मता
हो जाने के कारण ही ऐक्य भावना से, अपनी ही कथा श्री भागवत सुनाते हो। उसी भागवत के बाईसवें अध्याय
के अन्त में, उद्धव ने आपसे शान्ति कैसे प्राप्त होगी और ये द्वंद्व कैसे टूटेंगे इसका उपाय पूछा था। जिसके योग
से ब्रह्मज्ञान की इच्छा पूर्ण हो ऐसा महत्त्वपूर्ण प्रश्न उद्धव ने पूछा था। श्री शुक्राचार्यजी को तो वह बहुत अच्छा
लगा और इससे राजा परीक्षित की इच्छा भी पूर्ण हुई। उद्धव का यह प्रश्न सुनकर शुक्राचार्य आनन्द से डोलने
लगे। वे परीक्षित से बोले, राजा ! सावधान हो जाओ। उद्धव पर श्रीभगवान प्रसन्न हो उठे हैं। ब्रह्मज्ञान की अन्तिम
स्थिति मुख्यरूप से शान्ति ही है। इसलिये शान्ति और निवृत्ति का ही निरूपण वह अब चार अध्याय में करेंगे।