सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

अठारहवाँ अध्याय ४९१
प्रमुख लक्षण हैं। गृहस्थाश्रम के लिये जो धर्म बताया गया है उसे अन्य आश्रमधर्मी न करें। किन्तु अन्य आश्रम
के कुछ धर्म गृहस्थाश्रम वाले करें तो कोई हर्ज नहीं है।
ब्रह्मचर्यं तपः शौचं संतोषो भूतसौहृदम्।
गृहस्थस्याप्यृतौ गन्तुः सर्वेषां मदुपासनम्॥४३॥
गृहस्थ को निष्पाप होने के लिये आवश्यक जप और तप करना चाहिये और अंतःशुद्धि तथा बाह्यशुद्धि इन
दो शुद्धियों को अवश्य साधना चाहिये। मन की छटपटाहट को छोड़, जितना मिले उतने ही में संतोष मानना
चाहिये। सब का सुहृद समझ कर परोपकार करने की इच्छा रखनी चाहिये। गृहस्थाश्रम में भी ब्रह्मचर्य का यही
लक्षण है कि केवल ऋतुकाल में स्वस्त्री से रममाण हो। मुख्यरूप से मेरा भजन करना यह सभी का स्वधर्म है।
सभी वर्णों को और सभी आश्रमों को यही स्वधर्म है कि विषयों की आसक्ति छोड़ मेरा भजन करें। स्वधर्म से
मेरी भक्ति करने पर भक्तों को क्या प्राप्त होता है वह श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
इति मां यः स्वधर्मेण भजन्नित्यमनन्यभाक्।
सर्वभूतेषु मद्भावो मद्भक्तिं विन्दते दृढाम्॥४४॥
एकनिष्ठा से तथा स्वधर्म से मेरी भक्ति करने से समस्त भूतों में मेरी भावना दृढ़ होती है। सभी प्राणियों में
मेरी भावना पैदा होने पर, जिसके पैरों पर चारों मुक्तियाँ गिरती हैं वह मेरी चौथी भक्ति प्रकट होती है। असीम
[L

४९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उभरने लगती है और समस्त प्राणिमात्र में परमात्मा का ही भास होने लगता है और इस प्रकार परमशक्ति का
विकास होता है। परमभक्ति का विकास होने पर मेरे भक्त को मत्स्वरूप की प्राप्ति होती है। उसी स्वरूप का
लक्षण श्रीकृष्ण यथार्थ रीति से यथाक्रम बताते हैं। परमात्मा परमज्योति, परब्रह्म परतप्ती, परात्परप्रकृति, जिसे वेद
'परावर' कहते हैं, वही अज, अव्यय, अक्षर, अरूप, अनाम, अगोचर, अलवृक्ष्य, अतर्क्य, अपार और
अनंतस्वरूप, इस क्रम में निज स्वरूप निज प्राप्ति भक्तों को स्वधर्म स्थिति में प्राप्त होती है, 'नेति', 'नेति' कह
कर श्रुति भी वहाँ से लौट जाती हैं। (ऐसी स्वरूप स्थिति में भक्त पहुँच जाते हैं) इस प्रकार मत्स्वरूप होने पर
संसार की बाड टूट जाती है, नामरूप की बात खत्म हो जाती है और मत्स्वरूप से समरस हो जाने के कारण वे
अनायास 'मैं' ही बन जाते हैं। पूर्व में 'मैं' था और अब 'शिव' हो गया हूँ। इसका भी स्मरण नहीं रहता। इस
प्रकार का अनुभव मेरे भक्तों को होता है। संसार का अस्तित्व ही जब समाप्त हो जाता है तो फिर उसकी
पुनरावृत्ति कैसे होगी ? सारांश, स्वधर्म करने से ही मेरी प्राप्ति होती है, इसे ध्यान में रखो। अब स्वयं श्रीकृष्ण ही
उस स्वधर्म की महिमा का वर्णन कर रहे हैं। कृपया ध्यान देकर श्रवण करें।
वर्णाश्रमवतां धर्म एष आचारलक्षणः ।
स एवं मद्‍भक्तियुतो निःश्रेयसकरः परः ॥ ४७ ॥
अत्यन्त प्राचीन काल से चलता आ रहा स्वधर्माचार, जो सचमुच मोक्ष दिलाने वाला है, उसके आचरण से
सकाम लोग स्वर्गादि लोकों की कामना करते हैं। लेकिन वह स्वर्ग मिलने पर भी वहाँ से मृत्युलोक में जन्म
लेना ही पड़ता है। इस प्रकार मेरी भक्ति न कर लोग सकाम होकर स्वधर्म नष्ट कर देते हैं। ब्राह्मण को यदि दान
में हाथी मिला तो उसे खिलायेगा कौन इसलिये वह किसी को दे देता है और पोथियाँ ढोने के लिये बूढ़ा बैल
खरीदते हैं। इस प्रकार ब्राह्मण स्वधर्म की उपेक्षा करते हैं और स्वर्ग में भीख के दाने इकट्ठा करने जाते हैं। कोई
घर में कामधेनु बाँध दे तो उसका पोषण नहीं कर सकते यह कह कर मट्ठे के बदले में उसे किसी को दे देते हैं।
लेकिन इसमें कितनी हानि हुई इसे वे नहीं जानते हैं। उसी प्रकार मैंने ब्राह्मणों को अलग गायत्री मंत्र दिया था
जिसकी उपेक्षा कर वे जाने कौन से मंत्र जपते हैं और शूद्रों का सा व्यवहार करते हैं। वे सौर, शाक्त, गाणपत्य
आदि अनेक प्रकार की दीक्षा लेते हैं लेकिन गायत्री का अनुष्ठान नहीं करते। गायत्री का अनुष्ठान तो नहीं ही
करते, लेकिन उसके विपरीत काम करते हैं। पैसों के लिये ये ब्राह्मण गायत्री मंत्र का सारा श्रेय दूसरों को बेच
देते हैं। गायत्री मंत्र घर में होते हुए उसका भावार्थ ग्रहण नहीं करते और मूर्खों के द्वार पर भिक्षा माँगते फिरते
हैं। शस्त्रात्रों से भरे हुए रथ पर यदि कायर आदमी को बैठा दिया जाय तो वह रथ छोड़कर भाग जाने में ही
सुख का अनुभव करता है क्योंकि उसमें युद्ध करने का सामर्थ्य ही नहीं होता। उसी प्रकार मैं वेदरूप में नारायण
ब्राह्मणों के हृदय में वास करते हुए भी, उसकी महिमा न जानकर वेदों का किया हुआ पारायण बेच देते हैं।
स्वर्गफल की कामना कर अनेक प्रचण्ड यज्ञों का आयोजन करते हैं। सारांश, वे सकाम कल्पनायें स्वधर्म को
डुबो देती हैं। जिस वेद में कर्म का फल बताया गया है, वह वेद केवल मिथ्या ही नहीं है, बल्कि उस वेद में
सचमुच क्या प्रतिपादित किया गया है उसे बिना जाने व्यर्थ की बकवास करते रहते हैं। बालक दवा खा ले
इसलिये माँ उसे चीनी की चुटकी देती है लेकिन वह मुख्य उद्देश्य नहीं होता। उसका मुख्य उद्देश्य होता है पेट
का रोग दूर करना। उसी प्रकार वेद में जो फल बताया गया है उसका उद्देश्य स्वधर्म में रुचि उत्पन्न करना है
क्योंकि स्वधर्म से चित्त का मैल दूर होता है। लेकिन स्वधर्म छोड़कर सकाम कर्म करने पर उसमें भी बिना कष्ट

अट्ठारहवाँ अध्याय ४९३
किये क्षुद्र मनोरथ भी पूर्ण नहीं होता। जिस धन को देकर अमृत प्राप्त होता है, उसकी जगह मद्य खरीदने से
अधर्म होता है, मद बढ़ता है, पागलपन की हलचल करता है जिससे सारा संसार उस पर थूकता है। अपने पति
से रममाण होने पर पतिव्रता को परलोक प्राप्त होता है लेकिन यदि वह परपुरुष से रममाण होती है तो वह पतन
की ओर जाती है। जिह्वा अगर दुरुक्ती बोलती है तो यम मस्तक पर प्रहार करता है लेकिन यदि वह जिह्वा 'राम
राम' कहे तो हरिभक्तों से यम भी काँपता है। उसी प्रकार उत्तम जन्म लेकर सकाम कर्म करने से अत्यन्त दुःख
भोगना पड़ता है और बार-बार जन्म-मृत्यु भोगनी पड़ती है। लेकिन वही देह यदि स्वधर्माचरण करे तो सभी
कर्म समाप्त हो जाते हैं और जन्म-मरण के फेरे चुक जाते हैं। लेकिन यह मर्म कितने ही लोगों की समझ में
नहीं आता। स्वधर्म से भगवान की भक्ति सम्भव है यही इसका गूढ़ रहस्य है। उद्धव! यही बात मैं तुम्हें यथार्थ
ढंग से बताऊँगा। स्वधर्म पर आचरण करना अनिवार्य है, लेकिन उसमें फल की आशा छोड़नी चाहिये। इसमें
संकल्प न करने पर भी वह मुझे अर्पण होता है। अरे! यदि घर के मटके में मोतियों का ढेर मिल जाय तो फिर
ताम्रवर्णी नदी का समुद्र से मिलन स्थल खोजने की क्या आवश्यकता है? यदि अपने ही घर के वृक्ष कल्पवृक्ष
की तरह फल देने लगे तो अमरावती जाने की क्या आवश्यकता है? अथवा सद्गुरु का तीर्थ लेने पर पवित्रता
प्राप्त होती है तो फिर इधर-उधर के सैकड़ों तीर्थों की ओर दौड़ने की क्या आवश्यकता है? अथवा यदि ईश्वर
भावना से पिता की पूजा करने से मोक्ष प्राप्त होता है तो फिर ज्ञाता लोग देवी-देवताओं को क्यों भजें? उसी
प्रकार स्वकर्म करते समय ही निष्कर्मता प्राप्त होती है परन्तु उसी स्वधर्म में फल की इच्छा रखने पर प्राणी
अपने वास्तविक स्वार्थ से भटक जाते हैं। निर्विकल्प मन से स्वधर्मचरण करने का ही नाम है 'मेरा शुद्ध
भजन'। उसी भजन से प्रसन्न होकर मैं अपने भक्तों को विवेकयुक्त वैराग्य और ज्ञान देता हूँ। उसी ज्ञान से बुद्धि
पवित्र होती है। चित्त शुद्ध होता है तो मेरी 'परमभक्ति' उत्पन्न होती है और हे उद्धव! उसी भक्ति से भक्तों को
मेरे श्रेष्ठ स्वरूप की प्राप्ति होती है। इसलिये निष्काम स्वधर्माचरण ही मेरा उत्तम भजन है। उस भजन से ही जो
भक्तों में उत्तम होते हैं वे स्वयं पुरुषोत्तम होकर रहते हैं। इस प्रकार, स्वधर्म में ही हमें मुक्ति प्राप्त होती है यही
बात तुम्हें विस्तार से बतायी।
एतत्तेऽभिहितं साधो भवान् पृच्छति यच्च माम्।
यथा स्वधर्मसंयुक्तो भक्तो मां समियात् परम्॥४८॥
उद्धव! तुमने पूछा था कि स्वधर्म से मुक्ति कैसे प्राप्त होती है? और मैंने उत्तर दिया था, भक्ति से। स्वधर्म
हाथ में आते ही स्वकर्म का तत्काल विनाश होता है और संसार का सारा भ्रम दूर होता है। इस प्रकार स्वधर्म से
परमपद की प्राप्ति होती है। मुझे प्राप्त करना हो तो स्वस्वकर्म अर्थात् स्वधर्म का निष्काम भाव से आचरण करना
चाहिये। यह मर्म जिसकी समझ में आ गया, समझ लो पुरुषोत्तम उसके वश हुआ। स्वस्वधर्म जैसे पारस पत्थर
निर्विकल्प ढंग से प्राप्त होने पर उसे दूष्य पदार्थों में लगाते ही वे सारे पदार्थ चिन्मात्र सुवर्ण अर्थात् ब्रह्ममय ही हो
जाते हैं। स्वधर्म जैसे सूर्य का निष्कामता से अंतःकरण में उदय होते ही वह अज्ञानरूपी रात्रि को नष्ट कर
सदासर्वदा स्वप्रकाश से ही विचरण करता है। स्वधर्म का अमृत जो निष्काम भाव से सेवन कर पाते हैं उन्हें मैं
जन्म-मरण के जाल में फँसने ही नहीं देता। लेकिन जो स्वधर्म से विमुख हो जाते हैं उन्हें मेरी प्राप्ति नहीं होती।
वे मूर्ख सकाम होने के कारण करोड़ों जन्म तक असह्य दुःख भोगते रहते हैं। स्वधर्म से स्वकर्म करते समय यदि
निष्काम होने का मर्म मालूम हो जाय तो वे जन्म-मरण के जाल से बच कर परब्रह्मस्वरूप तक पहुँचते हैं। इस

४९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रकार संसार में स्वधर्म तारने वाला ही होता है। स्वधर्मरूप नौका पर बैठकर मेरे कितने ही भक्त संसार सागर पार
कर गये। लेकिन 'पार कर गये' यह कहना भी गलत है क्योंकि मेरी प्राप्ति की इच्छा से स्वधर्म का आचरण
करने पर संसार सागर बिलकुल सूख जाता है और मुझ परमात्मा से उनकी सामने ही भेंट होती है। निष्काम भाव
से होने वाले स्वधर्माचरण का इतना माहात्म्य है। भगवान को भी वह अत्यन्त प्रिय होने के कारण उन्होंने अनेक
प्रकार से यह बात उद्धव को समझायी। भागवत भक्तिप्रधान है, उसकी भक्ति स्वधर्मयुक्त है। इस स्वधर्म भजन से
ही समस्त श्रेष्ठ भक्तों का उद्धार हो गया। उस स्वधर्म कर्म का रहस्य और आत्मभजन भक्ति का भावार्थ श्रीकृष्ण
ने उद्धव को ग्यारहवें स्कन्ध में बतलाया। उस ग्यारहवें स्कन्ध की बातें मानों स्वधर्म कर्म की कसौटी है। श्री
जनार्दन की कृपादृष्टि से ही एकनाथ ने मराठी भाषा में टीका लिखी। यह काम जनार्दनजी ने ही किया और
काव्य में मेरा नाम लिख दिया और अन्त में इस निरूपण से तो उन्होंने 'मैं' और 'तू' का भेद ही समाप्त कर
दिया। विषय का विषयपन ही नष्ट कर दिया, भेद का भान उड़ा दिया और जीव-शिव का भाव समाप्त कर
दिया। जनार्दनरूप पिता ने हमारे लिये परब्रह्म खिलौना बना दिया। इसलिये उसके कारण जो-जो क्रियाएँ होती हैं
वे सब अपने आप स्वधर्म से ही घटती हैं। स्वभावतः स्वधर्म से कर्म निष्कर्म होता है और संसार ही परब्रह्म हो
जाता है। जनार्दन की यही बहुत बड़ी कृपा है। इसलिये एकपन छोड़ कर एका जनार्दन की शरण में गया।
इसलिये उनकी ही कृपा से स्वधर्म कर्म का निरूपण सम्पूर्ण हुआ।
इस प्रकार श्रीमद्भागवत महापुराण के एकादश स्कन्ध के श्रीकृष्णोद्धव संवाद का एकनाथकृत टीका का
'वानप्रस्थ संन्यास धर्म निरूपण' नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
ॐ तत्सत्-श्रीकृष्णार्पणमस्तु।
इति श्री भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णार्जुन संवादे
एकाकार टीकायां वानप्रस्थ संन्यास निरूपण नाम अष्टादशोध्यायः ॥ १८ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु।

उन्नीसवाँ अध्याय
हे ओंकाररूप सद्गुरु ! हे त्र्यंबक ! हे ब्रह्मगिरि पर वास करने वाले ! हे त्रिगुण, त्रिपुट का भेद करने वाले !
हे कामांतक गिरिजेश ! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारा अनुहत शब्दरूप डमरू का गजर चारों ओर सुनाई पड़ता है और
निरन्तर वेदानुवाद से वह कर्म, ज्ञान और भक्ति इन तीन विभागों में गरजता रहता है। तुम्हारे हाथ में जो खड्गसम
शस्त्र है वह जीवों का संहार करता है और अनंग का अंग जलाकर ही स्वस्वरूप प्राप्ति करा देता है। हे त्रिनयन
त्रिंबकलिंग। चित्प्रकाशगर्भा शंकर ! तुमसे ही (गोदावरी रूप) चिद्गंगा का प्रवाह बहता रहता है जो अपनी
पवित्रता से सारे संसार को पावन कर देता है। दो नेत्र तो स्पष्ट दिखाई ही देते हैं और तीसरा ज्ञाननेत्र गुप्त है।
इसलिये बिना नेत्र के ही दिखाई देने वाले तुम त्रिलोचन हो। तुम अपने शरीर पर, बोधरूपी चन्द्र धारण करते हो,
इसलिये तुम 'चन्द्रशेखर' हो और वास्तव में चन्द्रसूर्यादि सारा चराचर तुम्हारे ही कारण प्रकाशित होता है। 'भव'
की बड़ी ख्याति है किन्तु तुम्हारी चिच्छक्ति भवानी ही उस भव को प्रकाशित करती है। विष्णु तुम हो, ब्रह्मदेव
तुम हो और अन्त में संहार करने वाले रुद्र भी तुम ही हो। हे प्रलयकाल के प्रलयरुद्र ! हे चित्समुद्र शिवरूपा
सद्गुरो ! नामरूप का आकार मोड़कर तुम सारे जीवों को एकरूप कर देते हो। हे गुरुराया ! शिव-शिव कह कर
निजभाव से तुम्हारे पैरों में लगते ही तुम्हारे निजरूप दिखाने से गुरु शिष्य भाव विलीन हो जाता है। वह
निजस्वरूप एक बार दिखायी दे जाय तो फिर जीव किस बात का ? और सृष्टि भी कैसी ? तीन गुणों के साथ
त्रिपुटी ही समाप्त हो जाती है और स्वानंद से भेंट होती है। उस स्वानंद के उद्गार सँभाले नहीं सँभलते। उस
स्वानंद का सार ही है ग्यारहवाँ स्कन्ध। उसमें भी अत्यन्त गहन स्वानंदसुख का निरूपण जिसमें किया गया है
वह है उन्नीसवाँ अध्याय। वह शास्त्रप्रमाणों से भी सिद्ध है। वह निरूपण सुनाते ही परमानन्द उफन उठता है।
इसलिये एका जनार्दन से विनती करता है कि श्रोतागण मेरी ओर ध्यान दें। सत्रहवें और अठारहवें अध्याय में,
स्वधर्म कर्म से ही ब्रह्मप्राप्ति होती है इसलिये वर्णाश्रम के सारे प्रकार उद्धव को बताये। अब उन्नीसवें अध्याय में
जिस ज्ञान से आत्मज्ञान साध्य किया हो, उसका त्याग लक्षण स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं। जीवन्मुक्त के लिये कर्म-
कर्तव्यता-कारण नहीं होता, इसलिये उद्धव के 'यम', आदि प्रश्नों का उत्तर श्रीकृष्ण ही देंगे। शास्त्रयुक्त, पांडित्य
का ज्ञान अथवा उसने किया हुआ प्रपंच का मिथ्यत्व निरूपण वह सब आनुमानिक तथा किताबी ज्ञान है। उसमें
जरा भी तथ्य नहीं है। हमें पूर्व की ओर जाना है यह एक शुद्ध स्मरण है किन्तु दिशा भूल जाने पर वह पश्चिम
को ही पूर्व मानते लगता है; उसी प्रकार शाब्दिक शास्त्रज्ञान है। बोलते कुछ और हैं, करते कुछ और हैं इसलिये
साधक का कभी समाधान नहीं होता। वही दिशामूल समाप्त हो जाय तो जिस प्रकार वह पूर्व पूर्व की ही ओर
जाने लगता है उसी प्रकार अनुभव ज्ञान प्राप्त होने पर साधक को परमानन्द का नाम प्राप्त होता है। वह जिस
वेदान्त का श्रवण करता है, वह स्वयं ही होता रहता है। ऐसा होना यही आनुभविक ज्ञान का सच्चा और शुद्ध
लक्षण है यह ध्यान में रखो। ऐसा आनुभविक ज्ञान प्राप्त होने तक श्रवण और मनन नहीं छोड़ना चाहिये। इतना
ही नहीं, 'प्रत्यगावृत्ति' साधन अर्थात् आत्मानुसंधान का अभ्यास अवश्य करना चाहिये। अपरोक्ष ज्ञान प्राप्त होने
पर प्रपंच का भान मिथ्या लगने लगता है। विषयों पर पानी पड़ जाता है और कल्पना पिघल जाती है। जो पुरुष
यह करे उसे ही ज्ञान साधन का त्याग करना चाहिये। यही सारा निरूपण भगवान कर रहे हैं।

४९६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रीभगवानुवाच
यो विद्याश्रुतसम्पन्न आत्मवान् नानुमानिकः ।
मायामात्रमिदं ज्ञात्वा ज्ञानं च मयि संन्यसेत् ॥ १ ॥
(भगवान कहते हैं) वेदशास्त्रों में जो पारंगत; श्रवण मनन के अभ्यास से युक्त तथा जिन्हें स्वानुभव से
ब्रह्मविद्या साध्य है; लेकिन वह अनुभव ऐसा है जिसमें रस्सी को सर्प समझने का भ्रम अपने आप ही नष्ट हो
जाता है उसी प्रकार उसका भवभ्रम दूर हो जाता है; स्वांग करने वाले राजा-रानी जिस प्रकार प्रेम की झूठी
क्रीड़ा का ही अभिनय करते हैं उसी प्रकार प्रकृति पुरुष दोनों ही मिथ्या हैं यह वह जानता है। दीवार पर
अनेक प्रकार के चित्रविचित्र चित्र बनाये जाते हैं लेकिन जिस प्रकार वह वास्तव में एक दीवार ही रहती है,
उसी प्रकार समस्त चराचर एकरूप है यह वह जानता है; अथवा स्वप्न में अनेक प्रकार के कर्म दिखायी देने
पर भी जागृति में उसका कोई बन्धन नहीं होता, उसी प्रकार मैं यह जीव और प्राण हूँ और मैं यह कर्म करता
हूँ यह सब मिथ्या है यह जो जानता है; ऐसी स्थिति को कहते हैं, 'शुद्ध आत्मप्राप्ति' इसी को वास्तव में
'निजानुभव' कहते हैं। हे सात्वतकुल के भक्तशिरोमणि! उसकी एक और भी पहचान है। वह यह कि वहाँ
विषयोपभोग के बिना ही स्वानंद रहता है। इस प्रकार के अनुभव के बिना जो शाब्दिक ज्ञान होता है उसे केवल
'आनुमानिक' ज्ञान ही समझो, उद्धव! जिसके अनुभव में अनुमान का प्रवेश नहीं है, जो निरन्तर अपरोक्ष
साक्षात्कार में ही विचरण करता रहता है, ऐसे पुरुष को ज्ञान का साधन और वृत्तिरूप ज्ञान का त्याग करना
चाहिये। वैसे भी इसका अपने आप त्याग हो जाता है जिस प्रकार सूर्योदय होते ही चन्द्रमा के साथ नक्षत्रों का
तेज भी नष्ट हो जाता है, मारुति को आते देख नवचंडी (अहिरावण की देवी) भागने लगती है फिर अन्य भूतों
की क्या बात की जाय? उनके सामने खड़े होने का भी साहस नहीं होता। उसी प्रकार मेरे साक्षात्कार से उसे
वास्तव में कोई बाध्यता ही नहीं रह जाती। फिर उसकी निवृत्ति के बाद ज्ञान कैसे बचा रह पायेगा? मेरे
अनुभव में बन्ध और मोक्ष दोनों मिथ्या हैं। उद्धव! वहाँ साधन ज्ञान का कोई उपयोग नहीं है। परमात्मस्वरूप
में बंध और मोक्ष दोनों ही मायास्वरूप हैं। इसलिये वहाँ ज्ञान और ध्यान का त्याग न करने पर भी त्याग हो ही
जाता है। लेकिन ज्ञान का और ध्यान का त्याग होने पर भी ज्ञानी को मेरी नितांत प्रीति रहती है। वही प्रीति का
लक्षण स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
ज्ञानिनस्त्वहमेवेष्टः स्वार्थो हेतुश्च संमतः।
स्वर्गश्चैवापवर्गश्च नान्योऽर्थो मदृते प्रियः ॥ २॥
मुझ अद्वयानंदस्थिति रूप के प्रति ज्ञानी जनों में काफी प्रीति रहती है। उद्धव! उस प्रीति का लक्षण सुनो।
ज्ञानीजनों को प्रिय मैं स्वयंभू परमात्मा, ज्ञानियों का परम लाभ, उनकी जीवच्च कंठश्च निधि, ऐसा मैं पद्मनाभ हूँ।
ज्ञानियों का उत्तम स्वर्ग मेरे सिवा कोई है ही नहीं। उसी प्रकार ज्ञानियों का मोक्षभाग वह भी मैं निजात्मा श्रीरंग
हूँ। मैं परमात्मा नारायण ही ज्ञानियों का स्वधर्मसाधन हूँ अर्थात् ज्ञानियों को मेरे सिवा कुछ और दिखाई ही नहीं
देता। ज्ञानियों के लिये मेरे सिवा स्वर्गसुख या मोक्षसुख रह ही नहीं जाता। वे अपने शुद्ध भक्तिभाव से मेरे
सर्वव्यापी चिदात्म-स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं। ज्ञानियों का अर्थ, स्वार्थ, परमार्थ संब कुछ एक मैं पुरुषोत्तम ही
हूँ। इसलिये आद्य, अव्यय तथा अनंत ये मेरे निजसुख उन्हें प्राप्त होते रहते हैं। ज्ञाताओं को मुझसे प्रीति रहती है,
इसलिये वे भी मुझे प्रिय हैं। यही बात श्रीकृष्ण स्वयं उद्धव को बता रहे हैं।

उन्नीसवाँ अध्याय ४९७
ज्ञानविज्ञानसंसिद्धाः पदं श्रेष्ठं विदुर्मम ।
ज्ञानी प्रियतमोऽतो मे ज्ञानेनासौ बिभर्ति माम् ॥ ३ ॥
ज्ञान और विज्ञान की सम्पदा प्राप्त किये बिना मेरी प्राप्ति अर्थात् स्वस्वरूपस्थिति कभी भी किसी को प्राप्त
नहीं हो सकती। गुरुमुख से शास्त्रशुद्ध श्रवण करने से जो प्राप्त होता है, उसे 'ज्ञान' कहते हैं; और उसके
प्रत्यक्षानुभव को 'विज्ञान' कहते हैं। उसका भी लक्षण सुनो। स्वयं तैयार की हुई रसोई जब तक चख कर नहीं
देखी जाती तब तक वह कड़वी है, मधुर है या नमक अधिक है यह ठीक से नहीं मालूम होता। इस स्थिति को
ज्ञाता लोग 'ज्ञान' कहते हैं और उसके रस की माधुरी स्वयं चख कर देखने से जो स्थिति प्राप्त होती है उसे
'विज्ञान' कहते हैं। सारांश, मेरे सर्वोत्तम पद की प्राप्ति के लिये 'ज्ञानविज्ञान' की सम्पत्ति ही कारणीभूत है। इस
प्रकार जो मेरा वास्तविक स्वरूप जानते हैं उनसे मुझे अनन्य प्रीति होती है। वेद, शास्त्र अथवा युक्ति से मेरा
स्वरूप नहीं जाना जा सकता। उसका जिसे आकलन होता है उसके सिवा मुझे कुछ प्रिय नहीं है। उसका लक्षण
यही है कि उसके प्रत्येक पग पर मैं अपना देह आगे करता हूँ। इतना ही नहीं, बल्कि मैं उस पर अपना सब कुछ
न्योछावर करता हूँ। उसे जिस वस्तु की आवश्यकता पड़ती है उसे मैं बिना माँगे ही दे देता हूँ और उसमें यदि
कोई बाधा आती हो तो स्वयं उसे दूर करता हूँ। उसे सांसारिक आँधी का कहीं कोई कष्ट न हो इसलिये मैं स्वयं
उसका सामना करता हूँ। इतना मैं उस पर आसक्त हो उठता हूँ। ज्ञानी जिस ज्ञान से मुझे प्रिय हैं, उस ज्ञान की
पवित्र कीर्ति यथार्थ ढंग से भगवान आत्मज्ञानपूर्वक उद्धव को बता रहे हैं।
तपस्तीर्थे जपो दानं पवित्राणीतराणि च।
नालं कुर्वन्ति तां सिद्धिं या ज्ञानकलया कृता ॥ ४ ॥
सारे साधनों से जो शुद्धि नहीं होती, वह निश्चय ही ज्ञान के एक अंश से होती है। हे बुद्धिमान उद्धव! इस
ज्ञानशुद्धि की महिमा सुनो। पंचाग्नि साधन से तप किया अथवा गंगा, त्रिवेणी आदि तीर्थों के दर्शन किये, अनेक
मंत्रों का जप किया अथवा गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण आदि का दान किया; अथवा और भी अन्य पवित्र
'स्वधर्मकर्मादि' आचार किये, अथवा 'योग', 'अग्निहोत्र', नाना प्रकार के 'यज्ञ' आदि अत्यन्त शुद्ध और पावन
करने वाले जो कर्म किये वे तपादिक साधन हैं उनकी शुद्धि महान है, लेकिन उनकी पवित्रता ज्ञान के अल्पांश
भी नहीं है। आधे क्षण की ज्ञाननिष्ठा से जो पवित्रता प्राप्त होती है उसे तपादि साधन नाना साधनों से कल्पांत में
भी प्राप्त नहीं कर पायेंगे। ऐसा जो पवित्र ज्ञान है उसे मुख्य रूप से धारण कर मेरा भजन करें यही बात श्रीकृष्ण
निरूपित करते हैं।
तस्माज्ज्ञानेन सहितं ज्ञात्वा स्वात्मानमुद्धव।
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो भज मां भक्तिभावितः ॥ ५ ॥
इसलिये हे उद्धव ! ऐसा जो ज्ञान का पवित्र प्रवाह है, उसमें निजभाव को प्रक्षालित कर, जीव
परमात्मस्वरूप ही है यह पहचान लें। जीव और परमात्मा दोनों एक हैं यह जानना 'ज्ञान' है और ऐक्यभाव से
परमात्मसुख का भोग करना 'विज्ञान' है। इस प्रकार ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न होकर मेरा भजन करें। उद्धव ! मेरे उस
भजन के लक्षण सुनो। यह यत्र-तत्र जो कुछ भी देखता है वहाँ उसे मेरे सिवा कुछ भी नहीं दिखायी देता। फिर
वह उन-उन स्थानों पर अनन्य भाव से भजन करने लगता है। अहोरात्र चलने वाले मेरे ऐसे भजन में कभी खण्ड
नहीं पड़ता। जागृति हो, स्वप्न हो अथवा सुषुप्ति हो मेरे भजन में बाधा नहीं आती। मुझे भूल कर वह जहाँ भी

४९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जाता है, वहाँ वह मुझे ही देखता है। इस प्रकार ऐसा नहीं कि विस्मरण को ही मृत्यु आती है; अपितु स्मरण भी
नष्ट हो जाता है। इस प्रकार जो ज्ञानविज्ञानसम्पन्न लोग हैं उन्हें मेरे सिवा कुछ भी दिखायी नहीं देता। उसी प्रकार
अनन्य भजन करने का ही नाम 'शुद्धभक्ति' है यह जान लो। पूर्व में भी बड़े-बड़े मुनिवर्यों ने इसी प्रकार मेरी
एकनिष्ठ भक्ति कर मुझे प्राप्त किया। उसके बारे में भी बताता हूँ।
ज्ञानविज्ञानयज्ञेन मामिष्ट्वाऽऽत्मानमात्मनि।
सर्वयज्ञपतिं मां वै संसिद्धिं मुनयोऽगमन्॥ ६॥
ज्ञानधन से अत्यन्त सम्पन्न तथा विज्ञान से परम पवित्र ऐसे जो ब्रह्मस्वरूप ब्राह्मण हैं वे यज्ञ के द्वारा मेरा
यजन करते हैं। वे अपने हृदय मन्दिर में (अथवा यज्ञमण्डप में) विकल्परूपी जमीन खोद कर श्रद्धा के आकार
से काम, दम और विरक्ति ये तीन कुण्ड तैयार करते हैं। उसमें क्षर और अक्षर (जीव और शिव) इन दो अरणियों
(अग्नि उत्पन्न करने वाली लकड़ियाँ) को लेकर गुरुमन्त्र से मंथन कर निकाला हुआ निर्धूम, सूक्ष्म अग्नि उस
कुण्ड में डाल कर उसे प्रज्वलित करते हैं। शुद्धसत्त्वरूपी घृत में रजतमादि होमद्रव्य मिलाकर, युक्ति के मंत्रों से,
वैराग्यरूपी स्रुवा से (लकड़ी की करछुल) उसमें आहुति देते हैं। तदुपरान्त विद्यारूप तीक्ष्ण अस्त्र हाथ में ले कर,
संकल्परूपी पशु को मार कर यज्ञ के स्वामी अनन्त को उस निजबोध से सन्तुष्ट करते हैं। उसमें पूर्णाहुति के
लिये जीवभाव की आहुति देने से यज्ञभोक्ता अर्थात् मैं नारायण सन्तुष्ट होता हूँ। इस प्रकार मेरा यजन कर अनेक
मुनीश्वर जन्म-मरण के चक्र से छूट कर मेरे स्वरूप तक पहुँच गये। बड़े-बड़े ऋषियों ने जो सिद्धि प्राप्त कर
ली वही उद्धव को भी प्राप्त हो सके इसलिये कृपासागर श्रीकृष्ण उसे प्रपंच का निषेध कर वस्तुतत्त्व का निरूपण
कर रहे हैं।
त्वय्युद्धवाश्रयति यस्त्रिविधो विकारो मायान्तराऽऽपतति नाद्यपवर्गयोर्यत्।
जन्मादयोऽस्य यदमी तव तस्य किं स्युराद्यन्तयोर्यदसतोऽस्ति तदेव मध्ये॥ ७॥
'मैं उद्धव हूँ' यह कहते समय तुम सचमुच कौन हो? तो तुम्हें तुम्हारे स्वरूप की कथा सुनाता हूँ। जन्म,
स्थिति और मृत्यु इन तीन विकारों का कारण त्रिगुण हैं और उनकी अधिष्ठात्री माया है; लेकिन उसे तुमसे ही
गति मिलती है। माया आदि से लेकर सभी कार्यों में अंतर्बाह्य तुम्हारा ही आश्रय है। तुम्हारे ही कारण उन्हें
चपलता अर्थात् चलन वलन (हिलना डोलना) प्राप्त हुआ है। तुम उनसे भिन्न चिदात्मा हो। मेरे कारण गुणकर्मों
में चलनता आयी यह कहें तो प्रपंच में सत्य आयी; वास्तव में यह सारा संसार मायामय है तथा मृगजाल का
आभास है। जो भी कुछ दिखाई देता है वह सब मिथ्या है, सत्य नहीं है। प्रपंच का सारा भान तो मृगजल की
तरह है। तुम जन्म-मरण से अलग हो, त्रिगुणों को स्पर्श न करने वाले तथा सचमुच ही प्रपंच से अलिप्त हो।
कैसे? तो सुनो। प्रपंच से अलिप्त रहने का तरीका यही है। उस युक्ति की परम प्रतीति यही है कि उत्पत्ति, स्थिति
और लय इनमें प्रपंच का वास्तविक अस्तित्व ही नहीं है। उत्पत्ति से पूर्व प्रपंच नहीं होता; और अन्त में भी कुछ
शेष दिखायी नहीं देता। बीच के काल में जिसका भास होता है वह भी मायामय होने के कारण मिथ्या है। प्रपंच
के, अर्थात् सृष्टि के पूर्व परब्रह्म ही रहता है, अंतकाल में भी निरूपम वही शेष रहता है और सृष्टि के
स्थितिकाल में भी ब्रह्म ही रहता है, भ्रमिष्ट लोगों को अवश्य ही संसार का मिथ्या भ्रम होता है। सूर्य के पहले
भी मृगजल का अस्तित्व नहीं होता और अस्त के बाद भी शेष नहीं रहता; बीच के काल में भी जो आभास होता
है उसमें भी पानी का अंशमात्र भी नहीं होता। रज्जु सर्प भी पहले रस्सी के ही रूप में रहता है और अन्त में भी

उन्नीसवाँ अध्याय ४९९
रस्सी के ही रूप में शेष रहता है। बीच के अन्तराल में जब सर्प का भास होता है तब भी वही रस्सी ही रहता
है। हे उद्धव! इस प्रकार आदि और अन्त का विचार करें तो ब्रह्म ही सत्य है, प्रपंच (संसार) मिथ्या है और
वेदशास्त्र भी इससे सहमत हैं। इस प्रकार इस प्रपंच में कितना भी परिवर्तन हुआ और जन्म-मरण के करोड़ों
चक्र चलते रहे तो भी हे उद्धव! उनसे तुम्हारा सम्पर्क ही नहीं होगा। क्योंकि तुम प्रवृत्ति और निवृत्ति इन दोनों
तीरों से नित्यमुक्त ही हो। उद्धव! निर्गुण, निःसंग, निर्विकार, अज, अव्यय, अक्षर, अनंत और अपार जो ब्रह्म है,
वही सचमुच तुम हो। भगवान का यह भाषण सुनकर उद्धव ने मन में गाँठ बाँध ली। हर्ष उसके मन में समा नहीं
रहा था। उसे अपने लिये यह सृष्टि छोटी मालूम होने लगी। 'तुम ब्रह्म हो' ऐसा श्रीकृष्ण ने कहते ही उद्धव
खुशी से नाचने लगा। यह देख कर श्रीकृष्ण को समाधान हुआ। श्रीकृष्ण अपने मुख से 'तुम पूर्ण ब्रह्म हो' ऐसा
कहते हैं, इससे वह स्वयं धन्य समझने लगा। मेरा जैसा भाग्यवान और कौन है? ऐसा विचार मन में आकर
उद्धव ने श्रीकृष्ण के चरणों का वन्दन किया। 'तुम स्वयं ही परब्रह्म हो' इसका अर्थ वह श्रीकृष्ण से पूछने लगा।
उद्धव उवाच
ज्ञानं विशुद्धं विपुलं यथैतद् वैराग्यविज्ञानयुतं पुराणम्।
आख्याहि विश्वेश्वर विश्वमूर्ते त्वद्भक्तियोगं च महद्विमृग्यम्॥८॥
(उद्धव बोले) हे विश्ववसेना! हे विश्वेश्वर! विश्वमूर्ते! विश्वंकर श्रीकृष्ण! जिसके योग से
महासाक्षात्कार हो ऐसा निश्चित ज्ञान मुझे बतायें। जो केवल ज्ञान देते रहते हैं उन्हें मैं निरा मूर्ख ही समझता हूँ।
इसलिये जिससे जीव का बन्धन टूट जाये ऐसी प्रखर वैराग्ययुक्ति मुझे बतायें। क्योंकि ज्ञान के बिना वैराग्य अन्धा
रहता है। वह शिलाओं से टकरा कर गिर पड़ता है और वैराग्य के बिना लंगड़ा होता है। उसे युक्ति मालूम रहती
है लेकिन उसका पुरुषार्थ काम नहीं करता। इसलिये विवेक और वैराग्य ये दोनों यदि हृदय मन्दिर में प्रवेश करें
तभी विषयावस्था छोड़कर जीव 'ब्रह्म मैं ही हूँ' यही समझ कर विचरण करने लगता है। ज्ञान को जब तक
विज्ञान का साथ नहीं मिलता तब तक जीवत्व का विनाश नहीं होता। इसलिये जो जीव और शिव दोनों का ही
निवारण करे ऐसा विज्ञान मुझे बतायें। जिसमें असंभावना का दोष रत्ती मात्र भी नहीं रहता, उसी को 'शुद्ध ज्ञान'
कहते हैं और जिसमें 'विपरीत भावना' बिलकुल नहीं रहती उसी को ज्ञाता लोग विपुल कहते हैं। ऐसा अत्यन्त
शुद्ध और विपुल ज्ञान, उससे युक्त वैराग्य और विज्ञान और उसमें भी श्रेष्ठ तुम्हारा जो भजन हो वह कृपया मुझे
बतायें। हे कृपामूर्ति श्रीकृष्ण! ज्ञान-विज्ञान-वैराग्य सहित तुम्हारी प्राचीन भक्ति के बारे में भी मुझे निश्चित रूप
से बतायें। तुम्हारी श्रेष्ठ भक्ति की खोज बड़े-बड़े साधु महात्मा भी कर रहे हैं और जीव प्राण लेकर धरना देकर
बैठे हैं। उस भक्ति के बारे में मुझे बतायें। तुम्हारी उत्तम भक्ति करने से त्रिविध तापों का भी क्षय होता है और
मुक्ति प्राप्त होती है। इसलिये उद्धव विनती कर रहा है।
तापत्रयेणाभिहतस्य घोरे संतप्यमानस्य भवाध्वनीश।
पश्यामि नान्यच्छरणं तवाङ्घ्रिद्वन्द्वातपत्रादमृताभिवर्षात्॥९॥
जो त्रिविध ताप से दग्ध रहते हैं, कामक्रोध जिन्हें जर्जर कर देते हैं; आशा और तृष्णा में जो डूबे रहते हैं
और जन्म-मरण में लिप्त रहते हैं; संसार के अत्यन्त विकट मार्ग पर जो दुःख के साथ भी नहीं चल पाते, ऐसी
यातना भोगने वाले पुरुष के लिये हरि के पदकमल में ही आश्रय है। तुम्हारे चरण कमल के सिवा शरण जाने के
लिये कोई अन्य स्थान ही दिखायी नहीं देता इसलिये काया, वाचा और मन से मैं भक्तिभाव से तुम्हारी ही शरण

५०० श्रीमद् एकनाथी भागवत
आया हूँ। छत्र केवल एक ही ताप दूर करता है लेकिन तुम्हारे चरण का छत्र कुछ विशेष ही है। वह त्रिविध तापों
के साथ सारा संताप दूर कर संसार को पापरहित कर देता है। कोई अपने ही मन से तुम्हारी शरण में आया। कोई
बैर करके ही तुम में विलीन हो गया, किसी ने भावार्थ से तुम्हारा भजन किया तो किसी ने भयभीत होकर तुम्हारा
स्मरण किया; कुछ तुम्हारे कुल के होने के कारण तुम्हारे सुहृद बन गये, कुछ स्नेह के कारण तुमसे प्रेमबद्ध हो
गये, कुछ काम तंत्र से अंग-संग कर तर गये तो कोई आज्ञाधारी सेवक बन कर रहे। सारांश, अनेक प्रकारों से
विचित्र ढंग से जिन्होंने तुम्हारे चरण छत्र का आश्रय लिया, उनके सामने संसार भय नहीं टिक सकता। भक्त हो,
बैरी हो अथवा अपना हो उन सबको ही तुम अपना निजपद देते हो। तुम्हारी उदारता महान है। तुम सबके स्वानंद
बोध हो। होम हवन करके अग्नि को जो भी अर्पण किया जाता है, उसे अग्नि अपने जैसा कर देता है, यदि
गलती से भी उसमें कुछ गिर जाय तो उसकी भी वही गति होती है। इस प्रकार, हे श्रीकृष्ण! किसी कारण से भी
जो तुम्हारे पास आते हैं, उनकी सांसारिक पीड़ा दूर कर उन्हें समत्व से तुम अपने पद तक पहुँचाते हो। तुम्हारा
चरणरूप छत्र त्रिविध तापों का निवारण कर सदा सर्वदा परमामृत की वर्षा कर रहा है। इसीलिये मैं उनकी शरण
में हूँ। जिस संसार के भय से मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ उस भवभय का स्वरूप उद्धव स्वयं ही बता रहे हैं।
दष्टं जनं सम्पतितं बिलेऽस्मिन् कालाहिना क्षुद्रसुखोरुतर्षम् ।
समुद्धरैनं कृपयाऽपवर्ग्यैर्वचोभिरासिञ्च महानुभाव ॥ १०॥
लोग संसाररूपी गुफा में फँस कर गृहदारारूप कुएँ में गिर गये हैं। उसमें भी कालरूपी सर्प ने काट लिया
है। वे वेदनायें तो और भी भयानक हैं। उस कालरूप सर्प का विष क्षण-प्रतिक्षण शरीर में चढ़ रहा है; फिर भी
लोग अभिमान के भुलावे में विषयसुख की इच्छा करते ही हैं। कालसर्प का प्रताप कुछ विचित्र ही है। उसने विष
जैसे कडुए विषय को भी मधुर बना दिया है और अत्यन्त मधुर परमार्थ को जीव भाव से कडुआ बना दिया है।
विषय विष से भी ज्यादा भयंकर हैं। विष एक ही बार मारक होता है किन्तु विषय बार-बार वार करते रहते हैं।
कालसर्प ने लोगों पर इतनी अधिक मोहिनी डाल रखी है। विषय एक शुद्ध विष है। मूर्ख लोग ही उसकी ओर
मोहित होते हैं और विषयों की तृष्णा बढ़ाते हैं। ऐसे जो दुःख में डूबे हुए लोग हैं उनका उद्धार करें। इस पर आप
शायद यह कहेंगे कि जब वे साधन करेंगे तब मैं उनका उद्धार करूँगा। किन्तु हे स्वामिन! जब तक आपकी कृपा
नहीं होती, तब तक साधन भी व्यर्थ हो जाते हैं। हे श्रीकृष्ण! तुम्हारी कृपा हो जाय तो संसार की व्यथा स्पर्श भी
नहीं करेगी। हे कृपानिधि! हे अनंता, कृष्णनाथा! मेरी विनती सुनें। तुम्हारी मोक्षफल रूपी जो कथाएँ हैं, उस
कथामृत का सिंचन कर सबका उद्धार करें। तुम्हारे मुख से कथामृत का एक बिन्दु भी प्राप्त हुआ तो वह संसार
सर्प का विष उतार कर स्वानंद-सुख उत्पन्न करता है। अब आपका आग्रह सभी लोगों का उद्धार करने के प्रति
क्यों है? लोग मेरी जैसी विनती नहीं करते हैं। ऐसी कल्पना यदि आपके मन में आ रही हो तो मेरा यह कहना है
कि जैसे कोई अन्धा व्यक्ति यदि अन्धे कुएँ में पड़ा दिखाई दे तो देखने वाले को उसको बाहर निकाल कर अच्छे
मार्ग पर लगाना चाहिये, उसी प्रकार ज्ञानंध लोग दुःख में डूबते रहते हैं, उनका उद्धार करें ऐसी मेरी आपसे
प्रार्थना है। अब यह पूछोगे कि ये लोग अन्धे कैसे हो गये? तो उन्हें संसाररूपी सर्प ने ग्रस लिया है इसलिये वे
आत्मसुख भूल कर विषयसुख के मोह में फँस गये हैं। श्रीकृष्ण! सचमुच आप ऐसे दीनजनों का उद्धार करें।
इतना कह कर उसने श्रीकृष्ण के चरण पर मस्तक रख दिया और प्रार्थना की। भक्त की ऐसी विनती सुनकर भक्तों
का प्रभु प्रसन्न हो उठा। वह अब उसे एक उत्तम सभा का ज्ञान देगा। उस सभा में मुख्य रूप से श्रीकृष्ण, देवर्षि

उन्नीसवाँ अध्याय ५०१
और ब्रह्मर्षि तथा तपोराशि और ज्ञाननिधि आदि राजर्षि एकत्र थे। उस सभा में ज्ञान का विषय श्रीकृष्णनाथ उद्धव
को बताएंगे। तो श्रोतागण कृपया ध्यान दें, ऐसी एकाजनार्दन विनती करता है। ज्ञान और वह भी पुरातन। उसका
वक्ता कौन है ? तो स्वयं भगवान हैं। इसलिये श्रोता उद्धव ध्यान देकर श्रीकृष्ण की बातें सुनने लगा।
श्रीभगवानुवाच
इत्थमेतत् पुरा राजा भीष्मं धर्मभृतां वरम्।
अजातशत्रुः पप्रच्छ सर्वेषां नोऽनुशृण्वताम्॥ ११॥
(भगवान बोले) जिस प्रकार तुमने मुझसे ज्ञान पूछा था, उसी प्रकार भीष्माचार्य जब शर पंजरी पर पड़े
अन्त समय काट रहे थे, उस समय धर्मराज ने भी उनसे यही प्रश्न किया था। अब धर्मराज की महानता सुनो।
संसार में उसका कोई शत्रु नहीं था। वह निश्चयात्मक और सत्य बोलनेवाला था। ऋषी के मंत्र से उसका जन्म
हुआ था। पाण्डवों का संहार करने के लिये स्वयं वज्रदेही होने के उद्देश्य से दुर्योधन ने धर्मराज से उपाय पूछा था
लेकिन धर्मराज झूठ नहीं बोला। ऐसे ईर्षाहीन और परमपवित्र राज युधिष्ठिर ने अत्यन्त आदरपूर्वक महाशूरवीर
भीष्माचार्य से विनती की जो दृढ़निश्चयी होते हुए अत्यन्त धार्मिक था, स्वधर्म का नियम से पालन करने वाला
था जो आजीवन ब्रह्मचर्य से रहा और बड़े-बड़े योद्धाओं को भी जो वन्दनीय था, गुरुत्व की मर्यादा को भग्न कर
जिसने परशुराम से युद्ध किया; लेकिन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने के लिये जिसने काशीराज की लड़की का
अंगीकार नहीं किया। धनुर्विद्या में परशुराम उसका गुरु था, प्रतिज्ञा कर जब उसे समरभूमि में जीता तो उसने
सन्तुष्ट होकर अपना गोत्रदान किया। इतना ही नहीं, अपितु परशुराम और भी अधिक प्रसन्न हो उठे और बोले कि
मेरे ब्रह्मचर्य व्रत का ऐसा निश्चय है कि हे भीष्म ! तुम्हें काम की कभी बाधा नहीं होगी (अपने बाप को संतोष
प्रदान करने के लिये उसने उसे अपना यौवन प्रदान किया और स्वयं वार्धक्य स्वीकार कर शांतनू को सुखी
किया) तब पिता ने भी उसे आशीर्वाद दिया कि "हे बुद्धिमान् भीष्म ! सुनो। वार्धक्य में शक्ति क्षीण होने की
विपत्ति तुम पर नहीं आयेगी।" इसलिये जैसे-जैसे उस पर वार्धक्य की छाया पड़ने लगी वैसे-वैसे उसका प्रताप
बढ़ता ही चला गया। काल की शक्ति रूक गयी। वह भीष्म को क्षीण नहीं कर सका। इसलिये उसने अपने पैरों
में काल, काम और परशुराम इन तीनों में ही चिह्न बाँध लिये। 'धर्मनिष्ठों में श्रेष्ठ' था इसलिये भीष्म को
धर्मभृतांवर यह नाम शोभा दे रहा था। जिसकी प्रतिज्ञा से कृष्ण को भी हार माननी पड़ी और उन्हें शस्त्र उठाना
पड़ा। उसकी प्रतिज्ञा की ऐसी योग्यता थी। भजन मर्यादा तोड़े बिना गोविन्द से युद्ध किया और मुकुन्द से वचन
भंग कराकर उनके चरणविन्द में पड़ गया। फिर प्रण पूरा कर उसने शस्त्रास्त्र फेंक दिये और मर्मस्थल पर शत्रु
के घाव लगने पर भी पुनः शस्त्र नहीं उठाया। बाणों ने मर्मस्थल फोड़ने पर अत्यन्त व्याकुल होने पर भीष्म ने
स्वयं निश्चय किया और देहत्याग के लिये सिद्ध हो गया। लेकिन उस समय दक्षिणायन चल रहा है यह सुनकर
उसने काल को दूर कर दिया और अपने शरीर की रक्षा की ओर फिर अपने निश्चय के अनुसार उसने शरपंजर
पर शयन किया और बड़े-बड़े ऋषिसमुदाय के परिवार में धर्मराज ने उससे प्रश्न किया। हम सबके सामने
युधिष्ठिर ने जो कथा पूछी, वही प्राचीन कथा तुम्हें सुनाता हूँ।
निवृत्ते भारते युद्धे सुहृन्निधनविह्वलः।
श्रुत्वा धर्मान् बहून् पश्चान्मोक्षधर्मानपृच्छत ॥ १२ ॥
मैं श्रीकृष्ण दोनों में सन्धि कराने गया था किन्तु दुर्योधन ने उसे नहीं माना। व्यास ने भी जब उसका निषेध

५०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
किया तो वह युद्ध के लिये तैयार हो गया। सारांश दैवयोग से कौरव पाण्डवों के युद्ध में दुर्योधनादि बैरी परिवार
सहित मारे गये। युद्ध समाप्त हो जाने के बाद धर्मराज राजसिंहासन पर बैठा, तब उसके अंतःकरण में विचार
उठा कि "पृथ्वी पर महापातकी एक मैं ही हूँ।" मैंने उसे राज्य पर बिठाया तो वह बोला, मैंने अनेक ब्राह्मण
गुरुओं को मारा, कर्ण दुःशासन को मैंने मारा, और राजा दुर्योधन भी मेरे हाथों मारा गया। यहाँ वास्तव में
उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकर्त्ता एक ईश्वर ही होते हुए, धर्मराज इन सबका 'कर्त्ता मैं हूँ' ऐसे कहने लगा।
देहाभिमान के कारण वह अत्यन्त पश्चात्ताप से स्वयं को अपने ही कुलगोत्र का विनाश करने वाला महापातकी
कहने लगा। तब उसका समाधान करने के लिये मैं भीष्मनिर्वाह का मौका पाकर उसे उनके पास ले गया और
उससे प्रश्न पुछवाये धर्म ने किये हुए प्रश्न अब सुनो। उसने 'राजधर्म' पूछा; 'दानधर्म' पूछा; आपद्धर्म पूछा और
मुख्य रूप से सबसे उत्तम 'मोक्ष धर्म' भी पूछा। वही अब सुनो।
तानहं तेऽभिधास्यामि देवव्रतमुखाच्छ्रुतान्।
ज्ञानवैराग्यविज्ञानश्रद्धाभक्त्युपबृंहितान्॥ १३॥
भीष्म के मुख से निकले वे अति उत्तम मोक्षधर्म मैंने श्रवण किये। उनके योग से संसार का भ्रम दूर होता
है और सारा कर्म दग्ध हो जाता है। ज्ञान, विज्ञान, श्रद्धा, भक्ति, अनित्य की नश्वरता तथा वैराग्यस्थिति आदि के
सम्बन्ध में भीष्म ने धर्म को बताया। वही मैं तुम्हें यथार्थ रीति से बताता हूँ। भीष्म को 'देवव्रत' कहते हैं। इसका
कारण वह भगवान पर चित्त रखकर, निश्चयपूर्वक आत्मानुसंधान धारण कर, स्वस्थ अंतःकरण से शरपंजर पर
लेटा हुआ था। उसने मोक्षधर्म बतलाया। उसमें मुख्य रूप से प्रथम 'ज्ञान' बतलाया। वही उत्तम ज्ञान पुरुषोत्तम
सुना रहे हैं, श्रवण करें।
नवैकादश पञ्च त्रीन् भावान् भूतेषु येन वै।
ईक्षेताथैकमप्येषु तज्ज्ञानं मम निश्चितम् ॥ १४॥
प्रकृति, पुरुष, महत्तत्त्व, पंचतन्मात्रा अर्थात् पाँच सूक्ष्म भूत और अहंकार आदि मिलाकर तत्त्वों की संख्या
नौ है। कुछ लोगों के अनुसार वह 'ग्यारह' है, अर्थात् पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और एक मन और पाँच
अर्थात् पंचमहाभूत होते हैं और 'तीन' अर्थात् सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण होते हैं। इन सब तत्त्वों की संख्या
मिलाने पर 'अट्ठाईस' होती है। ये सारे तत्त्व सभी प्राणिमात्र में समसमान भाव से विचरण करते रहते हैं। ब्रह्मदेव
से लेकर स्थावर तक में ये सारे तत्त्व समान रूप में भरे हुए हैं। उसी प्रकार इनमें 'जीवचैतन्य' भी समसमान रूप
में ही प्रतिबिम्बित हुआ है और यही सबका नाम, रूप और अभिमान प्रकाशित करता है। जलाशय में, कुएँ में
अथवा समुद्र में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब एक जैसा ही होता है, उसी प्रकार ब्रह्मदेव से लेकर मक्खी तक सबके
शरीर में जीव भी एक समान ही होता है। प्राणिमात्र में चैतन्य समसमान होने के कारण सबका आत्मा एक है यह
समझना यही 'शुद्ध ज्ञान' है और मेरा भी यही मत है। अब विज्ञान का भी लक्षण तुम्हें बताता हूँ। इसे श्रीकृष्ण
आधे श्लोक में वर्णन कर रहे हैं। पहले से ही देखते रहने के अनुसार व्यापक परब्रह्म से देहादिक सारे तत्त्व भरे
हुए हैं यह वह निश्चित रूप से देखता है। जिस प्रकार घटादिकों में आकाश ही व्याप्त रहता है, उसी प्रकार सारे
संसार में चिदाभास ही व्याप्त है। ऐसा शुद्ध ज्ञान ज्ञेयप्राप्ति का कारण होता है और ज्ञेय प्राप्त होते ही वह ज्ञान
वृत्ति के साथ लुप्त हो जाता है। (यही विज्ञान है) वह केवल ज्ञान से ही जाना जाता है इसलिये उसे 'ज्ञेय' कहते
हैं। और ज्ञेय प्राप्त होते ही जिस प्रकार सूर्य के तेज से जुगनू शरमा जाता है उसी प्रकार वह ज्ञान भी लज्जित हो

उन्नीसवाँ अध्याय ५०३
उठता है। नमक पानी में मिलने पर उसका स्वभाव ही नष्ट हो जाता है। उसी प्रकार ज्ञेय प्राप्त होने के बाद ज्ञान
का ज्ञातापन ही समाप्त हो जाता है। ज्ञेय की यथार्थ प्राप्ति होने के बाद, स्वरूप में केवल चिन्मात्रता ही रह जाती
है, फिर व्याप्य-व्यापक अथवा साधक-बाधक जैसी बात नहीं रह जाती। सूर्योदय होने के बाद जिस प्रकार
चन्द्रमा नक्षत्रों के साथ लुप्त हो जाता है, उसी प्रकार ज्ञेय की प्राप्ति के आगे सारे संसार के साथ ज्ञानसम्पत्ति का
भी लोप हो जाता है। इस प्रकार का साङ्ग अपरोक्ष ज्ञान जब तक नहीं हो जाता तब तक वह प्रपंच के स्वरूप
और संसार को आत्मा से भिन्न समझता है और केवल ब्रह्मज्ञान की बकवास करता है। ऐसा जो शाब्दिक ब्रह्मज्ञान
है वह भी त्रिगुणात्मक ही रहता है और परब्रह्म तो निराकार और निर्गुण है, उसे न जन्म है न मरण। जितना भी
कुछ त्रिगुणात्मक है वह सब नाशवान है। इसी विषय पर नाशवान और साकार का निरूपण अब श्रीकृष्ण स्वयं
कर रहे हैं।
एतदेव हि विज्ञानं न तथैकेन येन यत्।
स्थित्युत्पत्त्यप्ययान् पश्येद् भावानां त्रिगुणात्मनाम्॥ १५॥
यदि नाशवान न होता तो सगुण को सत्य ही मानते। यहाँ तीन गुण हैं जिन्हें उत्पत्ति, स्थिति और लय है।
रजोगुण से उत्पत्ति, सत्त्वगुण से स्थिति और तमोगुण से अन्त में नाश होता है। यह गुणों की वृत्ति का स्वभाव ही
है। इन गुणों में परब्रह्म रहता ही है; उसी के योग से कार्य प्रकाशित होता है; लेकिन वह वस्तु जन्ममरणादि दोषों
से अलिप्त रहती है और अविनाशी ही रहती है जो वस्तु तीनों गुणों पर आश्रित नहीं होती, जिसके योग से ही
गुणों के कर्म चलते हैं, वह तीन गुणों से बिल्कुल अलग है। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।
आदावन्ते च मध्ये च सृज्यात् सृज्यं यदन्वियात्।
पुनस्तत्प्रतिसंक्रामे यच्छिष्येत तदेव सत्॥१६॥
गुणों के पूर्व, मध्य और अन्त में, उसी प्रकार सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय के समय जो अविनाशी
रूप से विद्यमान रहता है, वही 'संत' अर्थात् शाश्वत है ऐसा मैं समझता हूँ। वह 'संततत्त्व' ऐसा है जिसके
आधार पर संसार टिका हुआ है और जो संसार में अंतर्बाह्य भरा हुआ है और जिसके कारण संसार प्रकाशित होता
है। यह संसार ही है जो उत्पन्न होता है और इसका लय होता है; लेकिन वह तत्त्व कायम ही रहता है। ऐसी जो
आत्मवस्तु है, वही सच है, यह तुम जान लो। जिस प्रकार घट और मठ होते हैं और चले जाते हैं, लेकिन
आकाश वैसे ही रहता है, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और लय होने पर भी परब्रह्म उसी अवस्था में एकत्र
रहता है। अलंकार बनाने से पूर्व का सुवर्ण, अलंकार तैयार होने पर भी सुवर्ण के ही रूप में रहता है अथवा
अलंकार टूटने पर भी सुवर्ण ही रहता है। उसी प्रकार चराचर को व्यापने वाला परब्रह्म अखण्ड ही रहता है।
कैसा भी आकार या विकास हो लेकिन इससे परब्रह्म को कोई विकार नहीं होता। इस प्रकार अखण्ड रहने वाली
जो परब्रह्म रूप वस्तु है, उसके चार प्रमाण हैं। उनके आधार पर उस वस्तु को जानें और प्रपंच को मिथ्या समझें।
श्रुतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं चतुष्टयम्।
प्रमाणेष्वनवस्थानाद् विकल्पात् स विरज्यते॥ १७॥
यत्र-तत्र-सर्वत्र एक अद्वैत परब्रह्म ही है, अन्य कुछ नहीं है। उस परब्रह्म में यह प्रपंच मिथ्या आभास ही
है। इसका प्रमाण वेदों में भी है। देह की क्षणभंगुरता हम साक्षात देखते ही हैं। यही प्रपंच की अधिकता का
दूसरा प्रत्यक्ष प्रमाण है। मार्कण्डेय और भुशुंडी ने कोटि-कोटि कल्पांत के समय प्रपंच को शख होते अपनी

५०४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
आँखों से है। बड़े-बड़े लोगों के मुख से हमने अनेक बार यह सुना है जो प्रपंच की नश्वरता का तीसरा
ऐतिहासिक प्रमाण है। शास्त्र प्रमाण तथा अनुमान से भी प्रपंच का भास मिथ्या ही है। वह मृगजल की तरह
दिखाई देता है। उसमें वास्तविकता नहीं है। रस्सी वास्तव में रस्सी के ही रूप में रहती है लेकिन भ्रम से वह
अनेक आकारों में दिखायी देती है। यह लकड़ी है या साँप है या मोतियों की लड़ी है? या पानी की धारा बह
रही है? कुछ भी समझ में नहीं आता। उसी प्रकार परब्रह्म एक है तथा चैतन्यधन है। उसके सम्बन्ध में भ्रम से
अनेक प्रकार के विवाद शुरु हो जाते हैं। कोई शून्य कहता है, कोई सगुण कहता है। कर्मधर्माचरण को भी मिथ्या
कहा जाता है। इस प्रकार अनुमान-प्रमाण के आधार पर भी प्रपंचभास मिथ्या ही दिखायी देता है। उद्धव ! वेदांत
का सच्चा और प्रामाणिक मत यही है। तंतु के बिना वस्त्र अलग से दिखायी नहीं देता, उसी प्रकार प्रपंच भी ब्रह्म
से अलग सत्यरूप में नहीं है। प्रपंच का मिथ्यापन श्रुति, प्रत्यक्ष, ऐतिह्य तथा अनुमान इन चार प्रमाणों से सिद्ध
होता है इसलिये इस प्रपंच की विषयासक्ति को त्याग कर वैराग्य धारण करना चाहिये। इसी विषय का निरूपण
स्वयं श्रीकृष्ण कर रहे हैं। विषयों का चिन्तन मिथ्या है तथा इस लोक में परलोक में भी अमंगल ही है।
कर्मणां परिणामित्वादाविरिञ्चादमङ्गलम्।
विपश्चिन्नश्वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टवत्॥ १८॥
यज्ञ याग आदि कर्मसाधनों से जो लोक प्राप्त होता है, वह नश्वर रहता है, इसे ध्यान में रखो। ब्रह्मलोक
आदि जो लोक हैं वे सारे नश्वर होने के कारण अमंगल ही हैं। उस लोक में जिस सुख की बात होती है वह
विष मिलाकर तैयार किये गये अन्न की तरह होती है। विषययुक्त अन्न खाते समय मधुर लगता है लेकिन अन्त में
मृत्यु होती है। प्रकार स्वर्ग में रहने वाले का भी अन्त में अधःपतन होता है। यह लोक जैसा यहाँ दिखायी देता
है, वैसा ही स्वर्ग भोग वहाँ भी दिखायी देता है। दोनों ही नाशवान हैं। कुत्ता काला हो या सफेद हो अमंगलता में
दोनों ही एक जैसे हैं। उसी प्रकार नश्वरता की दृष्टि से इहलोक और परलोक दोनों समान हैं। इसीलिये हे
उद्धव ! इहलोक अथवा परलोक के सुखोपभोग के सम्बन्ध में हमेशा विरक्ति ही धारण करनी चाहिये। इसी का
नाम वैराग्य है। अब तुमने अपने पहले प्रश्न में मेरी भक्ति के सम्बन्ध में पूछा था, उसी को मैं तुम्हें अपने मत के
अनुसार बता रहा हूँ।
भक्तियोगः पुरैवोक्तः प्रीयमाणाय तेऽनघ।
पुनश्च कथयिष्यामि मद्भक्तेः कारणं परम्॥ १९॥
भक्ति के माहात्म्य के सम्बन्ध में मैं तुम्हें पूर्व में बता ही चुका हूँ। उस भक्ति पर तुम्हारा अत्यन्त प्रेम होने
के कारण मैं तुम्हें उसे पुनः बता रहा हूँ। हे पुण्यमूर्ति उद्धव! सुनो! जिसे मेरी भक्ति की चाह होती है वह सारे
त्रिभुवन में मुझे प्रिय रहता है क्योंकि मेरे भजन से ही मेरे भक्तों को परमपद की प्राप्ति होती है। उस भक्ति का
लक्षण भगवान प्रारम्भ से ही बता रहे हैं। इसलिये श्रोतागण सावधान होकर सुनें।
श्रद्धामृतकथायां मे शश्वन्मदनुकीर्तनम्।
परिनिष्ठा च पूजायां स्तुतिभिः स्तवनं मम॥ २०॥
अमृत जैसी मेरी कथाओं का श्रवण करने से अमृत भी फीका लगता है और तत्काल भक्तिमार्ग की चाह
उत्पन्न होती है। देवतागण अमृतपान करते हैं लेकिन वे भी अन्त में मर जाते हैं, लेकिन जो मेरे कथामृत का
सेवन करते हैं वे कलिकाल को भी समाप्त कर देते हैं। कथासारामृत सेवन करने से वे अत्यन्त उन्मत्त हो जाते हैं

उन्नीसवाँ अध्याय ५०५
और मृत्यु को ही मारने लगते हैं। इससे उनके भय से ही सारा संसार भागने लगता है। मेरे कथामृतसार को प्राशन
करने से उनका अंतःकरण मेरी भक्ति में रंग जाता है। वे अत्यन्त उल्हास से मेरे गुण और चरित्र का गायन करते
हैं। मेरा नाम, मेरे पद, अद्वैत बोध से, नानाप्रकार के छंदों में, कीर्तनों में आनन्दपूर्वक गाते हैं और परमानन्द में
डोलते रहते हैं। बड़े समारोह में अत्यन्त प्रेमपूर्वक नामसंकीर्तन का गजर करते रहते हैं और नामघोष के साथ
तालियाँ बजाते हैं जिससे महापापों की होली जल जाती है। कीर्तन की ऐसी चाह उत्पन्न होने पर शास्त्रविधियुक्त
प्रायश्चित्तों का कहीं ठौर नहीं रह जाता, तीर्थ लाचार हो जाते हैं और जप-तप के संकट नष्ट हो जाते हैं। कीर्तन
का गजर सुनकर यमलोक का व्यापार रुक जाता है। उन्हें कोई काम न रहने के कारण वे खाली हाथ घूमते रहते
हैं। शमधर्म अपने अस्त्र छिपा कर रखता है। कीर्तन की चाह देखकर भगवान दौड़ा-दौड़ा आता है, वैकुण्ठ से
वह कूद कर आता है। इस प्रकार जो कीर्तन का नित्य निरन्तर गजर करता है, उसके अधीन मैं श्रीकृष्ण हो जाता
हूँ। कीर्तन का मुझे वास्तव में इतना सम्मोहन होता है। कीर्तन की ही तरह वह मेरे गरुड़ध्वज की पूजा भी बड़े
आदर से करता है। सुगन्धित पुष्पादिक सामग्री से देवता की पूजा करता है। इस प्रकार अत्यन्त निष्ठा से मेरी
पूजा कर मेरा स्तुतिस्तोत्र भी गाता रहता है। आधा क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने देता।
आदरः परिचर्यायां सर्वाङ्गैरभिवन्दनम्।
मद्भक्तपूजाभ्यधिका सर्वभूतेषु मन्मतिः ॥ २१ ॥
वह अपने इन्द्रियों की योजना पूजाविधान की ओर करता है; 'वाणी' हरिकीर्तन को अर्पण करता है;
'हृदय' मेरे ध्यान में मग्न रखता है और 'अष्टांग' नमस्कार की ओर लगाता है। इस प्रकार वह अंतर्बाह्य अपनी
इच्छा से मुझ पर ही समर्पित रहता है लेकिन मेरे भक्तों को देखते ही वह आनन्द में मेरे पास आना ही भूल जाता
है। मेरे भक्त बड़े भाग्य से ही मेरे घर आते हैं। उस दिन को दीपावली या दशहरा की तरह समझना चाहिये।
लड़की जिस प्रकार ससुराल से मायके आती है, उसी प्रकार यहाँ सारे तीर्थ दौड़ते हुए आते हैं। भक्तपूजा की
शोभा देखने के लिये सनकादिकों के भी झुण्ड आते हैं। नारद, प्रह्लाद आदि भक्तों की टोलियाँ दौड़ती हुई आती
हैं। उस स्थान पर असंख्य सिद्ध एकत्र होते हैं। बड़े-बड़े देवताओं की तो बाढ़ आ जाती है। महात्माओं के झुण्ड
इकट्ठा होते हैं और पितर दौड़ते-हाँफते चले आते हैं। वेदों का तो वहाँ प्रवेश ही नहीं हो पाता; विधि विधान
लजाकर पीछे मुड़ जाते हैं। इस प्रकार मेरे भक्त की पूजा के कौतुक से द्वार पर भीड़ उमड़ पड़ती है। बड़े उत्कर्ष
से मेरे भक्त की पूजा देखकर मैं कृष्ण भी मोहित हो जाता हूँ फिर औरों की क्या बात की जाय ? भक्तपूजा का
ऐसा माहात्म्य है। मेरी पूजा को भी पीछे छोड़कर जो मेरे भक्त की प्रेम से पूजा करता है तो उसे मुझ श्रीकृष्ण के
सकल लोकों के साथ सपरिवार पूजा करने का श्रेय प्राप्त होता है क्योंकि मेरी मूर्तियाँ अचेतन व्यक्ति तथा भक्त
मेरी चलती बोलती मूर्तियाँ हैं। उनकी यथाविधि पूजा करने से मुझ भगवान को संतोष प्राप्त होता है। जो मद्भाव
मेरे भक्त के प्रति रखते हैं वही भाव सारे भूतों के प्रति रखना चाहिये क्योंकि भूताकृति अलग होने पर भी सब में
आत्मास्थिति एक जैसी होती है। देह का केशवपन करने से वह विधवा हो जाती है लेकिन आत्मा विधवा नहीं
होती। दहकते अंगारे विभिन्न आकारों में दिखायी देते हैं लेकिन उनमें अग्नि एक ही होता है। उसी प्रकार सारे
प्राणि मत्स्वरूप ही हैं। दीवार पर बने हुए चित्रों में अनेक आकृतियाँ दिखायी देती हैं लेकिन जिस प्रकार उनमें
दीवार एक ही रहती है, उसी प्रकार मैं चिदात्मा समस्त प्राणिमात्र में भरा हुआ हूँ इसे निश्चित समझना चाहिये।
दूसरी बात यह है कि दूजेपन का अहंकार त्याग कर समस्त प्राणिमात्र में मेरी भावना रखना यही मेरी सबसे श्रेष्ठ

५०६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पूजा है और मुझे वह अत्यन्त प्रिय है। इस प्रकार जो मेरी पूजा करता है वह मेरा अत्यन्त चहेता होता है, मैं
सर्वांग से उसके घर में काम करता हूँ क्योंकि उसका मुझ पर स्वामित्व रहता है। उसकी प्रत्येक कृति मेरा भजन
ही रहता है। यही बात श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
मदर्थेष्वङ्गचेष्टा च वचसा मद्गुणेरणम्।
मय्यर्पणं च मनसः सर्वकामविवर्जनम्॥२२॥
लौकिक कर्म हो अथवा अन्य कोई भी शरीर कर्म हो उस कर्म द्वारा मेरी भक्ति उत्पन्न होती है। उद्धव! मेरे
भजन का स्वरूप बड़ा निराला है। वह भक्त बाहर चबूतरे पर बैठकर गपसड़ाका भी करे लेकिन उसमें मेरा
कीर्तन उत्पन्न होता है। उसकी रसाल वाणी मेरे गुण के गायन की गर्जना करती है। वह जो स्वधर्म कर्म क्रिया
करता है, वह भी मुझे ही अर्पण करता है। मेरे सिवा अन्य कुछ भी करना उसकी समझ में नहीं आता है। उसके
सारे इन्द्रियों के कर्म में मेरी भक्ति अपने आप उत्पन्न होती है। मेरे नाम के सिवा अथवा मेरे गुणानुवाद के सिवा
उसकी वाणी को और कुछ भी मालूम नहीं होता। उसे जो कुछ अच्छा लगता है वह सब वह मुझे ही अर्पण
करता है और अन्त में वह अपना मन भी मुझे अर्पण करता है। अब मन किस प्रकार मेरे स्वरूप में अर्पण होता
है, इसका निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं।
मदर्थेऽर्थपरित्यागो भोगस्य च सुखस्य च।
इष्टं दत्तं हुतं जप्तं मदर्थं यद् व्रतं तपः॥२३॥
मैं जो परमात्मा हूँ, वही सच्चा स्वार्थ है, ऐसा निश्चय कर, अपना परमार्थ साधने के लिये लोग धन-धान्य
आदि सर्वस्व खर्च करते हैं। परमार्थ पूरी तरह साधने के लिये मन में सच्चा वैराग्य होना आवश्यक होता है
इसलिये मुझ श्रीकृष्ण से मिलने के लिये वे सारे सुखोपभोग का त्याग करते हैं। छत्र, चामर, हाथी, घोड़े आदि
सारा वैभव छोड़कर रंक बन जाते हैं। मुझ तक यदि पहुँचना है तो प्रखर वैराग्य चाहिये। मेरा निजसुख प्राप्त
करने के लिये पत्नी, बच्चे, धनधान्य आदि का झट त्याग कर देते हैं। उन्हें इतना अधिक अनुताप होता है। चाह
कर मेरा भजन करने से वे भोग को भूलने लगते हैं। सच्चा भक्त मेरी प्राप्ति के लिये एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने
देता। मुझे प्राप्त करने के उद्देश्य से ही श्रौत स्मार्त कर्म करता है। अग्निहोत्र, यज्ञयाग, बड़े-बड़े व्रत वह मेरे लिये
करता रहता है। मेरा चिद्रूप प्राप्त करने के लिये गायत्री आदि मंत्रों का जाप करता है। दुर्धर तप भी मत्स्वरूप की
प्राप्ति के लिये करते हैं। मैं विश्वंभर सर्वव्यापी और सर्वतोमुखी होने के कारण वह गरीबों को अन्नदान करता है,
उससे मैं सुखी होता हूँ। हृदय में मैं स्वतः सिद्ध ही रहता हूँ, मेरा आवाहन कर वह भोजन करता है और वह भी
मुझे ही अर्पण करता है। प्रत्येक ग्रास के साथ हरि का स्मरण करने से वह अन्न पूर्ण ब्रह्म हो जाता है। इस प्रकार
मेरे भक्त स्वयं ही अपने सारे कर्म मुझे अर्पण करते हैं। इस प्रकार जो सदासर्वदा अपने सारे कर्म कृष्णार्पण करता
है, उसका मन भी मुझे ही अर्पण होता है। उसी का निरूपण भगवान करते हैं।
एवं धर्मैर्मनुष्याणामुद्धवात्मनिवेदिनाम्।
मयि संजायते भक्तिः कोऽन्योऽर्थोऽस्यावशिष्यते॥२४॥
लोहे को तैयार कर, उस पर उत्तम मुलम्मा लगाया जाय तो उसका दर्पण बन जाता है। उसी प्रकार सारे
कर्म मुझे अर्पण करने से मन भी शुद्ध हो जाता है। सोने को जितना तपाया जाय उतना उसका तेज बढ़ता है;
वस्त्र जितना अधिक धोया जाता है उतना अधिक वह स्वच्छ होता है। उसी प्रकार सारे कर्म मुझे अर्पण करने से

उन्नीसवाँ अध्याय ५०७
मन भी निर्मल होता है और मन शुद्ध होते ही वह मेरे स्वरूप में अर्पण होने लगता है। नदियों में बाढ़ का पानी
मिलने से वे समुद्र में जाकर मिलती हैं, उसी प्रकार मन निर्मल होते ही वह मेरे स्वरूप में आकर मिलता है। मेरे
स्वरूप में मन जब स्थिर होता है, उस समय आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी ये तीनों प्रकार समाप्त हो जाते हैं और चौथा
प्रकार 'भक्ति' उत्पन्न होती है। भक्ति ही मेरी पूँजी है। उसमें दूसरी, तीसरी या चौथी समझना साधकों का भ्रम है।
मेरी अनेक भक्तियाँ नहीं हैं। वही एक मेरी श्रेष्ठ भक्ति इस साधन से प्राप्त होती है; ब्रह्मदेव, शंकर, सनकादिक
आदि इसी भक्ति के कारण मेरे भक्त कहलाते हैं। अहंकार पूरी तरह नष्ट होने पर सारे प्राणि आत्मस्वरूप दिखायी
देने लगते हैं। उद्धव! मेरे स्वरूप की जो 'सहजास्थिति' है वही मेरी श्रेष्ठ भक्ति है। इस श्रेष्ठ भक्ति का यदि एक
अंश भी प्राप्त हो जाय तो आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी संज्ञान होकर विचरण करने लगते हैं। वे सच्चे साधक बन
कर अपना स्वार्थ साधते हैं। यही भक्ति आर्त के मन में परमार्थ के विषय में आर्तता उत्पन्न करती है। मन में
भगवत्प्राप्ति की तीव्र व्यथा उत्पन्न होना, यही परमार्थ की 'आर्तता' है। जो भगवान की प्राप्ति के लिए चट्टान पर
से कूदने में भी नहीं डरता और जलती आग में भी प्रवेश करना चाहता है उसको ही वास्तव में 'आर्त' कहते हैं।
आर्त की स्थिति ऐसी होती है; किन्तु जिज्ञासु ऐसे साहस का निवारण करता है। वह कहता है, मनुष्यदेह
ब्रह्मप्राप्ति का साधन है। आत्महत्या से उसका विनाश नहीं करना चाहिये। पूर्व के भक्तों ने किस प्रकार
भगवद्भक्ति सम्पादित की, वह रीति जानने के लिये जो जीवप्राण हो उस युक्ति पर चलता है उसका ही नाम है
'जिज्ञासु'। मुझे जानने की जो इच्छा है उसी का नाम है 'जिज्ञासा'। वही मेरे स्वरूप को प्रकाशित करती है।
इसीलिये मैं उन्हें 'जिज्ञासु' कहता हूँ। परब्रह्म तक पहुँचने के लिये जिस युक्ति का प्रयोग होता है, उसी का नाम
है 'शुद्ध जिज्ञासा'। वेदशास्त्र के अर्थज्ञान सम्बन्ध से जो प्रयास किया जाता है उसे लौकिक जिज्ञासा कहते हैं।
उसी प्रकार प्रत्येक अर्थ में मुझे माँगना या मुझे ही खोजना, इसे 'शुद्ध अर्थार्थी' कहते हैं, यह ध्यान में रखो। अर्थ
की अर्थात् द्रव्य की इच्छा करनेवाले को जो अर्थार्थी कहते हैं वे उस शब्द का गलत अर्थ लगाते हैं। संसार में
अनेक अर्थ अथवा वस्तु दिखाई देती हैं, उनका विचार कर जो परमार्थ की ओर दृष्टि लगाता है, उसी को
'अर्थार्थी' कहते हैं। उसमें भी मेरी भक्ति प्रकाशित होती है। इस प्रकार आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी इनमें मेरी
'सहजभक्ति' प्रकाशित होती है। भक्त अपनी कल्पना भ्रान्ति से मेरी भक्ति के चार प्रकार मानते हैं। लेकिन वह
गलत है। मेरी जो निजभक्ति है वह 'एकमेव' है। ऐसी मेरी निजभक्ति कैसे प्राप्त की जाती है, आत्मनिवेदन की
स्थिति कैसी होती है, उसे हे उद्धव! मैंने तुम्हें स्पष्ट रूप से बतला दिया है। जिन भक्तों के हाथ में मेरी इस भक्ति
का सार सचमुच आ जाता है, उनके सारे व्यापार मद्रूप हो जाते हैं। वह जिधर ध्यान देते हुए बैठ जाता है वह
दिशा मैं ही बन जाता हूँ। वह जिधर अपने कदम बढ़ाता है, वहाँ की धरती भी मैं ही बन जाता हूँ। वह भोजन
करने बैठता है तो मैं षडरस बन जाता हूँ और प्राशन करने के लिये जल भी मैं ही बन जाता हूँ। वह निजपदों से
चलने लगता है तो मैं निजबोध से सामने का दृश्य समुदाय नष्ट कर देता हूँ और शान्ति पहले से ही पाँवड़े
बिछाये पग-पग पर उसकी नजर उतारती जाती है। शम-दम हाथ जोड़े आज्ञाधारी सेवक की तरह हाथ जोड़े
खड़े रहते हैं। ऋद्धि-सिद्धि घर में दासी की तरह खटती रहती हैं और विवेक तो उसके घर के रोज के चाकर
की तरह काम करता रहता है। उसका बैठने का स्थान मैं ही बन जाता हूँ। वह शान्ति से सो सके इसलिये मैं ही
उसके लिये समाधि का बिस्तर तैयार कर देता हूँ। वह जिन शब्दों का उच्चार करता है उसमें निःशब्द ब्रह्म ही
शब्द रूप में प्रकट होता है। इसलिये सुनने वालों को भी उससे समाधान होता है। वह सहज ही कुछ बोलने
लगता है तो उस बोल के साथ मेरे गुणानुवाद प्रकट होते हैं। इसलिये उसकी बातें सुनते समय स्वाभाविक रूप

५०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
से ही श्रोतागण उसके गले में बाहें डाल देते हैं। वह परावाणी के ऊपर चढ़ते समय बैकुण्ठ और कैलास की
सीढ़ियाँ बनाता है और उस उन्मनी अवस्था को दूर भगाकर सुखशय्या पर शयन करता है। चारों मुक्ति एकत्र
होकर उसके घर पानी भरती हैं। मैं श्रीकृष्ण भी लक्ष्मी के साथ उसके घर में काम करता हूँ। फिर औरों की
महत्ता की बात क्या करें ? सहसा उसके मुख से किसी के लिए 'तुम्हारा उद्धार हो गया' यह सुनते ही मैं हृषीकेश
उसे अपने मस्तक पर बिठाया हूँ और उसके वचन के कारण उसे निजधाम पहुँचाता हूँ। जिन्हें मेरी सहजभक्ति
प्राप्त हो जाती है उसके लाड़ मैं इस प्रकार पूरे करता हूँ। उद्धव ! और क्या-क्या बताऊँ ? समझ लो कि मैं देह हूँ
और वह आत्मा है। वह मेरा जीव, मेरा प्राण रहता है। यह बात केवल निजभक्तों की ही मालूम रहती है। वह
जब सहजभक्ति में विचरण करता है, उस समय मैं भगवान हूँ और वह मेरा भक्त रहता है। अन्यथा मैं पूर्णतयः
उसके भीतर और वह मेरे भीतर होता है। इस प्रकार हम दोनों एकरूप से निरन्तर रहते हैं। नाम से भले ही दोनों
बाहर हों। जो मेरे साथ एकरूपता के लिये आये वे 'मैं' ही बनकर रह गये; लेकिन जो इस प्रकार मुझे भजते हैं
उन्हें मैं 'भक्त' समझता हूँ। उद्धव ! एकरूपता से भी अधिक मधुर मेरी भक्ति है; इसी निरूपण की तुम्हें चाह थी
यह जानकर ही तुम्हें यह स्पष्ट करके बताया। मेरे ऐसे भक्तों को दूसरा कोई लाभ शेष ही नहीं रह जाता। मैं
श्रीहरि उनके निजभाव से ही पूर्णतयः सन्तुष्ट होता हूँ। भागवतशास्त्र भक्तिप्रधान है। उसके निजभक्ति का सार
मैंने तुमसे आदरपूर्वक निवेदन किया। तुम्हारी पसन्द के बहाने मैंने अपनी अत्यन्त गुप्त वस्तु 'भक्ति' तुम्हें
मिष्ठान्न के रूप में प्रस्तुत की है। जिस ढंग से मैंने तुम्हें बताया उसी ढंग से मेरी श्रेष्ठ भक्ति का आचरण करना
चाहिये। ऐसा कहते हुए भगवान ने उद्धव को प्रेम से उठाया। पीताम्बर पीछे सँवारा, शंख चक्र फेंक दिया और
उद्धव को उठा लिया। फिर भी भगवान का प्रेम कम होने का नाम नहीं ले रहा था। दो हाथ कम पड़ रहे थे
इसलिये उन्होंने चारों हाथ फैलाये और उद्धव को प्रेम से गले लगा लिया। हृदय से हृदय मिल गया। इस प्रकार
श्रीकृष्ण ने अपना सर्वस्व उद्धव के हृदय में उड़ेल दिया। श्रीहरि अवाप्त काम और इच्छारहित थे, लेकिन उसे
भी भक्ति की चाह थी। उद्धव उसे इतना प्यारा लगा कि उसने स्वानंद से उसके सारे लाड़ पूरे किये। उद्धव से
उनकी इतनी प्रीति थी कि वे आलिंगन में बँधे उद्धव को छोड़ना ही भूल गये और देखो। कृष्ण के हृदय से हृदय
मिल जाने के कारण उद्धव भी अपने आप को भूल गया। इस प्रकार दोनों आनन्द और चाव से निष्काम प्रेम में
डूब गये। उद्धव तो भक्तिसुख की समृद्धि में डूब ही गया। कृष्ण ने अपना सर्वस्व उद्धव के हृदय में उड़ेल दिया
लेकिन उद्धव को इसकी जानकारी नहीं होने दी। श्रीहरि का यह बहुत बड़ा चमत्कार था क्योंकि (भगवान कहते
हैं) उद्धव को यदि मेरे हृदय की यह बात मालूम हुई तो वह मेरे पास ऐक्य के लिये आयेगा; फिर आगे की
सरस कथा किसे सुनाई जाय ? उद्धव के साथ निरन्तर प्रेम से बोलना अच्छा लगता है। इसका कारण यह है कि
वैसा कोई अन्य श्रोता नहीं मिल पाता। भक्तिसुख की महत्ता बताने का शौक मैं किसके सामने पूरा करूँगा
इसलिये उद्धव की आड़ में प्रेम छिपा दिया। सूर्य से किरणों निकलती है उसी प्रकार उसके आलिंगन का बन्धन
छूटा और कृष्ण और उद्धव अलग हो गये। फिर भी उनकी अभिन्नता नहीं टूटी। अस्तु! (टीकाकार श्री एकनाथ
कहते हैं) अगली कथा का सन्दर्भ और श्लोक का सम्बन्ध छूट गया, इसलिये श्रोतागण अन्यथा न सोचें। मूल
अर्थ का विचार करें। मूल पद संक्षेप में है। उसका मैंने केवल विस्तार किया है। इसे व्यर्थ की बकवास न
समझें। इस पर श्रोतागण बोले, कैसा आश्चर्य है। मूल में पद अत्यन्त गूढ़ था, तिस पर तुमने श्रीहरि के मन से
भक्ति सारामृत निकाल लिया। तुम्हारे हृदय में श्रीकृष्णनाथ प्रकट होकर, अपना हृद्गत ग्रन्थ में तुम्हारे द्वारा
कहलवा रहे हैं, यह हमने अच्छी तरह जान लिया है। यह भक्तिसारामृत श्रवण करते ही चित्त में चैतन्य जगने

उन्नीसवाँ अध्याय ५०९
लगता है। तुम ग्रन्थ का अर्थ यथार्थ ढंग से बता रहे हो। संतों का यह भाषण सुनकर एकाजनार्दन को हर्ष हुआ
और उसने श्रीचरणों में मस्तक रख दिया। अब आगे का निरूपण सुनें। श्रीकृष्ण अपनी भक्ति को आदरपूर्वक दृढ़
करने के लिये अपने निरूपण की पुनरावृत्ति कर रहे हैं।
यदात्मन्यर्पितं चित्तं शान्तं सत्त्वोपबृंहितम्।
धर्मं ज्ञानं सवैराग्यमैश्वर्यं चाभिपद्यते॥ २५॥
अपना अंतःकरण मुझे अर्पण कर देने से मेरी भक्ति उल्हास के साथ बढ़ती है, इस सम्बन्ध में मैं पहले ही
बता चुका हूँ। अब मन को मेरे स्वरूप में अर्पण करने का एक सरल उपाय बताता हूँ, सुनो। मेरा नामस्मरण
करने से पापों का विनाश होता है। मन की कोई कामना रख नामस्मरण करने से वह नाम ही उस कामना को
पूर्ण करता है और बिना इच्छा किये नामस्मरण करने से समस्त पालकों का विनाश करता है और पाप भस्म हो
जाने पर रज और तम को जीत कर अपने आप ही धर्मपरायण तथा धार्मिक सत्त्वगुण बढ़ने लगता है। सत्त्वगुण
के कारण वैराग्य हमेशा के लिये अटल हो जाता है। वैराग्य के कारण विषय का निर्मूलन होता है जिससे
आत्मज्ञान प्रकट होता है। विवेक के साथ ज्ञान बढ़ने से स्वरूप का अनुसंधान होता है और शान्ति का समाधान
बढ़ता जाता है, उस समय मन मुझे अर्पण होता है। मन मेरे प्रति अर्पण होने पर निजभक्ति प्रकट होती है। उसका
सारा निरूपण मैंने पिछले श्लोक में किया ही है। निजभक्ति पूर्णरूप से प्राप्त होने पर अष्टमहासिद्धि स्वयं होकर
उसके आँगन में खड़ी हो जाती हैं। उन सिद्धियों की ओर वह आँख उठा कर भी नहीं देखता। उसके लिये
अप्राप्य कोई भी वस्तु नहीं रहती। मेरे भक्तों का मुझसे ऐक्य होने के बाद उन्हें मेरी पूरी सत्ता प्राप्त होती है। मेरी
ऐसी भक्ति को न प्राप्त कर तथा आत्मस्थिति का लाभ न उठाकर, विषयासक्ति से व्यवहार करने पर बहुत बड़े
अनर्थ का सामना करना पड़ता है।
यदर्पितं तद्विकल्पे इन्द्रियैः परिधावति।
रजस्वलं चासन्निष्ठं चित्तं विद्धि विपर्ययम्॥ २६॥
जो वेदशास्त्र को नहीं मानता, परमार्थ पर जो विश्वास नहीं करता; जो घर, स्त्री, बच्चे और सम्पत्ति पर
आसक्त होकर विषयों पर ही लुब्ध रहता है, उसमें विषय की अधिकता से रजोगुण अत्यन्त क्षुब्ध हो उठता है
और उसका चित्त ज्ञान के प्रति अन्धा हो जाता है। ज्ञान का अर्थ उसे विपरीत ही दिखायी देने लगता है। जो लोग
उसे विषयोपभोग के अनेक उपाय सुझाते हैं, उसे वह बड़ा 'ज्ञानी' मानता है और जो छलवाद की युक्ति से मुँह
बन्द करता है, उसे पण्डित कहते हैं। जिसके पीछे बहुत बड़ा प्रपंच रहता है, उसे 'भाग्यवान' समझते हैं और जो
नाना उपभोगों से अपने शरीर का पोषण करता है उसे 'पुण्यवान' पुरुष मानते हैं। परमार्थ विषयों में अनुतापी
रहता है उसे बड़ा 'दुःखी' कहते हैं; जो अनेक प्रकार के विषयों का पोषण करता है उसे बहुत बड़ा 'सुखी'
मानते हैं। जिसके शाप से मनुष्य की मृत्यु होती है, उसे 'सिद्ध' मानते हैं। जिसके आचार में दंभ होता है, उसे
बड़ा 'पवित्र' मानते हैं और स्त्रियों को तथा शूद्रों को मंत्र देता है उसे बहुत बड़ा 'ज्ञाता' कहते हैं। जो अनुतापी
और वैराग्यशील होता है, उसे 'भाग्यहीन' कहते हैं और जो सबके समक्ष विषयों का उपभोग करता है उसे
'राजयोगी' मानते हैं। जो स्वयं धन का अभिलाषी होता है वह धन खर्च करने वाले को 'मूर्ख' कहता है और
खर्च न करने वाले को 'विचारी' तथा 'धर्मज्ञ' मानता है। जिसकी गाँठ में काफी द्रव्य रहता है, वह सबको
अत्यन्त 'पूज्य', 'पवित्र' तथा 'ज्ञानी' लगता है। ऐसा विपरीत ज्ञान उन्हें होने लगता है। वह स्वयं सर्वात्मा और

अध्याय १९ से २४: ज्ञान-भक्ति लक्षण, गुण-दोष विवेक व सांख्य-दर्शन

५१० श्रीमद् एकनाथी भागवत
सर्वेश है यह बिलकुल भूलकर वह अपने को अधर्मी, अकर्मी, दीनदुबला तथा अज्ञानी मानने लगता है। ऐसी
स्थिति में मेरी भक्ति कैसे उत्पन्न होगी ? और मेरी प्राप्ति भी कैसे होगी ? इस प्रकार संसार के भवसागर में फँस
कर कितने लोग चक्कर खा रहे हैं, उनकी कोई गिनती नहीं है। परमात्मा को प्राप्त करने के चार उपाय हैं और
वे चारों अत्यन्त गुप्त हैं। अंतःकरण के वात्सल्य के कारण श्रीकृष्ण उद्धव को वे उपाय बताते हैं। धर्म की प्रमुख
भूमिका है भजन, उससे उत्पन्न होता है ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य। ये चार उपाय मेरी प्राप्ति के लिये आवश्यक
हैं। उनके सम्बन्ध में बताता हूँ, सुनो।
धर्मो मद्भक्तिकृत् प्रोक्तो ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम्।
गुणेष्वसङ्गो वैराग्यमैश्वर्यं चाणिमादयः ॥ २७॥
उद्धव ! अब मैं असली मर्म तथा गुह्य में गुह्य बात तुम्हें बताता हूँ। मेरी प्रेमयुक्त भक्ति वही सबसे अच्छा
धर्म है, यह जान लो और ऐक्य से एकात्मता का जो साक्षात बोध होता है और फिर कभी भेद उत्पन्न नहीं होता,
उसी का नाम है, 'शुद्धज्ञान' ऐसा परमानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण ने कहा। धनधान्य का ढेर सामने पड़ा हो या उर्वशी
सेज पर आयी हो लेकिन जिसे वह सब तुच्छ मालूम होता है उसे ही हम 'वैराग्य' कहते हैं। हे बुद्धिमान उद्धव !
सुनो ! मेरी अष्ट महासिद्धि हैं जो मुझसे कभी दूर नहीं होती, वे अटल हैं। मेरी श्रेष्ठ भक्ति के निश्चय से जो
एकात्मता प्राप्त कर मेरी पदवी पा लेता है, उसके घर में मेरी सिद्धियाँ दासी बनकर रहती हैं। सिद्धि उसकी सेवा
करती हैं इसमें आश्चर्य की क्या बात है ? मैं लक्ष्मी के साथ भक्तों की भक्ति करता हूँ। 'ऐश्वर्य' का प्रमुख
लक्षण है, स्वयं भगवान की योग्यता प्राप्त कर भगवद्-ऐश्वर्य से अत्यन्त सम्पन्न होना। यह मेरे गुप्त भण्डार की
चाभी है। उसे लेकर आत्मानंद का कमरा खोलो और अपनी सुखसिद्धि का उपभोग करो। श्लोक के चार शब्दों
का ऐसा गहन प्रतिपादन सुनकर उद्धव को बड़ा आश्चर्य हुआ। 'धर्म' आदि को लेकर चार शब्दों का अर्थ
भगवान ने विचित्र-सा बताया, उसी प्रकार अब यम आदि का अर्थ भी भगवान से पूछा जाय ताकि श्रीकृष्ण
उसका गुप्त अर्थ बताएंगे, यह बात मन में लाकर ही परमार्थ को पूर्णरूप से जानने के लिये उद्धव स्वयं ही यम
आदि के प्रश्न पूछ रहा हो। पाँच श्लोकों में उसने गहन ज्ञान के पैंतीस प्रश्न पूछे हैं। उनके उत्तर सुनने पर
'जीव' और 'शिव' दोनों का समाधान होगा। पहले श्लोक में छह प्रश्न हैं; दूसरे में नौ हैं तथा तीसरे और चौथे
में आठ-आठ हैं और पाँचवें में चार प्रश्न हैं।
उद्धव उवाच
यमः कतिविधः प्रोक्तो नियमो वारिकर्शन।
कः शमः को दमः कृष्ण का तितिक्षा धृतिः प्रभो ॥ २८ ॥
अहंकाररूपी शत्रु का विनाश करने वाले श्रीकृष्ण ! 'यम' और 'नियम' के कितने प्रकार हैं ? 'शम' और
'दम' किसे कहते हैं ? उसी प्रकार, 'तितिक्षा' और 'धृति' कैसी रहती है ?
किं दानं किं तपः शौर्यं किं सत्यमृतमुच्यते।
कस्त्यागः किं धनं चेष्टं को यज्ञः का च दक्षिणा ॥ २९ ॥
यहाँ 'दान' क्या है और 'तप' क्या है ? 'शौर्य' क्या है और 'सत्य' कैसा रहता है ? उसी प्रकार जिसे
'ऋत' कहते हैं उसका यथार्थ ढंग से वर्णन करें। इसी प्रकार 'त्याग' क्या है ? पुरुष के लिये इष्ट धन कौन सा
होता है ? 'यज्ञ' किसे कहते हैं ? और उसमें 'दक्षिणा' क्या होती है ?