श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 517, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय ५०१
और ब्रह्मर्षि तथा तपोराशि और ज्ञाननिधि आदि राजर्षि एकत्र थे। उस सभा में ज्ञान का विषय श्रीकृष्णनाथ उद्धव
को बताएंगे। तो श्रोतागण कृपया ध्यान दें, ऐसी एकाजनार्दन विनती करता है। ज्ञान और वह भी पुरातन। उसका
वक्ता कौन है ? तो स्वयं भगवान हैं। इसलिये श्रोता उद्धव ध्यान देकर श्रीकृष्ण की बातें सुनने लगा।
श्रीभगवानुवाच
इत्थमेतत् पुरा राजा भीष्मं धर्मभृतां वरम्।
अजातशत्रुः पप्रच्छ सर्वेषां नोऽनुशृण्वताम्॥ ११॥
(भगवान बोले) जिस प्रकार तुमने मुझसे ज्ञान पूछा था, उसी प्रकार भीष्माचार्य जब शर पंजरी पर पड़े
अन्त समय काट रहे थे, उस समय धर्मराज ने भी उनसे यही प्रश्न किया था। अब धर्मराज की महानता सुनो।
संसार में उसका कोई शत्रु नहीं था। वह निश्चयात्मक और सत्य बोलनेवाला था। ऋषी के मंत्र से उसका जन्म
हुआ था। पाण्डवों का संहार करने के लिये स्वयं वज्रदेही होने के उद्देश्य से दुर्योधन ने धर्मराज से उपाय पूछा था
लेकिन धर्मराज झूठ नहीं बोला। ऐसे ईर्षाहीन और परमपवित्र राज युधिष्ठिर ने अत्यन्त आदरपूर्वक महाशूरवीर
भीष्माचार्य से विनती की जो दृढ़निश्चयी होते हुए अत्यन्त धार्मिक था, स्वधर्म का नियम से पालन करने वाला
था जो आजीवन ब्रह्मचर्य से रहा और बड़े-बड़े योद्धाओं को भी जो वन्दनीय था, गुरुत्व की मर्यादा को भग्न कर
जिसने परशुराम से युद्ध किया; लेकिन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने के लिये जिसने काशीराज की लड़की का
अंगीकार नहीं किया। धनुर्विद्या में परशुराम उसका गुरु था, प्रतिज्ञा कर जब उसे समरभूमि में जीता तो उसने
सन्तुष्ट होकर अपना गोत्रदान किया। इतना ही नहीं, अपितु परशुराम और भी अधिक प्रसन्न हो उठे और बोले कि
मेरे ब्रह्मचर्य व्रत का ऐसा निश्चय है कि हे भीष्म ! तुम्हें काम की कभी बाधा नहीं होगी (अपने बाप को संतोष
प्रदान करने के लिये उसने उसे अपना यौवन प्रदान किया और स्वयं वार्धक्य स्वीकार कर शांतनू को सुखी
किया) तब पिता ने भी उसे आशीर्वाद दिया कि "हे बुद्धिमान् भीष्म ! सुनो। वार्धक्य में शक्ति क्षीण होने की
विपत्ति तुम पर नहीं आयेगी।" इसलिये जैसे-जैसे उस पर वार्धक्य की छाया पड़ने लगी वैसे-वैसे उसका प्रताप
बढ़ता ही चला गया। काल की शक्ति रूक गयी। वह भीष्म को क्षीण नहीं कर सका। इसलिये उसने अपने पैरों
में काल, काम और परशुराम इन तीनों में ही चिह्न बाँध लिये। 'धर्मनिष्ठों में श्रेष्ठ' था इसलिये भीष्म को
धर्मभृतांवर यह नाम शोभा दे रहा था। जिसकी प्रतिज्ञा से कृष्ण को भी हार माननी पड़ी और उन्हें शस्त्र उठाना
पड़ा। उसकी प्रतिज्ञा की ऐसी योग्यता थी। भजन मर्यादा तोड़े बिना गोविन्द से युद्ध किया और मुकुन्द से वचन
भंग कराकर उनके चरणविन्द में पड़ गया। फिर प्रण पूरा कर उसने शस्त्रास्त्र फेंक दिये और मर्मस्थल पर शत्रु
के घाव लगने पर भी पुनः शस्त्र नहीं उठाया। बाणों ने मर्मस्थल फोड़ने पर अत्यन्त व्याकुल होने पर भीष्म ने
स्वयं निश्चय किया और देहत्याग के लिये सिद्ध हो गया। लेकिन उस समय दक्षिणायन चल रहा है यह सुनकर
उसने काल को दूर कर दिया और अपने शरीर की रक्षा की ओर फिर अपने निश्चय के अनुसार उसने शरपंजर
पर शयन किया और बड़े-बड़े ऋषिसमुदाय के परिवार में धर्मराज ने उससे प्रश्न किया। हम सबके सामने
युधिष्ठिर ने जो कथा पूछी, वही प्राचीन कथा तुम्हें सुनाता हूँ।
निवृत्ते भारते युद्धे सुहृन्निधनविह्वलः।
श्रुत्वा धर्मान् बहून् पश्चान्मोक्षधर्मानपृच्छत ॥ १२ ॥
मैं श्रीकृष्ण दोनों में सन्धि कराने गया था किन्तु दुर्योधन ने उसे नहीं माना। व्यास ने भी जब उसका निषेध