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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

४०६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अथक साधनों के बाद भी उसका आकलन नहीं होता। मेरी भक्ति की थाह स्वयं मुझे भी नहीं लग पाती।
इसीलिये मैं भक्तों का आज्ञाधारक बन कर रहता हूँ। उनके शब्दों का जरा भी उल्लंघन नहीं करता। भक्तों की
महिमा अगाध है इसलिये मैं भी उनकी सेवा करता हूँ। भक्त ने मारी हुई लात मैंने अपने हृदय पर धारण की।
भक्तों के चरणों की धूलि मैं माथे पर लगाता हूँ। भक्त कहलाना बहुत अच्छा लगता है लेकिन भजन का स्वरूप
अत्यन्त विकट है। भक्ति का रहस्य अत्यन्त गूढ़ है। श्रुति शास्त्रों के भी वह ठीक से समझ में नहीं आता। कंजूस
व्यक्ति कितनी ही दूर क्यों न जाये लेकिन घर में रखी हुई निधि को वह अपने मन में सुरक्षित रखता है। उसी
प्रकार वह सदा सर्वदा मेरी प्रीति अपने अंतःकरण में सुरक्षित रखता है या बहुत दिन के बाद जब किसी स्त्री को
गर्भ रह जाता है तो वह सुन्दरी जिस प्रकार आनन्दपूर्वक उसका पालन पोषण करती है उसी प्रकार जब हृदय में
मेरे प्रति प्रेम जगता है अथवा बाँझ स्त्री जब गर्भवती होती है उसी प्रकार उसके मन में मेरे प्रेम का उत्सव मनाने
की इच्छा होती है और अंतःकरण से प्रेमविह्वल होकर पहले से भी अधिक उत्कर्ष से उल्हास बढ़ता जाता है।
अथवा भाग्यवान जामाता घर आने पर जिस प्रकार सास उसका स्वागत करने में किसी बात की कमी नहीं रहने
देती, अथवा बीज जितनी अधिक पैदावार देता है उतना ही किसान का उल्हास बढ़ता है, अथवा गुणवान, सुन्दर
और श्रीमान पति के घर से जाने पर उसकी पत्नी उसके लिये छटपटाती है, उसी प्रकार मेरे लिये उसके मन में
बेचैनी बढ़ने लगती है। उद्धव ! इसी का नाम है मेरे प्रति सच्ची भक्ति। जिस भक्ति के भुलावे में मैं लक्ष्मीकांत
भक्तों के हाथ में हूँ। मेरे लिये चाह बढ़ने से प्रीति उत्पन्न होती है। उद्धव को सीने से लगाकर भगवान उससे
बताने लगे कि जिसके पास मैं सदा रहता हूँ वह मेरी भक्ति ऐसी रहती है। संसार सागर को पार करने के लिये
भक्ति यही एक प्रमुख साधन है। मोक्ष भी उसके चरणों पर लोटता है फिर अन्य साधनों की क्या बिसात है?
देखो! पूरे त्रिलोक में मैं अविजीत हूँ। लेकिन भक्तों के सामर्थ्य ने मुझे जीत कर भक्ति के बल पर मुझे अपना
सेवक बना लिया है। इसीलिये सभी विजयों में श्रेष्ठ एक मेरी भक्ति ही है। उसकी भी कथा सुनो। तुम्हें
विस्तारपूर्वक बताता हूँ।
न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव ।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥ २० ॥
नित्य क्या है और अनित्य क्या है इसका ज्ञान देने वाला सांख्यशास्त्र अथवा नित्य-नैमित्तिक कर्म अपना
सर्व अष्टांगिक योग भी मेरी प्राप्ति कराने में समर्थ नहीं है अथवा जिसे 'स्वाध्याय' कहते हैं वह वेदाध्ययन
अथवा वायु, जल तथा पके हुए पत्ते खाकर किया जाने वाला तप अथवा संन्यास ग्रहण आदि त्याग ये सब मेरी
भक्ति के बिना दुर्बल हैं। जिस प्रकार बिना नाक का सौन्दर्य अथवा मस्तक बिना सारे अवयव अथवा पति बिना
सुहागन ये सब जिस प्रकार व्यर्थ हैं उसी प्रकार मेरी भक्ति के बिना सभी साधन दुर्बल हैं। उन सब में मुझ तक
पहुँचने का सामर्थ्य नहीं है। लेकिन मेरी भक्ति वैसी नहीं है। वह मेरे प्रेम की अधिकाधिक वृद्धि कर तत्काल
मेरी प्राप्ति कराती है। अन्य किसी के अधीन नहीं होती। जिस समय मेरी भक्ति उत्पन्न होती है तभी मेरी प्राप्ति
होती है। यह बात श्रीकृष्ण उद्धव को बार-बार, प्रसन्नतापूर्वक बताने लगे। हे उद्धव! जिस प्रकार रत्न के साथ
उसका तेज होता है, अरुण के साथ जैसे सूर्य होता है उसी प्रकार भक्ति के पास मैं लक्ष्मीपति खड़ा रहता हूँ। वह
भक्ति जिसके मन में लग गयी उसी समय मैं उसके हाथ लग जाता हूँ। अन्य कितने ही साधन कोई क्यों न प्राप्त
कर ले लेकिन भक्ति के बिना मैं नहीं प्राप्त हो सकता।

चौदहवाँ अध्याय ४०७
भक्त्याहमेकयाग्राह्यः श्रद्धयाऽऽत्मा प्रियः सताम्।
भक्तिः पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात् ॥ २१ ॥
अन्य साधन तथा युक्तियाँ दूर कर मेरी श्रद्धायुक्त भक्ति करने से मेरा लाभ होता है। मन में किसी भी प्रकार
का विकल्प लाये बिना, किसी भी प्रकार की शंका न कर समस्त प्राणिमात्र के प्रति भगवत्स्वरूप की भावना
रखना यही भक्ति का मुख्य लक्षण है। इसी का नाम है भजनभाव। सभी प्रकार की सम्पत्ति के प्रति उदासीन
होकर जब मेरे भजन में आनन्द आने लगे, जितनी मोक्ष की इच्छा नहीं की उससे अधिक मेरे भजन पर विश्वास
किया तो फिर तरने या न तरने का प्रश्न ही कहाँ उठता है। मेरे भजन ने विधि निषेध के सभी वादों को निरस्त
कर दिया। इतने विश्वास से जिनकी भावना भक्ति के अलावा अन्य उपाय स्वीकार नहीं करती उसके ही जीवन
से हमारा जीवन चलता है। वह हमारा आत्मा ही है। ज्ञानियों का आत्मा मैं, भक्तों का प्रिय परमात्मा मैं, शास्त्रों में
जिस पुरुषोत्तम का वर्णन करते हैं वह मैं दौड़ कर उनकी अगवानी करने जाता हूँ। मुझे अनन्य भक्ति पसन्द है
इसलिये मैं उनके ही अधीन रहता हूँ। उनके ही कारण पूरे त्रैलोक्य में मेरी ख्याति है। उनके ही कारण मुझे
महत्त्व प्राप्त हुआ है। उनके ही कारण मुझे अलंकार धारण करने को मिलते हैं तथा पहनने के लिये परिधान
मिलते हैं। उनके ही बल पर मैं सर्वत्र विचरण करता रहता हूँ। मेरी गाँठ में कुछ भी नहीं है। भक्तों ने अपना
सर्वस्व खर्च कर, विविध प्रकार के उपचारों से मुझे महत्त्व प्रदान किया है। मैं नेत्रहीन था उन्होंने मुझे आँखें दीं,
मुझे कान नहीं थे जो उन्होंने मुझे दिये, मैं मुखविहीन था तो उन्होंने मुझे मुख दिया, उनकी ही वाणी से मैं बोलने
लगा। उनके ही कारण मेरा आना-जाना होता है। उनके ही कारण मैं हाथों में तथा पैरों में अलंकार धारण करता
हूँ। उनके ही कारण मुझे निश्चित स्थान प्राप्त हुआ है। उनके ही कारण मुझे सामर्थ्य प्राप्त हुआ है। मेरा नाम
और रूप उन्होंने ही बनाया, मुझे उनके गुणों से ही पवित्रता प्राप्त हुई है। वैकुण्ठ में मेरा स्थान मेरे भक्तों ने ही
अटल बना दिया है। इस प्रकार मेरे भक्तों को मैं भक्ति के ही कारण वशीभूत हुआ हूँ इसलिये रात-दिन मैं उनके
साथ खड़ा रहता हूँ। जन्मरहित होते हुए मैं उनके लिये जन्म लेता हूँ, कर्मशून्य होते हुए मैं उनके ही लिये कर्म
करता हूँ। उनके ही कहने से मैं महान पापियों का नाममात्र से उद्धार करता हूँ। वाल्मीकि इस संसार में महान
पापी था लेकिन नारदजी के कहने से मैंने उसे नामजप की पवित्रता के कारण पूजनीय बना दिया। मुझ पर भक्ति
का इतना अधिकार है। भक्ति के अलावा मैं किसी के भी हाथ नहीं आता। भक्तों के उपकार से मैं बिलकुल झुक
गया हूँ क्योंकि उसके उपकार को चुकाया नहीं जा सकता। इसलिये मैं पूरी तरह उनके अधीन रहता हूँ। उनके
उपकार का बदला चुकाने के लिये मेरी गाँठ में कुछ नहीं रहता। अब जो कुछ थोड़ा-बहुत मैंने उन्हें दिया है वह
भी तुम्हें धीरे से बता देता हूँ। भक्त मेरे ही कारण सनाथ हुए हैं। मेरे ही कारण वे कृतकृत्य हुए हैं। मेरे ही
आनन्द से वे सर्वदा तृप्त हुए हैं और आत्मज्ञान से अभिभूत हो गये हैं। मेरे ही बल पर वे सारी दुनिया पर भारी
हैं। वे प्रहार किये बिना ही सृष्टि को छेद देते हैं। मेरे सामर्थ्य के कारण ही कलिकाल उनके सामने नहीं आ
सकता। मेरे ही कारण वे त्रैलोक्य में किसी की चिन्ता नहीं करते। मेरे ही कारण वे देह में विदेह की भाँति रहते
हैं। मेरे ही बल पर उन्होंने प्रलयकाल को निगल लिया है। मेरे ही बल से उन्होंने जन्म-मरण को नष्ट कर दिया
है। मेरा भजन कर वे सनातन ब्रह्मस्वरूप हो गये। लेकिन यह सब भी उन्हें मैंने नहीं दिया। वे अपने भजन
सामर्थ्य से ही वह सब मुझसे ले गये। उनके आगे मेरी कुछ भी नहीं चलती। मेरा सर्वस्व मेरे भक्त मुझसे लूट
कर ले गये हैं। उन भक्तों ने भजनसामर्थ्य से मुझ अजेय को भी जीत लिया है और मुझे अपने वश में कर लिया
है। मेरा जो आत्मपद भले ही मेरे भक्तों के हाथ में आ गया हो लेकिन उसे मेरे ही अधिकार में रख कर वे

४०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
भक्तिमार्ग से चिपक कर रह रहे हैं। मेरी उस भक्ति की पवित्रता सुन कर तुम्हें आश्चर्य होगा लेकिन उसे बताने
में मुझे कोई सन्देह नहीं है। उस भक्ति की सच्ची महिमा सुनो। दांभिक लौकिक छोड़ कर जो शुद्ध भाव से मेरा
भजन करने लगा वह जाति से भले ही चांडाल क्यों न हो फिर भी वह मुझे अत्यन्त पूज्य है। अमंगल रीछ
अथवा वानर अथवा छाछ पीने वाले तथा जंगलों में भटकने वाले ग्वालों के लड़कों को भी मैंने पूज्य माना। जो
जाति से भले ही निम्न था किन्तु भक्तिभाव के कारण महत्त्वपूर्ण हो गया। वह मत्स्वरूप तक पहुँच गया और
त्रैलोक्य में पूज्य हो गया। 'विप्रात द्विषड्गुणयुता' इस श्लोक का सारांश यही है। जो ब्राह्मण मेरे भजनमार्ग से
विन्मुख हुआ उस ब्राह्मण की पवित्रता जल गयी समझो। उसकी अपेक्षा मेरे भजन में भजननिष्ठ होने वाला
चाण्डाल ही श्रेष्ठ है। उसका महान कविश्रेष्ठ तथा ज्ञाता भी वन्दन करते हैं। विदुर वास्तव में दासीपुत्र था।
लेकिन अपनी भक्ति के कारण वह भगवान का प्रिय बना। इसलिये परमार्थ साधने के लिये भाव ही मुख्य है।
जाति का अभिमान उपयोगी नहीं रहता। सचमुच मुझे पाने के लिये मेरी भक्ति ही श्रेष्ठ है। इसीलिये मैंने सबसे
पहले वनचरों का (वानर, रीछ आदि) उद्धार किया। पक्षियों अत्यन्त निन्द्य गिद्ध जटायु का मैंने उद्धार किया।
मैंने धर्मव्याध नामक अंत्यज का उद्धार किया। क्योंकि मेरे प्रति उसकी विशुद्ध भक्ति थी। कोई किसी भी जाति
में क्यों न उत्पन्न हुआ हो, लेकिन जिसे मेरी भावार्थपूर्ण भक्ति प्राप्त होती है वही पवित्रता की मूर्ति है यह समझ
लो। मेरे भजन से ही मेरी प्राप्ति होती है। मेरी भक्ति को छोड़ अनेक साधनों का प्रयोग करने अथवा वाद-विवाद
करने से मेरी प्राप्ति नहीं होती। यही तथ्य श्रीकृष्ण बताते हैं।
धर्मः सत्यदयोपेतो विद्या वा तपसान्विता।
मद्भक्त्यापेतमात्मानं न सम्यक् प्रपुनाति हि॥२२॥
मेरी भक्ति के बिना कोई भी कर्म अथवा आचरण करना केवल भ्रम है यह समझ लो। इससे मेरी प्राप्ति
का मार्ग चूक जाता है और उस धर्म का परिणाम अधर्म में होता है अथवा मेरी भक्ति के बिना सत्य भाषण करना
भी किसी जन्मांध की तरह ही है क्योंकि उसमें पग-पग पर प्रमाद होता है और वह स्वयं यह नहीं देखता कि
वह पतन की ओर जा रहा है। भक्ति के बिना दया का महत्त्व उसी प्रकार है जिस प्रकार पुरुष के बिना उसकी
सुन्दर स्त्री का जो विधवा होने के कारण धार्मिक कृत्यों से वंचित रहती है। मेरी भक्ति के बिना विद्या अविद्या ही
है यह जान लो। जिस प्रकार कौआ चन्द्रमा को नहीं पहचानता उसी प्रकार वे मेरे आत्मबोध को नहीं पहचानते।
गधा चन्दन का बोझ ढोता है लेकिन चन्दन के गंध का रहस्य वह नहीं जानता। उसी प्रकार मेरी भक्ति के बिना
विद्या और शास्त्र पढ़ना भार ढोने की तरह है। मेरी भक्ति के बिना शरीर शोषण का जो तप मनुष्य करता है वह
मानों पूर्वसंचित के अनुसार पाप ही भोगता है क्योंकि तप की वह क्रिया सत्त्वस्वरूप नहीं होती। मेरी भक्ति के
बिना किया हुआ साधन उस कीड़े की तरह है जो अपने चारों ओर खोल बनाकर उसके भीतर रहता है क्योंकि
भक्ति के बिना जो भी क्रिया की जाती है वह स्वयं के लिये ही बन्धनकारी होती है। सारांश, मेरी भक्ति के बिना
किया हुआ सभी कार्य अप्रामाणिक है। अब उसी भक्ति का शुद्ध स्वरूप भगवान बता रहे हैं।
कथं विना रोमहर्षं द्रवता चेतसा विना।
विनाऽऽनन्दाश्रुकलया शुध्येद् भक्त्या विनाऽऽशयः॥२३॥
स्वेच्छा से हरि की कथा श्रवण करने से अथवा नाना प्रकार के चरित्रों के बारे में सुनने से अथवा हृदय में
निरन्तर मेरे ही स्वरूप का विचार करने से चित्त में परिवर्तन होता है। इससे मेरी भक्ति उत्पन्न होती है। वे मेरे

चौदहवाँ अध्याय ४०९
भजनों के माध्यम से जोर-शोर से मेरा नाम गाते हैं, बड़े भक्ति भाव से रंग जाते हैं जिससे मन में भक्ति का स्रोत
फूट पड़ता है। अंतःकरण में सुख उत्पन्न होने पर बाहर रोमांच उभर आते हैं। उस आत्मानुभव के सुख की
माधुरी प्रेमाश्रु के रूप में नेत्रों से बहने लगती है। मेरी भक्ति की चाह से 'अहं' और सोहं की अभिमान की कड़ी
टूटती है और विषय की आसक्ति समाप्त हो जाती है। उस क्षण का यही लक्षण है कि शरीर रोमांचित हो उठता
है, नेत्रों से आनंदाश्रु बहने लगते हैं और हृदय परिपूर्ण आनन्द से भर जाता है। दोनों नेत्र विस्तृत होकर उनमें का
तेज चमकने लगता है और वे सदा प्रसन्न दिखायी देते हैं। देह का भान नहीं रहता और मन भगवान में रम जाता
है। इस प्रकार यदि मेरे प्रति भक्ति उत्पन्न नहीं होगी तो फिर विषय से विरक्ति कैसे होगी ? और विरक्ति उत्पन्न
हुए बिना उद्धव ! सचमुच मेरी प्राप्ति नहीं होती। मेरी शुद्ध भक्ति जिसे पूर्ण रूप से प्राप्त हुई उसके लक्षणों का
वर्णन और उसकी पवित्रता के बारे में सुनो। जो मेरी भक्ति करता है वह तत्काल पवित्र हो जाता है। इतना ही
नहीं बल्कि वह तो त्रैलोक्य को भी पवित्र करता है ऐसा श्रीकृष्ण ने गरज कर कहा।
वाग् गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च।
विलज्ज उद्गायति नृत्यते च मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति ॥ २४॥
शरीर पर रोमांच उभर आते हैं, पसीने की बूँदें चमकने लगती हैं, चैतन्य से चित्त द्रवित हो उठता है और
उससे वाणी भी सद्गदित हो उठती है। अंतःकरण में आनन्द भर जाते ही दृष्टि अधोन्मीलित हो जाती है, जीव
की शिव से भेंट होती है, ध्येय, ध्याता और ध्यान का त्रिकुट नष्ट हो जाता है। आँखों से अश्रु की वर्षा होने
लगती है, गला भर आता है, शरीर पर नियंत्रण नहीं रह पाता और वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ता है। वह जोर-
जोर से आक्रोश करता है और रोने लगता है। बार, बार फफक-फफक कर रोने लगता है। रोते-रोते बीच में ही
जोर-जोर से हँसने लगता है। जिस प्रकार भूत-बाधा होने से आदमी पागल हो जाता है, उसी प्रकार उसकी
अवस्था हो जाती है। वह रोना और हँसना नहीं छोड़ता और उसमें ही ऐसी आश्चर्यजनक चाह उत्पन्न होती है
कि आत्मस्वरूप से प्रेम हो जाने के कारण वह उसी अर्थ को लेकर बार-बार गाने लगता है। 'मेरा' और 'तेरा'
भूलकर, लोकलाज छोड़ कर, अत्यंत हर्ष से, प्रेम की चाह के कारण शंकामुक्त होकर नाचने लगता है। उसके
भी लक्षण बताता हूँ, सुनो। कोई बालक भटक कर जब माँ से बिछड़ जाता है, वह माँ को खोजने लगता है
लेकिन वह कहीं नहीं मिलती और जब वह मिलती है तो बालक फुक्का फाड़ कर रोने लगता है और माँ उसे
अपने कलेजे से लगा लेती है। उसी प्रकार जीवात्मा और परमात्मा इन दोनों का भ्रांतिनगर में बिछोह हो जाता है,
एक बार उनका मिलन होते ही जीव बिलख-बिलख कर रोने लगता है। अनेक दिनों के पश्चात भेंट होने के
कारण दोनों ऐक्यभाव से गले मिलते हैं, उस आनन्द से गला भर आता है और रुलाई आ जाती है। भगवान
अनेक प्रकार से नाटकीय है। वह मायावी होने के कारण किसी को मिल नहीं पाता। वह घर में ही मिल जाता है
और आश्चर्य से, तटस्थ होकर देखता रहता है। भगवान सदा पास में ही रहता है। उसके लिये पागल होकर लोग
उसे देश-परदेश में ढूँढ़ते रहते हैं। यह देखकर उसे हँसी आ जाती है। भगवान सबके लिये अजेय है लेकिन उस
भगवान को मैंने जीत लिया और अपने हृदय में रख लिया इस आनन्द से वह नाचने लगता है। दूजेपन की बात
समाप्त कर मैंने भगवान को जीत लिया और संसार में यशस्वी हुआ इस आनन्द से वह नाचने-गाने लगता है।
देखने पर दूसरा कोई दिखायी नहीं देता इसलिये वह लाज करना भी छोड़ देता है और संसार में निर्लज्ज बन
जाता है। उसकी निर्लज्जता का यह कारण है। इस प्रकार मेरे भक्त भक्तियुक्त होकर आत्मानंद से नाचते-गाते

४१० श्रीमद् एकनाथी भागवत
रहते हैं। उनके उस आनन्द से त्रैलोक्य पवित्र हो जाता है। जिनके चरणों का दर्शन होते ही जड़ जीवों का उद्धार
होता है, उनके चरणों की धूल लगने पर भी पशु और पाषाण का उद्धार होता है। कीर्तन के महाघोष ने संसार के
सारे दुःख नष्ट कर दिये, सारा ब्रह्माण्ड आनन्द से भर जाने के कारण वह अत्यन्त सुख से ओत-प्रोत रहता है।
किसी ने दर्शन से तारा, किसी ने स्पर्श से तारा तो किसी ने उपदेश से तारा। कोई कीर्तन से तरे तो कोई
नामस्मरण से तर गये। उद्धव! इस प्रकार उन्होंने जगत का उद्धार किया। जीव अविद्यायुक्त होने के कारण मलिन
रहता है। उसे शुद्ध होने के लिये मेरी भक्ति ही मुख्य साधन है, यह ध्यान में रखो। यही बात श्रीकृष्ण स्वयं
बताते हैं।
यथाग्निना हेम मलं जहाति ध्मातं पुनः स्वं भजते च रूपम्।
आत्मा च कर्मानुशयं विधूय मद्भक्तियोगेन भजत्यथो माम्॥ २५॥
मिलावटी सोना मलिन हो जाता है। उसे पानी से कितनी ही बार धोने पर भी उसमें शुद्धता नहीं आती।
लेकिन उसी सुवर्ण का पत्ता बनाकर उसे अग्नि में तपाने से उसका मैल जल जाता है और वह शुद्ध होकर पहले
जैसा चमकने लगता है। उसी प्रकार अविद्या और सकाम कर्म से जो मलिन हुआ रहता है उसके चित्त की शुद्धि
करने के लिये मेरी भक्ति यही एक उपाय है। उसी के योग से जीव के मल का क्षालन होता है। अंतःकरण पर
जैसे-जैसे भक्ति का पुट चढ़ता है वैसे-वैसे अविद्या के बन्धन ढीले होते जाते हैं, माया का मूल ही नष्ट हो जाता
है और जीव आत्मपद को प्राप्त कर लेता है। अविद्या का बन्धन टूट जाने पर उस ज्ञानस्वरूप तथा शुद्ध जीव को
पूर्ण बोध होता है और उस आत्मबोध के कारण उसे अत्यन्त आनन्द होता है। जीव को जो अविद्या प्राप्त है
उसकी निवृत्ति ज्ञान से होगी। तो फिर वहाँ भक्ति की क्या आवश्यकता है ऐसी शंका तुम करोगे। तो मेरी भक्ति
के बिना ज्ञान उत्पन्न ही नहीं होता इसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं।
यथा यथाऽऽत्मा परिमृज्यतेऽसौ मत्पुण्यगाथाश्रवणाभिधानैः।
तथा तथा पश्यति वस्तु सूक्ष्मं चक्षुर्यथैवाञ्जनसम्प्रयुक्तम्॥ २६॥
मेरा वेदशास्त्रों ने बनाया स्वरूप, मेरे नाना प्रकार के चरित्र और मेरी पवित्र कथाओं का श्रवण, मनन
अथवा कीर्तन आदि से चित्त का क्षालन कर जो भी मेरी भक्ति करता है उसकी अविद्या की निवृत्ति होती है और
श्रुति को तथा वेदान्त को भी मेरे अतर्क्य स्वरूप की प्राप्ति होती है। जो अत्यन्त सूक्ष्म और निर्गुण रहता है वह
अलक्ष्य होने के कारण दृष्टिगोचर नहीं होता इतना गहन होता है, वही स्वरूप जीव को प्राप्त होता है और मेरे
भजन से उसका समाधान होता है। जिसकी आँखों में अंजन लगा रहता है वह पृथ्वी के अन्दर का खजाना भी
देख सकता है, उसी प्रकार मेरे भजन से ज्ञान प्राप्त कर जीव ज्ञानस्वरूप हो जाता है। उद्धव! यह एक बात ध्यान
में रखो कि यहाँ अधिक परिश्रम की आवश्यकता नहीं है। जिसके चित्त में जैसा भाव रहता है वैसा ही फल उसे
प्राप्त होता है।
विषयान् ध्यायतश्चित्तं विषयेषु विषज्जते।
मामनुस्मरतश्चित्तं मय्येव प्रविलीयते॥ २७॥
जो विषयों का ही ध्यान करता है वह विषयों में ही मग्न रहता है। जो सदा मेरा ही चिन्तन करता है, वह
ज्ञानस्वरूप मैं ही बन जाता हूँ। पत्नी मैके जाती है उस समय उसका ध्यान करते ही मन में उसकी मूर्ति साकार

चौदहवाँ अध्याय ४११
हो उठती है। इतना ही नहीं बल्कि अपने हावभाव तथा नेत्र कटाक्ष से वह पुरुष को सकाम कर देती है। जो
सामने नहीं है उस स्त्री का ध्यान करने से वह जब साक्षात प्रकट हुई मालूम होती है और मैं तो स्वतः सिद्ध हृदय
में रहता हूँ, अतः मेरा चिन्तन करने से सहज ही मद्रूपता प्राप्त होगी। प्यार से होने वाला मेरा चिन्तन, चित्त,
चिन्ता तथा चिन्तन क्रिया ये सब नष्ट होकर वह पुरुष स्वयं ही ज्ञानरूप हो जाता है। इसी का नाम है मद्रूपता।
अरे! मुझे प्राप्त करने का मुख्य साधन यही है। मेरा ध्यान और मेरा भजन करने से मत्स्वरूपता प्राप्त होती है।
मेरे सिवा और जो भी ध्यान किया जाता है वह सब जीव के लिये दृढ़ बन्धन होता है। इसलिये विषय का ध्यान
छोड़ कर मेरा ही चिन्तन करते रहना चाहिये।
तस्मादसद्भिध्यां यथा स्वप्नमनोरथम्।
हित्वा मयि समाधत्स्व मनो मद्भावभावितम्॥ २८॥
जो सत्य दिखायी देता है किन्तु नाशवान रहता है, उसे 'असत' कहते हैं। जो 'भ्रमरूप' होकर केवल
भासमान रहता है उसी प्रकार जो इस लोक में तथा परलोक में अपने सौन्दर्य से मन को लुभाता है और अविचार
के बल से मन को मोहित करता है; इसलिये अनेक जीव अनेक प्रकार के प्रयास कर दुःखी हो रहे हैं। बड़े कष्ट
से साधना कर स्वर्गभोग का स्थान प्राप्त किया लेकिन वह भी स्वप्न के मनोरथों की तरह नश्वर ही रहता है।
इसलिये विषयों का ध्यान करने के बजाय मेरा भजन करना चाहिये और मन को मेरी ही भावना रखने के लिये
जागृत करना चाहिये। सावधान चित्त से मेरा भजन करते समय तथा चित्त को एकाग्र कर मेरा ध्यान करते समय
उसमें जो बाधाएँ आती हैं उनका त्याग किस तरह किया जाय इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण बताते हैं।
स्त्रीणां स्त्रीसङ्गिनां सङ्गं त्यक्त्वा दूरत आत्मवान्।
क्षेमे विविक्त आसीनश्चिन्तयेन्मामतन्द्रितः॥ २९॥
जो मेरी प्राप्ति के लिये अत्यन्त व्याकुल हुआ हो उसे स्त्री संग का विचार ही छोड़ देना चाहिये। उसे मुझ
भगवंत का चिन्तन करना चाहिये तथा एकान्त में रहना चाहिये। स्त्री की संगति की अपेक्षा स्त्री लंपट पुरुषों की
संगत अधिक घातक तथा हानिकारक है। उनसे भेंट नहीं करनी चाहिये उनसे बात नहीं करनी चाहिये, उन्हें दूर
से भी नहीं देखना चाहिये। जो साधक है उसे काया, वाचा, मनसा स्त्री तथा स्त्रैण इन दोनों की संगत छोड़ देनी
चाहिये और मन में उन्हें पुनः देखने की इच्छा न हो इसलिये अंतःकरण को दृढ़ करना चाहिये। फिर किसी
एकान्त, निर्जन स्थान में, प्रशस्त एवं पवित्र स्थान पर आसन लगा कर मेरा चिन्तन करना चाहिये। आलस त्याग
कर वृत्ति को सावधान रखना चाहिये और फिर मन को एकाग्र कर मेरा ध्यान करना चाहिये। किन्तु मेरे साधकों
के लिये स्त्री और स्त्रीलंपट पुरुष ये दो बड़ी बाधायें हैं, जो मेरे ध्यान का विध्वंस कर विघ्नरूप से मेरी प्राप्ति के
आड़े आती हैं।
न तथास्य भवेत् क्लेशो बन्धश्चान्यप्रसङ्गतः।
योषित्सङ्गाद् यथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गतः ॥ ३०॥
अविद्या के अनन्त कोटि समुदाय स्त्रीसंग में भरे रहते हैं। स्त्री को मात्र देखने भर से अधर्म की ज्वाला
भड़क उठती है। जो महामोहों की राशि है, जो प्रज्वलित कामाग्नि का ईंधन है, जो जीव का बहुत बड़ा भुलावा
है और जो अधःपतन का मुक्त द्वार है, वही स्त्री है। मदन के वे प्रखर बाण, माया का वह यंत्र और नरक का जो

४१२ श्रीमद् एकनाथी भागवत

अंधतम कुण्ड है, वही स्त्री है। उसकी संगति से ज्ञानशक्ति भी अन्धी हो जाती है, वह अनेक प्रकार की आसक्ति
बढ़ाती है और जिसके संयोग से स्वार्थ की भी विस्मृति होती है। उसके लिये अनेक प्रकार का संसार करना
पड़ता है, जिसके लिये असह्य गर्भवास सहन करना पड़ता है, जिसके लिये जीव के लिये वज्रपाश जैसे विषय
विलास भोगने पड़ते हैं। जो निरन्तर दुःख और शोक सहकर नरक की यातना सहती है उस साक्षात माँ को शत्रु
समझ कर उसके लिये पत्नी सगी हो जाती है। जो मातृप्रेम में दुराव उत्पन्न करती है, जो बन्धु प्रेम को बिगाड़ती
है, जो निरन्तर अपने नखरे में पुरुष को बाँधे रखती है, वह अधर्मरूपी जंगल में छोड़ देती है। उसके नेत्रकटाश
अत्यन्त प्रखर होते हैं जो एक बार पुरुष के अंतःकरण में घुसने पर उस पर अपनी मोहिनी फैलाते हैं और
जिसका विष कभी नहीं उतरता। इतना कष्ट स्त्री की संगति के कारण होता है। इसलिये जो मेरी प्राप्ति की इच्छा
करता है उसे स्त्री की आसक्ति छोड़ देनी चाहिये। हृदय में उसके प्रति लोभ ही नहीं रहना चाहिये। मन में
उसका स्मरण होते ही वह ज्ञान-ध्यान स्थिति का विध्वंस करती है। हृदय में उसका लोभ नहीं रखना चाहिये।
स्त्रियों की संगति से इतनी अधिक बाधा होती है और स्त्री-लंपट पुरुषों की बाधा तो इससे अधिक होती है। स्त्री
की संगति से प्राप्त होने वाले मोहमद से शायद पुरुष छूट पाये किन्तु स्त्री लंपट पुरुष की संगति से जो बाधा
रहती है वह तो अपार है। चुडाल स्त्री की संगति से राजा शिखिध्वज तर गया अथवा मदालसा की संगति से
कुवलयाश्व राजा तर गया। लीला नामक स्त्री ने भक्ति की साधना से सरस्वती को प्रसन्न किया जिससे उसके
पति का उद्धार हुआ यह सब वसिष्ठ मुनि ने अपने ग्रन्थ में लिखा ही है। इस प्रकार स्त्रियों की संगति से पुरुषों
के उद्धार की बातें सुनते हैं। किन्तु स्त्री लंपट पुरुष की संगति से उद्धार होने का कोई मार्ग नहीं है। जो स्त्री का
अंकित होकर रहता है, जो स्त्री के लिये स्वयं को प्राणों सहित बेच देता है, जो स्त्री का गुलाम बनता है और
उसके कहने के अनुसार आचरण करता है, जो आकाश में संचार करने वाली कुलदेवता की तरह स्त्री की पूजा
करता है और जो उसकी ही सेवा करने के लिये नाना प्रकार के उपचार करने के लिये तत्पर रहता है, वह किसी
सम्बन्धी का छल करने का निश्चय करती है तो वह उस व्यक्ति पर श्वान की तरह भूँकता है और जब वह स्त्री
उसे दुत्कार देती है तो वह दुम दबा कर भागता है। अच्छे और सुस्वादु पकवान वह स्वयं नहीं खाता और स्त्री के
हाथ में उन्हें देकर अपनी सत्ता समाप्त कर देता है। मानों कोई कार्य उसकी इच्छा के विरुद्ध हो जाय तो ब्रह्माण्ड
ही उलट जायेगा। मानों उसकी बात व्यर्थ हो जाने पर सुख ही उलट जायेगा। मानों उसकी बात व्यर्थ हो जाने पर
सुख का क्षीर सागर सूख जायेगा। देवी की, कुलदेवी की पूजा न करना, माँ-बाप के साथ छल करना, गुरु को
भी फँसाना तथा अपना सर्वस्व स्त्री को अर्पण करना। सारांश वह मदारी के बन्दर की तरह पत्नी के चारों ओर
नाचता रहता है। ऐसे स्त्री लंपट पुरुष का साथ होने पर साधक को सुख कहाँ से प्राप्त होगा ? जिसके मुख से
स्त्री सम्बन्धी बातें सुनकर ही ज्ञाताओं के मन में कामवासना उत्पन्न होती है और जो तत्काल कामवासना उत्पन्न
कर स्त्रियों के मोहजाल में फँसाता है ऐसे स्त्रीलंपट की संगत से साधक को सुख की प्राप्ति कैसे हो पायेगी ?
वह उसे अधःपतन की ओर ले जाकर नरक में अवश्य डाल देगा। इसीलिये स्त्री लंपट पुरुष की कथा या वार्ता
भी कान से नहीं सुननी चाहिये। उसकी वायु से भी बचना चाहिये। उससे मिलना नहीं चाहिये, उससे बात नहीं
करनी चाहिये, उसे देखना भी नहीं चाहिये अथवा उसके पीछे-पीछे भी नहीं जाना चाहिये। जिस मार्ग पर वह
जा रहा हो उस मार्ग का भी त्याग करना चाहिये। स्त्री और स्त्रैण की संगत से जितना दुःख प्राप्त होता है उतना
दुःख त्रिभुवन में भी कहीं दिखायी नहीं देता। स्त्री की इच्छा के वश होकर रहना इसी का नाम है स्त्री लंपटता।
स्त्री के अधीन रहना अत्यन्त निंद्य होने के कारण परमार्थ में अत्यन्त बाधक होता है। हमारे हृदय में जो

चौदहवाँ अध्याय ४१३
कामासक्ति है वही स्त्री संग की प्राप्ति के लिये कारणीभूत है। अगर वहीं विरक्ति उत्पन्न हो जाय तो फिर स्त्री
की प्राप्ति कौन पूछता है? भगवान ने भाव विह्वल होकर उद्धव से यह बात कहीँ। वह सुनकर उद्धव ने भी
अंतःकरण में विचार किया। जिससे प्रबल विरक्ति उत्पन्न होती है, विषयासक्ति की बाधा भी नहीं होती उस ध्यान
के सम्बन्ध में उसने भगवान से पूछा। वैसा ध्यान लगने से स्त्री-पुरुष का भान ही नहीं रहता और जीव में
ज्ञानजन्य संतोष उत्पन्न होकर जो संतोष प्राप्त होता है उसके सम्बन्ध में उसने भगवान से प्रश्न किया।
उद्धव उवाच
यथा त्वामरविन्दाक्ष यादृशं वा यदात्मकम्।
ध्यायेन्मुमुक्षुरेतन्मे ध्यानं त्वं वक्तुमर्हसि॥ ३१॥
उद्धव ने कहा, "हे कमलनयन! हे जगज्जीवन! मुमुक्षु जन तुम्हारा जो ध्यान करते हैं उसका लक्षण मुझे
बताओ। वह ध्यान सगुण होता है या निर्गुण? उसका स्वरूप कैसा रहता है? वर्ण कैसा रहता है? सब कुछ
यथासांग बताने की कृपा करो। जिसमें निमग्न होने पर वहाँ से मन हटता ही नहीं है, उसका माधुर्य इतना होता है
कि वह तुम्हें भी अच्छा लगता है, ऐसे ध्यान के बारे में मुझे बताइये।" उद्धव का यह प्रश्न सुनकर भगवान
उत्तम ध्यान के लक्षण के रूप में आसन और प्राणायाम का ही निरूपण करते हैं।
श्रीभगवानुवाच
सम आसन आसीनः समकायो यथासुखम्।
हस्तावुत्सङ्ग आधाय स्वनासाग्रकृतेक्षणः॥ ३२॥
अब आसन का लक्षण सुनो। पाषाण का आसन करने से व्याधि उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है। केवल
जमीन पर बैठना तो और भी कठिन और दुःखदायी है। लकड़ी का आसन बनाने से मन भी सूखी लकड़ी की तरह
शुष्क एवं निर्दयी बनता है। तृण का आसन बनायें तो जिस प्रकार उसमें चित्र विचित्र अंकुर निकले रहते हैं उसी
प्रकार मन में भी अनेक प्रकार के विकल्प उत्पन्न होते हैं। वृक्ष के पत्तों का आसन बनायें तो चित्त सदैव हिचकोले
ही खाता रहता है। जारण, मारण अथवा स्तम्भन करना हो तो काले आसन का प्रयोग करना चाहिये। ज्ञानार्जन के
लिये मृगचर्म उपयुक्त है। व्याघ्रचर्म का आसन मोक्षसिद्धि के लिये फलदायी है। श्वेत कम्बल का आसन बनाने से
मोक्ष आदि अनेक प्रकार की सिद्धियाँ साधकों को प्राप्त होती हैं। जमीन निर्मल तथा समतल हो और वहाँ किसी
के उपद्रव की सम्भावना न हो ऐसे स्थान पर आगे कहे गये ढंग से उत्तम लक्षणों से युक्त आसन तैयार करना
चाहिये। कुशा, वस्त्र, कम्बल, चर्म आदि से तैयार किये गये आसन का प्रयोग करना चाहिये। वह अत्यधिक ऊँचा
या नीचा नहीं होना चाहिये। चारों ओर से एक जैसा होना चाहिये। आसन ऊँचा होने पर वह डगमगाने लगता है
और नीचा होने पर उसमें भूमिदोष की सम्भावना होती है। इसलिये आसन समतल तथा एक जैसा होना चाहिये।
वह कोमल तथा मुलायम होना चाहिये। फिर शुद्ध मुद्रा के साथ वज्रासन अथवा कमलासन लगाना चाहिये अथवा
जिसमें आनन्द प्राप्त हो ऐसा सहजासन लगाना चाहिये और फिर मेरुदण्ड को सीधा रखना चाहिये, शरीर को
बिलकुल सीधा रखना चाहिये और मूलाधारादि जो तीन बंध हैं उन्हें ठीक तरह से साधना चाहिये। ऐसा आसन
लगाने पर उस आसन पर दोनों हाथों के फैले हुए पंजे दोनों जाँघों पर उलट कर रखने से बहुत सुन्दर लगते हैं।
फिर नाक का ऊपरी हिस्सा दूर रख केवल नाक के अग्रभाग पर दृष्टि केन्द्रित करनी चाहिये। उसी स्थान पर

४१४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अग्निचक्र होता है जिसमें योग का श्रेष्ठ साधन होता है। इस प्रकार धीरे-धीरे अभ्यास करते रहने से योगाभ्यास
तथा योगसामर्थ्य से, उस समय ध्यान के बाद होने वाले चित्तस्थैर्य के संयोग से नेत्र अधोन्मीलित हो जाते हैं। भेद
से तत्काल अभेद में दृष्टि स्थिर हो जाने पर वह अन्य पदार्थों को न देखकर नासाग्रि में दृढ़ हो जाती है। किन्तु
आसन की जय, तीनों बंधों की प्राप्ति तथा दृष्टि की स्थिरता साधक को किस रीति से प्राप्त होगी ? उद्धव ! तुम्हारे
मन में यदि ऐसी शंका आती है तो उस अभ्यास का प्रकार भी मैं तुम्हें यथार्थ रीति से बताता हूँ।
प्राणस्य शोधयेन्मार्गं पूरकुम्भकरेचकैः।
विपर्ययेणापि शनैरभ्यसेन्निर्जितेन्द्रियः ॥ ३३ ॥
अभ्यास का पहला लक्षण है प्राण का भाग शुद्ध करना। पूरक, कुंभक तथा रेचक यही प्राण और अपान
वायु को शुद्ध करते हैं। जिह्वा तथा लिंग के स्वैराचार पर जो काबू पा सकता है वही यह प्राणायाम कर सकता
है। अन्य कोई कितना भी परिश्रम क्यों न करे लेकिन उससे वह नहीं सधेगा। प्राण का शुद्धिकरण किस प्रकार
किया जाता है, सुनो। पूरक, कुंभक तथा रेचक करने के बाद तत्काल रेचक, पूरक और कुंभक इन दोनों का
अभ्यास करना चाहिये। पहले ईडा (बायां नथुना) से वायु भीतर खींच लेनी चाहिये, फिर उसे वैसे ही रख कर
बाद में वैसे ही बाहर छोड़ना चाहिये। यह एक लक्षण है अथवा दायें नथुना से वायु भीतर खींचनी चाहिये और
उसी से बाहर छोड़नी चाहिये। यह प्राणायाम का दूसरा लक्षण है ऐसा ज्ञाता बताते हैं किन्तु जो लक्षण सभी को
स्वीकार है उसके अनुसार बायें नथुने से वायु भीतर खींचनी चाहिये, कुम्भक से उसे भीतर रोक कर रखना
चाहिये और फिर दाहिने नथुने से उसे बाहर छोड़ना चाहिये अथवा दाहिने नथुने से वायु भीतर लेनी चाहिये, उसे
कुम्भक से रोक कर रखना चाहिये और फिर उसे बायें नथुने से बाहर छोड़ना चाहिये। लेकिन यह योगाभ्यास के
विरुद्ध है। इसलिये उसमें फेरबदल नहीं करना चाहिये और क्रम नहीं बदलना चाहिये। किसी भी प्रकार की
जल्दबाजी न कर शान्त चित्त से धीरे-धीरे अभ्यास करना चाहिये। इसमें यदि जल्दबाजी की तो प्राण संकट में
पड़ जायेंगे। चींटी पर्वत पर चढ़ना शुरु करती है और चढ़ती जाती है, नीचे नहीं गिरती है लेकिन यदि उत्तम
घोड़ा भी चढ़ने लगे तो काफी परिश्रम के बाद भी वह चढ़ नहीं पायेगा। उसी प्रकार इस योगाभ्यास में ज्ञान और
बुद्धिमानी काम नहीं आती। बुद्धिमानी का अहंकार करने वाले का अधःपतन ही होता है। वह उस मार्ग पर आगे
नहीं चल पाता। उद्धव ! उस चींटी की ही तरह जो धीरे-धीरे योगमार्ग पर चलने का प्रयत्न करता है वही
सचमुच ओंकार के मस्तक पर चढ़ता है इसे ध्यान में रखो। पक्का अभ्यास हो जाने पर, जिस प्रकार समरांगण में
शूर योद्धा बिना किसी रुकावट के चलता है, उसी प्रकार साधक की इच्छा के अनुसार प्राणवायु चलता है।
अभ्यास गाढ़ा होने के कारण यदि प्राण उबल रहा हो तो वह प्राण और अपान का भेद ही तोड़ देता है और चक्र
के परदे फाड़ देता है। यहाँ मेरा भजन दो प्रकार का होता है। पहला योगमुक्त और निर्गुण का रहता है और दूसरा
ओंकार के अभ्यास से सगुण करते रहते हैं। उसका भी लक्षण सुनो। अब प्राणायाम के भेद सुनो। इसमें सगर्भ
प्राणायाम तथा अगर्भ प्राणायाम ये दो प्रकार हैं। सगर्भ प्राणायाम शास्त्रोक्त मार्ग से शुद्ध है और सगुणध्यानादिकों
से सम्बन्धित, दूसरा अगर्भ प्राणायाम है।
हृद्यविच्छिन्नमोङ्कारं घण्टानादं बिसोर्णवत्।
प्राणेनोदीर्य तत्राथ पुनः संवेशयेत् स्वरम् ॥ ३४ ॥
ओंकार का दीर्घ उच्चार यदि वाणी नहीं कर पाती है तो वही ओंकार हृदय में निरन्तर चलता रहता है। वह

चौदहवाँ अध्याय ४१५
घंटानाद की तरह अखण्ड चलता रहता है। कमलनाल के सूक्ष्म तंतु की तरह मूल से ब्रह्मरन्ध्र के अन्त तक
प्राणायाम से प्रणव का आभास होता है। वहाँ अत्यन्त दीर्घ स्वर में नाद होता है इसलिये अत्यन्त सूक्ष्म रीति से
प्रणव का भास होता है। उसे प्राणायाम से स्थिर, अखण्ड रूप तथा नादयुक्त करना चाहिये।
एवं प्रणवसंयुक्तं प्राणमेव समभ्यसेत्।
दशकृत्वस्त्रिषवणं मासादर्वाग् जितानिलः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार स्वर, वर्ण और मात्रा इनसे भी निराला अत्यन्त श्रेष्ठ तथा अदृश्य ऐसा जो (ॐकार) है उसे
कितने ही पुरुष अभ्यास के सामर्थ्य से स्वयं इन्द्रियों को वृत्तिगोचर कर लेते हैं। उस उच्चार का चमत्कार
आश्चर्यजनक है। वह ऊर्ध्वमुख होकर अखण्ड अस्तित्व में रहता है। उसी झंकारयुक्त तथा नादमय प्रणव को
अभ्यास के योग से स्थिर करते हैं। इस प्रकार आलस्य का त्याग कर प्रणव का त्रिकाल अभ्यास करते समय
धीरे-धीरे दस आवृत्तियाँ करने से, जिस प्रकार कोई महासाध्वी पतिव्रता अपने पति के वचन का जरा भी
उल्लंघन नहीं करती, उसी प्रकार एक माह पूरा होने के भीतर ही यह प्राणजप साध्य होता है। इस अभ्यास में
सतत दक्ष रहने पर वह पुरुष योगाभ्यास का रहस्य सहज ही प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार प्राणनिरोध साध्य होने
से भजन की स्थिति भी दो प्रकार की होती है। पहली शास्त्रोक्त विधि से सगुणोपासना तथा दूसरी योगाभ्यास से
निर्गुणोपासना। लेकिन दोनों का समाधान निर्गुण में ही मिलता है, यह ध्यान में रखो। इन दोनों का उपलक्षण
श्रीकृष्ण संक्षेप में बताते हैं। अरे! ॐकार का स्मरण ही जहाँ नष्ट होता है और यदि स्मरण किया ही तो स्वर के
साथ प्राण ही प्रणव में भर जाता है और फिर अखण्ड आकार से उल्हास पाने वाला प्रणव ही स्फुरण करता रहता
है। जहाँ से अक्षरों का उद्गम होता है और बोलने के बाद शब्द जिसमें समाविष्ट होते हैं और फिर जो स्फूर्ति
शेष रहती है, उसी को सचमुच प्रणव कहते हैं। उस प्रणव के ही आधार पर छहों चक्र जीतने पर प्रणव आगे
बढ़कर निश्चयपूर्वक चलने लगता है। तब कुण्डलिनी शक्ति के जोर और वैराग्य की प्रबलता के कारण वह
सुषुम्ना नाड़ी (इडा और पिंगला के बीच सुषुम्ना नाड़ी है) के द्वार का मार्ग तत्परता से पार कर पश्चिम मार्ग के
पहले स्थान को प्राप्त कर लेता है। उस समय दशनादों के घोष से विजय का निशान लहराने लगता है। तब आगे
चलने का जो योगमार्ग है वह अपने आप ही आगे आता है। वहाँ औटपीठ और गोल्हार अत्यन्त आनन्द और
उत्साह से दोनों चक्रों का मार्ग जीतकर तत्परता से आगे बढ़ने लगते हैं। पीछे का विस्मरण हो जाता है, विकल्प
का भी नाश हो जाता है और जीने की कला प्राप्त हो जाती है। वहाँ सहस्रदल कमलों से छूटी धारायें नीचे की
ओर आती रहती हैं और सीधे स्वानंदजीवन (जीवनकला के निकट) के पास आती हैं। वहाँ का जल
आनन्दपूर्वक सेवन करने से संतप्त हुई जमीन हरी हो जाती है, इन्द्रियों की बेचैनी शान्त हो जाती है और गुणों
की त्रिवेणी डूब जाती है। तब भ्रमर गुफा के अन्दर जीव और शिव की एकान्त में भेंट होती है। उससे जीवत्व
के प्रान्त और वृत्ति इन दोनों का नाश होता है। यहाँ आत्मस्वरूप से ऐक्य हो जाने के कारण शिव और शक्ति का
उत्कृष्ट तालमेल हो जाता है और परमानन्द से शरीर सौष्ठव बढ़ जाता है और सुख का उपभोग ही शेष रह जाता
है। उस समय उद्देश्य, बोलना, दृष्टांत अथवा वेदवाद आदि की बातें समाप्त हो जाती हैं। 'मैं' और 'तू' का अन्त
होता है और अकेला एकान्त शेष रह जाता है। लेकिन यह कहनेवाला भी कोई नहीं रहता इसे ध्यान में रखो। इस
प्रकार जो मेरे योगसामर्थ्य से बलवान हुए उन्हें ही मेरा आत्मसुख प्राप्त हुआ। लेकिन योगमार्ग का यह रास्ता
अत्यन्त कठिन है और उसमें कष्ट भी अनेक हैं। इसलिये इसमें योग की प्राप्ति एकआध को ही होती है। मेरा

४१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
भक्तिमार्ग वैसा नहीं है और उसमें विघ्नों की तो बात ही नहीं है। भक्तों को यही स्थान प्राप्त होता है। उसका भी
प्रकार सुनो। अब इस पर आप कहेंगे कि ''योग कहाँ से मोल लिया ? मूल पद का अर्थ छूट गया है और यह
व्यर्थ की बकवास है।'' क्योंकि इसी श्लोक में भगवान ने कहा है 'मासादर्वाक' (एक माह के अन्दर ही)
प्राणायाम साध्य होता है। इसमें ध्वनितार्थ से योगाभ्यास को बताया गया है। इसीलिये मैंने उसे स्पष्ट किया। जहाँ
प्राणापान पर विजय प्राप्त होती है, वहीं यह महायोग साध्य होता है। यह योग शास्त्रों में वर्णित है। इसीलिये मैंने
उसे शास्त्रीय रीति से स्पष्ट किया। अहो ! प्राणापान का निग्रह हो जाने पर, साधक की योग्यता के अनुसार सगुण
अथवा निर्गुण उपासना के योग से उसके अनुकूल पद की सहज प्राप्ति होती है। एक बार प्राणापान पर विजय
प्राप्त हो जाय और सगुणोपासना पूर्ण हो जाय तो उस योग से किस प्रकार निर्गुण की भी प्राप्ति होती है यह
श्रीकृष्ण उद्धव से बता रहे हैं। तुम्हारा ध्यान किस प्रकार का है ? यह प्रश्न उद्धव ने किया इसलिये सगुण ध्यान
का निरूपण कर तत्काल निर्गुण स्वरूप की सिद्धता करके दिखा दी। मछली पकड़ने के लिये जिस प्रकार
आमिष का प्रयोग किया जाता है उसी प्रकार चित्त को पकड़ कर रखने के लिये सगुण मूर्ति की योजना की जाती
है। उसी मूर्ति का सगुण स्वरूप श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
हृत्पुण्डरीकमन्तः स्थमूर्ध्वनालमधोमुखम्।
ध्यात्वोर्ध्वमुखमुन्निद्रमष्टपत्रं सकर्णिकम्॥ ३६॥
केले के फूल की तरह हृदय में अष्टदलात्मक कमल होता है। उसका मुँह नीचे की ओर तथा डंठल ऊपर
की ओर होता है और वह बिलकुल कोमल होता है। इसीलिये प्राणायाम के सामर्थ्य से हृदयकमल को ऊर्ध्वमुख
कर पूर्ण एकाग्रता से ध्यान करते हुए अष्टदल कमल को विकसित करना चाहिये। वहाँ अधोभाग में मुख और
नीचे डंठल इस प्रकार हृदय कमल की स्थिति का ध्यान करने के बाद उसकी आठों पंखुड़ियाँ प्रफुल्लित हुई हैं
ऐसी धारणा बना कर मन में स्थिर करना चाहिये।
कर्णिकायां न्यसेत् सूर्यसोमाग्नीनुत्तरोत्तरम्।
वह्निमध्ये स्मरेद् रूपं ममैतद् ध्यानमङ्गलम्॥ ३७॥
फिर उसकी कर्णिका में सोलह कलाओं से युक्त चन्द्रमण्डल है ऐसी कल्पना कर उसका ध्यान करना
चाहिये और उसके भीतर बारह कलाओं से युक्त देदीप्यमान सूर्यमण्डल है ऐसी कल्पना करनी चाहिये। उसके
भी अन्दर इसे कलाओं से युक्त धधकता अग्निमण्डल है ऐसी कल्पना कर अग्निमण्डल में मेरी अत्यन्त मंगलमय
दिव्य मूर्ति है ऐसा ध्यान करना चाहिये।
समं प्रशान्तं सुमुखं दीर्घचारुचतुर्भुजम्।
सुचारुसुन्दरग्रीवं सुकपोलं शुचिस्मितम्॥ ३८॥
समानकर्णविन्यस्तस्फुरन्मकरकुण्डलम्।
हेमाम्बरं घनश्यामं श्रीवत्सश्रीनिकेतनम्॥ ३९॥
उद्धव ! अब मेरी मूर्ति का ध्यान कैसा रहना चाहिये इसे ध्यानपूर्वक सुनो। यह कहकर श्रीकृष्ण अपनी
मूर्ति का ध्यान स्वयं ही बताने लगे। न बहुत ऊँची न बहुत नाटी, सभी अवयव समान प्रमाण में, बैठक भी
समतल, सुडौल और पुष्ट शरीर इन लक्षणों से युक्त मूर्ति का चिन्तन करना चाहिये। मूर्ति हमारी तरफ मुँह करके

चौदहवाँ अध्याय ४१७
खड़ी है ऐसा ध्यान करना चाहिये। उस मूर्ति का मुखकमल प्रसन्न और अत्यन्त रमणीय होना चाहिये। वह इस
प्रकार हो कि मूर्ति का मुँह देखते ही हृदय में आनन्द भर जाय। कमल की विशाल पंखुड़ियों की तरह कान तक
पहुँचने वाले विशाल नेत्र हों। काजल से रेखांकित काली और धनुष्याकृति भौंहें हों। साँवले ललाट पर पीला
चन्दन हो और उस पर कस्तूरी के दो टीके हों तथा उस पर कुकुमांकित अक्षत लगी हों। नाक और ललाट भव्य
होना चाहिये। ललाट के दोनों ओर की ऊँचाइयाँ तेजःपुंज हो। मुँह नाजुक तथा कोमल हो और होंठ मूँगे के
समान लाल हों और द्वितीया के चन्द्रमा की कला की तरह अत्यन्त सुन्दर ठुड्डी हो। भक्त चकोर को जैसे
चन्द्रमा होता है वैसा ही मनोहर और सुकुमार मुख हो। मुख में हीरे के समान तेजस्वी अथवा अनार के दाने जैसे
तेजयुक्त दंतपंक्ति हो। दोनों ओर समान और सुन्दर कान हों और उसमें मत्स्याकृति कुण्डल लटकते हों। गालों में
मनोहर हास्य खिलता हो और कण्ठ की आकृति शंख जैसी हो। गले में तीस लड़वाली कंठी हो और उसमें
कौस्तुभमणि शोभायमान हो। उसके तेज के प्रकाश का वर्णन कौन कर सकता है? उस तेज के सामने सूर्य भी
फीका लगेगा। स्वाभाविक रूप से ही भुजंग जैसे दीखने वाले अजानबाहु चार हाथ, विशाल वक्षःस्थल हो और
उस पर श्रीवत्स का चिह्न हो। हृदय पर दोनों ओर श्रीवत्स और श्रीनिकेतन; उदर गहरा हो और उस पर तीन
पंक्तियाँ हों, दामोदर चिह्न उसमें प्रकट हो रहा हो। बिजली की चमक जैसा चमकीला, सुवर्ण की आभावाला
पीला पीताम्बर परिधान की हुई घनश्याम की सुशोभित मूर्ति! जिस प्रकार आकाश में चाँदनी छिटकने पर नीले
रंग पर शुभ्र वर्ण की आभा चमकती है उसी प्रकार श्यामवर्ण अंग पर शुभ्र चन्दन का उबटन होने से श्रीहरि की
शोभा अप्रतिम दिखाई देती है।
शङ्खचक्रगदापद्मवनमालाविभूषितम् ।
नूपुरैर्विलसत्पादं कौस्तुभप्रभया युतम्॥४०॥
द्युमत्किरीटकटककटिसूत्राङ्गदायुतम् ।
सर्वाङ्गसुन्दरं हृद्यं प्रसादसुमुखेक्षणम्॥४१॥
कौस्तुभमणि से युक्त कंठ, पैरों तक लटकने वाली वनमाला कमर में परिधान की हुई रत्नों से जड़ित
मेखला और उसमें लगे हुए झुनझुन करने वाले घुँघरू। कर में कंकण और बाहुओं में अंगद, शंख, चक्र, पद्म,
गदा आदि आयुध हों और उँगलियों में नाना प्रकार की रत्नजड़ित मुद्रिकाएँ हों। गहरी और निर्मल नाभि जिसमें
से बालक ब्रह्मा का जन्म हुआ और जो त्रैलोक्यरूपी कमल का भी मूल स्थान है, वह श्रीहरि का नाभिकमल है।
उसके सुडौल, सुन्दर तथा स्वयंभू चरण मणिरत्नों के खम्भों की तरह शोभा दे रहे हैं। हरि के शरीर में वे चरण
अत्यन्त शोभा प्रदान करते हैं और उस श्रीहरि के चरणों पर ध्वज, वज्र, अंकुरा, यवांकित ऊर्ध्व रेखा, पद्म, चक्र
आदि शुभ चिह्न होने के कारण वे अत्यन्त सुन्दर दिखायी देते हैं। इंद्रनील मणि कांति का त्रिकोण बना हो, इस
प्रकार मनोहर, पारदर्शी, श्यामवर्ण और कोमल सुकुमार तलुवों की आरक्त आभा है। तलुवों के नीचे आरक्त
आभा और पैरों के ऊपर साँवली छटा है जिससे संध्या में नीले आकाश पर लाल छटा का आभास होता है।
नभोमण्डल में चन्द्र की रेखा सुशोभित हो रही हो, इस प्रकार उँगलियों के सिरे पर नख शोभा दे रहे हैं।
पिण्डलियाँ भी उसी प्रकार कोमल तथा मनोरम और जंघायें भी अत्यन्त सुन्दर हैं। सिंहों को अपनी कमर पर गर्व
था किन्तु श्रीहरि की कमर देखते ही वे जंगल में भाग गये। अभी भी वे जंगल में ही निवास कर रहे हैं।
लज्जावश वे किसी को मुँह नहीं दिखाते और श्रीहरि की कमर देखने को मिल सके इसलिये वे मेखला पर चित्र

४१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
बन गये हैं। चरणों में नूपुरों का गजर, हाथ में कंकणों की झंकार, मस्तक पर विपुल केश-संभार और पुष्पों से
गुंफित वे सुन्दर केश ! जिस मूर्ति की ओर ध्यान लगते ही भूख-प्यास का भी विस्मरण होता है और एक बार
ध्यान की पकड़ में आ जाये तो सुख का दिन उदित होता है। सुन्दर श्यामवर्ण से युक्त सर्वांग हो, मुद्रा अत्यंत
श्रेष्ठ, उदार और गम्भीर हो मुखकमल सुन्दर और सुप्रसन्न हो और ऐसी मूर्ति का ध्यान किया जाय।
सुकुमारमभिध्यायेत् सर्वाङ्गेषु मनो दधत्।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यो मनसाऽऽकृष्य तन्मनः।
बुद्ध्या सारथिना धीरः प्रणयेन्मयि सर्वतः॥ ४२॥
तत् सर्वव्यापकं चित्तमाकृष्यैकत्र धारयेत्।
नान्यानि चिन्तयेद् भूयः सुस्मितं भावयेन्मुखम् ॥ ४३॥
शायद नेत्रों के कटाक्ष भी चुभें, चन्द्रकिरण भी चुभें ऐसी सुकुमार मूर्ति का ध्यान करना चाहिये ध्यान पर
भक्ति जमने के लिये मूर्ति जितनी कोमल हो उतना ही अच्छा। इन्द्रियजल विषयों पर लुब्ध रहने वाले मन को
काबू में रखकर बुद्धिमान लोग एकनिष्ठा से मेरा ही ध्यान करते रहते हैं। इस प्रकार विषयों पर नियंत्रण कर
अखण्ड मेरा ध्यान करने से हम स्वयं मत्स्वरूप हो जायेंगे इस प्रकार ध्यान लगाना चाहिये। चिन्तन करते समय
यदि मन विचलित होने लगे तो विचारों से तथा बुद्धि के सामर्थ्य से सन्देह रहित होकर मेरा स्मरण करने से
धारणा किये बिना ही ध्यान मन में बैठ जाता है। धारणा भले ही टूट जाय लेकिन ध्यान की छाप नहीं मिटती।
मन मूर्ति में ही रहता है और वही सर्वांग में जम जाता है। प्रत्येक अंग और उपांग पर ध्यान के बहाने जो चित्त
केन्द्रित हो जाता है उसे नियंत्रित कर केवल एकाग्र हास्यवसन पर केन्द्रित करना चाहिये। मूर्ति का सांगोपांग
ध्यान छोड़ कर श्रीहरि के स्वानंदघन हास्यवदन का ही चिन्तन करना चाहिये। "तुम्हारा ध्यान किस प्रकार का
होना चाहिये?" ऐसा उद्धव का प्रश्न था। उसका इस प्रकार उत्तर देकर आत्मस्वरूप के लक्षण भी भगवान
बताते हैं। ध्यान में जो हास्यमुख आयेगा, उसमें मुख को छोड़ कर केवल हास्य का ही ध्यान करना चाहिये।
फिर उस हास्य का भी ध्यान छोड़कर उस हास्य में जो गहरा आनन्द भरा हुआ है उसमें ही अपने मन को लीन
करना चाहिये और उसमें ही सावधान होकर निष्ठा रखनी चाहिये। उस आनन्द से अपना मन आनन्दयुक्त होने
पर साधकों को भी निश्चित रूप से आत्मानंद की प्राप्ति होगी
तत्र लब्धपदं चित्तमाकृष्य व्योम्नि धारयेत्।
तच्च त्यक्त्वा मदारोहो न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥ ४४॥
उस आनन्दपद की प्राप्ति होने पर सर्वत्र चिदाकाश ही दिखायी देने लगता है। उस चिदाकाश में सावधान
होकर चित्त को एकाग्र करना चाहिये। फिर चिदाकाश, चित्त और चिन्तन ये ध्यान के तीनों भेद भूल कर
परमानन्द से परिपूर्ण और भेदशून्य चित्स्वरूप आत्मा जो मैं हूँ, उसमें ही अपनी वृत्ति निमग्न करनी चाहिये। तब
चिदाकाश का ज्ञान, अथवा ज्ञेय, दाता और ज्ञान इनमें से किसी की भी स्फूर्ति शेष नहीं रह जाती।
एवं समाहितमतिर्मामेवात्मानमात्मनि।
विचष्टे मयि सर्वात्मन् ज्योतिर्ज्योतिषि संयुतम् ॥ ४५ ॥
इस प्रकार साधकों की आत्मवृत्ति मेरे स्वरूप में एकरूप हो जाने पर जब वे मत्स्वरूप हो जाते हैं तब 'मैं'

चौदहवाँ अध्याय ४१९
पन की जो स्फूर्ति प्रकट होती रहती है वह भी अद्वैत में विलीन हो जाती है। इस प्रकार उस समय 'मैं' और 'तू'
का आभास भी निःशेष हो जाता है और मेरा परमानन्दात्मक आत्मसौख्य ही अद्वैत स्वरूप से भर जाता है। जिस
प्रकार एक ज्योति जब दूसरी ज्योति मिलती है तो दोनों का मिला कर एक ही तेज हो जाता है, उसी प्रकार जीव
और चैतन्य इन दोनों की स्फूर्ति अद्वैतसुख का लाभ होने से एकरूप हो जाती है। सहस्रों दीपकों में तेल और
बातियाँ डालकर जलाने से अलग-अलग सहस्र दीप जलते हैं लेकिन उन दीपकों में तेज एक ही होता है उसी
प्रकार अद्वैत में जीव ज्ञानरूप ही है। देह और इन्द्रियों की उपाधि के कारण जीव में निरालेपन का आभास होता
है लेकिन अद्वैत का बोध होते ही ऐक्य भाव के कारण जीव आत्मस्वरूप में लीन हो जाता है। तब एक परमसुख
ही शेष रहता है यह कहने वाला भी कोई नहीं रहता। एक अकेला आत्मसुख भर जाता है। जिस प्रकार शक्कर
से ही शक्कर खा कर देखनी चाहिये या पानी को ही पानी में स्नान करना चाहिये या जिस प्रकार निश्चित रूप
से सुगन्ध आने के लिये घृत को ही घृत में प्रवेश करना चाहिये, उसी प्रकार मेरी ध्यान की स्थिति साधकों के
लिये अत्यन्त लाभकारी है। यही बात श्रीकृष्ण उद्धव को बताते हैं।
ध्यानेनेत्थं सुतीव्रेण युञ्जतो योगिनो मनः।
संयास्यत्याशु निर्वाणं द्रव्यज्ञानक्रियाभ्रमः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार तीव्र ध्यानस्थिति से समाधि तक यथाविधि ध्यान करने पर साधक को तत्काल मेरी प्राप्ति होती
है। मेरा यह ध्यान अत्यन्त उत्तम है। वह अगर सदा सर्वदा के लिये मन में अंकित हो जाय तो वह अधिभूत,
अधिदैव और अध्याय यह तीन प्रकार का भ्रम रहने ही नहीं देता। विषय सेवन करने वाला, विषय और विषय
का संभ्रम, ज्ञेय, ज्ञाता और ज्ञानोपक्रम; कर्म, कर्त्ता और क्रिया का भ्रम, इनका नामरूप भी शेष नहीं रहने देता।
उसी प्रकार ध्येय, ध्याता और ध्यान; दृश्य, द्रष्टा और दर्शन; मन, मननकर्त्ता और मनन इनका भान समूल नष्ट
कर देता है। देव, देवी और देवता, भज्य, भजन और भजन करने वाला; लक्ष्य, लक्षण और लक्षिता इनका पता
ही नहीं चल पाता। इससे योग्यता के साथ महायोग, अथवा समाधि सुख का सुखोपभोग अथवा जीव और शिव
का आत्मैक्य, यह बात भी शेष नहीं रह जाती। फिर बोध कैसा ? बोधकर्ता किसका ? बद्धता किसकी ? और
मुक्तता भी किसकी ? ब्रह्मा का नाम इस बात का भी पूरी तरह विलय हो जाता है। सत्, चित् और आनन्द इन
शब्दों का उच्चार, वह भी मुझे माया के ही कारण है। उसे भी स्पष्ट रूप से बताता हूँ, सुनो। असत् (मिथ्या) की
व्याप्ति हटाने के लिये श्रुति मुझे सत् कहती है। जड़ की मिथ्या स्थिति दिखाने के लिये मुझे ज्ञानस्वरूप कहते
हैं। उसी प्रकार दुःख के साथ मेरा सम्बन्ध न आये इसलिये मुझे 'परमानंद' कहते हैं। इस प्रकार मुझे
'सच्चिदानंद' कहना यह भी विद्या की दृष्टि से विपरीत बोध ही है। जहाँ असत् जरा भी नहीं है वहाँ 'सत्'
कहना कैसे सम्भव होगा ? जहाँ अज्ञान ही नहीं है वहाँ 'ज्ञानमय' भी कौन कहेगा ? जब दुःख का अंश भी नहीं
रहता वहाँ सुख किसे कहा जाय ? इसलिये मेरे लिये नामरूप रखना पूर्णतः असंगत है। त्रिपुटी का भान पूरी तरह
नष्ट होना इसी का नाम 'तीव्र ध्यान' है। उसी में मेरा भजन कर साधक आत्मानंद के पात्र बनते हैं। इस प्रकार
मेरी इस ध्यानपद्धति से बड़े चमत्कार से संसार का विलय होता हैं और उद्धव ! आत्मस्वरूप के निश्चय से मेरा
शुद्धस्वरूप ही शेष रह जाता है। उस स्वरूप में न सुख है, न दुःख है। सत् और असत् का उल्लेख भी नहीं है।
अथवा वहाँ ज्ञान और अज्ञान इन कल्पनाओं की बाधा भी नहीं है। उसमें नाम, रूप, गुण 'मैं तू' की पहचान,
विद्या-अविद्या का भान इनमें से कुछ भी नहीं है। सर्वत्र आनन्दघन आत्मस्वरूप ही व्याप्त रहता है। इस प्रकार

४२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
भगवान ने अनेक प्रकार की युक्तियों से उद्धव को भक्तिसुख के झूले पर झुलाया और बोले, मेरी यह भक्ति
अंतःकरण में अंकित होने पर सभी सिद्धियों का लाभ होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। भक्ति से सुख स्वरूपी
दुग्ध निकाल कर और उसका मंथन कर जो सार निकला उसे उन्होंने उद्धव को प्रदान किया। यह चौदहवाँ
अध्याय है। इसमें भगवान ने स्वमुख से कहा, “अहो! मैं केवल भक्ति के वश में हूँ। अन्य सभी उपाय गौण
हैं।'' समस्त योगों का योगसंग्रह स्थान, वेदान्त का प्रमुख भण्डार और सारी सिद्धियों का परम रहस्य यही
वास्तव में हरि की सच्ची भक्ति है। आत्मभाग्य का सच्चा लाभ, महत्सुख का सच्चा प्रेम और सभी बातों का
माधुर्य यही श्रीहरि की एकनिष्ठ भक्ति है। भक्तिपूर्वक भजन करने से चांडाल भी पावन हो गये। जिसने अपना
मन भक्ति पर न्योछावर कर दिया, उसके अधीन भगवान सदासर्वदा रहता है। एकनाथ ने भी मुक्ति की उपेक्षा
कर जनार्दन के प्रति एकनिष्ठ भक्ति समर्पित की है, इसलिये उसके ही प्रसाद से भगवत्प्राप्ति रात-दिन खिलौने
की तरह वश हुई है। वह भले ही उस भगवत्प्राप्ति को स्वीकार न करे लेकिन वह स्वयं ही घर में घुस आती है।
ऐसी गुरुभक्ति के कारण भगवान सर्वांग से खो गया है। जो भगवत्प्राप्ति चाहता हो उसे मेरी भक्ति की उपेक्षा नहीं
करनी चाहिये। जो निरन्तर श्रीहरि का स्मरण करता है, उसके पास भगवान निरन्तर खड़े रहते हैं। सकल भजन
में जिसकी वाणी 'राम' इस दो अक्षर के नाम की गर्जना करती रहती है, वह इस चराचर में धन्य है। एकनाथ
जनार्दन की शरण में जाकर नामस्मरण करते ही जन्म-मरण पीछे लौट गये और महासिद्धियाँ आँगन की दासी के
रूप में खटने लगीं।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे एकाकारटीकायां
श्रीकृष्णोद्धव संवादे भक्तिरहस्यावधारण नाम चतुर्दशोध्यायः ॥ १४ ॥

पन्द्रहवाँ अध्याय
ॐकार स्वरूप श्री जनार्दन को मेरा नमस्कार। तुम्हारे पवित्र चरण सभी सिद्धियों का मूलस्थान है, सभी
निधियों में श्रेष्ठ निधि है और चारों पुरुषार्थ प्रदान करने वाले हैं। जमीन में रखी हुई निधि दिखायी दे इसलिये
लोग आँखों में अंजन डालते हैं लेकिन उससे आँखें ही खराब हो जाती हैं और निधि दिखायी नहीं देती। लेकिन
तुम्हारे चरणों में वह बात नहीं है। तुम्हारे चरणों की रज का वन्दन करने से सारी कालिमा दूर हो जाती है और
निधि का पूर्ण रूप से दर्शन हो जाता है। अंजन डाल कर निधि निकालने जाओ तो वहाँ भी विघ्न उपस्थित हो
जाता है। बलि देकर निधि प्राप्त करने जाओ तो वह भी नश्वर ही रहता है। लेकिन तुम्हारे चरणों की वह बात
नहीं है। उनका सहज स्मरण करने से भी नित्य, सिद्ध, अव्यय आत्मस्वरूप का खजाना हाथ लगता है। यही
निधि साध्य कर सनकादिक भाग्यशाली बन गये। नारद की उदारता की प्रशंसा भी इसी कारण से होती है। प्रह्लाद
को सुरक्षा प्रदान करने वाला वज्रकवच भी इसी कारण प्राप्त हुआ। शुक वामदेव आदि को भी इसी कारण महत्त्व
प्राप्त हुआ है। व्यास वाल्मीकि ने हरिभक्ति का जो इतना बड़ा व्यवहार किया उसका कारण यही था कि वे इसी
पूँजी पर बलवान हुए थे और इसीलिये उनकी प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। उन्होंने ही निर्माण की हुई पुराण आदि पूँजी
के आधार पर छोटे-बड़े लोग अपनी दरिद्रता मिटा कर सुख से जीवनयापन कर रहे हैं। उस सद्गुरु के पवित्र
चरण श्रेष्ठ निधियों की भी निधि है। एका उस जनार्दन की शरण में है यही हमारी परिपूर्ण पूँजी है। उसी पूँजी से
प्रस्तुत श्रीभागवत की प्राप्ति हुई है। उसी में श्रीकृष्ण उद्धव को ज्ञान का रहस्य बता रहे हैं। उन दोनों की यह
बात एकान्त में हुई थी लेकिन वह सारे संसार में प्रसिद्ध हो गयी। राजा परीक्षित ने लोगों पर यह बहुत बड़ा
उपकार किया है। उसी श्रद्धा के वश शुक्राचार्य शीघ्रता से आये और उन्होंने यह गुह्यज्ञान स्पष्ट करके दिखलाया।
शुक्राचार्यजी की यह महिमा विस्मयकारी है। यह गुह्यज्ञान केवल कान में न बताकर केवल श्रवण से ही संसार
बन्धन तोड़कर उन्होंने परीक्षित का उद्धार किया। श्रवणमाधुर्य को इतने प्रभावशाली ढंग से प्रसिद्ध किया फिर भी
अभागे दाँत भींच कर बैठे रहते हैं और बन्द कान खोल नहीं पाते। यदि प्रेमपूर्वक भगवत्कथा का सार उनके
कान में डालने का प्रयत्न करो तो कथा का सार बाहर ही गिर जाता है, कान में एक बूँद भी नहीं जा पाता।
इसीलिये विषय के लिये रोता रहता है। वह अपने अंतःकरण में कथामृत की एक घूँट भी नहीं जाने देता। किन्तु
कथा कहने वाला वक्ता भी वैसा ही रोता रहता है, वह भी अपने अंतःकरण में एक घूँट नहीं जाने देता। जैसे ईख
के रस का घाना ईख का रस निकालता रहता है और रस से बर्तन भरता जाता है, नीरस चीपड़े करकराते रहते हैं
वही स्थिति वक्ता के मुख की होती है। कथामृत की जो माधुरी है उसे सिवाए सद्गुरु के दूसरा कौन चख सकता
है? इसीलिये जिसने यह माधुर्य चखाया है उसी जनार्दन की शरण में मैं आया हूँ। लेकिन इस माधुर्य का स्वरूप
बड़ा विचित्र है, क्योंकि इस माधुर्य को चखते समय सद्गुरु स्वयं माधुर्य बनकर उसका स्वाद चखाता है। बालक
के हाथ में फल देने पर उसे कैसे खाया जाता है इसे बालक नहीं जानता। इसलिये उसका बाप स्वयं फल खाकर
उसका रस बच्चे के मुँह में डाल कर उसे माधुर्य का स्वाद चखाता है। बच्चे के मुँह को वह स्वाद लग जाने पर
वह स्वयं दिन रात वह फल चखता रहता है। उसी प्रकार हमें भी जनार्दन ने श्रीभागवत की माधुरी बता दी। वह
माधुरी अब मुँह में इतनी अधिक लग गयी है कि उसमें एक विशेष प्रकार का मजा आता है। वह मजा इस

४२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रकार है कि अब भले ही मैं उस माधुर्य को छोड़ दूँ लेकिन वह माधुर्य मुझे नहीं छोड़ता। उस माधुरी ने मुझे
निगल लिया है। इससे मेरा 'मैं पन' भी उस माधुरी में समा गया है। वह मिठास इतनी अधिक बढ़ गयी है कि
उसने मेरे भीतर या बाहर कोई स्थान रीता नहीं रहने दिया है। यह शुक्राचार्य के मुख का श्रेष्ठ फल है। माधुर्य से
वह अत्यन्त रसाल बन गया है। ऊपर की छाल और भीतर की गुठली छोड़कर सारा माधुर्य फल के रूप में एकत्र
हो गया है। उस श्री भागवत का माधुर्य अर्थात् भक्ति का स्वाद श्रीकृष्ण ने प्रेमपूर्वक उद्धव के माध्यम से बार-
बार चखाया है। मेरा भजन करते समय, मेरी मूर्ति का ध्यान करते समय समाधि तक का सारा साधन श्रीकृष्ण ने
उद्धव को बतलाया। श्रीकृष्ण के मुख के चौदहवें अध्याय के वे शब्द श्रवण कर उद्धव को ऐसा विलक्षण आनन्द
हुआ और मेरा स्वार्थ मेरे हाथ लगा ऐसा उसे लगा। मेरा ध्यान सदासर्वदा श्रीकृष्ण मूर्ति की ओर लगा हुआ है।
उसी से समाधि का समाधान होता है। अब आगे कौन-सा प्रश्न पूछूं? चौदहवाँ अध्याय सुनकर उद्धव के मन
का यही दृढ़ निश्चय हुआ। यह देखकर भगवान ने स्वयं अभिप्राय सुझाया। दृढ़ विश्वास से मेरा भजन और
ध्यान करने से आगे सिद्धि का विघ्न उपस्थित होता है। उस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण उपदेश देते हैं। पन्द्रहवें अध्याय
में ऐसा निरूपित किया गया है कि भक्तों द्वारा मेरा भजन करने से सिद्धियाँ अवश्य उत्पन्न होती हैं किन्तु वे
विघ्नकारक होती हैं इसलिये भगवान उनका त्याग करने के लिये कहते हैं।
श्री भगवानुवाच
जितेन्द्रियस्य युक्तस्य जितश्वासस्य योगिनः।
मयि धारयतश्चेत उपतिष्ठन्ति सिद्धयः ॥ १ ॥
जिसने प्राणापान सिद्ध कर लिया, जिसका इन्द्रियों पर नियंत्रण हो गया और जिसके मन में मेरी भक्ति के प्रति
उल्हास उत्पन्न होकर दिन-रात चित्त मेरे प्रति लग गया उसके प्रति अनेक सिद्धियाँ उत्पन्न होती हैं और वह जब भी
जिस चीज की भी इच्छा करता है, उसकी वह इच्छा पूर्ण होती है इसमें कोई सन्देह नहीं है। यह सुनते ही उद्धव के
मन में चमत्कार हुआ और उसने मन ही मन कहा कि उन सिद्धियों की साद्यंत कथा अब श्रीकृष्ण से पूछी जाय।
उद्धव उवाच
कया धारणया कास्वित् कथंस्वित् सिद्धिरच्युत।
कति वा सिद्धयो ब्रूहि योगिनां सिद्धि दो भवान् ॥ २ ॥
कौन-सी धारणा करने से कौन-सी सिद्धि प्राप्त होती है ? उसे पूरे विधि-विधान के साथ बतायें। हे
कृपानिधि ! उन सिद्धियों की संख्या क्या है इसका भी निवेदन करें क्योंकि हे अच्युत ! इन सारी सिद्धियों के बारे
में जानने वाले सचमुच एक तुम ही हो और योगियों को सिद्धि प्रदान करने वाले हो। इसलिये कृपया मुझे उनके
सम्बन्ध में बतायें।
श्रीभगवानुवाच
सिद्धयोऽष्टादश प्रोक्ता धारणा योगपारगैः ।
तासामष्टौ मत्प्रधाना दशैव गुणहेतवः ॥ ३ ॥
तब योगवेत्ता, योगसम्पन्न एवं महासिद्ध श्रीकृष्ण बोले- सिद्धियाँ अठारह हैं तथा उन्हें धारण करने की
विधियाँ भी भिन्न-भिन्न हैं। उनमें आठ सिद्धियाँ अत्यन्त श्रेष्ठ और प्रसिद्ध हैं और जो मेरे स्वरूप में स्थिर होता है

पन्द्रहवाँ अध्याय ४२३
उसे ही वे प्राप्त होती हैं। दूसरों को वे कभी भी प्राप्त नहीं होतीं। मन, वाणी अथवा कर्म से जो देह का देहपन
भूल कर मेरे ही स्वरूप में युक्त होकर ज्ञानस्वरूप होता है उसके पास ये सिद्धियाँ हाथ जोड़कर खड़ी रहती हैं
लेकिन वह उधर भूल कर भी नहीं देखता। अब यदि शेष इस सिद्धियों के बारे में पूछो तो वे सत्त्वगुण से सम्पन्न
होने के कारण साधक के शुद्धसत्त्व अत्यन्त सहजता से मेरे स्वरूप में रात-दिन विचरण करती रहती हैं उन आठ
महासिद्धियों की कथा अब तुम्हें सुनाऊँगा।
अणिमा महिमा मूर्तेर्लघिमा प्राप्तिरिन्द्रियैः।
प्राकाम्यं श्रुतदृष्टेषु शक्तिप्रेरणमोशिता ॥ ४ ॥
गुणेष्वसङ्गो वशिता यत्कामस्तदवस्यति।
एता मे सिद्धयः सौम्य अष्टावौत्पत्तिका मताः ॥ ५ ॥
अणिमा, महिमा और लघिमा ये तीनों सिद्धियाँ देहसिद्धि के योग से प्राप्त होती हैं। इन्द्रियों सहित उन
विषयों की प्राप्ति चौथी महासिद्धि होती है। परलोक के अदृश्य विषयों का ज्ञान अर्थात् प्राकाम्य श्रुतदृष्टा
पाँचवीं महासिद्धि है और शक्ति की प्रेरणा करने वाली असंग ईशिता सचमुच छठी महासिद्धि है। जिसमें मेरे ही
धर्म प्राप्त होते हैं उसे सिद्धान्ती लोक 'वशिता' इस नाम से जानते हैं। यह सातवीं महासिद्धि है। त्रैलोक्य में जो
भी अनुपम भोग हैं वे उत्तम भोग बिना परिश्रम किये केवल इच्छा करने मात्र से सुगम हो जाते हैं।
'यत्कामस्तहवस्यति' अर्थात् इच्छित सुख की प्राप्ति अथवा त्रैलोक्य की भोगसंपत्ति अकस्मात् एक ही समय
प्राप्त होना यही प्रसिद्ध आठवीं सिद्धि है। इन आठ महासिद्धियों का समुदाय स्वाभाविक रूप से मेरे पास रहता
है। साधक प्रयास करके जब थक जाता है तो उनमें से एकआध सिद्धि उसे प्राप्त होती है। तो ये महासिद्धियों के
रूप हैं। अब जो अन्य दस सिद्धियाँ हैं उनके सम्बन्ध में भी हे उद्धव ! तुम्हें साद्यंत बताता हूँ।
अनूर्मिमत्त्वं देहेऽस्मिन् दूरश्रवणदर्शनम्।
मनोजवः कामरूपं परकायप्रवेशनम् ॥ ६ ॥
स्वच्छन्दमृत्युर्देवानां सहक्रीडानुदर्शनम्।
यथासंकल्पसंसिद्धिराज्ञाऽप्रतिहतागतिः ॥ ७ ॥
क्षुधा, तृष्णा, शोक, मोह, जरा और मृत्यु ये छः ऊर्मियाँ देह को जरा भी पीड़ा नहीं देतीं यह पहली 'अनूर्मि
सिद्धि' है। एक ही जगह बैठ कर दूर का भाषण सुनायी पड़ना यह 'दूरश्रवण' नामक दूसरी अद्भुत सिद्धि है।
त्रैलोक्य में कहीं भी होने वाली हलचल मनुष्य एक स्थान पर बैठ कर देख सके यह तीसरी सिद्धि का चमत्कार
है। उसका नाम है दूरदर्शन कला। 'मनोजय' सिद्धि में मनुष्य जिधर की कल्पना करता है उधर मनोवेग से शरीर
जा सकता है। यह चौथी सिद्धि है। 'कायरूप' सिद्धि ऐसी है कि इसमें मनुष्य जिस स्वरूप की इच्छा करता है
उसे तत्काल धारण कर लेता है। यह सचमुच पाँचवीं 'कामनासिद्धि' है। अपना शरीर दूर रखकर मनुष्य दूसरे के
शरीर में प्रवेश करता है वह 'परकाया प्रवेश' सिद्धि है। यह छठीं उत्तम सिद्धि है। काल के वश में न रहकर
अपनी ही इच्छा से मरना यह सातवीं सिद्धि है। उसका नाम है 'स्वच्छंद महना'। स्वर्ग के देवताओं की क्रीड़ा
का दर्शन करना तथा शरीर में वैसी क्रीड़ाएँ करने का सामर्थ्य होना यह आठवीं सिद्धि है। निश्चित किया हुआ
उद्देश्य सिद्ध होना नौवीं सिद्धि है। जिसकी आज्ञा राजा भी शिरसावंद्य समझता है और जो कहीं भी आ जा सकता

४२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है, जिसकी आज्ञा और गमन पर कहीं भी प्रतिबन्ध नहीं है यह दसवीं सिद्धि का लक्षण है। अब इनसे भी क्षुद्र
सिद्धियों के लक्षण बताता हूँ।
त्रिकालज्ञत्वमद्वन्द्वं परचित्ताद्यभिज्ञता।
अग्न्यर्काम्बुविषादीनां प्रतिष्टम्भोऽपराजयः ॥ ८ ॥
क्षुद्र सिद्धियाँ पाँच प्रकार की हैं। भूत, भविष्य और वर्तमान का जो ज्ञान होता है वह पहली सिद्धि है यह
जान लो। सुख-दुःख, शीत-उष्ण, मृदु और अत्यन्त कठोर इन छंदों के वशीभूत न होना यह दूसरी सिद्धि का
लक्षण है। दूसरे का स्वप्न बतलाना, दूसरे के मन की बात जानना इसे तीसरी सिद्धि कहते हैं। अब चौथी का
लक्षण सुनो। अग्नि, वायु, उदक, शस्त्र, विष तथा विष आदि का प्रभाव न होने देना यह चौथी सिद्धि है। किसी
से हार न मानना सदा विजयी होना, कहीं भी अकेले ही विजय प्राप्त करना यह पाँचवीं सिद्धि है।
एताश्चोद्देशतः प्रोक्ता योगधारणसिद्धयः।
यया धारणया यास्याद् यथा वा स्यान्निबोध मे ॥ ९॥
इस प्रकार मैंने सिद्धियों का स्वरूप उनके उद्देश्यों के साथ तुम्हें बतलाया। अब किस धारणा से और किस
स्थिति से कौन सी सिद्धि प्राप्त होती है यह भी सुनो। अष्ट महासिद्धियों की धारणा, दस सिद्धियों के गुण और
पाँच क्षुद्र सिद्धियों के लक्षण साध्य करने के लिये श्रीकृष्ण उपयुक्त साधनों का वर्णन करते हैं।
भूतसूक्ष्मात्मनि मयि तन्मात्रं धारयेन्मनः।
अणिमानमवाप्नोति तन्मात्रोपासको मम॥ १० ॥
देखो। अष्टमहासिद्धि स्वाभाविक रूप से मुझ में ही होती हैं किन्तु उन्हें साध्य करना कठिन है। लेकिन जो
उन्हें साध्य करना चाहता है उन्हें साधन बताते हैं। मैं अणु रेणु से भी अधिक सूक्ष्म हूँ। मैं प्रत्येक जीव के हृदय
में रहता हूँ। वहाँ जो भी हो उसे मन को अणुमात्र सूक्ष्म बनाकर मुझमें स्थिर रखना चाहिये और वे अणुरेणु जो
सदा मेरे ही स्वरूप का ध्यान करेंगे उसका देह भी अणु की तरह ही होता है और जिस प्रकार कीटक भ्रमर में
रहता है उसी प्रकार उसे 'अणिमा' सिद्धि प्राप्त होती है। जिस पदार्थ में छिद्र है उसमें से भी वह निकल जाता
है। संसार की आँखों में समाता है किन्तु किसी की आँखों को चुभता नहीं है। ऐसी स्थिति आ जाए तो समझ लो
कि 'अघिमा' सिद्धि प्राप्त हो गयी।
महत्यात्मन्मयि परे यथासंस्थं मनो दधत्।
महिमानमवाप्नोति भूतानां च पृथक् पृथक् ॥ ११ ॥
मेरा स्वरूप अनंत और अपार है। महत्त्व से भी अधिक बड़ा है और सच तो यह है कि महत्तत्त्व का भी
वास्तविक नियंता जो ईश्वर है वह मैं ही हूँ। उस सिद्धि को साध्य करने के लिये जो पुरुष मेरा ध्यान भी
अपरंपार-विशाल है यह मानकर धारणा करेगा उसका शरीर भी उसी प्रकार विशाल होगा। इसलिये इस सिद्धि
का महातम भी बहुत बड़ा है। देखो! रुई के तंतु भी सूक्ष्म होते हैं फिर भी उससे हमारी इच्छा के अनुरूप बड़ा
वस्त्र तैयार होता है। उसी प्रकार जो मेरे ध्यान की कल्पना भी विशाल समझ कर करता है उसे मेरी महासिद्धि ही
प्राप्त होती है। उसके भार की कल्पना करें तो समस्त पर्वतों के साथ धरा भी कम पड़ेगी। सिद्धि के कारण वह
इतनी ऊँचाई प्राप्त करता है।

पन्द्रहवाँ अध्याय ४२५
परमाणुमये चित्तं भूतानां मयि रञ्जयन्।
कालसूक्ष्मार्थतां योगी लघिमानमवाप्नुयात् ॥१२॥
वायु आदि प्राण की तरह सूक्ष्म तत्त्व हैं, जिनसे कालसूत्र का मापन किया जाता है वह परमाणुस्वरूप
भगवान ही है। जो सदा एकनिष्ठा से उसी का ध्यान करेगा, उस परमाणुस्वरूप ध्यान की ऐसी महिमा है कि
उसके कारण देह को हलकापन प्राप्त होता है। वह मशक पर चढ़ कर आकाश में भ्रमण करता है। अणिमादिक
जो तीनों धारणायें हैं वे इस देह की ही सिद्धियाँ हैं, यह ध्यान में रखो। वे ही इस देह में सूक्ष्मता, जड़ता और
हलकापन आदि लक्षण उत्पन्न करती हैं। हे बुद्धिमान उद्धव! अब जो शेष पाँच महासिद्धियाँ हैं उनकी धारणा
विधियाँ भी बताता हूँ। सुनो।
धारयन् मय्यहंतत्त्वे मनो वैकारिकेऽखिलम्।
सर्वेन्द्रियानामात्मत्वं प्राप्तिं प्राप्नोति मन्मनाः ॥ १३॥
मूल रूप से जो अहंकार रहता है जिससे इन्द्रियों के समस्त विकार उत्पन्न होते हैं और इन्द्रियों का आश्रय
भूत, उन्हें चेतना प्रदान करने वाला, ऐसा देवाधिदेव ईश्वर जो मैं हूँ उसका ध्यान करने से इन्द्रिय के अधिष्ठान में
जो देवता होते हैं उनसे एकात्मता होकर उसमें इन्द्रियप्रकाशक धर्म का उदय होता है। इस कारण से इन्द्रियों के
जो व्यापार चलते रहते हैं वे सब वह स्वयं वहां प्रकट होकर देखता रहता है। इन्द्रियप्राप्ति की सिद्धि का इतना
वैभव वह साध्य कर लेता है। इससे जिन-जिन इन्द्रियों का व्यापार वहाँ चलता रहता है वह सब उसने ही किया
है ऐसा उसे प्रतीत होता है। उसे 'इन्द्रियप्राप्ति' नामक सिद्धि कहते हैं।
महत्यात्मनि यः सूत्रे धारयेन्मयि मानसम्।
प्राकाम्यं पारमेष्ठ्यंमे विन्दतेऽव्यक्तजन्मनः ॥ १४॥
यह जो महत्तत्त्व है उसे ही माया का प्रथम स्फुरण समझ लो। इसी को 'सूत्रप्रधान क्रिया' कहते हैं। उसमें
मैं स्वयं जन्मरहित होते हुए भी उस सूत्र का सूत्रात्मा बन गया हूँ। मेरे उस स्वरूप का जो सावधान चित्त से ध्यान
करता है उसे उस सूत्र के प्रकाश के प्रवाह से ब्रह्माण्ड और हिरण्यगर्भ भी प्रकाशमान हो जाते हैं, वह प्रकाशकता
ही वश में हो जाती है। इस प्रकार के निदिध्यास से वह सूत्रात्मा को देखता रहता है। उस निदिध्यास में ही वह
कोटि ब्रह्माण्डों का निर्माण कर सकता है। इतनी उत्तम प्रकाश सिद्धि साधकों को मेरे सिवा प्राप्त नहीं होती।
विष्णौ त्र्यधीश्र्वरे चित्तं धारयेत् कालविग्रहे।
स ईशित्वमवाप्नोति क्षेत्रक्षेत्रज्ञचोदनाम् ॥ १५॥
माया आदि त्रिगुणों का नियंता, कलिकाल का आकलन करने वाला, उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय करने
वाला और जो सचमुच अंतःकरण में वास करता है उस विष्णु का अर्थात् मेरा जो निरन्तर ध्यान करता है उसे
ईशत्व प्राप्त होने के कारण अदृश्य वस्तुओं को देखने का सामर्थ्य भी प्राप्त हो जाता है। शतरंज का मिथ्या खेल
खेलने वाला मोहरों की गति अच्छी तरह जान लेता है उसी प्रकार संसार का अनुभव मिथ्या होते हुए भी वह
जीवों की हलचल स्वयं समझ सकता है। वह जीव आदि शरीर की प्रेरणा स्वयं कर सकता है। इस प्रकार
अंतर्यामी नारायण का ध्यान करने से इतनी सिद्धि प्राप्त होती है इसे ध्यान में रखो। वह अपने प्रताप के सामर्थ्य
से मशक से पर्वत के टुकड़े करवा देता है। किसी दुर्बल के हाथों सृष्टि का विनाश करवा कर पुनः उसकी रचना