श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 436, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें४२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
भगवान ने अनेक प्रकार की युक्तियों से उद्धव को भक्तिसुख के झूले पर झुलाया और बोले, मेरी यह भक्ति
अंतःकरण में अंकित होने पर सभी सिद्धियों का लाभ होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। भक्ति से सुख स्वरूपी
दुग्ध निकाल कर और उसका मंथन कर जो सार निकला उसे उन्होंने उद्धव को प्रदान किया। यह चौदहवाँ
अध्याय है। इसमें भगवान ने स्वमुख से कहा, “अहो! मैं केवल भक्ति के वश में हूँ। अन्य सभी उपाय गौण
हैं।'' समस्त योगों का योगसंग्रह स्थान, वेदान्त का प्रमुख भण्डार और सारी सिद्धियों का परम रहस्य यही
वास्तव में हरि की सच्ची भक्ति है। आत्मभाग्य का सच्चा लाभ, महत्सुख का सच्चा प्रेम और सभी बातों का
माधुर्य यही श्रीहरि की एकनिष्ठ भक्ति है। भक्तिपूर्वक भजन करने से चांडाल भी पावन हो गये। जिसने अपना
मन भक्ति पर न्योछावर कर दिया, उसके अधीन भगवान सदासर्वदा रहता है। एकनाथ ने भी मुक्ति की उपेक्षा
कर जनार्दन के प्रति एकनिष्ठ भक्ति समर्पित की है, इसलिये उसके ही प्रसाद से भगवत्प्राप्ति रात-दिन खिलौने
की तरह वश हुई है। वह भले ही उस भगवत्प्राप्ति को स्वीकार न करे लेकिन वह स्वयं ही घर में घुस आती है।
ऐसी गुरुभक्ति के कारण भगवान सर्वांग से खो गया है। जो भगवत्प्राप्ति चाहता हो उसे मेरी भक्ति की उपेक्षा नहीं
करनी चाहिये। जो निरन्तर श्रीहरि का स्मरण करता है, उसके पास भगवान निरन्तर खड़े रहते हैं। सकल भजन
में जिसकी वाणी 'राम' इस दो अक्षर के नाम की गर्जना करती रहती है, वह इस चराचर में धन्य है। एकनाथ
जनार्दन की शरण में जाकर नामस्मरण करते ही जन्म-मरण पीछे लौट गये और महासिद्धियाँ आँगन की दासी के
रूप में खटने लगीं।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे एकाकारटीकायां
श्रीकृष्णोद्धव संवादे भक्तिरहस्यावधारण नाम चतुर्दशोध्यायः ॥ १४ ॥