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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 440, कुल 869 में से

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पृष्ठ 440

४२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है, जिसकी आज्ञा और गमन पर कहीं भी प्रतिबन्ध नहीं है यह दसवीं सिद्धि का लक्षण है। अब इनसे भी क्षुद्र
सिद्धियों के लक्षण बताता हूँ।
त्रिकालज्ञत्वमद्वन्द्वं परचित्ताद्यभिज्ञता।
अग्न्यर्काम्बुविषादीनां प्रतिष्टम्भोऽपराजयः ॥ ८ ॥
क्षुद्र सिद्धियाँ पाँच प्रकार की हैं। भूत, भविष्य और वर्तमान का जो ज्ञान होता है वह पहली सिद्धि है यह
जान लो। सुख-दुःख, शीत-उष्ण, मृदु और अत्यन्त कठोर इन छंदों के वशीभूत न होना यह दूसरी सिद्धि का
लक्षण है। दूसरे का स्वप्न बतलाना, दूसरे के मन की बात जानना इसे तीसरी सिद्धि कहते हैं। अब चौथी का
लक्षण सुनो। अग्नि, वायु, उदक, शस्त्र, विष तथा विष आदि का प्रभाव न होने देना यह चौथी सिद्धि है। किसी
से हार न मानना सदा विजयी होना, कहीं भी अकेले ही विजय प्राप्त करना यह पाँचवीं सिद्धि है।
एताश्चोद्देशतः प्रोक्ता योगधारणसिद्धयः।
यया धारणया यास्याद् यथा वा स्यान्निबोध मे ॥ ९॥
इस प्रकार मैंने सिद्धियों का स्वरूप उनके उद्देश्यों के साथ तुम्हें बतलाया। अब किस धारणा से और किस
स्थिति से कौन सी सिद्धि प्राप्त होती है यह भी सुनो। अष्ट महासिद्धियों की धारणा, दस सिद्धियों के गुण और
पाँच क्षुद्र सिद्धियों के लक्षण साध्य करने के लिये श्रीकृष्ण उपयुक्त साधनों का वर्णन करते हैं।
भूतसूक्ष्मात्मनि मयि तन्मात्रं धारयेन्मनः।
अणिमानमवाप्नोति तन्मात्रोपासको मम॥ १० ॥
देखो। अष्टमहासिद्धि स्वाभाविक रूप से मुझ में ही होती हैं किन्तु उन्हें साध्य करना कठिन है। लेकिन जो
उन्हें साध्य करना चाहता है उन्हें साधन बताते हैं। मैं अणु रेणु से भी अधिक सूक्ष्म हूँ। मैं प्रत्येक जीव के हृदय
में रहता हूँ। वहाँ जो भी हो उसे मन को अणुमात्र सूक्ष्म बनाकर मुझमें स्थिर रखना चाहिये और वे अणुरेणु जो
सदा मेरे ही स्वरूप का ध्यान करेंगे उसका देह भी अणु की तरह ही होता है और जिस प्रकार कीटक भ्रमर में
रहता है उसी प्रकार उसे 'अणिमा' सिद्धि प्राप्त होती है। जिस पदार्थ में छिद्र है उसमें से भी वह निकल जाता
है। संसार की आँखों में समाता है किन्तु किसी की आँखों को चुभता नहीं है। ऐसी स्थिति आ जाए तो समझ लो
कि 'अघिमा' सिद्धि प्राप्त हो गयी।
महत्यात्मन्मयि परे यथासंस्थं मनो दधत्।
महिमानमवाप्नोति भूतानां च पृथक् पृथक् ॥ ११ ॥
मेरा स्वरूप अनंत और अपार है। महत्त्व से भी अधिक बड़ा है और सच तो यह है कि महत्तत्त्व का भी
वास्तविक नियंता जो ईश्वर है वह मैं ही हूँ। उस सिद्धि को साध्य करने के लिये जो पुरुष मेरा ध्यान भी
अपरंपार-विशाल है यह मानकर धारणा करेगा उसका शरीर भी उसी प्रकार विशाल होगा। इसलिये इस सिद्धि
का महातम भी बहुत बड़ा है। देखो! रुई के तंतु भी सूक्ष्म होते हैं फिर भी उससे हमारी इच्छा के अनुरूप बड़ा
वस्त्र तैयार होता है। उसी प्रकार जो मेरे ध्यान की कल्पना भी विशाल समझ कर करता है उसे मेरी महासिद्धि ही
प्राप्त होती है। उसके भार की कल्पना करें तो समस्त पर्वतों के साथ धरा भी कम पड़ेगी। सिद्धि के कारण वह
इतनी ऊँचाई प्राप्त करता है।