श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 435, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ अध्याय ४१९
पन की जो स्फूर्ति प्रकट होती रहती है वह भी अद्वैत में विलीन हो जाती है। इस प्रकार उस समय 'मैं' और 'तू'
का आभास भी निःशेष हो जाता है और मेरा परमानन्दात्मक आत्मसौख्य ही अद्वैत स्वरूप से भर जाता है। जिस
प्रकार एक ज्योति जब दूसरी ज्योति मिलती है तो दोनों का मिला कर एक ही तेज हो जाता है, उसी प्रकार जीव
और चैतन्य इन दोनों की स्फूर्ति अद्वैतसुख का लाभ होने से एकरूप हो जाती है। सहस्रों दीपकों में तेल और
बातियाँ डालकर जलाने से अलग-अलग सहस्र दीप जलते हैं लेकिन उन दीपकों में तेज एक ही होता है उसी
प्रकार अद्वैत में जीव ज्ञानरूप ही है। देह और इन्द्रियों की उपाधि के कारण जीव में निरालेपन का आभास होता
है लेकिन अद्वैत का बोध होते ही ऐक्य भाव के कारण जीव आत्मस्वरूप में लीन हो जाता है। तब एक परमसुख
ही शेष रहता है यह कहने वाला भी कोई नहीं रहता। एक अकेला आत्मसुख भर जाता है। जिस प्रकार शक्कर
से ही शक्कर खा कर देखनी चाहिये या पानी को ही पानी में स्नान करना चाहिये या जिस प्रकार निश्चित रूप
से सुगन्ध आने के लिये घृत को ही घृत में प्रवेश करना चाहिये, उसी प्रकार मेरी ध्यान की स्थिति साधकों के
लिये अत्यन्त लाभकारी है। यही बात श्रीकृष्ण उद्धव को बताते हैं।
ध्यानेनेत्थं सुतीव्रेण युञ्जतो योगिनो मनः।
संयास्यत्याशु निर्वाणं द्रव्यज्ञानक्रियाभ्रमः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार तीव्र ध्यानस्थिति से समाधि तक यथाविधि ध्यान करने पर साधक को तत्काल मेरी प्राप्ति होती
है। मेरा यह ध्यान अत्यन्त उत्तम है। वह अगर सदा सर्वदा के लिये मन में अंकित हो जाय तो वह अधिभूत,
अधिदैव और अध्याय यह तीन प्रकार का भ्रम रहने ही नहीं देता। विषय सेवन करने वाला, विषय और विषय
का संभ्रम, ज्ञेय, ज्ञाता और ज्ञानोपक्रम; कर्म, कर्त्ता और क्रिया का भ्रम, इनका नामरूप भी शेष नहीं रहने देता।
उसी प्रकार ध्येय, ध्याता और ध्यान; दृश्य, द्रष्टा और दर्शन; मन, मननकर्त्ता और मनन इनका भान समूल नष्ट
कर देता है। देव, देवी और देवता, भज्य, भजन और भजन करने वाला; लक्ष्य, लक्षण और लक्षिता इनका पता
ही नहीं चल पाता। इससे योग्यता के साथ महायोग, अथवा समाधि सुख का सुखोपभोग अथवा जीव और शिव
का आत्मैक्य, यह बात भी शेष नहीं रह जाती। फिर बोध कैसा ? बोधकर्ता किसका ? बद्धता किसकी ? और
मुक्तता भी किसकी ? ब्रह्मा का नाम इस बात का भी पूरी तरह विलय हो जाता है। सत्, चित् और आनन्द इन
शब्दों का उच्चार, वह भी मुझे माया के ही कारण है। उसे भी स्पष्ट रूप से बताता हूँ, सुनो। असत् (मिथ्या) की
व्याप्ति हटाने के लिये श्रुति मुझे सत् कहती है। जड़ की मिथ्या स्थिति दिखाने के लिये मुझे ज्ञानस्वरूप कहते
हैं। उसी प्रकार दुःख के साथ मेरा सम्बन्ध न आये इसलिये मुझे 'परमानंद' कहते हैं। इस प्रकार मुझे
'सच्चिदानंद' कहना यह भी विद्या की दृष्टि से विपरीत बोध ही है। जहाँ असत् जरा भी नहीं है वहाँ 'सत्'
कहना कैसे सम्भव होगा ? जहाँ अज्ञान ही नहीं है वहाँ 'ज्ञानमय' भी कौन कहेगा ? जब दुःख का अंश भी नहीं
रहता वहाँ सुख किसे कहा जाय ? इसलिये मेरे लिये नामरूप रखना पूर्णतः असंगत है। त्रिपुटी का भान पूरी तरह
नष्ट होना इसी का नाम 'तीव्र ध्यान' है। उसी में मेरा भजन कर साधक आत्मानंद के पात्र बनते हैं। इस प्रकार
मेरी इस ध्यानपद्धति से बड़े चमत्कार से संसार का विलय होता हैं और उद्धव ! आत्मस्वरूप के निश्चय से मेरा
शुद्धस्वरूप ही शेष रह जाता है। उस स्वरूप में न सुख है, न दुःख है। सत् और असत् का उल्लेख भी नहीं है।
अथवा वहाँ ज्ञान और अज्ञान इन कल्पनाओं की बाधा भी नहीं है। उसमें नाम, रूप, गुण 'मैं तू' की पहचान,
विद्या-अविद्या का भान इनमें से कुछ भी नहीं है। सर्वत्र आनन्दघन आत्मस्वरूप ही व्याप्त रहता है। इस प्रकार