श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 437, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ अध्याय
ॐकार स्वरूप श्री जनार्दन को मेरा नमस्कार। तुम्हारे पवित्र चरण सभी सिद्धियों का मूलस्थान है, सभी
निधियों में श्रेष्ठ निधि है और चारों पुरुषार्थ प्रदान करने वाले हैं। जमीन में रखी हुई निधि दिखायी दे इसलिये
लोग आँखों में अंजन डालते हैं लेकिन उससे आँखें ही खराब हो जाती हैं और निधि दिखायी नहीं देती। लेकिन
तुम्हारे चरणों में वह बात नहीं है। तुम्हारे चरणों की रज का वन्दन करने से सारी कालिमा दूर हो जाती है और
निधि का पूर्ण रूप से दर्शन हो जाता है। अंजन डाल कर निधि निकालने जाओ तो वहाँ भी विघ्न उपस्थित हो
जाता है। बलि देकर निधि प्राप्त करने जाओ तो वह भी नश्वर ही रहता है। लेकिन तुम्हारे चरणों की वह बात
नहीं है। उनका सहज स्मरण करने से भी नित्य, सिद्ध, अव्यय आत्मस्वरूप का खजाना हाथ लगता है। यही
निधि साध्य कर सनकादिक भाग्यशाली बन गये। नारद की उदारता की प्रशंसा भी इसी कारण से होती है। प्रह्लाद
को सुरक्षा प्रदान करने वाला वज्रकवच भी इसी कारण प्राप्त हुआ। शुक वामदेव आदि को भी इसी कारण महत्त्व
प्राप्त हुआ है। व्यास वाल्मीकि ने हरिभक्ति का जो इतना बड़ा व्यवहार किया उसका कारण यही था कि वे इसी
पूँजी पर बलवान हुए थे और इसीलिये उनकी प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। उन्होंने ही निर्माण की हुई पुराण आदि पूँजी
के आधार पर छोटे-बड़े लोग अपनी दरिद्रता मिटा कर सुख से जीवनयापन कर रहे हैं। उस सद्गुरु के पवित्र
चरण श्रेष्ठ निधियों की भी निधि है। एका उस जनार्दन की शरण में है यही हमारी परिपूर्ण पूँजी है। उसी पूँजी से
प्रस्तुत श्रीभागवत की प्राप्ति हुई है। उसी में श्रीकृष्ण उद्धव को ज्ञान का रहस्य बता रहे हैं। उन दोनों की यह
बात एकान्त में हुई थी लेकिन वह सारे संसार में प्रसिद्ध हो गयी। राजा परीक्षित ने लोगों पर यह बहुत बड़ा
उपकार किया है। उसी श्रद्धा के वश शुक्राचार्य शीघ्रता से आये और उन्होंने यह गुह्यज्ञान स्पष्ट करके दिखलाया।
शुक्राचार्यजी की यह महिमा विस्मयकारी है। यह गुह्यज्ञान केवल कान में न बताकर केवल श्रवण से ही संसार
बन्धन तोड़कर उन्होंने परीक्षित का उद्धार किया। श्रवणमाधुर्य को इतने प्रभावशाली ढंग से प्रसिद्ध किया फिर भी
अभागे दाँत भींच कर बैठे रहते हैं और बन्द कान खोल नहीं पाते। यदि प्रेमपूर्वक भगवत्कथा का सार उनके
कान में डालने का प्रयत्न करो तो कथा का सार बाहर ही गिर जाता है, कान में एक बूँद भी नहीं जा पाता।
इसीलिये विषय के लिये रोता रहता है। वह अपने अंतःकरण में कथामृत की एक घूँट भी नहीं जाने देता। किन्तु
कथा कहने वाला वक्ता भी वैसा ही रोता रहता है, वह भी अपने अंतःकरण में एक घूँट नहीं जाने देता। जैसे ईख
के रस का घाना ईख का रस निकालता रहता है और रस से बर्तन भरता जाता है, नीरस चीपड़े करकराते रहते हैं
वही स्थिति वक्ता के मुख की होती है। कथामृत की जो माधुरी है उसे सिवाए सद्गुरु के दूसरा कौन चख सकता
है? इसीलिये जिसने यह माधुर्य चखाया है उसी जनार्दन की शरण में मैं आया हूँ। लेकिन इस माधुर्य का स्वरूप
बड़ा विचित्र है, क्योंकि इस माधुर्य को चखते समय सद्गुरु स्वयं माधुर्य बनकर उसका स्वाद चखाता है। बालक
के हाथ में फल देने पर उसे कैसे खाया जाता है इसे बालक नहीं जानता। इसलिये उसका बाप स्वयं फल खाकर
उसका रस बच्चे के मुँह में डाल कर उसे माधुर्य का स्वाद चखाता है। बच्चे के मुँह को वह स्वाद लग जाने पर
वह स्वयं दिन रात वह फल चखता रहता है। उसी प्रकार हमें भी जनार्दन ने श्रीभागवत की माधुरी बता दी। वह
माधुरी अब मुँह में इतनी अधिक लग गयी है कि उसमें एक विशेष प्रकार का मजा आता है। वह मजा इस