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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 434, कुल 869 में से

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पृष्ठ 434

४१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
बन गये हैं। चरणों में नूपुरों का गजर, हाथ में कंकणों की झंकार, मस्तक पर विपुल केश-संभार और पुष्पों से
गुंफित वे सुन्दर केश ! जिस मूर्ति की ओर ध्यान लगते ही भूख-प्यास का भी विस्मरण होता है और एक बार
ध्यान की पकड़ में आ जाये तो सुख का दिन उदित होता है। सुन्दर श्यामवर्ण से युक्त सर्वांग हो, मुद्रा अत्यंत
श्रेष्ठ, उदार और गम्भीर हो मुखकमल सुन्दर और सुप्रसन्न हो और ऐसी मूर्ति का ध्यान किया जाय।
सुकुमारमभिध्यायेत् सर्वाङ्गेषु मनो दधत्।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यो मनसाऽऽकृष्य तन्मनः।
बुद्ध्या सारथिना धीरः प्रणयेन्मयि सर्वतः॥ ४२॥
तत् सर्वव्यापकं चित्तमाकृष्यैकत्र धारयेत्।
नान्यानि चिन्तयेद् भूयः सुस्मितं भावयेन्मुखम् ॥ ४३॥
शायद नेत्रों के कटाक्ष भी चुभें, चन्द्रकिरण भी चुभें ऐसी सुकुमार मूर्ति का ध्यान करना चाहिये ध्यान पर
भक्ति जमने के लिये मूर्ति जितनी कोमल हो उतना ही अच्छा। इन्द्रियजल विषयों पर लुब्ध रहने वाले मन को
काबू में रखकर बुद्धिमान लोग एकनिष्ठा से मेरा ही ध्यान करते रहते हैं। इस प्रकार विषयों पर नियंत्रण कर
अखण्ड मेरा ध्यान करने से हम स्वयं मत्स्वरूप हो जायेंगे इस प्रकार ध्यान लगाना चाहिये। चिन्तन करते समय
यदि मन विचलित होने लगे तो विचारों से तथा बुद्धि के सामर्थ्य से सन्देह रहित होकर मेरा स्मरण करने से
धारणा किये बिना ही ध्यान मन में बैठ जाता है। धारणा भले ही टूट जाय लेकिन ध्यान की छाप नहीं मिटती।
मन मूर्ति में ही रहता है और वही सर्वांग में जम जाता है। प्रत्येक अंग और उपांग पर ध्यान के बहाने जो चित्त
केन्द्रित हो जाता है उसे नियंत्रित कर केवल एकाग्र हास्यवसन पर केन्द्रित करना चाहिये। मूर्ति का सांगोपांग
ध्यान छोड़ कर श्रीहरि के स्वानंदघन हास्यवदन का ही चिन्तन करना चाहिये। "तुम्हारा ध्यान किस प्रकार का
होना चाहिये?" ऐसा उद्धव का प्रश्न था। उसका इस प्रकार उत्तर देकर आत्मस्वरूप के लक्षण भी भगवान
बताते हैं। ध्यान में जो हास्यमुख आयेगा, उसमें मुख को छोड़ कर केवल हास्य का ही ध्यान करना चाहिये।
फिर उस हास्य का भी ध्यान छोड़कर उस हास्य में जो गहरा आनन्द भरा हुआ है उसमें ही अपने मन को लीन
करना चाहिये और उसमें ही सावधान होकर निष्ठा रखनी चाहिये। उस आनन्द से अपना मन आनन्दयुक्त होने
पर साधकों को भी निश्चित रूप से आत्मानंद की प्राप्ति होगी
तत्र लब्धपदं चित्तमाकृष्य व्योम्नि धारयेत्।
तच्च त्यक्त्वा मदारोहो न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥ ४४॥
उस आनन्दपद की प्राप्ति होने पर सर्वत्र चिदाकाश ही दिखायी देने लगता है। उस चिदाकाश में सावधान
होकर चित्त को एकाग्र करना चाहिये। फिर चिदाकाश, चित्त और चिन्तन ये ध्यान के तीनों भेद भूल कर
परमानन्द से परिपूर्ण और भेदशून्य चित्स्वरूप आत्मा जो मैं हूँ, उसमें ही अपनी वृत्ति निमग्न करनी चाहिये। तब
चिदाकाश का ज्ञान, अथवा ज्ञेय, दाता और ज्ञान इनमें से किसी की भी स्फूर्ति शेष नहीं रह जाती।
एवं समाहितमतिर्मामेवात्मानमात्मनि।
विचष्टे मयि सर्वात्मन् ज्योतिर्ज्योतिषि संयुतम् ॥ ४५ ॥
इस प्रकार साधकों की आत्मवृत्ति मेरे स्वरूप में एकरूप हो जाने पर जब वे मत्स्वरूप हो जाते हैं तब 'मैं'