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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 439, कुल 869 में से

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पृष्ठ 439

पन्द्रहवाँ अध्याय ४२३
उसे ही वे प्राप्त होती हैं। दूसरों को वे कभी भी प्राप्त नहीं होतीं। मन, वाणी अथवा कर्म से जो देह का देहपन
भूल कर मेरे ही स्वरूप में युक्त होकर ज्ञानस्वरूप होता है उसके पास ये सिद्धियाँ हाथ जोड़कर खड़ी रहती हैं
लेकिन वह उधर भूल कर भी नहीं देखता। अब यदि शेष इस सिद्धियों के बारे में पूछो तो वे सत्त्वगुण से सम्पन्न
होने के कारण साधक के शुद्धसत्त्व अत्यन्त सहजता से मेरे स्वरूप में रात-दिन विचरण करती रहती हैं उन आठ
महासिद्धियों की कथा अब तुम्हें सुनाऊँगा।
अणिमा महिमा मूर्तेर्लघिमा प्राप्तिरिन्द्रियैः।
प्राकाम्यं श्रुतदृष्टेषु शक्तिप्रेरणमोशिता ॥ ४ ॥
गुणेष्वसङ्गो वशिता यत्कामस्तदवस्यति।
एता मे सिद्धयः सौम्य अष्टावौत्पत्तिका मताः ॥ ५ ॥
अणिमा, महिमा और लघिमा ये तीनों सिद्धियाँ देहसिद्धि के योग से प्राप्त होती हैं। इन्द्रियों सहित उन
विषयों की प्राप्ति चौथी महासिद्धि होती है। परलोक के अदृश्य विषयों का ज्ञान अर्थात् प्राकाम्य श्रुतदृष्टा
पाँचवीं महासिद्धि है और शक्ति की प्रेरणा करने वाली असंग ईशिता सचमुच छठी महासिद्धि है। जिसमें मेरे ही
धर्म प्राप्त होते हैं उसे सिद्धान्ती लोक 'वशिता' इस नाम से जानते हैं। यह सातवीं महासिद्धि है। त्रैलोक्य में जो
भी अनुपम भोग हैं वे उत्तम भोग बिना परिश्रम किये केवल इच्छा करने मात्र से सुगम हो जाते हैं।
'यत्कामस्तहवस्यति' अर्थात् इच्छित सुख की प्राप्ति अथवा त्रैलोक्य की भोगसंपत्ति अकस्मात् एक ही समय
प्राप्त होना यही प्रसिद्ध आठवीं सिद्धि है। इन आठ महासिद्धियों का समुदाय स्वाभाविक रूप से मेरे पास रहता
है। साधक प्रयास करके जब थक जाता है तो उनमें से एकआध सिद्धि उसे प्राप्त होती है। तो ये महासिद्धियों के
रूप हैं। अब जो अन्य दस सिद्धियाँ हैं उनके सम्बन्ध में भी हे उद्धव ! तुम्हें साद्यंत बताता हूँ।
अनूर्मिमत्त्वं देहेऽस्मिन् दूरश्रवणदर्शनम्।
मनोजवः कामरूपं परकायप्रवेशनम् ॥ ६ ॥
स्वच्छन्दमृत्युर्देवानां सहक्रीडानुदर्शनम्।
यथासंकल्पसंसिद्धिराज्ञाऽप्रतिहतागतिः ॥ ७ ॥
क्षुधा, तृष्णा, शोक, मोह, जरा और मृत्यु ये छः ऊर्मियाँ देह को जरा भी पीड़ा नहीं देतीं यह पहली 'अनूर्मि
सिद्धि' है। एक ही जगह बैठ कर दूर का भाषण सुनायी पड़ना यह 'दूरश्रवण' नामक दूसरी अद्भुत सिद्धि है।
त्रैलोक्य में कहीं भी होने वाली हलचल मनुष्य एक स्थान पर बैठ कर देख सके यह तीसरी सिद्धि का चमत्कार
है। उसका नाम है दूरदर्शन कला। 'मनोजय' सिद्धि में मनुष्य जिधर की कल्पना करता है उधर मनोवेग से शरीर
जा सकता है। यह चौथी सिद्धि है। 'कायरूप' सिद्धि ऐसी है कि इसमें मनुष्य जिस स्वरूप की इच्छा करता है
उसे तत्काल धारण कर लेता है। यह सचमुच पाँचवीं 'कामनासिद्धि' है। अपना शरीर दूर रखकर मनुष्य दूसरे के
शरीर में प्रवेश करता है वह 'परकाया प्रवेश' सिद्धि है। यह छठीं उत्तम सिद्धि है। काल के वश में न रहकर
अपनी ही इच्छा से मरना यह सातवीं सिद्धि है। उसका नाम है 'स्वच्छंद महना'। स्वर्ग के देवताओं की क्रीड़ा
का दर्शन करना तथा शरीर में वैसी क्रीड़ाएँ करने का सामर्थ्य होना यह आठवीं सिद्धि है। निश्चित किया हुआ
उद्देश्य सिद्ध होना नौवीं सिद्धि है। जिसकी आज्ञा राजा भी शिरसावंद्य समझता है और जो कहीं भी आ जा सकता