श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
२६४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ऐसी विनती करता हूँ कि गुण और आत्मा कभी एक साथ नहीं रह सकते। जिस प्रकार मृगजल से भरे तालाब में
चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ेगा उसी प्रकार आत्मा कभी गुणों से बँध नहीं सकता क्योंकि गुणों का स्पर्श भी न
करना उसका स्वभाव धर्म है। गुण है अज्ञान की रात्रि और आत्मा स्वयंप्रकाश सूर्य है। उसके सामने वे आयें भी
तो कैसे ? और उसे बाँधें भी तो कैसे ? अन्धकार यदि सूर्य को निगल सकेगा, कौआ यदि कैलाश पर्वत पर
पहुँचेगा, बगुला यदि मारुति को जर्जर कर पायेगा या मच्छर हाथी को खायेगा मक्खी के पंखों से यदि आकाश
उड़ जायेगा, मेरु पर्वत यदि जलकुण्ड में डूब जायेगा या मृगजल में जहाज डूबेगा तभी आत्मा गुणों के बन्धन में
बद्ध होगा। जिस प्रकार आकाश जाल में नहीं फँसता उसी प्रकार आत्मा भी गुणसमुदाय में नहीं फँसता। फिर
सुख-दुःख का अनुभव गुणों के कोलाहल में वह कैसे भोगेगा ? इस प्रकार विचार करें तो आत्मा किसी बन्धन में
नहीं पड़ता फिर मुक्ति की बात क्यों की जाय ? अतः हे श्रीकृष्णनाथ बद्ध-मुक्त अवस्था किसे प्राप्त होती है
बतायें। सारांश, यहाँ बन्धन होने का क्या कारण है ? और मुक्त नर का क्या लक्षण है ? तात्पर्य बद्ध और मुक्त का
सविस्तार लक्षण मुझे बतायें।
कथं वर्तेत विहरेत् कैर्वा ज्ञायेत लक्षणैः।
किं भुञ्जीतोत विसृजेच्छयीतासीत याति वा ॥ ३६॥
हे श्रीपति ! अब मुझे बद्ध और मुक्त की स्थिति बतायें। वे दोनों किन लक्षणों से और कैसे पहचाने जायेंगे ?
उसी प्रकार विदेह स्थिति प्राप्त होने के बाद वे देह में किस प्रकार विचरण करते हैं ? मुक्तता प्राप्त करने के बाद
वे देह से भोग कैसे भोगते हैं ? उनके त्याग की छाप कैसी रहती है यह भी बतायें ? हे श्रीकृष्ण ! इसे भी बतायें
कि उनकी निद्रा का क्या लक्षण है ? उनका आसन कैसा रहता है ? पूर्ण परब्रह्म जानने के बाद उनका विचरण
किस प्रकार का होता है ? ऐसे जो मुक्तों के लक्षण होंगे और बद्धों के उनसे अलग दीखने वाले लक्षण क्या हैं वह
भी कृपा करके मुझे बतायें।
एतदच्युत मे ब्रूहि प्रश्नं प्रश्नविदां वर।
नित्यमुक्तो नित्यबद्ध एक एवेति मे भ्रमः ॥ ३७॥
हे सर्वश्रेष्ठ वैकुंठाधिपति गोविन्द ! इन प्रश्नों के उत्तरों की मुझे बड़ी उत्कंठा लगी हुई है, आप उनके
समुचित उत्तर देने में समर्थ एवं श्रेष्ठ हैं। यह गुणों का सम्बन्ध अनादि काल से चलता चला आ रहा है इसलिये
आत्मा 'नित्यबद्ध' हो गया है। इसलिये 'नित्यमुक्त' यह शब्द बिलकुल असंगत लगता है। आत्मा को यदि
नित्यमुक्तता प्राप्त हो तो 'बंधन' शब्द का उच्चार ही नहीं करना चाहिये। एक ही को 'बद्ध' और 'मुक्त' कहें तो
हे श्रीकृष्ण ? मुझे इसमें भ्रम लगता है। हे श्रीकृष्ण, आत्मा तो सचमुच एक है। उस एक की ही बन्धन और मुक्ति
ये दो अवस्थायें कैसी होंगी ? जो तृप्त हुआ है वही भूखा, जो जागृत है वही सोया हुआ, जो जीवित है वही मृत
इस बात को कैसे सच माना जाय ? जो काला है वही सफेद, जो आँख वाला है वही अन्धा, जो आधा है उसे
पूरा कैसे कहा जाय ? कैरैले की बेल में केला कैसे उत्पन्न होगा ? नमकीन नमक बिना, सूखा पानी, शीतल और
भीषण अग्नि, गूँगा हो उसे वाचाल कैसे कहा जाय ? साड़ी ही नग्न होने के कारण लज्जा करे, अन्न ही भूख के
कारण व्याकुल हो, मुक्त को ही मुक्ति का अकाल, कर्पूर को ही सुगन्ध नहीं है यह कैसे कहा जाय ? उसी प्रकार
संत को ही असंत, अद्वैत को ही द्वैत, हित ही अनहित है ऐसा अब हमें लगने लगा है। आत्मा नित्यमुक्त हैं तथा
वह शुद्ध और ज्ञानस्वरूप है, यह आपने ही बोध कराया था और वही गुणों की संगति से बद्ध होता है ऐसा
दसवाँ अध्याय २६५
आपने बोध कराया। इससे मैं बड़ी असमंजस में पड़ गया हूँ। भगवन्! एक ही को एक ही समय बन्धन और
मुक्ति कैसे होगी? हे अनंत! आप कृपालु हैं। इसलिये इसमें सत्य क्या है यह बतायें। मुक्ति को आप आगंतुक
कहें तो मोक्ष अनित्य हुआ और बन्धन को आगंतुक कहें तो उसका आदि भी हुआ। पहले बन्धन था ही नहीं वह
आज से उत्पन्न हुआ इस प्रकार यदि कहा जाय तो वह शास्त्रार्थ के विरुद्ध होगा। श्रुति, स्मृति और शास्त्रों के
अनुसार मुक्ति और बन्ध अनादि सिद्ध हैं और आत्मा एक होते हुए उसकी ये दो अवस्थाएँ? और वे भी एक
दूसरे के विपरीत? यह बात कितनी विचित्र है? यदि बद्धता बढ़ती है तो वह मुक्ति का छल करेगी और मुक्ति
बिफर जाय तो वह बन्धन को को भी निगल लेगी। ये परस्पर विरोधी स्थितियाँ आत्मा के पास किस तरह रह
पाती हैं? यदि शाम को भोर होगी तभी विद्या और अविद्या एक होगी, सूर्य यदि अन्धकार की गठरी बाँध दे तंभी
ये अवस्थायें आत्मा के साथ रहेंगी। हींग को यदि कर्पूर की गन्ध आने लगे, यदि अविद्या विद्या के बीच आये,
खरगोश यदि शेर पर टूट पड़े तभी ये अवस्थाएँ आत्मा के साथ रहेंगी। उद्धव ने कहा, "हे कृष्णनाथ! ये दो
अवस्थाएँ कैसी हैं यह समझ में आ जाय तो समझो मुक्ति भी हाथ लग गयी, ऐसा मैं निःसन्देह समझता हूँ।"
उसने पुनः कहा, भगवन्! तुम ही मोक्षदाता हो, इसलिये मुझे वे अवस्थाएँ स्पष्ट करके बतायें। इतना कह कर
उसने उनके चरणों पर मस्तक रख दिया। उद्धव का यह मार्मिक प्रश्न सुनकर नारायण परम संतुष्ट हुए। मेरा
उद्धव अब ज्ञानी हो गया इस विचार के मन में आते ही वे आनन्द से डोलने लगे। परमार्थ के प्रति उसकी
छटपटाहट तथा उसके प्रश्न का महत्त्व ध्यान में लाकर वे अपनी काया उद्धव पर न्यौछावर करने के लिये तैयार
हो गये। भगवान् भक्तों के वचन का कभी उल्लंघन नहीं करते। इसके लिये उन्होंने अपने गुप्त ज्ञान का भण्डार
खोल दिया। सचमुच, जब परमेश्वर प्रसन्न होता है तो वह भक्तों पर अपार कृपा ही करता है। उद्धव का प्रश्न
गहरा होने के कारण जगजीवन कृष्ण कृपा से द्रवित हो उठा। एका जनार्दन (एकनाथ) विनयपूर्वक बताता है
कि वह आनन्द का मेघ ही बन कर आया। उसकी वृष्टि से अब शिष्यरूप नदी में आनन्द की बाढ़ आयेगी
जिसके फलस्वरूप शिष्य ज्ञानगंगा के समुद्र से जा मिलेगा। संसार की आस्था छोड़कर जो भक्तिमार्ग पर चल
पड़ा वही इस भागवत का सच्चा अधिकारी है और वही परमार्थ का वास्तविक ग्राहक है और जिसके पेट में
संसार की ही चिन्ता है, उसके मन में यह कथा सुनकर विपरीत भावनाएँ उत्पन्न होंगी क्योंकि चित्त जिस चीज
का चिन्तन करता है वैसे ही होता है। जब तक चित्त सावधान और स्थिर नहीं है तब तक भागवत समझ में नहीं
आयेगा। उसी प्रकार गुरु के बिना भागवत का अर्थ प्राणियों की समझ में नहीं आयेगा। जो संसार से विरक्त होगा,
जो गुरु-चरणों के प्रति अनुरक्त होगा उसे ही परमार्थ प्राप्त होगा और उसे ही भागवत की फलप्राप्ति होगी।
श्रीकृष्ण का मुख देखकर ही उद्धव को नित नया समाधि सुख प्राप्त होता था, फिर भी और अधिक सुनने की
उसे इच्छा थी, इतनी महान थी उसकी श्रद्धा। जिसका वेदों ने भी प्रतिपादन किया है ऐसा वह ज्ञानस्वरूप
परमात्मा श्रीकृष्ण, जिसका गुह्यज्ञान बार-बार सुनने को मिले इसलिये उसने नितांत योग्य प्रश्न ही पूछा था। अब
भगवान श्रीकृष्ण विद्या और अविद्या का निराकरण करेंगे। यह अगला अध्याय बहुत सरस है। श्रोतागण मेरी ओर
ध्यान दें। श्रीकृष्ण और उद्धव के बीच हुए संवाद की कथा अत्यन्त आह्लाद देने वाली है। इससे एका जनार्दन
(एकनाथ) में भी महाज्ञान और परमानंद प्रकट होगा।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे श्रीकृष्ण उद्धव संवादे
परमहंस संहितायां एकाकार टीकायां दशमोध्यायः ॥ १० ॥
श्री कृष्णार्पणमस्तु ।
ग्यारहवाँ अध्याय
श्री गणेशाय नमः! श्री कृष्णाय नमः! हे ओंकाररूप श्री गुरु! तुम्हें नमस्कार है। तुम सत् और चित् के मेघ
हो। तुम स्वानंद जीवन की वृष्टि करते हो जिससे मुमुक्षुरूपी मयूरों को आनन्द होता है और वे हर्ष से नाचने
लगते हैं। उन सजल मेघों को देखकर वे 'सोऽहं' अर्थात् 'मैं ब्रह्म हूँ' का आर्तनाद करने लगते हैं और
रोमांचरूपी पंख खोलकर अत्यन्त तीव्र गति से सत्त्व का नृत्य करने लगते हैं। स्वानंद के आवेग में नृत्य करने के
कारण उनके सारे शरीर में बड़ी-बड़ी आँखें उभर आती हैं और वे सारे पंख शोभित हो जाते हैं, इसीलिये
श्रीकृष्ण उन पंखों को मस्तक पर धारण करते हैं। वह मेघ सामने देखकर आर्त (भक्त मुमुक्षु) रूपी चातक मुँह
खोलते हैं। मुँह में एक बूँद पड़ते ही वे सुखी तथा नित्य निर्दोष हो जाते हैं। आर्त की तृष्णा तत्काल दूर होती है।
वे स्वानंदजल से तृप्त होकर हर्षोल्लास के साथ सुख का उपभोग करते हैं। उत्तम और निर्मल भूमि देखकर,
उचित समय पर वे मेघवृष्टि करते हैं। उनकी वह सतत और प्रचण्ड वृष्टि शुरू होने पर जल की अनगिनत लहरें
उठने लगती हैं। उस कृपारूपी वर्षा की शुरुआत होते ही शिष्यरूप नदी में बाढ़ आ जाती है। विकल्परूपी कूड़ा
वह बाढ़ अपने प्रवाह में बहा ले जाती है। अनन्तर वह निर्मल प्रवाहयुक्त नदी चिदैक्य सागर में जा मिलती है
और उससे समरस होकर आत्मस्वरूप में स्थिर हो जाती है। फिर वैराग्य से शुद्ध की हुई भूमि अपनी ही आर्द्रता
से गीली हो जाती है और मृदु हो जाती है। लेकिन उसमें बीज अंकुरित नहीं हुए होते ऐसी उस भूमि पर जब
जल की निरन्तर वर्षा होने लगती है तो वासनारूपी ढेले गलने लगते हैं और सद्भाव की आर्द्रता मिलने से ज्ञान
की वाष्प निकलने लगती है। तब वहाँ आत्मबीज बोये बिना ही अपने आप परिपूर्ण अंकुर निकल कर खेत में
फसल स्वयमेव तैयार हो जाती है। बालों में दाने स्वाभाविक रूप से ही स्वस्थ्य एवं पुष्ट रहते हैं। परमकूपा से
पोषण से पुष्ट होकर समदृष्टि के बाल पकने लगते हैं। परमानन्द से सृष्टि भर जाती है। जीव और शिव एकरूप
हो जाते हैं। दुःखरूपी अकाल समाप्त होकर सुख के सुकाल का उदय होता है। कृपाधन सद्गुरु जब कृपा की
वर्षा करने लगते हैं तो सच्छिष्यों में हर्ष का कोलाहल शुरू हो जाता है। आत्मज्ञानरूपी पर्जन्य की जब वर्षा होने
लगती है तो साथ ही अवताररूपी ओलों की भी वर्षा होती है। वे ओले कार्य के अनुरूप आकार प्राप्त कर अन्त
में निराकार में विलीन हो जाते हैं। उस पर्जन्य के तुषार यदि दैवयोग से जड़मूढ़ पर पड़ जाएँ और उसका एक
बूँद भी सहसा उसके मुँह में पड़ जाय तो वह संतों की सभा में सम्मान पाता है। श्री हरिरूपी सद्गुरु महामेघ की
जिस पर कृपा हो जाय वही चराचर में धन्य होकर देवताओं में तथा मानवों में भी पूजनीय बन जाता है। 'गुरु'
शब्द का अर्थ भारी (वजनी) है। लेकिन वह इतना हलका है कि भवसागर में स्वयं तैर कर शिष्य को भी पार
कराता है। उसका आदि, मध्य और अन्त वेद भी नहीं जान पाये। यह वही सद्गुरु आनन्दघन जनार्दन है जिसने
मेरा एकाकीपन दूर कर इस एक एका को (एकनाथ) को पावन कर दिया और देखो! आत्मज्ञान का बोध
कराकर जो एक है वही अनेक है और जो अनेक है वही एक है यह निश्चित कर दिया। निजआत्मैक्य का ज्ञान
कराकर उसी ऐक्य से भक्ति मार्ग पर लगा दिया और अपनी ही कथा सुनाने के लिये मुझे श्रीभागवत सुनाने के
लिये खड़ा कर दिया। भागवत की कथा यही है कि दशम अध्याय के अन्त में उद्धव ने श्रीकृष्ण को बद्धों की
और मुक्तों की व्यवस्था के बारे में पूछा। उद्धव का प्रश्न अत्यन्त जटिल था। उसे सुनने के बाद अब श्रीकृष्ण
अपने अंतःकरण का गुह्य ज्ञान उद्धव को बताने वाले हैं। वे प्रश्नोत्तर श्रवण करने से जन्ममरण के फेरे समाप्त हो
जायेंगे, संसार की छत टूट जायेगी और विषयों का लेनदेन भी समाप्त हो जायेगा। मोक्षमार्ग के यात्री जो बेचारे
अनेक साधन अपना कर थक गये, उन्हें भी बंधमोक्ष की प्रतियोगिता जीतने के लिये शीघ्र यहाँ आना चाहिये
और भी जो जप-तप आदि साधन कर अथवा ध्येयध्यानादि अनुष्ठान करके हैरान हुए हों उन्हें भी शीघ्र यहाँ
आकर इस साधन से ज्ञान-अज्ञान पर विजय प्राप्त करनी चाहिये। ऐसी यह कथा नितांत जटिल है। इसलिये
श्रोताओं को सावधान होना चाहिये। एकनाथ विनती करता है कि आज स्वानंदघन जनार्दन प्रसन्न हो गये हैं। इस
ग्यारहवें अध्याय में बद्ध और मुक्त का भेद तथा साधु का लक्षण इसके बारे में श्रीकृष्ण बतायेंगे। इसी क्रम में
प्रसंग के अनुसार भक्ति का लक्षण तथा ग्यारह पूजा के अधिष्ठान का श्रीहरि निरूपण करेंगे।
श्री भगवानुवाच
बद्धो मुक्त इति व्याख्या गुणतो मे न वस्तुतः।
गुणस्य मायामूलत्वान्न मे मोक्षो न बन्धनम् ॥१॥
हे उद्धव! यदि तुम बद्ध और मुक्त अवस्थाओं को सच मानते हो तो यह सच नहीं है। सुनो, मैं तुम्हें
बताता हूँ। सच पूछो तो मेरे स्वरूप में बद्ध और मुक्त ऐसी अवस्थाएँ हैं ही नहीं। वह सब गुणों के कार्य का
परिणाम है। उनका सम्बन्ध मुझ से नहीं है। मेरे आत्मस्वरूप में न बद्धता है न मुक्तता है। गुणों के कार्यों से ही
गुणों में बद्धता का और मुक्तता का भास होता है। गुण समूल मायावी हैं। मैं माया से विरत, गुणातीत हूँ। सत्य
पर यदि असत्य की बाधा हो जाय तो सारे लोग मृगजल में भी डूबेंगे। चित्त में बनी हुई आग से गाँव जल कर
भस्म होंगे, या स्वप्न के सिक्कों से सांसारिक लेन-देन होगा अथवा जब सूर्य को उसका प्रतिबिम्ब निगल
जायेगा, पुरुष को उसकी छाया बाँध देगी, समुद्र यदि मृगजल में डूब जायगा तभी मैं गुणों की त्रिगुट मुझे बाँध
पायेगी। जीभ पर यदि केश उग आयें, हथेली पर यदि पेड़ उग जायें, आँख में यदि पर्वत घुस जाये, तभी मैं
गुणों के मेल से जकड़ा जाऊँगा। आकाश को यदि कुदाल खरोंच सके अथवा वायु के ललाट पर काजल चढ़े
या बिजली के मस्तक पर लोग सेहरा बाँधे या आकाश टूट कर समुद्र में गिर पड़े पर्वत के साथ सारी पृथ्वी हवा
से उड़ जाये, सूर्य अन्धकार में लड़खड़ाकर गिर पड़े तभी मैं गुणों में दिखाई पडूँगा। अधर में लटकते आकाश
में सरोवर हो, उसमें अनेक प्रकार के मनोहारी कमल खिल उठें और उनका मकरंद भ्रमर सेवन करें ऐसा यदि
सम्भव होगा तभी मैं आत्म गुणों के मेल से नाना प्रकार के विषयों का भोग कर फिर उन विषयों के लालच से
स्वयमेव उन गुणों से बँध जाऊँगा। तीन गुणों के अधीन रहकर कार्य करने से गुणकार्यों से तादात्म्य हो जाता है।
उससे भ्रान्तों को बद्ध और मुक्त इन अवस्थाओं का व्यर्थ ही आभास होता है। तुम कहोगे कि यदि गुण और
आत्मा ये अलग हैं इसे सच मान भी लें तो गुणों के साथ रहने से आत्मा अवश्य ही विकारग्रस्त हो जायेगा।
लेकिन भाई! जिस प्रकार अग्नि के कारण बर्तन गरम होता है, उसके कारण पानी गरम होता है और पानी गरम
होने से खाना पकता है, उसी प्रकार आत्मा विकार मुक्त होता है। अग्नि के ताप से आकाश गरम नहीं होता उसी
प्रकार आत्मा गुणों के साथ रहने पर भी विकार मुक्त रहता है। बहुरुपिया अन्धा दिखाई देने पर भी अन्धा नहीं
होता उसी प्रकार आत्मा गुणों के साथ विचरता दिखाई देने पर भी अपनी निर्गुण अवस्था में ही अवस्थित रहता
है। बहुरूपिया अन्धेपन के अपने अभिनय से सचमुच का अन्धा नहीं बन जाता, उसी प्रकार आत्मा भी गुणों के
मेल से बद्ध नहीं हो जाता क्योंकि ये गुण मायावी हैं और आत्मा शुद्ध है। उनका और इसका किसी भी अर्थ में
कोई सम्बन्ध नहीं है। आत्मा व्यापक है और गुण सीमित। इस दृष्टि से भी उसे कोई बन्धन सम्भव नहीं है
२६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
क्योंकि कलश में समुद्र कैसे समा सकेगा ? राई में पर्वत कैसे रह पायेगा ? अंजुली में यदि पृथ्वी समा सकेगी
चिऊँटी यदि हाथी को निगल पायेगी, जुगनू यदि सूर्य को अपना ग्रास बना पायेगा, मक्खी यदि ब्रह्माण्ड को
अपनी बगल में दबा सकेगी, पतंगा प्रलयानल को स्वाहा कर पायेगा तो आत्मा को गुण एकत्र होकर अपने पाश
में बाँध सकेंगे। इस प्रकार बद्धता प्राप्त होना यही असम्भव बात है। बद्धता जाते ही उसके साथ मुक्तता भी
गयी। लेकिन मैं आत्मा के रूप में जो हूँ वह सचमुच बद्ध-मुक्त अवस्थाओं से परे हूँ। स्वप्न का पुण्यात्मा
अथवा महापापी दुष्ट ये दोनों ही जागृत होने पर जिस प्रकार मिथ्या मालूम होते हैं उसी प्रकार आत्मा में भी
बद्धता और मुक्तता ये दोनों मिथ्या हैं। इसलिये जीवात्म पर बद्धता का जो आरोप किया जाता है वह सच नहीं
है। फिर मुझ परमात्मा को बद्ध-मुक्त अवस्था कैसी ? बिम्ब अथवा प्रतिबिम्ब में मल नहीं है लेकिन वह दर्पण
की काँच पर लगा होने के कारण वह देह पर ही लगा है ऐसा लगता है। यदि उसे साफ करना हो तो दर्पण को
ही रगड़ना होगा। ऐसा न कर प्रतिबिम्ब को साफ करने का प्रयत्न करना उचित नहीं होगा। उसी प्रकार जीव
और शिव में दोष नहीं होता वह अंतःकरण में होता है। अंतःकरण को ही शुद्ध करने से बन्ध और मोक्ष दोनों
की ही छुट्टी हो जाती है। उसी प्रकार गुणों के कारण उत्पन्न होने वाले जो अनेक प्रकार के दोष हैं वे सब
अविद्यात्मक हैं। मूर्ख लोग अपनी स्थूल बुद्धि से उन्हें जीव की देह के साथ जोड़ते हैं। प्रबल हो गये गुण जब
सद्बुद्धि से झड़ जाते हैं तभी अविद्या के कारण लगे हुए दोष नष्ट होते हैं और अविद्या ही निर्मल सविद्या हो
जाती है, जीव शिव होकर रहता है। जीव और शिव ये दोनों जब मुझमें एकरूप हो जाते हैं तब मुझ अकेले के
सिवा इस जन में या वन में कुछ शेष नहीं रह जाता। जीवभावना से देखें तो मैं ही जीव हूँ और शिवभावना से
देखें तो मैं ही शिव हूँ। मैं एक भी नहीं हूँ और अनेक भी नहीं हूँ।, मेरा अनुभव मैं ही जानता हूँ। अब यहाँ तुम
ऐसी शंका करोगे कि यदि जीव और शिव दोनों तुम ही हो तो फिर केवल शुकवामदेव ही क्यों मुक्त हैं? और
दूसरों को जड़ जीव क्यों कहते हैं ? जीव के रूप में भी जब सचमुच तुम ही हो तो फिर यह भेदभाव क्यों है ?
शुकवामदेवों की यह अवस्था वेदशास्त्र सम्मत है। वेदवाक्य की तो तीनों लोकों में मान्यता है, इसलिये यह बात
कुछ विचित्र-सी लगती है और इसलिये असत्य है ऐसा यदि तुम कहोगे तो वह ठीक ही है। वेद कहता है वही
सच है। वेद का वचन मेरा श्वासोच्छ्वास है लेकिन जो मैं अपने मुँह से कहता हूँ उसे तुम झूठ क्यों कहते हो ?
वेदों को भी वाणी देने वाला, सभी शास्त्रों का रचयिता मैं उसके भाषण की तुम असत्य कहते हो और स्वयं को
बड़ा बुद्धिमान समझते हो। वेदों के तीन खण्ड हैं, कर्मकाण्ड, उपासना काण्ड और ज्ञानकाण्ड ! पाखण्डी नर उसे
वेदवाक्य के बल पर ही मुँह बजाता है। वेद के कारण ही अनेक मतभेद तथा विवाद उत्पन्न होते हैं। लेकिन वेद
केवल मेरा परोक्षवाद है। उससे तत्त्वज्ञान का बोध कैसे प्राप्त होगा ? शब्दज्ञान और ब्रह्मज्ञान बाह्य दृष्टि से एक
से लगते हैं। जिस प्रकार एक तोला और एक तोला सुवर्ण भार एक से होते हैं लेकिन दोनों के मूल्य में कभी
बराबरी नहीं हो सकती उसी प्रकार वेदवाक्य और ब्रह्मस्वरूप का अनुभव ये दोनों एक से नहीं हैं। जिसे हरिहर
भी स्वीकार करते हैं, उसकी बात को तुम प्रमाण नहीं मानते हो यह केवल तुम्हारा ज्ञानाभिमान है। इस अभिमान
का त्याग करो। मेरा भाषण सत्य का भी सत्य है इसे निश्चित रूप से जान लो। तभी परमार्थ सिद्ध होगा। मेरे
इस वचन को ब्रह्म का लेख समझो। हे उद्धव ! मेरे विचार से वसिष्ठ वामदेव की. बातों में बद्ध और मुक्त का
कोई भेद नहीं है। यही मेरा सच्चा आत्मानुभव है। मुक्तों की दृष्टि से देखें तो सारी सृष्टि मुक्त दिखाई देगी
इसलिये शुक और वामदेव की बात अलग कैसे होगी ? बद्धमुक्त से भिन्न मैं चिद्धन परमात्मा हूँ। अगर तुम यह
कहते हो कि जीव को भी बन्धन है तो वह भी सच नहीं है।
ग्यारहवाँ अध्याय २६९
शोकमोहौ सुखं दुःखं देहापत्तिश्च मायया।
स्वप्नोयथाऽऽत्मनः ख्यातिः संसृतिर्न तु वास्तवी ॥ २ ॥
स्वप्न की स्थिति दो मुहूर्त ही रहती है लेकिन उतने समय में अनेक जन्मों तथा अनेक जातियों के लोग
दिखायी पड़ते हैं। उसी प्रकार संसार तथा उसके अनुभव मिथ्या हैं। व्यर्थ का आभास वहीं विलीन हो जाता है
जिससे देह में भीषण हाहाकार मच जाता है। इसी को शोक कहते हैं। टूटे हुए बर्तन में पानी भरने पर उसमें
चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब दिखाई देने लगता है तो बालक उसे अपने सीने से चपका लेता है लेकिन शीघ्र ही पानी
बह जाता है और प्रतिबिम्ब लुप्त हो जाता है। इससे बालक छटपटाने लगता है। इसी का नाम है 'शोक'। अथवा
गागर में चन्द्रमा का बिम्ब जब बालक के हाथ में नहीं आता तो वह जो दुःख प्रकट करता है उसका ही नाम है
'शोक'। जो नहीं है उसी के प्रति वह 'मैं' और 'मेरा' का भाव प्रकट करता है वही 'मोह' का कारण है। उसी
अवसर पर भीषण ममता उत्पन्न होती है। मृगजल का तालाब देखकर उसमें केले की फसल तैयार होगी इस
आशा से मृगतृष्णा के उस जल की आठों पहर रखवाली करता है। कोई उधर से गुजरता है तो उससे झगड़ा
करने लगता है। इस मोह में अन्धा होने के कारण उससे सत्य का विवेक नहीं हो पाता। उसी प्रकार माँ-बाप
कहते हैं कि पुत्रप्राप्ति से सुख लाभ होगा इस भ्रम से वह उनके मोह में पड़ा रहता है क्योंकि अन्त में लड़के
उन्हें अँगूठा ही दिखाते हैं। गन्धर्वनगरी की रचना देखकर उसके मन में अभिलाषा उत्पन्न होती है और उसे प्राप्त
करने के लिये वह बड़ी शीघ्रता से सेना तैयार करता है। उसी प्रकार देह का अभिमान मिथ्या है। देहसम्बन्धी
ममता बहुत कठिन होती है। प्राणियों में ममता का अभिमान लगा रहता है, वही मोह का मूल कारण है। सारांश
'अहं' और 'ममता' ही मोह के माता-पिता हैं। उन्हीं के मेल से जागृत 'मोह' बढ़करु लोगों को भुलावे में
डालता है। कोई विष स्वाद में मधुर रहता है इसलिये अपने प्रिय विषयों के प्रति आसक्ति रखते हैं और, जब
अनेक बार उसकी प्राप्ति होती है तो उसे 'सुख' इस नाम सम्बोधन करते हैं। विषयलाभ से जो हर्ष होता है उसे
ही वे 'सुख' कहते हैं और विषय का नाश होते ही उसे 'दुःख' और 'असुख' कहने लगते हैं। शोक, मोह, सुख,
दुःख आदि से ही 'देह की प्राप्ति' होती है। देहाभिमान के कारण ही अनेक दुःखदायी देह धारण करने पड़ते हैं।
वह जिस तीव्र ध्यान से मरता है उसी रूप में जन्म लेता है अथवा जो अत्यन्त द्वेष के कारण करता है वह द्वेषरूप
में ही जन्म लेता है। सर्प और नेवले की पूर्वजन्म की वृत्ति बैर की ही होती है इसलिये वे बैरी के ही रूप में
जन्म लेते हैं। मृत्यु के समय जो वासना शेष रहती है वही गति प्राणी को प्राप्त होती है। इसलिये अन्तःकरण में
अन्त समय जो प्रबल वासना उत्पन्न होती है वही गति उस प्राणी को प्राप्त होती है ऐसा वेद और पुराण भी बताते
हैं। पुरुष के साथ जिस प्रकार छाया मिथ्या है, उसी प्रकार ब्रह्म में माया भी मिथ्या है। वही गुणकार्यों को उत्पन्न
करती है और देह का आभास उत्पन्न करने का मूल भी वही है। जिस प्रकार स्वप्न में मन अकेला होने पर भी
वह अनेक प्रकार के रूप धारण करता है उसी प्रकार चैतन्य का जो अन्यथा आभास है वही चराचर है। सारांश
संसार का सचमुच ही कोई अस्तित्व नहीं है। फिर सुख और दुःख कैसा ? जरा देखो। बिना देह के छाया
किसकी रहेगी ? जिसने जन्म ही नहीं लिया वह काला है या गोरा कैसे कहा जाय ? सारा कुछ स्वप्न की तरह है,
संसार का वास्तविक अस्तित्व नहीं है। इस प्रकार इन दो श्लोकों में वस्तुविरोध का अच्छे ढंग से निरूपण किया।
अब प्रतीती से जो अनुभव प्राप्त होता है वृह सत्य में बाधक नहीं होता। आँख पर उँगली रखने से दो चन्द्रमा
दिखाई देते हैं लेकिन आकाश में दो चन्द्रमा नहीं होते, उसी प्रकार निराकार में मिथ्या आभास होता है।
२७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
विद्याविद्ये मम तनू विद्ध्युद्धवशरीरिणाम्।
मोक्षबन्धकरी आद्ये मायया मे विनिर्मिते ॥ ३॥
जिसका आत्मज्ञान की तरह अनुभव होता है, 'अहं ब्रह्मास्मि' की निरन्तर भावना रहती है, वही 'शुद्ध
विद्या' है और वही अविद्या का नाश करने वाली है ऐसा समझ लो। मैं 'पापी', 'अभागा' यही भावना जहाँ
प्रस्फुटित होती रहती है, वही भावना 'अविद्या' है जो अनेक प्रकार के सन्देह उत्पन्न करती है। एक जीव को
बन्धन में डालती है तो दूसरी उसे मुक्त करती है। हे उद्धव ! ये दोनों मेरी ही अनादि शक्तियाँ हैं। तुम चिन्मात्र
चैतन्यधन हो, चित्स्वरूप होने के कारण वृत्तिशून्य हो, सदा निर्धर्म होकर रहते आये हो, तुम्हारी शक्तियाँ कैसे
माने ? ऐसा व्यर्थ सन्देह करने का कारण नहीं है, सुरनरों के भी वश में जो नहीं आ पाती वह मेरी माया ही इन
शक्तियों को जन्म देती है। उसे 'सत्' कहें तो वह तत्काल नष्ट होती है, असत् कहें तो उसका आभास होता है।
उसी ने संसार को नाम और रूप की आसक्ति दी है। उसे न सच कह सकते हैं, न झूठ ही कह सकते हैं।
इसीलिये उसे 'अनिर्वचनीय' अर्थात् शब्दों में व्यक्त न करने लायक कहा जाता है। उसी ने अविद्यारूपी पिल्लों
को अपने पंखों के नीचे पाल-पोस कर बड़ा किया है। विद्या और अविद्या कोई आज की वस्तु नहीं हैं, वे
अनादि शक्तियाँ हैं। ये माया की दो वृत्तियाँ हैं। इनके कारण ही बन्धन और मोक्ष का आभास होता है। तुम
कहोगे ऐसी यह माया कौन है ? तो तुम्हारी जो कल्पना है वही माया है, उसी में बद्धता और मुक्तता प्रस्फुटित
होती रहती है इसे ध्यान में रखो। अब तुम्हें बन्ध मोक्ष की स्थिति के बारे में यथातथ्य रीति से बताता हूँ, उसे
ध्यान से सुनो। जो स्वप्न में भी मेरी आराधना नहीं करता, मेरा भजन नहीं करता उसी में सारी अविद्या की वृद्धि
होती रहती है और जो मेरे प्रति अत्यन्त तत्पर रहता है, आठों पहर भजन में लीन रहता है वह ब्रह्मविद्या का
निवासस्थान है। वहीं उसकी सतत वृद्धि होती रहती है। जहाँ मेरे भजन का उल्हास रहता है वहाँ अविद्या का
नाश होता है। वहीं ब्रह्मविद्या का प्रवेश होता है ऐसा भक्तों को पक्का विश्वास रहता है। अब तक मैंने शक्ति की
दृढ़ स्थापना की दृष्टि से बन्ध का कारण और मोक्ष के साधन के बारे में बतलाया। इस पर उद्धव ने कहा,
"बन्ध और मोक्ष इन वृत्तियों को तुम माया की शक्ति कहते हो, अर्थात् माया ही मोक्षदायिनी हो गयी। लेकिन हे
कृष्ण, यह कैसे होगा ? क्योंकि यदि माया मोक्षदात्री हुई तो फिर तुम्हारी भक्ति क्यों की जाय ? तो इसमें सत्य
क्या है, इसे बतायें।" इस पर कृष्ण ने उद्धव से कहा, "छाया स्वयं चल फिर नहीं सकती, वैसे ही माया को भी
अपना सामर्थ्य नहीं है। फिर वह मोक्ष कैसे प्रदान करेगी? माया का नियंता विष्णु है और वही मोक्ष का दाता है।
वही जीव का बन्धन तोड़कर सायुज्यता देता है। इस पर तुम कहोगे कि अविद्या और काम्य कर्म से जीव को जो
बद्धता प्राप्त होती है वह ब्रह्मविद्या तथा निष्कर्म से टूटती है। यही बोध गुरु भी श्रुतियों के माध्यम से
निश्चयपूर्वक करते हैं। क्या इसमें विष्णु कर्त्ता है? नहीं। फिर वह मोक्षदाता कैसे होगा ?" लेकिन उद्धव ! तुम
ऐसे विकल्प की बात भी न सोचो क्योंकि गुरु के रूप में विष्णु ही रहते हैं। श्रुति का अर्थ भी साक्षात विष्णु ही
हैं और शमदमादिक जो साधन हैं वह भी विष्णु ही हैं। शिष्य की बुद्धि को जो ज्ञान प्राप्त होता है वह भी
विष्णुरूप है यह ध्यान में रखो। इस प्रकार श्रीविष्णु ही अपने भक्तों को मोक्ष प्रदान करने वाला है। उस मोक्ष का
परिपाक जो समाधि है वह भी श्रीविष्णु ही हैं, समाधि का सुख भी श्रीविष्णु ही हैं। सनातन ब्रह्म, परिपूर्ण
परमात्मा जो विष्णु है वह मैं ही हूँ। मैं अपनी कृपा से भक्तों को भवपाश से मुक्त करता हूँ। अब तीसरे श्लोक में
आये पद 'शरीरिणां' से जीव को बन्धन होता है ऐसा अर्थ ध्वनित होता है। उसका भी बड़ी कुशलता से निवारण
करते हैं। एक को ही बन्ध मोक्ष होता है या नहीं, इस प्रश्न के उत्तर अब उद्धव को स्पष्ट रूप से दे रहे हैं।
ग्यारहवाँ अध्याय २७१
एकस्यैव ममांशस्य जीवस्यैव महामते।
बन्धोऽस्याविद्ययानादिर्विद्यया च तथेतरः ॥४॥
लकड़ियाँ कम या अधिक करने से अग्नि कम या अधिक होती है। उसी अग्नि में से एकआध चिनगारी
उड़ कर आकाश की ओर चली जाती है किन्तु आत्मस्वरूप में कम और अधिक होना नहीं है। फिर उसका
'अंश' मालूम हाने के लिये अवकाश कहाँ है ? जिससे आत्मज्ञान प्राप्त हो ऐसी बुद्धि उद्धव के पास थी। लेकिन
इसलिये श्रीकृष्ण ने उसे बड़े प्रेम से 'महामते !' कहकर सम्बोधित किया। फिर बोले, "जरा ध्यान देकर सुनो।
इस श्लोक का अर्थ अत्यन्त गूढ़ है। उस धारणा को धारण करो। कहकर जगजेठी कृष्ण ने उद्धव की पीठ
थपथपायी और बोले, यह अत्यन्त गूढ़ बात तुझ पर कृपा होने के ही कारण बताता हूँ। पीठ थपथपाने के बहाने
अपनी शक्ति उसे प्रदान की और इस प्रकार उद्धव के अंतःकरण में अद्वैत ज्ञान का लक्षण प्रकट किया। हे उद्धव !
जिस प्रकार दीपक अनेक होने पर भी प्रकाश एक अभिन्न रहता है उसी प्रकार त्रिभुवन में जीव सब जगह एक
है। दीपक की ज्योतियाँ एक होती हैं किन्तु दीपक एक नहीं होते। भेद जड़ में उत्पन्न होता है किन्तु अजड़ में
ऐक्यवृत्ति होती है। चन्दन के टुकड़े अनेक होते हैं किन्तु उनमें सुगन्ध एक ही होता है। उसी प्रकार जीवरूप में
मैं अविनाश परमात्मा प्रतीत होता हूँ। अब जीव के रूप में तुम श्रीकृष्ण ही हो इसे यदि सच मान लें तो संसार
पाश आदि का जो बन्धन है वह तुम पर ही लागू होता है ऐसा कहना पड़ेगा'' ऐसी यदि तुम कल्पना करते हो तो
वह सच नहीं होगी। जिस प्रकार शरीर को चलाने के लिये प्राण की आवश्यकता होती है लेकिन उस पर शरीर
की अवस्थाएँ लागू नहीं होतीं। सूक्ष्मदेह में स्वयंभू रहने वाला जीव मेरे ही अंश के रूप में प्रतिबिम्बित हुआ है।
उसे बन्धन की भावना केवल मिथ्या आभासित होती है। घट में आकाश रहता है जिसे 'घटाकाश' कहते हैं
लेकिन वह घट नष्ट होने पर भी आकाश नष्ट नहीं होता उसी प्रकार मैं भी जीवतत्व में अविनाश रूप में रहता
हूँ। जैसे जलकुण्ड में सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखायी देने पर भी सूर्य वास्तव में आकाश से जलकुण्ड में नहीं उतरता
उसी प्रकार मैं भी जीवत्व से अलिप्त रहता हूँ। सूर्य जिस प्रकार जलकुण्ड में प्रतिबिम्बित होता है उसी प्रकार
सूक्ष्म देह में मेरा आभास होता है। वहाँ मिथ्या भोग के पागलपन का बन्धन मुझ पर कैसे लागू होगा.? अब
विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है। प्रतिबिम्ब का नाम 'जीव' और मुख्य बिम्ब मैं 'शिव' यही 'जीव
शिव' का बृहत् अर्थ है। तालाब, कुएँ, जगह-जगह दिखायी देने वाले जलकुण्ड इन सभी में सूर्य के बिम्ब
दिखायी देते हैं किन्तु आकाश में देखें तो सूर्य के इतने बिम्ब नहीं दिखाई देते। उसी प्रकार एक को अनेकत्व देने
वाला जो जीवत्व है वह मिथ्या है यह ध्यान में रखो। भागवत का मुख्य तत्त्व और ज्ञान का शुद्ध सत्त्व यही है।
जलकुण्ड में सूर्य का प्रतिबिम्ब हिलता-डुलता है, वह निश्चल है, वह मटमैला होता है आदि जो जलकुण्ड के
गुण हैं वे सब उस प्रतिबिम्ब पर मढ़े जाते हैं। वैसे देखा जाय तो शिव को कभी बाधकता नहीं होती। वास्तव में
यह कार्य अविद्या का है जो जीव के मत्थे थोपा जाता है। इसलिये जीवभेद बिलकुल मिथ्या है। उसे विद्या और
अविद्या अपने कर्म और गुण के अनुसार मुक्तता और बद्धता प्रदान करते हैं। उस एक जीवभाव को ये नित्यमुक्त
और नित्यबद्ध अवस्थायें दिखाने के लिये विद्या और अविद्या कारणीभूत होती हैं। जिस प्रकार जल में सूर्य का
प्रतिबिम्ब हिलता है तो पानी की चंचलता या स्थिरता ये अवस्थाएँ केवल प्रतिबिम्ब के लिये होती हैं, उसका
पता सूर्य को नहीं होता या जिस प्रकार अँधेरे के जुगनू को कल्पांत में भी सूर्य का दर्शन नहीं होता उसी प्रकार
जीव की बद्धता अथवा मुक्तता परमात्मा पर लागू नहीं होती। पानी में आकाश डूबा दिखाई देता है लेकिन वह
गीला नहीं हो जाता. उसी प्रकार आत्मस्वरूप भी अविद्या से अलिप्त रह कर जैसा का तैसा रहता है। एक बद्ध
२७२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
और एक मुक्त यह जीव का ही भास है। इसे भी मैं तुम्हें सिद्ध करके दिखाता हूँ। ध्यान देकर सुनो। हज़ार घड़ों
में पानी भरा जाय तो एक ही सूर्य हजार घड़ों में हजार रूपों में दिखाई देता है लेकिन एक घड़े की अवस्था दूसरे
पर लागू नहीं होती। उनमें से जो घड़ा हिल रहा है उसमें का प्रतिबिम्ब हिलता हुआ दिखायी देता है लेकिन दूसरे
घड़े में वह निश्चल रहता है। यदि संयोग से उनमें से एक घड़े में छेद हो जाय तो घड़े का पानी चूकर उसमें का
प्रतिबिम्ब अपने बिम्ब में मिल जाता है। बाकी प्रतिबिम्ब वैसे के वैसे रहते हैं। उसी प्रकार गुरुकृपा होने पर
सूक्ष्म देह विलीन हो जाता है, उसका परमात्मा से मिलन हो जाता है। बाकी सब देह के बन्दीगृह में फँसे रहते
हैं। इसी का निरूपण मैं लोगों के अनुरोध पर आनन्दपूर्वक, स्वरुचि से तथा विशद रूप में करने वाला हूँ।
अथ बद्धस्य मुक्तस्य वैलक्षण्यं वदामि ते।
विरुद्ध धर्मिणोस्तात स्थितयोरेकधर्मिणि ॥५॥
इसी प्रसंग में बद्ध-मुक्त लक्षण के सम्बन्ध में तुम्हारे जो प्रश्न हैं, उनका भी निरूपण करता हूँ। ये दोनों
देह में ही रहते हैं और उनका स्वभाव एक-दूसरे के विपरीत होता है। एक सदा सुखी रहता है तो दूसरा रात-
दिन दुःख उठाता रहता है। इस प्रकार इनके दो प्रकार के भेद हैं—एक जीव ईश्वरभेद और दूसरा जीव-जीव में
परस्पर भेद। इस प्रकार बद्धमुक्त में भी भेद है। पहले तुम्हें जीवेश्वर की कथा तथा उनमें का भेद बताता हूँ और
फिर जीव की बद्धमुक्तता की व्यवस्था स्पष्ट करके बताऊँगा। इस प्रकार जीवेश्वर में भेद स्वयं नारायण ढाई
श्लोकों में वर्णन करने लगे यह उद्धव का अहोभाग्य है।
सुपर्णावेतौ सदृशौ सखायौ यदृच्छयैतौ कृतनीडौ च वृक्षे।
एकस्तयोः खादति पिप्पलान्नमन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान्॥६॥
सुपर्ण का अर्थ है पक्षी। वह एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर जाता है उसी प्रकार देह धारण करने वाला जीव
भी इस एक देह से दूसरे देह में जाता रहता है इसीलिये उसे भी पक्षी कहते हैं। पक्षी की ही तरह उसकी भी
गति रहती है। एक देह को छोड़कर वे दूसरे देह में जाते हैं इसीलिये उन्हें पक्षी कहते हैं। इस प्रकार आत्मा देह
से भिन्न है। इसे उदाहरण देकर समझाया तथा उसी क्रम में देहात्मवाद का खण्डन भी किया। आत्मा कभी देह
धारण नहीं करेगा। देहबुद्धि धारण करना तो और भी खराब है। इसे भगवान् उद्धव को अत्यन्त प्रेम और निश्चय
से समझा रहे हैं। देहबुद्धि के उदर में जन्म-मरण का असंख्य भण्डार रहता है। ये सदा देहबुद्धि के साथ रहते
हैं। चित्स्वरूप में दोनों ही समान हैं। वे कभी भी जड़ देह की तरह नहीं होते। ये दोनों अनादि मित्र हैं तथा
परस्पर जीवश्वकंठश्च हैं। काल, अकाल वे कभी एक-दूसरे से अलग नहीं होते। सखा की तरह, हँसते, खेलते
सीधे सादे रूप में साथ-साथ रहते हैं। प्रकाश दीपक से अलग नहीं रहता और दीपक भी प्रकाश को छोड़कर
नहीं जाता उसी प्रकार जीवशिव का मिलन अपनी ही लीला से एक साथ चलता रहता है। जरा देखो! जीव
जिस चीज की भी इच्छा करता है वह सब उसकी वासना के अनुसार ईश्वर उसे प्रदान करता रहता है। कभी
उसे ना नहीं करता। अंतकाल में तो जीव जो भी कुछ माँगता है वह सब ईश्वर उसे देने लगता है और ईश्वर
की आज्ञा के अनुसार ही जीव आचरण करता रहता है। सचमुच ईश्वर की आज्ञा जीव मनोभाव से स्वीकार
करता है। कभी 'हाँ' या 'ना' नहीं करता। उनकी इस प्रकार की मित्रता की बात अपूर्व है। उनकी मैत्री
आश्चर्यजनक है। ईश्वर जैसी भी प्रेरणा करता है वैसे-वैसे जीव उसका पालन करता रहता है, उससे जरा भी
विचलित नहीं होता। जन्म के क्षण से लेकर जीव ईश्वर की आज्ञा को शिरोधार्य करता है। परस्पर मित्रता होने
ग्यारहवाँ अध्याय २७३
के कारण ईश्वर जीव का सहायक होता है। संकट के समय जब जीव ईश्वर की रट लगाता है तो वह तत्काल
आकर उसे संकट से छुड़ाता है। इस प्रकार शिव की आज्ञा में जीव रहता है। जीवत्व समाप्त होने पर वह शिव
में ही एकरूप हो जाता है। वह भी जीव के ही लिये शिवत्व स्वीकार करता है अन्यथा वह भी अलग ही रहता
है। ऐसी उनकी मित्रता है उसका वर्णन वाणी से कैसे सम्भव है। उद्धव ! उनकी मैत्री का सौजन्य सचमुच जानने
वाला एक मैं ही हूँ। इस प्रकार जीव ईश्वर के अधीन रहता है यह बात सिद्ध हो गयी और साथ ही साथ
अनीश्वरवाद का खण्डन भी हो गया। अनीश्वरवाद का खण्डन करते समय पाखण्ड कर्म का भी खण्डन किया।
कर्मपाखण्ड के मतवादी ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते। वे ईश्वर के स्थान पर चित्त धर्म को
स्वीकार करते हैं। ईश्वर सहज चित्स्वरूप है यह कहकर चित्त धर्म का निराकरण किया। अनेक प्रकार के
चिन्तन का नाम है 'चित्त' और हे उद्धव ! चित्त के बिना जो निश्चलता होती है उसे 'चैतन्य' या 'शुद्धचित्त
स्वरूप' कहते हैं। कुछ लोग धर्म का विचार न कर ईश्वर को मोक्षदाता कहते हैं। यह पाखण्डी भक्तों की बात
है। उसकी चिद्रूपता स्थापित कर चित्तधर्म का निराकरण किया। तिलक-माला-मुद्रा आदि धारण कर जो संतों
की निन्दा करता है, भक्ति का ढोंग रचा कर पाप का आचरण करता है, उसका नारायण कभी उद्धार नहीं करते।
अंतःकरण की बातें जानने वाला मैं हूँ इसीलिये मुझे 'अंतर्यामी' कहते हैं। वही मैं शाब्दिक वचनधर्मी अधर्म पर
कैसे चलूँगा ? मैं सचमुच ज्ञानस्वरूप हूँ, मैं सर्वसाक्षी और सर्वज्ञ हूँ। बिना धर्म-अधर्म का विचार किये मैं मोक्ष
प्रदान कर दूँ यह नहीं होगा। जो स्वयं भक्त का स्वांग बनाकर पाप का आचरण करता है उसे 'दंभी' कहते हैं।
उसका उद्धार भगवान नहीं करते। सदृशौ (समान) और सखायों (मित्र) इन दो शब्दों से भगवान ने पाखण्डियों
का खण्डन कर दिया। विभिन्न मतों का खण्डन कर अपना मत स्थापित करने के लिये भगवान श्रीकृष्ण ने बड़ा
विचार कर इन दो पदों की योजना की है। उन दोनों पक्षियों ने मिलकर देहरूपी वृक्ष पर अपना घोंसला बनाया।
अब देह को वृक्ष किस उद्देश्य से कहा इसका कारण सुनो। माता का उदर क्यारी है और पिता का रेत बीज है,
गर्भादान, बुआई और उसे बढ़ने के लिये वासना का जल है। 'सोहं' अर्थात् 'ब्रह्म मैं ही हूँ' इस भाव का गुप्त
अंकुर त्रिगुणरूप भूमि में त्रिदल रूप से ऊपर आता है और 'कोहं' अर्थात् 'मैं कौन हूँ' इस भाव से बड़ा होकर
वृक्ष का आकार लेता है। उसमें हस्तपादादि अनेक शाखायें फूट कर वे बढ़ने लगती हैं। उसी में नीचे नाखून
तथा ऊपर शिखा फूट कर वृक्ष का पूर्ण विस्तार होता है। उसमें देह बुद्धि के दृढ़ मूल निकलते हैं और उसमें
विकल्प की कलियाँ फलने लगती है। कर्म-अकर्म के पर्ण उसमें निकलते हैं जिससे मोह ममता के सुन्दर फलों
के गुच्छे लटकते हैं। बड़ी-बड़ी ऊँची शाखाओं में सुख-दुःख के फल लटकते हैं और उसके भार से लटक कर
वे शाखाएँ जमीन पर पसर जाती हैं। ऐसे वृक्षों में गुप्त एवं कठिन स्थान पर हृदय में जीवशिव अपने बसेरे के
लिये घोंसला बनाते हैं। यदि कोई उसे देह की सत्यप्राप्ति हुई ऐसा कहे तो श्रीकृष्ण उस मत का खण्डन करते
हैं। पुरुष के साथ ही छाया मिथ्या होती है। वह तोड़ने-मोड़ने से दूर नहीं होती। उसी प्रकार मेरी माया
अवर्णनीय है। वही अपनी इच्छा से वहाँ अपना घोंसला बनाती है। शान्त सोये हुए मनुष्य की तरह जीवात्मा
नीड में रहता है। वैसे, सह सब माया है उसमें सत्य का अंश नहीं है। इस प्रकार देह सम्बन्धों के मिथ्यत्व के
निरूपण से श्रीकृष्ण ने नैयायिक मत का जो मुख्य सिद्धान्त है उसी का उच्छेद कर दिया। ऐसे इस वृक्ष को
काल जन्म से ही क्षण-क्षण तोड़ता रहता है और उसकी बाल्यावस्थादि अवस्थाओं पर प्रहार करता रहता है।
इस वृक्ष के फल कच्चे, पके, तीते, कसैले होते हैं जिन्हें 'पिघले' कहते हैं। उन दो पक्षियों में जिसे 'जीव'
कहते हैं वह अनेक प्रकार के दुःखदायक कर्मफलों का भोक्ता होता है। उन फलों के खाने से पेट नहीं भरता,
२७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
खाने से पचता नहीं इसलिये संसार चक्र में फँसकर चक्कर लगाने पड़ते हैं। फिर भी वह बड़े चाव से खाता
रहता है। वह एक फल खाता रहता है तो दूसरा उसे न खाने का इशारा करता है लेकिन जीव को उस फल की
बहुत चाह रहती है इसलिये वह लगातार उन फलों को खाता रहता है। शिवा की बात नहीं मानता और रात-
दिन फल खाता रहता है। फिर भी उसमें शक्ति नहीं होती। उसे अशक्त पाकर काल उसे अपने पाश में बाँध
लेता है। दूसरा कर्मफल को स्पर्श नहीं करता। उसे देखकर कलिकाल भी भागने लगता है। जो कर्मफल का
सेवन नहीं करता वह अपनी ज्ञानशक्ति से और भी अधिक प्रबल होता है, वह सदा परमानन्द से तृप्त रहता है
और स्वानन्द से डोलता रहता है। उद्धव को आत्मबोध हो इसलिये श्रीकृष्ण ने जीवशिव का भेद तथा आत्मज्ञान
का बोध प्रांजलता से तथा अत्यन्त प्रेम से निरूपित किया।
आत्मानमन्यं च स वेद विद्वानपिप्पलादो न तु पिप्पलादः।
योऽविद्यया युक् स तु नित्यबद्धो विद्यामयो यः स तु नित्यमुक्तः ॥ ७ ॥
जो कर्मफलों का सेवन नहीं करता, जो आत्मस्वरूप का जानकार होते हुए सचमुच ही जीव और प्रपंच का
द्रष्टा होता है वही आत्मज्ञान के कारण अलिप्त रहता है। जीव प्रपंच का ज्ञाता है लेकिन परमात्मा को नहीं
जानता इसलिये कर्मफल खाते समय बद्ध होकर व्यथा भोगता रहता है। बेचारा कर्मफलों का सेवन करता है और
अन्धा, विकलांग तथा पागल बन जाता है। वह अपने को ठीक से नहीं पहचान पाता और देह की बेड़ी में फँस
जाता है। देह सम्बन्ध में तो पग-पग पर आत्मघात होता रहता है और जन्म-मरण का अन्त न होने के कारण वह
दुःख से छटपटाता रहता है। नश्वर विषयों की लत पड़ जाने के कारण जीव उनमें बद्ध हो जाता है। अविद्या का
यह सम्बन्ध बुद्धिमान देहधारी को भी लग जाता है। जीव को विषय में जितनी रुचि रहती है, उतनी ही उसे
नित्यबद्धता होती है और जो विषय से अलिप्त रहता है उसमें नित्यमुक्तता का वास रहता है। जो विद्या की
प्रधानता से नित्यमुक्त रहता है, जो ज्ञानशक्ति से शक्तिमान रहता है, जो सर्वव्यापी होकर सबसे अलिप्त रहता है
उसे ही 'नित्यमुक्त' कहते हैं। इस प्रकार जीव की नित्यवद्धता के बारे में बताया और शिव की मुक्तता भी व्यक्त
की। अब जीव की बद्ध-मुक्तता के सम्बन्ध में भी बताते हैं। अब श्रीकृष्ण उद्धव से बद्धमुक्तों के लक्षण और
दोनों की पहचान बतायेंगे।
देहस्थोऽपि न देहस्थो विद्वान् स्वप्नाद् यथास्थितः।
अदेहस्थाऽपि देहस्थः कुमतिः स्वप्नदृग् यथा ॥ ८ ॥
अब तीन श्लोकों में बद्धमुक्तों का मिश्र लक्षण बतायेंगे और केवल मुक्तों का उत्तम लक्षण सात श्लोकों में
निरूपित करेंगे। देह में रहकर भी विदेही होना यही मुक्त का लक्षण है। इसी कारण देह में रहते हुए भी उसे
'विदेह' कहते हैं। जिस प्रकार स्वप्न का राज्य और भिक्षा, जागने पर मिथ्या ही हैं, उसी प्रकार देहादि सुख-
दुःख भी मुक्तों के लिये मिथ्या है। जो स्वप्न में मर कर अग्नि को समर्पित भी कर दिया गया वह जागने पर राख
नहीं हो जाता उसी प्रकार प्रपंच मिथ्या है यह जिसने जान लिया उसी को 'मुक्त' कहते हैं। स्वप्न की अनुकूल,
प्रतिकूल बातें का जागृति में स्मरण होता है लेकिन उनके सुख-दुःख की बाधा नहीं होती, उसी प्रकार संसार के
सम्बन्ध में जो भी बातों हैं उनकी मुक्त को बाधा नहीं होती। अब बद्ध की स्थिति सुनो। वह वास्तव में देहातीत
ही होता है किन्तु दुर्बुद्धि के कारण स्वयं को 'देह' मानता है और इसी कारण से उसे दुःख होता है। पानी में पड़े
प्रतिबिम्ब को देखकर 'मैं डूबा' कहकर काँखने लगता है और 'मुझे बचाओ, तुम्हें पुण्य मिलेगा' कहकर
ग्यारहवाँ अध्याय २७५
चिल्लाने लगता है इसलिये जागृति में 'अब मैं नहीं बचूँगा' कहता है। भ्रम का यह सघन पटल ही बद्धता का
लक्षण है। स्वप्न का मिथ्या सुख-दुःख भोगते हुए भ्रम में छटपटाता रहता है। आत्मस्वरूप का विस्मरण होने से
विषयासक्ति बढ़ती है, मन में संकल्प विकल्पों का उदय होता है, वही बद्ध का लक्षण है। अब उसके और भी
लक्षण बताता हूँ। भोग भोगते हुए भी अभोक्ता रहता है, यही मुक्तावस्था है। उसके बारे में भी सुनो।
इन्द्रियेरिन्द्रियार्थेषु गुणैरपि गुणेषु च।
गृह्यमाणेष्वहं कुर्यान्न विद्वान् यस्त्वविक्रियः ॥ ९॥
अवशेष प्रारब्ध स्थिति के कारण मुक्तों की देह में बस्ती दिखायी पड़ती है। किन्तु जागृति में, स्वप्न में
अथवा सुषुप्ति में भी वह देहास्थिति को स्पर्श नहीं करता। पुरुष के कारण छाया चलती-फिरती दिखायी देती है
लेकिन उस छाया को पुरुष स्पर्श नहीं करता, उंसी प्रकार मिथ्या देहबुद्धि कल्पांत में भी मुक्त के पास नहीं आ
सकती। जिस प्रकार हम अपनी ही छाया में नहीं बैठ सकते उसी प्रकार मायादि गुण पास होते हुए भी उसका
स्पर्श नहीं करते। नियति की इच्छा से उसे जो भी विषय प्राप्त होते हैं उनका वह सेवन करता है लेकिन सेवन
करने का भास उसे नहीं होता क्योंकि उसमें विषय की भावना का स्फुरण ही नहीं होता। गुण ही गुणों की
अवस्था का पोषण करते हैं, इन्द्रिय अपने-अपने विषयों का भोग करते रहते हैं, 'मैं' दोनों का साक्षी होने के
कारण अकर्त्ता हूँ, चित्तस्वरूप होने के कारण मैं सबसे अलिप्त ही रहता हूँ। (ऐसी उसकी धारणा होती है)
इन्द्रियों की संगति से विषयों में लिप्त होते हुए भी वह विषय की छूत से कभी मैला नहीं होता। जहाँ काम से
अति प्रेम होता है वहाँ लालच की दृढ़ बस्ती होती है अथवा जहाँ काम की प्राप्ति नहीं होती, वहाँ क्रोध का
तूफान उठता है। किन्तु मुक्त सदा निष्काम होने के कारण क्रोध लोभ के साथ उसका काम भी नष्ट हुआ रहता
है। वह स्वयं आत्माराम तथा सारे जगत का विश्रामधाम बन जाता है। इस प्रकार मुक्त के हृदय में पाप या पुण्य
उत्पन्न हो ही नहीं सकता। वह काम, क्रोध की वृत्तियों से शून्य हो परिपूर्ण चिद्ब्रह्म होकर रहता है। मुक्त का
विषय सेवन ऐसा रहता है कि उसमें भी ब्रह्मभाव दिखायी देता है। इसलिये पापपुण्य का प्रश्न ही नहीं उठता
और इस प्रकार उन्हें नित्य मुक्ति प्राप्त होती है। मुक्त की बात ऐसी है। अब बद्ध की भी बात सुनो। वह सचमुच
ही अकर्त्ता होते हुए भी मैं उसे कर्ता कहता हूँ और इसीलिये वह सर्वत्र उलझ जाता है।
दैवाधीने शरीरेऽस्मिन् गुणभाव्येन कर्मणा।
वर्तमानोऽबुधस्तत्र कर्तास्मीति निबद्ध्यते ॥ १०॥
शरीर भाग्य के अधीन है। हरिहर भी उसमें यत्किंचित फेरबदल नहीं कर सकते। वेदशास्त्रों द्वारा भी यह
सम्मत है। देह में जिस गुण की प्रधानता होती है उसके ही अनुसार कर्म होते हैं और इन्द्रिय भी गुणों के अधीन
होने के कारण वे उसके अनुसार कार्य करते हैं। अर्थात् देह का आचरण दैव के गुणों के अनुसार होता है फिर
भी वह अपने को कर्त्ता मानता है। वही उसके लिये दृढ़ बन्धन का कारण बनकर अपना ही घातक बन जाता है।
चने की आशा से बन्दर पिंजरे की नली में हाथ लगाता है और वही उसके लिये पाश बन जाता है। उसी प्रकार
जीव देह के विषय विलास के घमण्ड में फँस जाता है। जो सचमुच ही देहातीत तथा गुणकर्मों का अकर्त्ता है
वही कहता है 'देह मैं हूँ और कर्मों का कर्त्ता भी मैं हूँ।' इस प्रकार अहं ममता में भूल जाता है। चोरी न करके
जो मैंने चोरी की कहता फिरता है उसे छोटे-बड़े सभी पीटने लगते हैं। वही गति जड़ जीवों की है। वास्तव में
कर्म होता है प्रकृति का, उसे अपने माथे पर लेकर अहं की ममता से नाचता फिरता है, उस अभिमान के कारण
२७६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कल्पांत तक अनिवार्य बद्धता में फँसता जाता है। नीचे काजल का लेप लगाकर ऊपर सफेद स्फटिक रखने पर
उसकी शुभ्रता लुप्त हो जाती है और वह काला ही दिखायी देने लगता है। उसी प्रकार जीव अन्धा हुआ रहता
है। अन्धा हाथी जब उन्मत्त हो जाता है तो वह इस बात का विचार नहीं करता कि मैं गड्ढे में गिर पडूँगा उसी
प्रकार जीव कर्म करने लगता है, अधोगति की ओर जाने का विचार भी उसके मन को स्पर्श नहीं करता। मैं देह
हूँ, मैं ज्ञाता हूँ, मैं विषयभोक्ता हूँ यह जो 'मैं' पन की अहंता है उसी का नाम है दृढ़बन्धन। इस प्रकार बद्धमुक्त
का वर्तन निरूपण से स्पष्ट करके बतलाया। अब श्रीकृष्ण केवल मुक्तों का लक्षण अत्यन्त प्रेम से बतलाते हैं
'ज्ञानी मेरी आत्मा है' यह रहस्य की बात भगवान ने अर्जुन को सेना की भीड़ में बतायी थी। वही गुप्त बात
भगवान इस समय उद्धव को बता रहे हैं। ज्ञान की मुक्तस्थिति का यथार्थ रीति से वर्णन करना यही आत्मगुह्य है।
ज्ञान के लक्षण बताते समय श्रीकृष्ण को संतोष नहीं हो रहा था इसीलिए निरूपण के बहाने वे पुनः ज्ञान के
लक्षण बता रहे हैं। इससे ज्ञात होता है कि भक्तों का माधुर्य एक श्रीकृष्ण ही जानें और कृष्ण भजन का स्वाद
भक्त ही जानें! वैसे भी जब मुक्तों की कथा हो और वक्ता भगवान श्रीकृष्ण हों तो उद्धव के भाग्य का क्या वर्णन
किया जाय? शेष भी वह नहीं कर पायेगा। उद्धव भी अर्जुन जैसा या उससे भी अधिक महान होना चाहिये
क्योंकि वे दोनों नर नारायण थे इसीलिये उन्होंने उसके सामने गुप्त ज्ञान का वर्णन किया था। अब वही ज्ञान की
कथा पुनः उद्धव को बता रहे हैं। इससे मालूम होता है कि उद्धव जैसा भाग्य किसी का नहीं है। निजधाम जाना
छोड़ तथा अपनी इच्छा एक ओर रख भगवान ने इतना निरूपण किया इसका अर्थ यही होता है कि श्रीकृष्ण
उद्धव को बहुत चाहते थे और उससे स्नेह रखते थे। उद्धव का पुण्य अत्यन्त निर्मल था, धन्य हे उद्धव ! जिसके
लिये स्वानंदघन नारायण स्वयं दयार्द हो उठे योगयागादि से भी जो नहीं प्राप्त हो सकता वह उद्धव के कहने से,
जिस प्रकार गाय अपने बछड़े को चाटती है उस प्रकार उसे गुप्त बातें बताने लगे। जो अपने ही कुल का काल
बना वही भक्तों का पक्ष लेने वाला तथा स्नेहसिक्त श्रीकृष्ण उद्धव पर प्रसन्न हुआ। इसलिये उद्धव का नाम लेते
ही श्रीकृष्ण सांसारिक दुःख से मुक्त करते हैं इतना उन्हें भक्तों के प्रति प्रेम है। भक्तों का स्मरण करने पर भी वह
उन्हें तारता है। एका (एकनाथ) जनार्दन संतों से विनती कर रहा है कि मुक्तों के लक्षण निश्चित करने से मुक्तता
प्राप्त होती है इसीलिये श्रीकृष्ण मुक्तों की कथा सुना रहे हैं। कृष्ण ने उद्धव से कहा, मैं अपना अत्यन्त गुप्त
रहस्य जो मुक्तों का लक्षण है वह तुमसे निवेदन कर रहा हूँ। वह चमत्कार सुनो।
एव विरक्तः शयने आसनाटनमज्जने ।
दर्शनस्पर्शनघ्राणभोजनश्रवणादिषु ॥१९॥
बैठना, भोजन करना, शयन करना, देखना, स्पर्श करना, सूँघना, टहलना, स्नान करना आदि कार्य मुक्तजन
कैसे करते हैं? उसके लक्षण सुनो। पिछले श्लोक में बताया था कि प्रकृति धर्म का अभिमान करने से दृढ़बन्धन
प्राप्त होता है लेकिन ज्ञाता उस अहंकार का स्पर्श नहीं करता। ज्ञाता को स्वाभाविक रूप से ही सारे कर्मों में
निरभिमानिता रहती है वही मूल कथा तुम्हें सुनाता हूँ, ध्यान देकर श्रवण करो। जिस प्रकार छाया का सम्मान
अथवा अपमान पुरुष को जरा भी बाधित नहीं करता उसी प्रकार देह का कर्माचरण निरभिमानी मुक्त को बाधित
नहीं करता। स्वाधिष्ठान उनकी बैठक है, उसी आसन पर वे निरन्तर बैठे रहते हैं। वहाँ अभिमान आ ही नहीं
सकता। वहाँ जम कर बैठा हुआ मन उठने का नाम ही नहीं लेता। उस आसन की महत्ता विचित्र है। वहाँ
विस्मरण समाप्त हो जाता है, एकान्त कभी नहीं ढलता। यही मुक्तों का 'सहजासन' है। इस आसन का समाधान
ग्यारहवाँ अध्याय २७७
ऐसा है कि यहाँ समाधि और व्युत्थान इन दोनों का निवारण होता है। यही मुक्तों का चलता आसन है। आसन पर
बैठने पर जो समाधान मिलता है वही चलते-फिरते समय भी रहता है। उठने और बैठने का भी उसे स्मरण नहीं
रहता, चलने का भी भान नहीं रहता। पैरों से तेजी से चलते समय भी उसे चलते रहने का स्मरण नहीं रहता।
चलते समय भी उसकी समाधि नहीं टूटती। मुक्तों के लक्षण ऐसे होते हैं। बादलों के कारण चन्द्रमा दौड़ता हुआ
दिखाई देता है उसी प्रकार त्रैलोक्य में भ्रमण करते रहने पर भी वह अपने स्थान से नहीं हिलता। इस प्रकार न
चलते हुए भी मुक्त भ्रमण करता रहता है। कुम्हार के चाक पर बैठी हुई मक्खी अपने स्थान से हिले बिना भी
चाक के साथ घूमती रहती है। उसी प्रकार मुक्त का गमन देह के गमन के साथ परिलक्षित होता है। देह प्रारब्ध
की ही तरह भटकता रहता है किन्तु मुक्त की आत्मस्वरूप की बैठक विचलित नहीं होती। रथ के घोड़े सरपट
दौड़ते रहते हैं लेकिन जिस प्रकार उसमें सोने वाले की निद्रा नहीं टूटती उसी प्रकार की यह स्थिति है। इस प्रकार
बिना हलचल के ही जो हलचल होती है वही मुक्त का गमन है। अब वह आत्मस्वरूप में डुबकी लगाकर किस
प्रकार 'स्नान' करता है उसकी कथा सुनो। वह गंगा के जल से स्नान करता है किन्तु गंगोदक का स्पर्श भी नहीं
करता। चितस्वरूप में स्थित मन किसी अशुद्धि से अपवित्र नहीं होता। आत्मस्वरूप में ही मज्जित होने के कारण
उसमें परम पवित्रता आयी रहती है इसलिये तीर्थ उसके ही चरणों का तीर्थ माँगते रहते हैं। इतना पवित्र रहता है
मुक्त का स्नान। वह जल को भी चित्स्वरूप ही देखता रहता है क्योंकि उसने चित्स्वरूप में ही अखण्ड डुबकी
लगायी रहती है। उसके चरणों के रजःकण प्राप्त होने से पृथ्वी भी परम पवित्र हो जाती है। उसके प्राणों की
संगति से वायु भी पवित्र हो जाती है। उसके चरण स्पर्श से गंगादि नदियाँ भी पवित्र हो जाती हैं। उसके उदर के
सान्निध्य से अग्नि को भी पवित्रता प्राप्त होती है। उसके हृदय के आकाश में आकाश भी शान्त पड़ा रहता है
इसलिये वह पवित्र होकर सर्वत्र अलिप्त और उदास रहता है। जो वैकुण्ठ प्राप्त कर लेते हैं वे भी सदा उससे भेंट
करने की इच्छा करते हैं। उसकी बातें सुनने के लिये वेद दौड़े आते हैं और उसका प्रत्यक्ष दर्शन करने के लिये
देवतागण आते हैं। इस प्रकार चित्स्वरूप में स्नान कर वह सर्ववंद्य तथा पवित्र हो जाता है। यह मुक्त के स्नान की
कथा है। अब उसका 'निरीक्षण' कैसा होता है, सुनो। यह समस्त चराचर देखते रहने पर भी वह न देखने वाला
रहता है क्योंकि दृष्टि तथा दृश्य के प्रति अलिप्त होने के कारण दृष्टि पदार्थ देखते समय भी उसे वहाँ श्रीहरि के
ही दर्शन होते हैं। सृष्टि दृश्य पदार्थों से भरी-पूरी रहती है किन्तु उसकी दृष्टि को दृश्य पदार्थ दिखायी ही नहीं
देता। दृश्य पदार्थ से भेंट होने पर भी वह अदृश्य के गले ही पड़ता है। दर्पण में अपना चेहरा देखने पर अपनी ही
आँखें दिखायी देती हैं उसी प्रकार सौन्दर्य से दृष्टि प्रकाशमान होकर दृश्यस्थान पर सौन्दर्य ही दिखायी देता है।
आँखों से दर्पण दिखाई देता है और उसमें आँखों से आँखें ही दिखायी देती हैं, मुक्त का 'निरीक्षण' या देखना भी
उसी प्रकार का है। वह अपने जैसा जगत ही देखता रहता है। देखने वाला पदार्थ, देखने वाला तथा यह त्रिगुट ही
अदृश्य हो जाता है। वह सर्वांग सुन्दर होकर दर्शन का अवलोकन दर्शन से ही करता है। अनेक पदार्थ दिखाई देने
पर भी दर्शन उस दृश्य को हटा कर दृश्यातीत आत्मतत्त्व ही सारी सृष्टि में व्याप्त दिखाई देता है। उद्धव ! मुक्तों
की यह जो निरीक्षण की पद्धति है उसे यथार्थ दृष्टि से जो देख पाता है, वह दृष्टि जिसे प्राप्त होती है उसे ही
त्रिभुवन में पावन हुआ समझना चाहिये। इस दृष्टि से जो सदा आचरण करते हैं वे परममुक्त हैं इसे ध्यान में रखो
और इसी दृष्टि से जो मुझे देखते हैं वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं और मुझे अत्यन्त प्रिय हैं। परादि वाचाओं में जिस
स्थान पर शब्द उत्पन्न होता है, उसी स्थान पर उसका श्रवण रहता है। श्रोता, वक्ता, कथा तथा निरूपण यह सारा
वह स्वयं बनकर सुनता रहता है। उसके श्रवणेन्द्रिय शब्द समुदाय से अखण्ड जुड़े रहते हैं। चाहे वे लौकिक शब्द
२७८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
हों या नारायणोपनिषद सुनने का प्रसंग हो या हरि, गोविन्द ये नाम सुनने को मिलें लेकिन उन सबका अर्थ बोध
उसे एक जैसा होता है। शब्दों का उच्चार करने वाला वही होता है और वही श्रवण में श्रोता बन जाता है जिससे
शब्दों में अत्यन्त मधुर निःशब्दता उपस्थित हो जाती है जो भी शब्द कान पर पड़ता है वह निःशब्द हो जाता है।
इस प्रकार श्रवण में मुक्तों का परमानन्दस्वरूप स्वानन्द बोध ही भरा रहता है। अकार, उकार और मकार इस
त्रिगुट का शब्दसृष्टि के मूल शब्द 'प्रणव' अर्थात् ओंकार यह शब्द भी उसे ब्रह्मस्वरूप में दिखाई देने लगता है।
यही मुक्तों की श्रवणसंतुष्टि है। शब्दज्ञान कानों पर आने पर भी शाब्दिक सृष्टि लुप्त हो जाती है और कानों में
पूर्ण ब्रह्म ही भर जाता है। यही मुक्तों का स्वानंद श्रवण है। उपनिषद का श्रवण करने या लौकिक शब्द सुनने से
मुक्तों के ज्ञान में परिवर्तन नहीं होता। उन्हें श्रवण में स्वानंद ही भरा दीखता है। अद्वितीय परब्रह्म यही वेदशास्त्रों
का गूढ़ रहस्य है। वही रहस्य मुक्तों को सुगम हुआ रहता है। उन्हें शब्दों में परब्रह्म ही भरा दिखायी देता है।
लौकिक शब्द हों या वैदिक शब्द हों, हर शब्द में ब्रह्म ही भरा रहता है। यही मुक्तों का श्रवण है। अब उनके घ्राण
का लक्षण सुनो। नाक में सुगन्ध आने पर भी मुक्तों को गन्ध के सम्बन्ध में भावना उत्पन्न ही नहीं होती। उस
सुगन्ध के रूप में उन्हें स्वानन्दकंद परमानन्द का ही अनुभव होता है। नाक, पुष्प और चन्दन वह स्वयं ही बन
जाता है। इस प्रकार भोक्ता हुए बिना वह उस सुगन्ध का उपभोग करता है। नाक में सुगन्ध आते ही तत्क्षण परेश
प्रकट होता है इसलिये वह सुगन्ध है या दुर्गन्ध है इस विषयोपभोग का उसे ज्ञान ही नहीं होता। मलयपर्वत से
वायु के साथ सुगन्ध भी उड़ती है, वहाँ मुक्तों का घ्राण रहता है। इस प्रकार इस सुख का उपभोग अगम्य है। वायु
जितना प्रवाहित होता है, उतना मुक्तों का सुवास ग्रहण करना होता है। इस प्रकार उसे सहज ही सुगन्ध का लाभ
होता है। सचमुच वह इस प्रकार गन्ध विषय का भोक्ता बनता है। यही मुक्तों का सुगन्ध ग्रहण करना है। अब
'रस' सेवन करने का ढंग सुनो। रस, रसना और भोजन यह तीनों वह स्वयं हो जाता है। वह बिना जिह्वा के, हाथ
लगाये बिना ही सब कुछ खाता रहता है। वह सभी रसों का स्वाद लेता रहता है लेकिन एक ही स्वाद से सब
कुछ खाता है लेकिन वह भोक्ता नहीं बनता। ऐसे भोजन से वह सदा तृप्त रहता है। उसे भूख की जानकारी नहीं
होती लेकिन खाना खाते समय वह किसी चीज को मना भी नहीं करता। वह बिना खाये ही सब कुछ खा जाता है
लेकिन उसे जूठा नहीं करता। थाली, भोजन और स्वयं इनमें उसे कुछ भिन्नता नहीं मालूम होती। रस विषय के
बहाने वह सर्वांग से स्वानंद का उपभोग करता रहता है। जिह्वा रस का आस्वाद लेने जाती है तो वहाँ परमानन्द
प्रकट होता है इसलिये वह रस और रसना इन दोनों का त्याग कर निजानंद को ही ग्रहण करता है। सारी
मधुरताओं में माधुर्य लाने वाली जो मूल मिठास है वहीं उसके अंतःकरण का प्रेम रहता है। इसलिये नाना प्रकार
के व्यंजन खाने पर भी उसे उसमें उसी मधुरता का स्वाद प्राप्त होता है। सारी चीजों में जो मिठास होती है वह
मिठास वह स्वयं बन जाता है इसलिये वह जो भी पदार्थ खाता है उसमें उसे उसी मधुरता का अनुभव होता है।
ऐसा है मुक्ता का निजबोध ! वह रस का आस्वाद लेने जाता है तो उस पदार्थ का रसत्व लुप्त होकर वहाँ
स्वानंदकंद परमान्द ही भर जाता है। इस प्रकार वे जिस-जिस रस को चखने जाते हैं वही ब्रह्मरस हो जाता है।
सारांश, मुक्तों की भोजन करने की क्रिया ऐसी रहती है यह ध्यान में रखो। अब उनका स्पर्श ग्रहण कैसा रहता है
इसका भी लक्षण सुनो। मुक्तों को ठंडक लगने पर उसकी शीतलता समाप्त हो जाती है। अथवा उष्णता उन्हें स्पर्श
करती है तो उसकी उष्णता समाप्त हो जाती है। जिस प्रकार अग्नि अपना सम्पर्क होते ही चन्दन और घुरे
(दुर्गन्धियुक्त वृक्ष) के विकारों को जलाकर उन्हें अपने जैसा बना देता है उसी प्रकार मुक्तों की देह पर यदि द्वंद्व
टूट पड़ें तो वे स्वयं ही टूट जाते हैं। वह सब तरह से सब में विद्यमान होने के कारण उनका द्वंद्व अपने आप
ग्यारहवाँ अध्याय २७९
समाप्त हो जाता है। वहाँ मुलायम और कठोर का भेद कैसा ? शीतलता और उष्णता कैसी ? वह सब में सबका
आत्मा होकर रहता है इसलिये उसे द्वंद्व का भान ही नहीं होता। जिस प्रकार ग्रीष्म आग को नहीं जलाता, ठंडक
हिमालय को बाधा नहीं पहुँचाती, उसी प्रकार द्वंद्व की यह माला मुक्तों के गले में नहीं पड़ती। सुवर्ण के सुन्दर
अलंकार सुवर्ण की पेटी में ढँक कर रखने से वे ढँके हुए हैं यह कहने की अपेक्षा वे खुले रखें हैं यह कहना ही
उपयुक्त होगा। उसी प्रकार उसे सारे द्वंद्व परब्रह्म की तरह रहते हैं। उसके शरीर से जो भी चीज आकर लगती है
उसके शरीर का ही अंग बन जाती है। अलग कुछ नहीं रह जाता। अर्थात् सारे द्वंद्व टूट जाते हैं। हाथ में यदि कोई
ललिया कमल पकड़े तो उस कमल का कमलत्व ही समाप्त हो जाता है। इसमें कमल से उत्पन्न ब्रह्मदेव भी डूब
जाता है और परब्रह्मस्वरूप बन जाता है। स्पर्श, स्पर्श करने वाला तथा स्पर्श का विषय यह त्रिपुट ही समाप्त हो
जाता है। बल्कि वह अपने स्वभाव के अनुसार सब कुछ स्वयं ही बन जाता है। पूजा के लिये वह मूर्ति को हाथ
में लेता है तो उसे लगता है कि वह मूर्ति मैं स्वयं हूँ या वह पत्थरों से खेलता है तो उसे उसमें मेरा ही आभास
होता है। दीवार पर अलग-अलग रंग के चित्र बने रहते हैं। उस पर कहीं भी हाथ लगाने पर दीवार का ही स्पर्श
होता है, उसी प्रकार मुक्तों का स्पर्श करना पूर्ण रूप से अद्वैतरूपी तथा आत्मानात्मक ही होता है। इस प्रकार मुक्तों
का स्पर्शलक्षण प्रतीत होता रहता है। अब उनका बोलना कैसा होता है यह सुनो। वह बड़े प्रेम से जब कोई सरस
कथा सुनाता है, अथवा कोई लौकिक बात करने लगता है तो उसकी समाधि खण्डित नहीं होती। बोलते समय भी
मौन नहीं टूटता यही उसकी पहचान होती है। शब्दों की निःशब्दता ज्ञाता की ही समझ में आ पाती है। पति-पत्नी
घर में लोगों के सामने बातें किये बिना ही आचरण करते रहते हैं। क्या वे अबोल हैं या उनमें अटूट प्रेम है ? उसी
प्रकार मुक्तों के बोलने की स्थिति रहती है। शब्दार्थ में से शब्द निःशब्द होते रहते हैं। वह मुँह से जो अक्षर
निकालता है वह सचमुच अक्षररूप ही रहते हैं। उसकी वाणी सुनकर मन आश्चर्यचकित हो उठता है। मैं एक
कुशल वक्ता हूँ इस बात का उसे अभिमान ही नहीं होता अथवा मुझे लोगों का मनोरंजन करना है इसका भी उसे
स्मरण नहीं होता। निःशब्दों में से शब्द निकलते रहते हैं, उन शब्दों में भी निःशब्द रूप ही रहता है। इस प्रकार
वह बोलता है इसलिये बोलते रहने पर भी वह मौन रहता है। जल में लहरें उत्पन्न होती हैं तो भी लहरों का
स्वरूप जल ही रहता है। उसी प्रकार सभी शब्द निःशब्द से ही निकलते रहने के कारण शब्दों का सारा रूप
निःशब्द ही रहता है। वाच्य, वाचा और वाचकता इस त्रिगुट को छोड़ कर ही वह मधुर बातें करता है। यदि वह
ऊटपटांग बातें भी करता है तो भी उसका मौन का दामन नहीं छूटता। अरे ! सच बोलना है इसका भी उसे स्मरण
नहीं होता अथवा स्वार्थवश झूठ बोला जाय ऐसा भी उसे नहीं लगता। सत्य तथा मिथ्या इन दोनों को उसने झट
निगल लिया होता है इसलिये अलग तरह का भाषण करने पर भी वह मूल के मौन के कारण मौनी ही बना रहता
है। वह जोर से हाँक लगाये अथवा सिंह जैसी गर्जना करे तो भी शब्दों में निःशब्दता ही भरी होने के कारण
उसका मौन नहीं टूटता। वह यदि मेरी स्तुति करने लगता है तो उसमें मैं ही रहता हूँ और यदि वह
बेतुकी बातें करता है तो उसमें भी उसे मैं ही दिखायी देता हूँ। यदि वैसा ही प्रसंग उपस्थित होता है तो वह
झगड़ा भी करता है लेकिन उस कलह में भी उसे आगे-पीछे मैं ही दिखाई देता हूँ। उसका ऊटपटांग या
व्यंग्य भाषण भी शुद्ध परब्रह्म ही रहता है। उसमें और मुझमें कोई अन्तर न होने के कारण मैं और वह
सदा एक ही स्थान पर रहते हैं। 'तुम्हें भगवान तारेगा' ऐसा यदि कोई अकस्मात् कहता है तो मैं उसे अपने
मस्तक पर बिठाकर ब्रह्मसाक्षात्कार कराता हूँ। इसके लिये मैं सदा उसके वचन का पालन करता हूँ और उसके
वचन को प्रामाणिक मानता हूँ। अब 'वह' और 'मैं' का जो वाक्प्रचार है वह केवल बाह्यदृष्टि से है। वैसे मैं
२८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
वही हूँ यह रहस्य मेरे भक्तगण अच्छी तरह जानते हैं। इसीलिये वह मेरा जीवश्चकंठश्च है और मैं भी उसका
आत्मजीवन हूँ। वह और मैं कल्पांत में भी भिन्न नहीं हैं इसे ध्यान में रखो। सारांश वह समग्र मुझमें रहता है और.
उसके अन्दर और बाहर मैं रहता हूँ। ऐसी अभिन्नता से वह संसार में सुख से रमता रहता है। उसके मुख से जो
शब्द निकलते हैं उनका उच्चार मैं ही करता हूँ। मुक्तों के बोलने के बारे में मैंने तुम्हें इस प्रकार विस्तार से बताया।
अब उसके हाथ की क्रियाओं के बारे में बताता हूँ। वह हाथ में कुछ लेने जाता है तो वह लेना ही भगवान बन
जाता है अथवा वह कुछ देने लगता है तो वह देना ही तद्रूप हो जाता है। इस प्रकार दान तथा उसे देने वाला और
लेनेवाला इन तीनों को वह अलग-अलग नहीं देखता। इस प्रकार करते हुए भी वह अकर्ता के रूप में हाथों से
क्रियाएँ कराता है। उसके हाथ अपने स्वभाव के अनुसार जो भी क्रियाएँ करते हैं उसमें उसके सूत्रधार होने की
छाप सहज ही दिखायी देती है। उसके हाथ में शस्त्र आ जाए तो उसका उपयोग करना उसे आता है किन्तु 'मैं
कर्ता हूँ' यह अहंकार उसके मन को नहीं छूता। वैसा ही प्रसंग आ जाय तो वह द्यूत भी खेल लेता है किन्तु उसमें
हारना या जीतना इनका उसे स्मरण भी नहीं होता। वह अपने स्वभाव से खेलता है, बस इतना ही। अथवा ब्राह्मण
की पूजा करने का अवसर हो तो उसे भक्तिभाव से करना वह जानता है किन्तु पूज्य और पूज्यकत्व यह भावना
मन में लाये बिना ही वह ब्राह्मण की पूजा करता है। धनुष्य की प्रत्यंचा खींच कर वह बाण चलाना भी जानता है,
निशाना साध कर वह लक्ष्यभेद भी करता है किन्तु इससे मेरी कीर्ति बढ़े ऐसी इच्छा वह नहीं करता। उसके हाथ
से कर्म इस तरह होते हैं जिस प्रकार सागर में तरंगें सहज ही उठती हैं। इस प्रकार उसके हाथ से अनेक कर्म होते
हैं किन्तु वह निजस्वरूप में निश्चल ही रहता है। जिस प्रकार मृगजल भरता है उसी प्रकार वह भी निर्विकार ढंग
से व्यापार करता है लेकिन मन में तिलमात्र भी अभिमान नहीं रखता। सूर्यकांत से अग्नि उत्पन्न होता है, वह कार्य
सूर्य करता है ऐसा कहते हैं उसी प्रकार उसके हाथ से जो भी व्यापार होते हैं वे उसके किये नहीं होते। सूर्यकांत
से अग्नि निकले यह कल्पना सूर्य के मन में भी नहीं होती उसी प्रकार मुक्त भी सारी क्रियाएँ करते समय
निरभिमानी ही बना रहता है। अब पैर की क्रियाओं के सम्बन्ध में बताते हैं। वह जब चलता है तो उसके पैरों के
नीचे की जमीन खिसक जाती है। वह स्वयं अपने पर ही स्वानंद से चलता रहता है। जल की लहरें जल पर
अखण्ड गति से चलती रहती हैं उसी प्रकार वह अपने आत्मस्वरूप में चित्स्वरूप में ही चलता रहता है। पैर होते
हुए भी वह अपनी मर्जी से पैरों के बिना चलता है, वह सर्वांग से चलता है क्योंकि वह सर्वव्यापी हो जाता है।
जिस प्रकार जल अखण्डदण्डायमान होकर बिना पैरों के चलता रहता है उसी प्रकार नित्य सावधान रहने वाला
मुक्त भी पैरों के बिना चलता रहता है। वायु जिस प्रकार पैरों के बिना सर्वत्र भ्रमण करता है उसी प्रकार
आत्मस्वरूप में संचार करना मुक्त का लक्षण है। इस प्रकार बिना हलचल किये ही उसका सर्वत्र गमन होता है।
चलते रहने का स्मरण ही उसे नहीं होता। ऐसा ही मुक्त का लक्षण होता है। अब मुक्त के स्त्रीभोग के सम्बन्ध में
बताते हैं। मूलतः 'आत्मा' और 'आत्मी' ये दो नहीं हैं, इसलिये उसे स्त्री-पुरुष भावना की जानकारी ही नहीं
होती। प्रारब्ध के कारण वह स्त्री का उपभोग करता है। नट नाटक करता है तो पुरुष होते हुए भी वह स्त्री का वेष
धारण करता है और स्त्री दीखने लगता है। उस समय स्त्री और पुरुष ये दोनों भाव उसके पास रहते हैं। उसी
प्रकार यह गृहस्थाश्रमी बन जाता है अथवा अर्धनारी नटेश्वर में जो पुरुष है वही स्त्री रहता है। उसी प्रकार मुक्त
को भी स्त्री या पुरुष के रूप में आत्मभावना ही रहती है। स्वयं अपनी ही छाया का आलिंगन करे, इस प्रकार द्वैत
की कल्पना छोड़ वह स्त्री का उपभोग करता है। छाया बिलकुल पास होते हुए भी वह कहाँ रहती है इसकी
जानकारी वह नहीं रखता उसी प्रकार मुक्तों को भी स्त्रियों की आसक्ति नहीं होती। इस प्रकार स्त्री-पुरुषों के
ग्यारहवाँ अध्याय २८१
विकार उत्पन्न होने पर भी उसकी आत्मस्थिति नहीं ढलती और संयोग से संतति होने पर उसे उसमें अपनी ही
आत्मप्रतीति होती है। इससे 'आत्मा वै पुत्र नामासि' इस श्रुति की सत्यता सिद्ध होती है क्योंकि वह सर्वकाल पुत्रों
को भी आत्मभाव से ही देखता है। वह स्वयं ही माता रहता है और स्वयं ही पिता रहता है और पुत्ररूप से स्वयं
ही क्रीड़ा करता है। जन में अथवा वन में उसे अपने सिवा कुछ भी नहीं दिखाई देता। स्त्री, पुत्र संतति ये सब
मुक्तों को आकाश में विचरण करने वाले बादलों की तरह लगते हैं। वे यथासमय आते हैं और चले जाते हैं। स्त्री
संभोग में जो सुख प्राप्त होता है वह सुख मुक्तों को सदा प्राप्त होता रहता है। इसलिये मुक्त को स्त्री सुख की
विशेष कामना नहीं होती। अब धन की दृष्टि के सम्बन्ध में बताते हैं। राजहंस के लिये गोबर का जो महत्त्व होता
है वही महत्त्व मुक्त को धन का होता है। उसे उससे कभी भी आसक्ति नहीं होती। वह उसके प्रति उदासीन ही
रहता है। जिस प्रकार व्याघ्र को मिष्ठान्न अच्छा नहीं लगता उसी प्रकार मुक्त को धन नहीं भाता क्योंकि उसे धन
का लोभ नहीं होता। जिस प्रकार कौआ चारा चुगते समय कर्कट के ढेले को स्पर्श नहीं करता उसी प्रकार मुक्त
अमूल्य रत्नमाला देखकर घृणापूर्वक थूक देता है। जिसे धन की आस्था रहती है उसे कल्पांत में भी मुक्तता नहीं
प्राप्त होती। उसी प्रकार जिसे स्त्री की वासना होती है उसे कभी परमार्थ या आत्मज्ञान प्राप्त नहीं होता। अब निद्रा
के सम्बन्ध में बताते हैं। ससुराल में श्रम से थकी हुई लड़की जिस प्रकार विश्राम के लिये मैके आती है उसी
प्रकार मुक्त की निद्रा के पास समाधि भी विश्राम के लिये आती है। जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीन
अवस्थाओं को स्पर्श न कर वह दिन रात आत्मस्वरूप में स्थित होकर आत्मा में ही सोया रहता है। इस प्रकार
आत्मस्वरूप में सोये रहने पर उसके नीचे न तो धरती रहती है न ऊपर आकाश। उसकी निद्रा का सबसे बड़ा
चमत्कार यह है कि चलते-फिरते समय भी उसकी निद्रा नहीं टूटती। खाना खाते समय भी वह अखण्ड निद्रा में
रहता है। सारांश, वह सहज भाव से निजरूप होकर रहता है। सोनेवाला और जगानेवाला वह स्वयं ही रहता है
और कौन किसे जगायेगा? वह स्वस्थ मन से निजरूप में सोया रहता है। जागृत अवस्था में भी वह सोया रहता है
और सोये रहने पर भी जागता रहता है। इस प्रकार स्वयं ही निजरूप हो जाने के कारण वह निद्रा के आश्रित नहीं
रह जाता। शय्या, शयन और शयनमन्दिर सब कुछ वही रहता है। अपने स्वरूप का स्वयं ही निवास होने के
कारण वह निरन्तर निजरूप में सोया रहता है। इस प्रकार वह जो भी कर्म करने जाता है वहीं परब्रह्म प्रकट होता
है। मुक्त को किसी नियम की पाबन्धी नहीं होती। यही मुक्त का रहस्य है। मुक्त को यदि नियम का बन्धन होगा
तो फिर साथ-साथ साधन भी आ जायेगा और साधन आने पर मुक्तता कभी नहीं मिल पायेगी। मुक्त को तो कभी
भी किसी चीज की आसक्ति नहीं होती। उसके हाथ से बचे हुए प्रारब्ध के अनुसार कर्म होते रहते हैं। जिसका
अहंकार नष्ट हो गया हो वह सचमुच मेरा ही रूप है। इसके सम्बन्ध में विचार करने की आवश्यकता नहीं है
क्योंकि वह वेदशास्त्र संमत है। जो नित्यमुक्त तथा निर्विकार रहता है वह व्यवहार में मेरे जैसा ही आचरण करता
है। लहरों के भीतर और बाहर जैसे समुद्र ही होता है उसी प्रकार उसके भीतर और बाहर मैं ही रहता हूँ। इस
प्रकार जो परब्रह्म होकर रहता है उसके लिये धर्माधर्म स्वप्न की तरह हैं। इन्द्रियों का कर्म भी उसे बाधक नहीं
होता। इसका रहस्य वही जाने!
न था बद्ध्यते विद्वांस्तत्र तत्रादयान गुणान्।
प्रकृतिस्थोऽप्यसंसक्तो यथा खं सवितानिल ॥१२॥
जिन इन्द्रियों के कर्म करने से मूर्ख को दृढ़बद्धता प्राप्त होती है, उसी इन्द्रियों से जब ज्ञाता कर्म करता है
२८२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तो उसे नित्यमुक्तता प्राप्त होती है। मूर्ख को कर्म का अहंकार रहता है और ज्ञाता सभी कर्मों में निरभिमान रहता
है। जीवों के बन्धन और मोक्ष का कारण अहंकार है इसे ध्यान में रखो। 'मैं कर्ता हूँ', 'मैं भोक्ता हूँ', 'यही
मूर्खों' का दृढ़बन्धन है। किन्तु वह प्रकृति कर्म ज्ञाता अहंकार से अपने माथे पर नहीं लेता। ज्ञाता के उसी
निरभिमान के सम्बन्ध में मैंने तुम्हें बताया। इन्द्रियों को विषयभोग सौंपते समय वह अपना अभोक्तापन अच्छी
तरह जानता है। अपनी छाया विष्ठा पर पड़े अथवा पालकी में चढ़े उसका सुख-दुःख व्यक्ति को नहीं होता उसी
प्रकार देह का सुख-दुःख अथवा मान-अपमान मुक्त को बाधक नहीं होता। ज्ञाता विषयसुख की भी अभिलाषा
नहीं करता। चित्र की सम्पत्ति की तरह विषय भी मिथ्या है ऐसा उनका विचार होता है। इसलिये जिसे प्रकृति के
गुणों के प्रति कोई अहंकार नहीं होता वह देह में रहते हुए भी विदेही और नित्यमुक्त रहता है। उद्धव! देह में
रहते हुए भी वह विदेही कैसे हुआ? यदि तुम ऐसी कल्पना कर रहे हो तो उसके सम्बन्ध में तुम्हें एक उदाहरण
बताता हूँ। आकाश सब लोगों पर है, सभी पदार्थों से लगा हुआ दीखता है लेकिन किसी भी पदार्थ के दोष से
वह मलिन नहीं होता। उस आकाश ही ही तरह ज्ञाता भी देह में होते हुए भी सदा देहकर्मों के प्रति अलिप्त रहता
है। जिस प्रकार किसी बड़े पत्थर से आकाश को ढँका नहीं जा सकता उसी प्रकार प्रकृति के गुण क्षुब्ध हो जाने
पर वह जड़बद्ध नहीं हो जाता। आकाश लोगों के बीच होने पर भी जिस प्रकार लोगों के घर्षण से उस पर घट्टा
नहीं पड़ता उसी प्रकार वह प्रकृति के कर्म के अनुसार आचरण करते हुए भी उसके गुणों से अलिप्त रहता है।
आकाश पानी में डूबा हुआ दिखायी देता है किन्तु वह सूखा ही रहता है। उसी प्रकार वह पत्नी और बाल-बच्चों
के बीच रहकर भी उनके दोषों में लिप्त नहीं होता। कोई यदि आकाश को कालिख लगाना चाहे तो वह लगाने
वाले को ही काला करती है उसी प्रकार मुक्त को दोषी कहने से कहने वाले को ही दोष लगता है। ठंडक, धूप
अथवा जल की धारा जिस प्रकार आकाश को स्पर्श नहीं करतीं उसी प्रकार द्वंद्वों के समुदाय में मुक्त निर्द्वन्द्व वृत्ति
से खड़ा रहता है। अनेक प्रकार के मेघपटल गरजते हुए आकाश को ढँक लेते हैं लेकिन आकाश उनमें होते हुए
भी उनसे अलग रहता है। वह उन मेघों को स्पर्श भी नहीं करता। उसी प्रकार मोहममता का जोर मुक्त को सताने
का प्रयत्न करता है लेकिन उसे उनमें से किसी की भी बाधा नहीं सताती। वह उन सबसे अलिप्त ही रहता है।
आकाश को जलाने का प्रयत्न करने से आग ही बुझ जाती है उसी प्रकार तीन गुण यदि मुक्त को बाँधना चाहें तो
गुणों का गुण ही समाप्त हो जाता है। प्रलयवायु के प्रहार से आकाश उड़ नहीं जाता लेकिन सारी वायु ही
आकाश में समा जाती है। वैसे देखा जाय तो वह गगन में भी नहीं मिलता उसी प्रकार अविद्या भी अपने स्वभाव
धर्म के अनुसार मुक्त को बद्ध नहीं कर पाती। 'अविद्या' इस नाम से ही वह मिथ्या है यह स्पष्ट मालूम होता है।
मुक्त को वह दिखायी ही नहीं देती। आकाश की तरह जो सब कर्मों में होते हुए भी अलिप्त रहता है वही ज्ञाता
है। जिस प्रकार सूर्य अलिप्त रह कर आचरण करता है उसी प्रकार मुक्त की स्थिति रहती है यह ध्यान में रखो।
घृत, मधु तथा जल इन सब में प्रतिबिम्बित होकर भी सूर्य जैसे उन सबसे अलिप्त रहता है उसी प्रकार बाल्य,
युवावस्था एवं वार्धक्य इन अवस्थाओं से मुक्त अलिप्त ही रहता है। अथवा सूर्य प्रकाश से शुभ अथवा अशुभ
कर्म होता रहता है लेकिन सूर्य उन दोनों से अलग रहकर अपने स्वयं प्रकाश से प्रभावित होता रहता है। इस
प्रकार गृहस्थाश्रम धर्म का निर्वाह कर नित्य नैमित्तिक कर्म करते हुए भी मुक्त को कर्म का बन्धन नहीं होता।
आत्मज्ञान के कारण वह अकर्त्ता ही बना रहता है। सूर्यकान्त में अग्नि उत्पन्न कर सूर्य अकर्त्ता ही रहता है, उसी
प्रकार आत्मतत्व जानने वाला कर्म करते हुए भी अकर्त्ता ही रहता है। सूर्य जल में प्रतिबिम्बित होता है लेकिन
वह भींगता नहीं है। उसी प्रकार स्त्री की संगत से उसे बाल-बच्चे होते हैं लेकिन उसका ब्रह्मचर्य भंग नहीं होता।
ग्यारहवाँ अध्याय २८३
अब तक सूर्य की अलिप्तता का वर्णन किया। अब देह में रहकर अलिप्तता कैसी होती है उसका लक्षण बताता
हूँ, सुनो। प्राण देह में रहता है जिसके कारण देह का चलन होता है, लेकिन देह के दोष को प्राण स्पर्श नहीं
करता। वह सुख-दुःख से अलिप्त ही रहता है। उसी प्रकार मुक्त संसार में रहकर सारा प्रपंच व्यवहार करता है
लेकिन उस संसार का तिल मात्र का दोष उसे नहीं लगता। वायु सबको स्पर्श करता है लेकिन स्पर्श का दोष उसे
नहीं लगता। उसी प्रकार अहंभाव न रख मुक्त देह गेह में विचरण करता है। वायु सब जगह पहुँचता है लेकिन
वह किसी के प्रति आसक्त नहीं होता। इस प्रकार स्वयं विषयी बने बिना मुक्त का विषय सेवन होता है। वायु
जिस प्रकार एक जगह स्थिर नहीं रहती उसी प्रकार मुक्त की भी देहगेह में आसक्ति नहीं रहती। वायु आकाश में
विश्राम करता है और मुक्त निर्गुण में। श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं, ऐसा जो अगाधपन है वही मुक्त की मुक्ति का
कारण बनता है। इसमें भी विवेक प्रमुख है यह याद रखो।
वैसारद्येक्षयासङ्गशितया छिन्नसंशयः।
प्रतिबुद्ध इव स्वप्नान्नानात्वाद् विनिवर्तते ॥ १३॥
विवेक से बुद्धि अत्यन्त प्रगल्भ होती है, उसे नित्य और अनित्य का ज्ञान होता है लेकिन वह ज्ञान अधूरा
रहता है, वैराग्य के बिना उसकी वृद्धि नहीं होती। लेकिन वैराग्य कितना भी बड़ा क्यों न हो वह विवेक के बिना
अन्धा है इसे ध्यान में रखो। उसे अपना पतन मालूम नहीं होता इसलिये वह अन्धे कुएँ में गिर पड़ता है। अन्धा
हाथी उन्मत्त होने पर इधर-उधर भागने लगता है, गड्ढे में गिरकर वह मर सकता है यह बात उसकी समझ में
नहीं आती। उसी प्रकार विवेक के बिना वैराग्य लंगड़ा है। जहाँ विवेक और वैराग्य मिलते हैं वहीं नित्य का
संग्रह और अनित्य का त्याग दिखायी देता है। वही सद्विद्या रूपी खड्ग है जो नैराश्य के तेज से जगमगाता है।
उसे वह गुरुवाक्यरूपी सील पर घिस कर तेज करता है और उसके प्रहार से संकल्प-विकल्प का समूल खात्मा
कर देता है। 'असम्भावना' अर्थात् सत्य वस्तु असत्य मालूम होना और 'विपरीत भावना' अर्थात् देह को ही
आत्मा समझना ये सारी भावनायें और वासनायें जब पूरी तरह टूट जाती हैं तभी आत्मस्वरूप में पुरुष जागृत हो
गया ऐसा समझना चाहिये। अविद्यारूपी दीर्घस्वप्न में जो नाना प्रकार के भोगों का अनुभव कर रहा था उसका
गुरुवाक्य के कृपा आशीर्वाद से जब अद्वैत में जागरण होता है तब द्वैत का ठिकाना ही नहीं रह जाता 'मैं' और
'मेरा' की भावना व्यर्थ हो जाती है और अविद्या के कारण उत्पन्न भेद का संशय मिटने से वह आत्मानुभव का
आनन्द लेने लगता है। जागने पर स्वप्न का स्मरण हो आता है लेकिन वह सहज ही मिथ्या मालूम होता है। मुक्त
को भी संसार वैसा ही दिखायी देता है इसलिये वह उन दोनों से अलिप्त रहता है। इस प्रकार मुक्त का जो
आचरण रहता है वह इस प्रकार अलिप्त रहता है इसे ध्यान में रखो। 'कथं वर्त्तेत' अर्थात् वह किस प्रकार का
आचरण करता है इस प्रश्न के उत्तर में प्रसंग के अनुसार यह लक्षण बताया। अब 'कथं विहेश्त' अर्थात् वह
किस प्रकार विहार करता है? इस प्रश्न का उत्तर सुनने के लिये उद्धव का मन विचलित हो उठा है यह जानकर
श्रीकृष्ण ने कहना प्रारम्भ किया।
यस्य स्युर्वीतसंकल्पाः प्राणेन्द्रियमनोधियाम्।
वृत्तयः स विनिर्मुक्तो देहस्थोऽपिहि तद्गुणैः ॥ १४॥
विद्यमान देह में रहते हुए भी देहस्थ गुण मुक्त को स्पर्श नहीं करते। पापपुण्य की कथा एवं सुख-दुःख
की वार्त्ता उसके कानों पर नहीं जाती। जिस प्रकार कै किया हुआ पित्त कोई ग्रहण नहीं कर सकता उसी प्रकार