श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय २७९
समाप्त हो जाता है। वहाँ मुलायम और कठोर का भेद कैसा ? शीतलता और उष्णता कैसी ? वह सब में सबका
आत्मा होकर रहता है इसलिये उसे द्वंद्व का भान ही नहीं होता। जिस प्रकार ग्रीष्म आग को नहीं जलाता, ठंडक
हिमालय को बाधा नहीं पहुँचाती, उसी प्रकार द्वंद्व की यह माला मुक्तों के गले में नहीं पड़ती। सुवर्ण के सुन्दर
अलंकार सुवर्ण की पेटी में ढँक कर रखने से वे ढँके हुए हैं यह कहने की अपेक्षा वे खुले रखें हैं यह कहना ही
उपयुक्त होगा। उसी प्रकार उसे सारे द्वंद्व परब्रह्म की तरह रहते हैं। उसके शरीर से जो भी चीज आकर लगती है
उसके शरीर का ही अंग बन जाती है। अलग कुछ नहीं रह जाता। अर्थात् सारे द्वंद्व टूट जाते हैं। हाथ में यदि कोई
ललिया कमल पकड़े तो उस कमल का कमलत्व ही समाप्त हो जाता है। इसमें कमल से उत्पन्न ब्रह्मदेव भी डूब
जाता है और परब्रह्मस्वरूप बन जाता है। स्पर्श, स्पर्श करने वाला तथा स्पर्श का विषय यह त्रिपुट ही समाप्त हो
जाता है। बल्कि वह अपने स्वभाव के अनुसार सब कुछ स्वयं ही बन जाता है। पूजा के लिये वह मूर्ति को हाथ
में लेता है तो उसे लगता है कि वह मूर्ति मैं स्वयं हूँ या वह पत्थरों से खेलता है तो उसे उसमें मेरा ही आभास
होता है। दीवार पर अलग-अलग रंग के चित्र बने रहते हैं। उस पर कहीं भी हाथ लगाने पर दीवार का ही स्पर्श
होता है, उसी प्रकार मुक्तों का स्पर्श करना पूर्ण रूप से अद्वैतरूपी तथा आत्मानात्मक ही होता है। इस प्रकार मुक्तों
का स्पर्शलक्षण प्रतीत होता रहता है। अब उनका बोलना कैसा होता है यह सुनो। वह बड़े प्रेम से जब कोई सरस
कथा सुनाता है, अथवा कोई लौकिक बात करने लगता है तो उसकी समाधि खण्डित नहीं होती। बोलते समय भी
मौन नहीं टूटता यही उसकी पहचान होती है। शब्दों की निःशब्दता ज्ञाता की ही समझ में आ पाती है। पति-पत्नी
घर में लोगों के सामने बातें किये बिना ही आचरण करते रहते हैं। क्या वे अबोल हैं या उनमें अटूट प्रेम है ? उसी
प्रकार मुक्तों के बोलने की स्थिति रहती है। शब्दार्थ में से शब्द निःशब्द होते रहते हैं। वह मुँह से जो अक्षर
निकालता है वह सचमुच अक्षररूप ही रहते हैं। उसकी वाणी सुनकर मन आश्चर्यचकित हो उठता है। मैं एक
कुशल वक्ता हूँ इस बात का उसे अभिमान ही नहीं होता अथवा मुझे लोगों का मनोरंजन करना है इसका भी उसे
स्मरण नहीं होता। निःशब्दों में से शब्द निकलते रहते हैं, उन शब्दों में भी निःशब्द रूप ही रहता है। इस प्रकार
वह बोलता है इसलिये बोलते रहने पर भी वह मौन रहता है। जल में लहरें उत्पन्न होती हैं तो भी लहरों का
स्वरूप जल ही रहता है। उसी प्रकार सभी शब्द निःशब्द से ही निकलते रहने के कारण शब्दों का सारा रूप
निःशब्द ही रहता है। वाच्य, वाचा और वाचकता इस त्रिगुट को छोड़ कर ही वह मधुर बातें करता है। यदि वह
ऊटपटांग बातें भी करता है तो भी उसका मौन का दामन नहीं छूटता। अरे ! सच बोलना है इसका भी उसे स्मरण
नहीं होता अथवा स्वार्थवश झूठ बोला जाय ऐसा भी उसे नहीं लगता। सत्य तथा मिथ्या इन दोनों को उसने झट
निगल लिया होता है इसलिये अलग तरह का भाषण करने पर भी वह मूल के मौन के कारण मौनी ही बना रहता
है। वह जोर से हाँक लगाये अथवा सिंह जैसी गर्जना करे तो भी शब्दों में निःशब्दता ही भरी होने के कारण
उसका मौन नहीं टूटता। वह यदि मेरी स्तुति करने लगता है तो उसमें मैं ही रहता हूँ और यदि वह
बेतुकी बातें करता है तो उसमें भी उसे मैं ही दिखायी देता हूँ। यदि वैसा ही प्रसंग उपस्थित होता है तो वह
झगड़ा भी करता है लेकिन उस कलह में भी उसे आगे-पीछे मैं ही दिखाई देता हूँ। उसका ऊटपटांग या
व्यंग्य भाषण भी शुद्ध परब्रह्म ही रहता है। उसमें और मुझमें कोई अन्तर न होने के कारण मैं और वह
सदा एक ही स्थान पर रहते हैं। 'तुम्हें भगवान तारेगा' ऐसा यदि कोई अकस्मात् कहता है तो मैं उसे अपने
मस्तक पर बिठाकर ब्रह्मसाक्षात्कार कराता हूँ। इसके लिये मैं सदा उसके वचन का पालन करता हूँ और उसके
वचन को प्रामाणिक मानता हूँ। अब 'वह' और 'मैं' का जो वाक्प्रचार है वह केवल बाह्यदृष्टि से है। वैसे मैं