श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 299, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय २८३
अब तक सूर्य की अलिप्तता का वर्णन किया। अब देह में रहकर अलिप्तता कैसी होती है उसका लक्षण बताता
हूँ, सुनो। प्राण देह में रहता है जिसके कारण देह का चलन होता है, लेकिन देह के दोष को प्राण स्पर्श नहीं
करता। वह सुख-दुःख से अलिप्त ही रहता है। उसी प्रकार मुक्त संसार में रहकर सारा प्रपंच व्यवहार करता है
लेकिन उस संसार का तिल मात्र का दोष उसे नहीं लगता। वायु सबको स्पर्श करता है लेकिन स्पर्श का दोष उसे
नहीं लगता। उसी प्रकार अहंभाव न रख मुक्त देह गेह में विचरण करता है। वायु सब जगह पहुँचता है लेकिन
वह किसी के प्रति आसक्त नहीं होता। इस प्रकार स्वयं विषयी बने बिना मुक्त का विषय सेवन होता है। वायु
जिस प्रकार एक जगह स्थिर नहीं रहती उसी प्रकार मुक्त की भी देहगेह में आसक्ति नहीं रहती। वायु आकाश में
विश्राम करता है और मुक्त निर्गुण में। श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं, ऐसा जो अगाधपन है वही मुक्त की मुक्ति का
कारण बनता है। इसमें भी विवेक प्रमुख है यह याद रखो।
वैसारद्येक्षयासङ्गशितया छिन्नसंशयः।
प्रतिबुद्ध इव स्वप्नान्नानात्वाद् विनिवर्तते ॥ १३॥
विवेक से बुद्धि अत्यन्त प्रगल्भ होती है, उसे नित्य और अनित्य का ज्ञान होता है लेकिन वह ज्ञान अधूरा
रहता है, वैराग्य के बिना उसकी वृद्धि नहीं होती। लेकिन वैराग्य कितना भी बड़ा क्यों न हो वह विवेक के बिना
अन्धा है इसे ध्यान में रखो। उसे अपना पतन मालूम नहीं होता इसलिये वह अन्धे कुएँ में गिर पड़ता है। अन्धा
हाथी उन्मत्त होने पर इधर-उधर भागने लगता है, गड्ढे में गिरकर वह मर सकता है यह बात उसकी समझ में
नहीं आती। उसी प्रकार विवेक के बिना वैराग्य लंगड़ा है। जहाँ विवेक और वैराग्य मिलते हैं वहीं नित्य का
संग्रह और अनित्य का त्याग दिखायी देता है। वही सद्विद्या रूपी खड्ग है जो नैराश्य के तेज से जगमगाता है।
उसे वह गुरुवाक्यरूपी सील पर घिस कर तेज करता है और उसके प्रहार से संकल्प-विकल्प का समूल खात्मा
कर देता है। 'असम्भावना' अर्थात् सत्य वस्तु असत्य मालूम होना और 'विपरीत भावना' अर्थात् देह को ही
आत्मा समझना ये सारी भावनायें और वासनायें जब पूरी तरह टूट जाती हैं तभी आत्मस्वरूप में पुरुष जागृत हो
गया ऐसा समझना चाहिये। अविद्यारूपी दीर्घस्वप्न में जो नाना प्रकार के भोगों का अनुभव कर रहा था उसका
गुरुवाक्य के कृपा आशीर्वाद से जब अद्वैत में जागरण होता है तब द्वैत का ठिकाना ही नहीं रह जाता 'मैं' और
'मेरा' की भावना व्यर्थ हो जाती है और अविद्या के कारण उत्पन्न भेद का संशय मिटने से वह आत्मानुभव का
आनन्द लेने लगता है। जागने पर स्वप्न का स्मरण हो आता है लेकिन वह सहज ही मिथ्या मालूम होता है। मुक्त
को भी संसार वैसा ही दिखायी देता है इसलिये वह उन दोनों से अलिप्त रहता है। इस प्रकार मुक्त का जो
आचरण रहता है वह इस प्रकार अलिप्त रहता है इसे ध्यान में रखो। 'कथं वर्त्तेत' अर्थात् वह किस प्रकार का
आचरण करता है इस प्रश्न के उत्तर में प्रसंग के अनुसार यह लक्षण बताया। अब 'कथं विहेश्त' अर्थात् वह
किस प्रकार विहार करता है? इस प्रश्न का उत्तर सुनने के लिये उद्धव का मन विचलित हो उठा है यह जानकर
श्रीकृष्ण ने कहना प्रारम्भ किया।
यस्य स्युर्वीतसंकल्पाः प्राणेन्द्रियमनोधियाम्।
वृत्तयः स विनिर्मुक्तो देहस्थोऽपिहि तद्गुणैः ॥ १४॥
विद्यमान देह में रहते हुए भी देहस्थ गुण मुक्त को स्पर्श नहीं करते। पापपुण्य की कथा एवं सुख-दुःख
की वार्त्ता उसके कानों पर नहीं जाती। जिस प्रकार कै किया हुआ पित्त कोई ग्रहण नहीं कर सकता उसी प्रकार