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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 869 में से

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पृष्ठ 288

२७२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
और एक मुक्त यह जीव का ही भास है। इसे भी मैं तुम्हें सिद्ध करके दिखाता हूँ। ध्यान देकर सुनो। हज़ार घड़ों
में पानी भरा जाय तो एक ही सूर्य हजार घड़ों में हजार रूपों में दिखाई देता है लेकिन एक घड़े की अवस्था दूसरे
पर लागू नहीं होती। उनमें से जो घड़ा हिल रहा है उसमें का प्रतिबिम्ब हिलता हुआ दिखायी देता है लेकिन दूसरे
घड़े में वह निश्चल रहता है। यदि संयोग से उनमें से एक घड़े में छेद हो जाय तो घड़े का पानी चूकर उसमें का
प्रतिबिम्ब अपने बिम्ब में मिल जाता है। बाकी प्रतिबिम्ब वैसे के वैसे रहते हैं। उसी प्रकार गुरुकृपा होने पर
सूक्ष्म देह विलीन हो जाता है, उसका परमात्मा से मिलन हो जाता है। बाकी सब देह के बन्दीगृह में फँसे रहते
हैं। इसी का निरूपण मैं लोगों के अनुरोध पर आनन्दपूर्वक, स्वरुचि से तथा विशद रूप में करने वाला हूँ।
अथ बद्धस्य मुक्तस्य वैलक्षण्यं वदामि ते।
विरुद्ध धर्मिणोस्तात स्थितयोरेकधर्मिणि ॥५॥
इसी प्रसंग में बद्ध-मुक्त लक्षण के सम्बन्ध में तुम्हारे जो प्रश्न हैं, उनका भी निरूपण करता हूँ। ये दोनों
देह में ही रहते हैं और उनका स्वभाव एक-दूसरे के विपरीत होता है। एक सदा सुखी रहता है तो दूसरा रात-
दिन दुःख उठाता रहता है। इस प्रकार इनके दो प्रकार के भेद हैं—एक जीव ईश्वरभेद और दूसरा जीव-जीव में
परस्पर भेद। इस प्रकार बद्धमुक्त में भी भेद है। पहले तुम्हें जीवेश्वर की कथा तथा उनमें का भेद बताता हूँ और
फिर जीव की बद्धमुक्तता की व्यवस्था स्पष्ट करके बताऊँगा। इस प्रकार जीवेश्वर में भेद स्वयं नारायण ढाई
श्लोकों में वर्णन करने लगे यह उद्धव का अहोभाग्य है।
सुपर्णावेतौ सदृशौ सखायौ यदृच्छयैतौ कृतनीडौ च वृक्षे।
एकस्तयोः खादति पिप्पलान्नमन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान्॥६॥
सुपर्ण का अर्थ है पक्षी। वह एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर जाता है उसी प्रकार देह धारण करने वाला जीव
भी इस एक देह से दूसरे देह में जाता रहता है इसीलिये उसे भी पक्षी कहते हैं। पक्षी की ही तरह उसकी भी
गति रहती है। एक देह को छोड़कर वे दूसरे देह में जाते हैं इसीलिये उन्हें पक्षी कहते हैं। इस प्रकार आत्मा देह
से भिन्न है। इसे उदाहरण देकर समझाया तथा उसी क्रम में देहात्मवाद का खण्डन भी किया। आत्मा कभी देह
धारण नहीं करेगा। देहबुद्धि धारण करना तो और भी खराब है। इसे भगवान् उद्धव को अत्यन्त प्रेम और निश्चय
से समझा रहे हैं। देहबुद्धि के उदर में जन्म-मरण का असंख्य भण्डार रहता है। ये सदा देहबुद्धि के साथ रहते
हैं। चित्स्वरूप में दोनों ही समान हैं। वे कभी भी जड़ देह की तरह नहीं होते। ये दोनों अनादि मित्र हैं तथा
परस्पर जीवश्वकंठश्च हैं। काल, अकाल वे कभी एक-दूसरे से अलग नहीं होते। सखा की तरह, हँसते, खेलते
सीधे सादे रूप में साथ-साथ रहते हैं। प्रकाश दीपक से अलग नहीं रहता और दीपक भी प्रकाश को छोड़कर
नहीं जाता उसी प्रकार जीवशिव का मिलन अपनी ही लीला से एक साथ चलता रहता है। जरा देखो! जीव
जिस चीज की भी इच्छा करता है वह सब उसकी वासना के अनुसार ईश्वर उसे प्रदान करता रहता है। कभी
उसे ना नहीं करता। अंतकाल में तो जीव जो भी कुछ माँगता है वह सब ईश्वर उसे देने लगता है और ईश्वर
की आज्ञा के अनुसार ही जीव आचरण करता रहता है। सचमुच ईश्वर की आज्ञा जीव मनोभाव से स्वीकार
करता है। कभी 'हाँ' या 'ना' नहीं करता। उनकी इस प्रकार की मित्रता की बात अपूर्व है। उनकी मैत्री
आश्चर्यजनक है। ईश्वर जैसी भी प्रेरणा करता है वैसे-वैसे जीव उसका पालन करता रहता है, उससे जरा भी
विचलित नहीं होता। जन्म के क्षण से लेकर जीव ईश्वर की आज्ञा को शिरोधार्य करता है। परस्पर मित्रता होने