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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 286, कुल 869 में से

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पृष्ठ 286

२७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
विद्याविद्ये मम तनू विद्ध्युद्धवशरीरिणाम्।
मोक्षबन्धकरी आद्ये मायया मे विनिर्मिते ॥ ३॥
जिसका आत्मज्ञान की तरह अनुभव होता है, 'अहं ब्रह्मास्मि' की निरन्तर भावना रहती है, वही 'शुद्ध
विद्या' है और वही अविद्या का नाश करने वाली है ऐसा समझ लो। मैं 'पापी', 'अभागा' यही भावना जहाँ
प्रस्फुटित होती रहती है, वही भावना 'अविद्या' है जो अनेक प्रकार के सन्देह उत्पन्न करती है। एक जीव को
बन्धन में डालती है तो दूसरी उसे मुक्त करती है। हे उद्धव ! ये दोनों मेरी ही अनादि शक्तियाँ हैं। तुम चिन्मात्र
चैतन्यधन हो, चित्स्वरूप होने के कारण वृत्तिशून्य हो, सदा निर्धर्म होकर रहते आये हो, तुम्हारी शक्तियाँ कैसे
माने ? ऐसा व्यर्थ सन्देह करने का कारण नहीं है, सुरनरों के भी वश में जो नहीं आ पाती वह मेरी माया ही इन
शक्तियों को जन्म देती है। उसे 'सत्' कहें तो वह तत्काल नष्ट होती है, असत् कहें तो उसका आभास होता है।
उसी ने संसार को नाम और रूप की आसक्ति दी है। उसे न सच कह सकते हैं, न झूठ ही कह सकते हैं।
इसीलिये उसे 'अनिर्वचनीय' अर्थात् शब्दों में व्यक्त न करने लायक कहा जाता है। उसी ने अविद्यारूपी पिल्लों
को अपने पंखों के नीचे पाल-पोस कर बड़ा किया है। विद्या और अविद्या कोई आज की वस्तु नहीं हैं, वे
अनादि शक्तियाँ हैं। ये माया की दो वृत्तियाँ हैं। इनके कारण ही बन्धन और मोक्ष का आभास होता है। तुम
कहोगे ऐसी यह माया कौन है ? तो तुम्हारी जो कल्पना है वही माया है, उसी में बद्धता और मुक्तता प्रस्फुटित
होती रहती है इसे ध्यान में रखो। अब तुम्हें बन्ध मोक्ष की स्थिति के बारे में यथातथ्य रीति से बताता हूँ, उसे
ध्यान से सुनो। जो स्वप्न में भी मेरी आराधना नहीं करता, मेरा भजन नहीं करता उसी में सारी अविद्या की वृद्धि
होती रहती है और जो मेरे प्रति अत्यन्त तत्पर रहता है, आठों पहर भजन में लीन रहता है वह ब्रह्मविद्या का
निवासस्थान है। वहीं उसकी सतत वृद्धि होती रहती है। जहाँ मेरे भजन का उल्हास रहता है वहाँ अविद्या का
नाश होता है। वहीं ब्रह्मविद्या का प्रवेश होता है ऐसा भक्तों को पक्का विश्वास रहता है। अब तक मैंने शक्ति की
दृढ़ स्थापना की दृष्टि से बन्ध का कारण और मोक्ष के साधन के बारे में बतलाया। इस पर उद्धव ने कहा,
"बन्ध और मोक्ष इन वृत्तियों को तुम माया की शक्ति कहते हो, अर्थात् माया ही मोक्षदायिनी हो गयी। लेकिन हे
कृष्ण, यह कैसे होगा ? क्योंकि यदि माया मोक्षदात्री हुई तो फिर तुम्हारी भक्ति क्यों की जाय ? तो इसमें सत्य
क्या है, इसे बतायें।" इस पर कृष्ण ने उद्धव से कहा, "छाया स्वयं चल फिर नहीं सकती, वैसे ही माया को भी
अपना सामर्थ्य नहीं है। फिर वह मोक्ष कैसे प्रदान करेगी? माया का नियंता विष्णु है और वही मोक्ष का दाता है।
वही जीव का बन्धन तोड़कर सायुज्यता देता है। इस पर तुम कहोगे कि अविद्या और काम्य कर्म से जीव को जो
बद्धता प्राप्त होती है वह ब्रह्मविद्या तथा निष्कर्म से टूटती है। यही बोध गुरु भी श्रुतियों के माध्यम से
निश्चयपूर्वक करते हैं। क्या इसमें विष्णु कर्त्ता है? नहीं। फिर वह मोक्षदाता कैसे होगा ?" लेकिन उद्धव ! तुम
ऐसे विकल्प की बात भी न सोचो क्योंकि गुरु के रूप में विष्णु ही रहते हैं। श्रुति का अर्थ भी साक्षात विष्णु ही
हैं और शमदमादिक जो साधन हैं वह भी विष्णु ही हैं। शिष्य की बुद्धि को जो ज्ञान प्राप्त होता है वह भी
विष्णुरूप है यह ध्यान में रखो। इस प्रकार श्रीविष्णु ही अपने भक्तों को मोक्ष प्रदान करने वाला है। उस मोक्ष का
परिपाक जो समाधि है वह भी श्रीविष्णु ही हैं, समाधि का सुख भी श्रीविष्णु ही हैं। सनातन ब्रह्म, परिपूर्ण
परमात्मा जो विष्णु है वह मैं ही हूँ। मैं अपनी कृपा से भक्तों को भवपाश से मुक्त करता हूँ। अब तीसरे श्लोक में
आये पद 'शरीरिणां' से जीव को बन्धन होता है ऐसा अर्थ ध्वनित होता है। उसका भी बड़ी कुशलता से निवारण
करते हैं। एक को ही बन्ध मोक्ष होता है या नहीं, इस प्रश्न के उत्तर अब उद्धव को स्पष्ट रूप से दे रहे हैं।