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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 869 में से

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पृष्ठ 285

ग्यारहवाँ अध्याय २६९
शोकमोहौ सुखं दुःखं देहापत्तिश्च मायया।
स्वप्नोयथाऽऽत्मनः ख्यातिः संसृतिर्न तु वास्तवी ॥ २ ॥
स्वप्न की स्थिति दो मुहूर्त ही रहती है लेकिन उतने समय में अनेक जन्मों तथा अनेक जातियों के लोग
दिखायी पड़ते हैं। उसी प्रकार संसार तथा उसके अनुभव मिथ्या हैं। व्यर्थ का आभास वहीं विलीन हो जाता है
जिससे देह में भीषण हाहाकार मच जाता है। इसी को शोक कहते हैं। टूटे हुए बर्तन में पानी भरने पर उसमें
चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब दिखाई देने लगता है तो बालक उसे अपने सीने से चपका लेता है लेकिन शीघ्र ही पानी
बह जाता है और प्रतिबिम्ब लुप्त हो जाता है। इससे बालक छटपटाने लगता है। इसी का नाम है 'शोक'। अथवा
गागर में चन्द्रमा का बिम्ब जब बालक के हाथ में नहीं आता तो वह जो दुःख प्रकट करता है उसका ही नाम है
'शोक'। जो नहीं है उसी के प्रति वह 'मैं' और 'मेरा' का भाव प्रकट करता है वही 'मोह' का कारण है। उसी
अवसर पर भीषण ममता उत्पन्न होती है। मृगजल का तालाब देखकर उसमें केले की फसल तैयार होगी इस
आशा से मृगतृष्णा के उस जल की आठों पहर रखवाली करता है। कोई उधर से गुजरता है तो उससे झगड़ा
करने लगता है। इस मोह में अन्धा होने के कारण उससे सत्य का विवेक नहीं हो पाता। उसी प्रकार माँ-बाप
कहते हैं कि पुत्रप्राप्ति से सुख लाभ होगा इस भ्रम से वह उनके मोह में पड़ा रहता है क्योंकि अन्त में लड़के
उन्हें अँगूठा ही दिखाते हैं। गन्धर्वनगरी की रचना देखकर उसके मन में अभिलाषा उत्पन्न होती है और उसे प्राप्त
करने के लिये वह बड़ी शीघ्रता से सेना तैयार करता है। उसी प्रकार देह का अभिमान मिथ्या है। देहसम्बन्धी
ममता बहुत कठिन होती है। प्राणियों में ममता का अभिमान लगा रहता है, वही मोह का मूल कारण है। सारांश
'अहं' और 'ममता' ही मोह के माता-पिता हैं। उन्हीं के मेल से जागृत 'मोह' बढ़करु लोगों को भुलावे में
डालता है। कोई विष स्वाद में मधुर रहता है इसलिये अपने प्रिय विषयों के प्रति आसक्ति रखते हैं और, जब
अनेक बार उसकी प्राप्ति होती है तो उसे 'सुख' इस नाम सम्बोधन करते हैं। विषयलाभ से जो हर्ष होता है उसे
ही वे 'सुख' कहते हैं और विषय का नाश होते ही उसे 'दुःख' और 'असुख' कहने लगते हैं। शोक, मोह, सुख,
दुःख आदि से ही 'देह की प्राप्ति' होती है। देहाभिमान के कारण ही अनेक दुःखदायी देह धारण करने पड़ते हैं।
वह जिस तीव्र ध्यान से मरता है उसी रूप में जन्म लेता है अथवा जो अत्यन्त द्वेष के कारण करता है वह द्वेषरूप
में ही जन्म लेता है। सर्प और नेवले की पूर्वजन्म की वृत्ति बैर की ही होती है इसलिये वे बैरी के ही रूप में
जन्म लेते हैं। मृत्यु के समय जो वासना शेष रहती है वही गति प्राणी को प्राप्त होती है। इसलिये अन्तःकरण में
अन्त समय जो प्रबल वासना उत्पन्न होती है वही गति उस प्राणी को प्राप्त होती है ऐसा वेद और पुराण भी बताते
हैं। पुरुष के साथ जिस प्रकार छाया मिथ्या है, उसी प्रकार ब्रह्म में माया भी मिथ्या है। वही गुणकार्यों को उत्पन्न
करती है और देह का आभास उत्पन्न करने का मूल भी वही है। जिस प्रकार स्वप्न में मन अकेला होने पर भी
वह अनेक प्रकार के रूप धारण करता है उसी प्रकार चैतन्य का जो अन्यथा आभास है वही चराचर है। सारांश
संसार का सचमुच ही कोई अस्तित्व नहीं है। फिर सुख और दुःख कैसा ? जरा देखो। बिना देह के छाया
किसकी रहेगी ? जिसने जन्म ही नहीं लिया वह काला है या गोरा कैसे कहा जाय ? सारा कुछ स्वप्न की तरह है,
संसार का वास्तविक अस्तित्व नहीं है। इस प्रकार इन दो श्लोकों में वस्तुविरोध का अच्छे ढंग से निरूपण किया।
अब प्रतीती से जो अनुभव प्राप्त होता है वृह सत्य में बाधक नहीं होता। आँख पर उँगली रखने से दो चन्द्रमा
दिखाई देते हैं लेकिन आकाश में दो चन्द्रमा नहीं होते, उसी प्रकार निराकार में मिथ्या आभास होता है।