श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 293, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय २७७
ऐसा है कि यहाँ समाधि और व्युत्थान इन दोनों का निवारण होता है। यही मुक्तों का चलता आसन है। आसन पर
बैठने पर जो समाधान मिलता है वही चलते-फिरते समय भी रहता है। उठने और बैठने का भी उसे स्मरण नहीं
रहता, चलने का भी भान नहीं रहता। पैरों से तेजी से चलते समय भी उसे चलते रहने का स्मरण नहीं रहता।
चलते समय भी उसकी समाधि नहीं टूटती। मुक्तों के लक्षण ऐसे होते हैं। बादलों के कारण चन्द्रमा दौड़ता हुआ
दिखाई देता है उसी प्रकार त्रैलोक्य में भ्रमण करते रहने पर भी वह अपने स्थान से नहीं हिलता। इस प्रकार न
चलते हुए भी मुक्त भ्रमण करता रहता है। कुम्हार के चाक पर बैठी हुई मक्खी अपने स्थान से हिले बिना भी
चाक के साथ घूमती रहती है। उसी प्रकार मुक्त का गमन देह के गमन के साथ परिलक्षित होता है। देह प्रारब्ध
की ही तरह भटकता रहता है किन्तु मुक्त की आत्मस्वरूप की बैठक विचलित नहीं होती। रथ के घोड़े सरपट
दौड़ते रहते हैं लेकिन जिस प्रकार उसमें सोने वाले की निद्रा नहीं टूटती उसी प्रकार की यह स्थिति है। इस प्रकार
बिना हलचल के ही जो हलचल होती है वही मुक्त का गमन है। अब वह आत्मस्वरूप में डुबकी लगाकर किस
प्रकार 'स्नान' करता है उसकी कथा सुनो। वह गंगा के जल से स्नान करता है किन्तु गंगोदक का स्पर्श भी नहीं
करता। चितस्वरूप में स्थित मन किसी अशुद्धि से अपवित्र नहीं होता। आत्मस्वरूप में ही मज्जित होने के कारण
उसमें परम पवित्रता आयी रहती है इसलिये तीर्थ उसके ही चरणों का तीर्थ माँगते रहते हैं। इतना पवित्र रहता है
मुक्त का स्नान। वह जल को भी चित्स्वरूप ही देखता रहता है क्योंकि उसने चित्स्वरूप में ही अखण्ड डुबकी
लगायी रहती है। उसके चरणों के रजःकण प्राप्त होने से पृथ्वी भी परम पवित्र हो जाती है। उसके प्राणों की
संगति से वायु भी पवित्र हो जाती है। उसके चरण स्पर्श से गंगादि नदियाँ भी पवित्र हो जाती हैं। उसके उदर के
सान्निध्य से अग्नि को भी पवित्रता प्राप्त होती है। उसके हृदय के आकाश में आकाश भी शान्त पड़ा रहता है
इसलिये वह पवित्र होकर सर्वत्र अलिप्त और उदास रहता है। जो वैकुण्ठ प्राप्त कर लेते हैं वे भी सदा उससे भेंट
करने की इच्छा करते हैं। उसकी बातें सुनने के लिये वेद दौड़े आते हैं और उसका प्रत्यक्ष दर्शन करने के लिये
देवतागण आते हैं। इस प्रकार चित्स्वरूप में स्नान कर वह सर्ववंद्य तथा पवित्र हो जाता है। यह मुक्त के स्नान की
कथा है। अब उसका 'निरीक्षण' कैसा होता है, सुनो। यह समस्त चराचर देखते रहने पर भी वह न देखने वाला
रहता है क्योंकि दृष्टि तथा दृश्य के प्रति अलिप्त होने के कारण दृष्टि पदार्थ देखते समय भी उसे वहाँ श्रीहरि के
ही दर्शन होते हैं। सृष्टि दृश्य पदार्थों से भरी-पूरी रहती है किन्तु उसकी दृष्टि को दृश्य पदार्थ दिखायी ही नहीं
देता। दृश्य पदार्थ से भेंट होने पर भी वह अदृश्य के गले ही पड़ता है। दर्पण में अपना चेहरा देखने पर अपनी ही
आँखें दिखायी देती हैं उसी प्रकार सौन्दर्य से दृष्टि प्रकाशमान होकर दृश्यस्थान पर सौन्दर्य ही दिखायी देता है।
आँखों से दर्पण दिखाई देता है और उसमें आँखों से आँखें ही दिखायी देती हैं, मुक्त का 'निरीक्षण' या देखना भी
उसी प्रकार का है। वह अपने जैसा जगत ही देखता रहता है। देखने वाला पदार्थ, देखने वाला तथा यह त्रिगुट ही
अदृश्य हो जाता है। वह सर्वांग सुन्दर होकर दर्शन का अवलोकन दर्शन से ही करता है। अनेक पदार्थ दिखाई देने
पर भी दर्शन उस दृश्य को हटा कर दृश्यातीत आत्मतत्त्व ही सारी सृष्टि में व्याप्त दिखाई देता है। उद्धव ! मुक्तों
की यह जो निरीक्षण की पद्धति है उसे यथार्थ दृष्टि से जो देख पाता है, वह दृष्टि जिसे प्राप्त होती है उसे ही
त्रिभुवन में पावन हुआ समझना चाहिये। इस दृष्टि से जो सदा आचरण करते हैं वे परममुक्त हैं इसे ध्यान में रखो
और इसी दृष्टि से जो मुझे देखते हैं वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं और मुझे अत्यन्त प्रिय हैं। परादि वाचाओं में जिस
स्थान पर शब्द उत्पन्न होता है, उसी स्थान पर उसका श्रवण रहता है। श्रोता, वक्ता, कथा तथा निरूपण यह सारा
वह स्वयं बनकर सुनता रहता है। उसके श्रवणेन्द्रिय शब्द समुदाय से अखण्ड जुड़े रहते हैं। चाहे वे लौकिक शब्द