श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तो उसे नित्यमुक्तता प्राप्त होती है। मूर्ख को कर्म का अहंकार रहता है और ज्ञाता सभी कर्मों में निरभिमान रहता
है। जीवों के बन्धन और मोक्ष का कारण अहंकार है इसे ध्यान में रखो। 'मैं कर्ता हूँ', 'मैं भोक्ता हूँ', 'यही
मूर्खों' का दृढ़बन्धन है। किन्तु वह प्रकृति कर्म ज्ञाता अहंकार से अपने माथे पर नहीं लेता। ज्ञाता के उसी
निरभिमान के सम्बन्ध में मैंने तुम्हें बताया। इन्द्रियों को विषयभोग सौंपते समय वह अपना अभोक्तापन अच्छी
तरह जानता है। अपनी छाया विष्ठा पर पड़े अथवा पालकी में चढ़े उसका सुख-दुःख व्यक्ति को नहीं होता उसी
प्रकार देह का सुख-दुःख अथवा मान-अपमान मुक्त को बाधक नहीं होता। ज्ञाता विषयसुख की भी अभिलाषा
नहीं करता। चित्र की सम्पत्ति की तरह विषय भी मिथ्या है ऐसा उनका विचार होता है। इसलिये जिसे प्रकृति के
गुणों के प्रति कोई अहंकार नहीं होता वह देह में रहते हुए भी विदेही और नित्यमुक्त रहता है। उद्धव! देह में
रहते हुए भी वह विदेही कैसे हुआ? यदि तुम ऐसी कल्पना कर रहे हो तो उसके सम्बन्ध में तुम्हें एक उदाहरण
बताता हूँ। आकाश सब लोगों पर है, सभी पदार्थों से लगा हुआ दीखता है लेकिन किसी भी पदार्थ के दोष से
वह मलिन नहीं होता। उस आकाश ही ही तरह ज्ञाता भी देह में होते हुए भी सदा देहकर्मों के प्रति अलिप्त रहता
है। जिस प्रकार किसी बड़े पत्थर से आकाश को ढँका नहीं जा सकता उसी प्रकार प्रकृति के गुण क्षुब्ध हो जाने
पर वह जड़बद्ध नहीं हो जाता। आकाश लोगों के बीच होने पर भी जिस प्रकार लोगों के घर्षण से उस पर घट्टा
नहीं पड़ता उसी प्रकार वह प्रकृति के कर्म के अनुसार आचरण करते हुए भी उसके गुणों से अलिप्त रहता है।
आकाश पानी में डूबा हुआ दिखायी देता है किन्तु वह सूखा ही रहता है। उसी प्रकार वह पत्नी और बाल-बच्चों
के बीच रहकर भी उनके दोषों में लिप्त नहीं होता। कोई यदि आकाश को कालिख लगाना चाहे तो वह लगाने
वाले को ही काला करती है उसी प्रकार मुक्त को दोषी कहने से कहने वाले को ही दोष लगता है। ठंडक, धूप
अथवा जल की धारा जिस प्रकार आकाश को स्पर्श नहीं करतीं उसी प्रकार द्वंद्वों के समुदाय में मुक्त निर्द्वन्द्व वृत्ति
से खड़ा रहता है। अनेक प्रकार के मेघपटल गरजते हुए आकाश को ढँक लेते हैं लेकिन आकाश उनमें होते हुए
भी उनसे अलग रहता है। वह उन मेघों को स्पर्श भी नहीं करता। उसी प्रकार मोहममता का जोर मुक्त को सताने
का प्रयत्न करता है लेकिन उसे उनमें से किसी की भी बाधा नहीं सताती। वह उन सबसे अलिप्त ही रहता है।
आकाश को जलाने का प्रयत्न करने से आग ही बुझ जाती है उसी प्रकार तीन गुण यदि मुक्त को बाँधना चाहें तो
गुणों का गुण ही समाप्त हो जाता है। प्रलयवायु के प्रहार से आकाश उड़ नहीं जाता लेकिन सारी वायु ही
आकाश में समा जाती है। वैसे देखा जाय तो वह गगन में भी नहीं मिलता उसी प्रकार अविद्या भी अपने स्वभाव
धर्म के अनुसार मुक्त को बद्ध नहीं कर पाती। 'अविद्या' इस नाम से ही वह मिथ्या है यह स्पष्ट मालूम होता है।
मुक्त को वह दिखायी ही नहीं देती। आकाश की तरह जो सब कर्मों में होते हुए भी अलिप्त रहता है वही ज्ञाता
है। जिस प्रकार सूर्य अलिप्त रह कर आचरण करता है उसी प्रकार मुक्त की स्थिति रहती है यह ध्यान में रखो।
घृत, मधु तथा जल इन सब में प्रतिबिम्बित होकर भी सूर्य जैसे उन सबसे अलिप्त रहता है उसी प्रकार बाल्य,
युवावस्था एवं वार्धक्य इन अवस्थाओं से मुक्त अलिप्त ही रहता है। अथवा सूर्य प्रकाश से शुभ अथवा अशुभ
कर्म होता रहता है लेकिन सूर्य उन दोनों से अलग रहकर अपने स्वयं प्रकाश से प्रभावित होता रहता है। इस
प्रकार गृहस्थाश्रम धर्म का निर्वाह कर नित्य नैमित्तिक कर्म करते हुए भी मुक्त को कर्म का बन्धन नहीं होता।
आत्मज्ञान के कारण वह अकर्त्ता ही बना रहता है। सूर्यकान्त में अग्नि उत्पन्न कर सूर्य अकर्त्ता ही रहता है, उसी
प्रकार आत्मतत्व जानने वाला कर्म करते हुए भी अकर्त्ता ही रहता है। सूर्य जल में प्रतिबिम्बित होता है लेकिन
वह भींगता नहीं है। उसी प्रकार स्त्री की संगत से उसे बाल-बच्चे होते हैं लेकिन उसका ब्रह्मचर्य भंग नहीं होता।