श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 291, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय २७५
चिल्लाने लगता है इसलिये जागृति में 'अब मैं नहीं बचूँगा' कहता है। भ्रम का यह सघन पटल ही बद्धता का
लक्षण है। स्वप्न का मिथ्या सुख-दुःख भोगते हुए भ्रम में छटपटाता रहता है। आत्मस्वरूप का विस्मरण होने से
विषयासक्ति बढ़ती है, मन में संकल्प विकल्पों का उदय होता है, वही बद्ध का लक्षण है। अब उसके और भी
लक्षण बताता हूँ। भोग भोगते हुए भी अभोक्ता रहता है, यही मुक्तावस्था है। उसके बारे में भी सुनो।
इन्द्रियेरिन्द्रियार्थेषु गुणैरपि गुणेषु च।
गृह्यमाणेष्वहं कुर्यान्न विद्वान् यस्त्वविक्रियः ॥ ९॥
अवशेष प्रारब्ध स्थिति के कारण मुक्तों की देह में बस्ती दिखायी पड़ती है। किन्तु जागृति में, स्वप्न में
अथवा सुषुप्ति में भी वह देहास्थिति को स्पर्श नहीं करता। पुरुष के कारण छाया चलती-फिरती दिखायी देती है
लेकिन उस छाया को पुरुष स्पर्श नहीं करता, उंसी प्रकार मिथ्या देहबुद्धि कल्पांत में भी मुक्त के पास नहीं आ
सकती। जिस प्रकार हम अपनी ही छाया में नहीं बैठ सकते उसी प्रकार मायादि गुण पास होते हुए भी उसका
स्पर्श नहीं करते। नियति की इच्छा से उसे जो भी विषय प्राप्त होते हैं उनका वह सेवन करता है लेकिन सेवन
करने का भास उसे नहीं होता क्योंकि उसमें विषय की भावना का स्फुरण ही नहीं होता। गुण ही गुणों की
अवस्था का पोषण करते हैं, इन्द्रिय अपने-अपने विषयों का भोग करते रहते हैं, 'मैं' दोनों का साक्षी होने के
कारण अकर्त्ता हूँ, चित्तस्वरूप होने के कारण मैं सबसे अलिप्त ही रहता हूँ। (ऐसी उसकी धारणा होती है)
इन्द्रियों की संगति से विषयों में लिप्त होते हुए भी वह विषय की छूत से कभी मैला नहीं होता। जहाँ काम से
अति प्रेम होता है वहाँ लालच की दृढ़ बस्ती होती है अथवा जहाँ काम की प्राप्ति नहीं होती, वहाँ क्रोध का
तूफान उठता है। किन्तु मुक्त सदा निष्काम होने के कारण क्रोध लोभ के साथ उसका काम भी नष्ट हुआ रहता
है। वह स्वयं आत्माराम तथा सारे जगत का विश्रामधाम बन जाता है। इस प्रकार मुक्त के हृदय में पाप या पुण्य
उत्पन्न हो ही नहीं सकता। वह काम, क्रोध की वृत्तियों से शून्य हो परिपूर्ण चिद्ब्रह्म होकर रहता है। मुक्त का
विषय सेवन ऐसा रहता है कि उसमें भी ब्रह्मभाव दिखायी देता है। इसलिये पापपुण्य का प्रश्न ही नहीं उठता
और इस प्रकार उन्हें नित्य मुक्ति प्राप्त होती है। मुक्त की बात ऐसी है। अब बद्ध की भी बात सुनो। वह सचमुच
ही अकर्त्ता होते हुए भी मैं उसे कर्ता कहता हूँ और इसीलिये वह सर्वत्र उलझ जाता है।
दैवाधीने शरीरेऽस्मिन् गुणभाव्येन कर्मणा।
वर्तमानोऽबुधस्तत्र कर्तास्मीति निबद्ध्यते ॥ १०॥
शरीर भाग्य के अधीन है। हरिहर भी उसमें यत्किंचित फेरबदल नहीं कर सकते। वेदशास्त्रों द्वारा भी यह
सम्मत है। देह में जिस गुण की प्रधानता होती है उसके ही अनुसार कर्म होते हैं और इन्द्रिय भी गुणों के अधीन
होने के कारण वे उसके अनुसार कार्य करते हैं। अर्थात् देह का आचरण दैव के गुणों के अनुसार होता है फिर
भी वह अपने को कर्त्ता मानता है। वही उसके लिये दृढ़ बन्धन का कारण बनकर अपना ही घातक बन जाता है।
चने की आशा से बन्दर पिंजरे की नली में हाथ लगाता है और वही उसके लिये पाश बन जाता है। उसी प्रकार
जीव देह के विषय विलास के घमण्ड में फँस जाता है। जो सचमुच ही देहातीत तथा गुणकर्मों का अकर्त्ता है
वही कहता है 'देह मैं हूँ और कर्मों का कर्त्ता भी मैं हूँ।' इस प्रकार अहं ममता में भूल जाता है। चोरी न करके
जो मैंने चोरी की कहता फिरता है उसे छोटे-बड़े सभी पीटने लगते हैं। वही गति जड़ जीवों की है। वास्तव में
कर्म होता है प्रकृति का, उसे अपने माथे पर लेकर अहं की ममता से नाचता फिरता है, उस अभिमान के कारण