सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 294

२७८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
हों या नारायणोपनिषद सुनने का प्रसंग हो या हरि, गोविन्द ये नाम सुनने को मिलें लेकिन उन सबका अर्थ बोध
उसे एक जैसा होता है। शब्दों का उच्चार करने वाला वही होता है और वही श्रवण में श्रोता बन जाता है जिससे
शब्दों में अत्यन्त मधुर निःशब्दता उपस्थित हो जाती है जो भी शब्द कान पर पड़ता है वह निःशब्द हो जाता है।
इस प्रकार श्रवण में मुक्तों का परमानन्दस्वरूप स्वानन्द बोध ही भरा रहता है। अकार, उकार और मकार इस
त्रिगुट का शब्दसृष्टि के मूल शब्द 'प्रणव' अर्थात् ओंकार यह शब्द भी उसे ब्रह्मस्वरूप में दिखाई देने लगता है।
यही मुक्तों की श्रवणसंतुष्टि है। शब्दज्ञान कानों पर आने पर भी शाब्दिक सृष्टि लुप्त हो जाती है और कानों में
पूर्ण ब्रह्म ही भर जाता है। यही मुक्तों का स्वानंद श्रवण है। उपनिषद का श्रवण करने या लौकिक शब्द सुनने से
मुक्तों के ज्ञान में परिवर्तन नहीं होता। उन्हें श्रवण में स्वानंद ही भरा दीखता है। अद्वितीय परब्रह्म यही वेदशास्त्रों
का गूढ़ रहस्य है। वही रहस्य मुक्तों को सुगम हुआ रहता है। उन्हें शब्दों में परब्रह्म ही भरा दिखायी देता है।
लौकिक शब्द हों या वैदिक शब्द हों, हर शब्द में ब्रह्म ही भरा रहता है। यही मुक्तों का श्रवण है। अब उनके घ्राण
का लक्षण सुनो। नाक में सुगन्ध आने पर भी मुक्तों को गन्ध के सम्बन्ध में भावना उत्पन्न ही नहीं होती। उस
सुगन्ध के रूप में उन्हें स्वानन्दकंद परमानन्द का ही अनुभव होता है। नाक, पुष्प और चन्दन वह स्वयं ही बन
जाता है। इस प्रकार भोक्ता हुए बिना वह उस सुगन्ध का उपभोग करता है। नाक में सुगन्ध आते ही तत्क्षण परेश
प्रकट होता है इसलिये वह सुगन्ध है या दुर्गन्ध है इस विषयोपभोग का उसे ज्ञान ही नहीं होता। मलयपर्वत से
वायु के साथ सुगन्ध भी उड़ती है, वहाँ मुक्तों का घ्राण रहता है। इस प्रकार इस सुख का उपभोग अगम्य है। वायु
जितना प्रवाहित होता है, उतना मुक्तों का सुवास ग्रहण करना होता है। इस प्रकार उसे सहज ही सुगन्ध का लाभ
होता है। सचमुच वह इस प्रकार गन्ध विषय का भोक्ता बनता है। यही मुक्तों का सुगन्ध ग्रहण करना है। अब
'रस' सेवन करने का ढंग सुनो। रस, रसना और भोजन यह तीनों वह स्वयं हो जाता है। वह बिना जिह्वा के, हाथ
लगाये बिना ही सब कुछ खाता रहता है। वह सभी रसों का स्वाद लेता रहता है लेकिन एक ही स्वाद से सब
कुछ खाता है लेकिन वह भोक्ता नहीं बनता। ऐसे भोजन से वह सदा तृप्त रहता है। उसे भूख की जानकारी नहीं
होती लेकिन खाना खाते समय वह किसी चीज को मना भी नहीं करता। वह बिना खाये ही सब कुछ खा जाता है
लेकिन उसे जूठा नहीं करता। थाली, भोजन और स्वयं इनमें उसे कुछ भिन्नता नहीं मालूम होती। रस विषय के
बहाने वह सर्वांग से स्वानंद का उपभोग करता रहता है। जिह्वा रस का आस्वाद लेने जाती है तो वहाँ परमानन्द
प्रकट होता है इसलिये वह रस और रसना इन दोनों का त्याग कर निजानंद को ही ग्रहण करता है। सारी
मधुरताओं में माधुर्य लाने वाली जो मूल मिठास है वहीं उसके अंतःकरण का प्रेम रहता है। इसलिये नाना प्रकार
के व्यंजन खाने पर भी उसे उसमें उसी मधुरता का स्वाद प्राप्त होता है। सारी चीजों में जो मिठास होती है वह
मिठास वह स्वयं बन जाता है इसलिये वह जो भी पदार्थ खाता है उसमें उसे उसी मधुरता का अनुभव होता है।
ऐसा है मुक्ता का निजबोध ! वह रस का आस्वाद लेने जाता है तो उस पदार्थ का रसत्व लुप्त होकर वहाँ
स्वानंदकंद परमान्द ही भर जाता है। इस प्रकार वे जिस-जिस रस को चखने जाते हैं वही ब्रह्मरस हो जाता है।
सारांश, मुक्तों की भोजन करने की क्रिया ऐसी रहती है यह ध्यान में रखो। अब उनका स्पर्श ग्रहण कैसा रहता है
इसका भी लक्षण सुनो। मुक्तों को ठंडक लगने पर उसकी शीतलता समाप्त हो जाती है। अथवा उष्णता उन्हें स्पर्श
करती है तो उसकी उष्णता समाप्त हो जाती है। जिस प्रकार अग्नि अपना सम्पर्क होते ही चन्दन और घुरे
(दुर्गन्धियुक्त वृक्ष) के विकारों को जलाकर उन्हें अपने जैसा बना देता है उसी प्रकार मुक्तों की देह पर यदि द्वंद्व
टूट पड़ें तो वे स्वयं ही टूट जाते हैं। वह सब तरह से सब में विद्यमान होने के कारण उनका द्वंद्व अपने आप