श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कल्पांत तक अनिवार्य बद्धता में फँसता जाता है। नीचे काजल का लेप लगाकर ऊपर सफेद स्फटिक रखने पर
उसकी शुभ्रता लुप्त हो जाती है और वह काला ही दिखायी देने लगता है। उसी प्रकार जीव अन्धा हुआ रहता
है। अन्धा हाथी जब उन्मत्त हो जाता है तो वह इस बात का विचार नहीं करता कि मैं गड्ढे में गिर पडूँगा उसी
प्रकार जीव कर्म करने लगता है, अधोगति की ओर जाने का विचार भी उसके मन को स्पर्श नहीं करता। मैं देह
हूँ, मैं ज्ञाता हूँ, मैं विषयभोक्ता हूँ यह जो 'मैं' पन की अहंता है उसी का नाम है दृढ़बन्धन। इस प्रकार बद्धमुक्त
का वर्तन निरूपण से स्पष्ट करके बतलाया। अब श्रीकृष्ण केवल मुक्तों का लक्षण अत्यन्त प्रेम से बतलाते हैं
'ज्ञानी मेरी आत्मा है' यह रहस्य की बात भगवान ने अर्जुन को सेना की भीड़ में बतायी थी। वही गुप्त बात
भगवान इस समय उद्धव को बता रहे हैं। ज्ञान की मुक्तस्थिति का यथार्थ रीति से वर्णन करना यही आत्मगुह्य है।
ज्ञान के लक्षण बताते समय श्रीकृष्ण को संतोष नहीं हो रहा था इसीलिए निरूपण के बहाने वे पुनः ज्ञान के
लक्षण बता रहे हैं। इससे ज्ञात होता है कि भक्तों का माधुर्य एक श्रीकृष्ण ही जानें और कृष्ण भजन का स्वाद
भक्त ही जानें! वैसे भी जब मुक्तों की कथा हो और वक्ता भगवान श्रीकृष्ण हों तो उद्धव के भाग्य का क्या वर्णन
किया जाय? शेष भी वह नहीं कर पायेगा। उद्धव भी अर्जुन जैसा या उससे भी अधिक महान होना चाहिये
क्योंकि वे दोनों नर नारायण थे इसीलिये उन्होंने उसके सामने गुप्त ज्ञान का वर्णन किया था। अब वही ज्ञान की
कथा पुनः उद्धव को बता रहे हैं। इससे मालूम होता है कि उद्धव जैसा भाग्य किसी का नहीं है। निजधाम जाना
छोड़ तथा अपनी इच्छा एक ओर रख भगवान ने इतना निरूपण किया इसका अर्थ यही होता है कि श्रीकृष्ण
उद्धव को बहुत चाहते थे और उससे स्नेह रखते थे। उद्धव का पुण्य अत्यन्त निर्मल था, धन्य हे उद्धव ! जिसके
लिये स्वानंदघन नारायण स्वयं दयार्द हो उठे योगयागादि से भी जो नहीं प्राप्त हो सकता वह उद्धव के कहने से,
जिस प्रकार गाय अपने बछड़े को चाटती है उस प्रकार उसे गुप्त बातें बताने लगे। जो अपने ही कुल का काल
बना वही भक्तों का पक्ष लेने वाला तथा स्नेहसिक्त श्रीकृष्ण उद्धव पर प्रसन्न हुआ। इसलिये उद्धव का नाम लेते
ही श्रीकृष्ण सांसारिक दुःख से मुक्त करते हैं इतना उन्हें भक्तों के प्रति प्रेम है। भक्तों का स्मरण करने पर भी वह
उन्हें तारता है। एका (एकनाथ) जनार्दन संतों से विनती कर रहा है कि मुक्तों के लक्षण निश्चित करने से मुक्तता
प्राप्त होती है इसीलिये श्रीकृष्ण मुक्तों की कथा सुना रहे हैं। कृष्ण ने उद्धव से कहा, मैं अपना अत्यन्त गुप्त
रहस्य जो मुक्तों का लक्षण है वह तुमसे निवेदन कर रहा हूँ। वह चमत्कार सुनो।
एव विरक्तः शयने आसनाटनमज्जने ।
दर्शनस्पर्शनघ्राणभोजनश्रवणादिषु ॥१९॥
बैठना, भोजन करना, शयन करना, देखना, स्पर्श करना, सूँघना, टहलना, स्नान करना आदि कार्य मुक्तजन
कैसे करते हैं? उसके लक्षण सुनो। पिछले श्लोक में बताया था कि प्रकृति धर्म का अभिमान करने से दृढ़बन्धन
प्राप्त होता है लेकिन ज्ञाता उस अहंकार का स्पर्श नहीं करता। ज्ञाता को स्वाभाविक रूप से ही सारे कर्मों में
निरभिमानिता रहती है वही मूल कथा तुम्हें सुनाता हूँ, ध्यान देकर श्रवण करो। जिस प्रकार छाया का सम्मान
अथवा अपमान पुरुष को जरा भी बाधित नहीं करता उसी प्रकार देह का कर्माचरण निरभिमानी मुक्त को बाधित
नहीं करता। स्वाधिष्ठान उनकी बैठक है, उसी आसन पर वे निरन्तर बैठे रहते हैं। वहाँ अभिमान आ ही नहीं
सकता। वहाँ जम कर बैठा हुआ मन उठने का नाम ही नहीं लेता। उस आसन की महत्ता विचित्र है। वहाँ
विस्मरण समाप्त हो जाता है, एकान्त कभी नहीं ढलता। यही मुक्तों का 'सहजासन' है। इस आसन का समाधान