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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 289, कुल 869 में से

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पृष्ठ 289

ग्यारहवाँ अध्याय २७३
के कारण ईश्वर जीव का सहायक होता है। संकट के समय जब जीव ईश्वर की रट लगाता है तो वह तत्काल
आकर उसे संकट से छुड़ाता है। इस प्रकार शिव की आज्ञा में जीव रहता है। जीवत्व समाप्त होने पर वह शिव
में ही एकरूप हो जाता है। वह भी जीव के ही लिये शिवत्व स्वीकार करता है अन्यथा वह भी अलग ही रहता
है। ऐसी उनकी मित्रता है उसका वर्णन वाणी से कैसे सम्भव है। उद्धव ! उनकी मैत्री का सौजन्य सचमुच जानने
वाला एक मैं ही हूँ। इस प्रकार जीव ईश्वर के अधीन रहता है यह बात सिद्ध हो गयी और साथ ही साथ
अनीश्वरवाद का खण्डन भी हो गया। अनीश्वरवाद का खण्डन करते समय पाखण्ड कर्म का भी खण्डन किया।
कर्मपाखण्ड के मतवादी ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते। वे ईश्वर के स्थान पर चित्त धर्म को
स्वीकार करते हैं। ईश्वर सहज चित्स्वरूप है यह कहकर चित्त धर्म का निराकरण किया। अनेक प्रकार के
चिन्तन का नाम है 'चित्त' और हे उद्धव ! चित्त के बिना जो निश्चलता होती है उसे 'चैतन्य' या 'शुद्धचित्त
स्वरूप' कहते हैं। कुछ लोग धर्म का विचार न कर ईश्वर को मोक्षदाता कहते हैं। यह पाखण्डी भक्तों की बात
है। उसकी चिद्रूपता स्थापित कर चित्तधर्म का निराकरण किया। तिलक-माला-मुद्रा आदि धारण कर जो संतों
की निन्दा करता है, भक्ति का ढोंग रचा कर पाप का आचरण करता है, उसका नारायण कभी उद्धार नहीं करते।
अंतःकरण की बातें जानने वाला मैं हूँ इसीलिये मुझे 'अंतर्यामी' कहते हैं। वही मैं शाब्दिक वचनधर्मी अधर्म पर
कैसे चलूँगा ? मैं सचमुच ज्ञानस्वरूप हूँ, मैं सर्वसाक्षी और सर्वज्ञ हूँ। बिना धर्म-अधर्म का विचार किये मैं मोक्ष
प्रदान कर दूँ यह नहीं होगा। जो स्वयं भक्त का स्वांग बनाकर पाप का आचरण करता है उसे 'दंभी' कहते हैं।
उसका उद्धार भगवान नहीं करते। सदृशौ (समान) और सखायों (मित्र) इन दो शब्दों से भगवान ने पाखण्डियों
का खण्डन कर दिया। विभिन्न मतों का खण्डन कर अपना मत स्थापित करने के लिये भगवान श्रीकृष्ण ने बड़ा
विचार कर इन दो पदों की योजना की है। उन दोनों पक्षियों ने मिलकर देहरूपी वृक्ष पर अपना घोंसला बनाया।
अब देह को वृक्ष किस उद्देश्य से कहा इसका कारण सुनो। माता का उदर क्यारी है और पिता का रेत बीज है,
गर्भादान, बुआई और उसे बढ़ने के लिये वासना का जल है। 'सोहं' अर्थात् 'ब्रह्म मैं ही हूँ' इस भाव का गुप्त
अंकुर त्रिगुणरूप भूमि में त्रिदल रूप से ऊपर आता है और 'कोहं' अर्थात् 'मैं कौन हूँ' इस भाव से बड़ा होकर
वृक्ष का आकार लेता है। उसमें हस्तपादादि अनेक शाखायें फूट कर वे बढ़ने लगती हैं। उसी में नीचे नाखून
तथा ऊपर शिखा फूट कर वृक्ष का पूर्ण विस्तार होता है। उसमें देह बुद्धि के दृढ़ मूल निकलते हैं और उसमें
विकल्प की कलियाँ फलने लगती है। कर्म-अकर्म के पर्ण उसमें निकलते हैं जिससे मोह ममता के सुन्दर फलों
के गुच्छे लटकते हैं। बड़ी-बड़ी ऊँची शाखाओं में सुख-दुःख के फल लटकते हैं और उसके भार से लटक कर
वे शाखाएँ जमीन पर पसर जाती हैं। ऐसे वृक्षों में गुप्त एवं कठिन स्थान पर हृदय में जीवशिव अपने बसेरे के
लिये घोंसला बनाते हैं। यदि कोई उसे देह की सत्यप्राप्ति हुई ऐसा कहे तो श्रीकृष्ण उस मत का खण्डन करते
हैं। पुरुष के साथ ही छाया मिथ्या होती है। वह तोड़ने-मोड़ने से दूर नहीं होती। उसी प्रकार मेरी माया
अवर्णनीय है। वही अपनी इच्छा से वहाँ अपना घोंसला बनाती है। शान्त सोये हुए मनुष्य की तरह जीवात्मा
नीड में रहता है। वैसे, सह सब माया है उसमें सत्य का अंश नहीं है। इस प्रकार देह सम्बन्धों के मिथ्यत्व के
निरूपण से श्रीकृष्ण ने नैयायिक मत का जो मुख्य सिद्धान्त है उसी का उच्छेद कर दिया। ऐसे इस वृक्ष को
काल जन्म से ही क्षण-क्षण तोड़ता रहता है और उसकी बाल्यावस्थादि अवस्थाओं पर प्रहार करता रहता है।
इस वृक्ष के फल कच्चे, पके, तीते, कसैले होते हैं जिन्हें 'पिघले' कहते हैं। उन दो पक्षियों में जिसे 'जीव'
कहते हैं वह अनेक प्रकार के दुःखदायक कर्मफलों का भोक्ता होता है। उन फलों के खाने से पेट नहीं भरता,