श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 287, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय २७१
एकस्यैव ममांशस्य जीवस्यैव महामते।
बन्धोऽस्याविद्ययानादिर्विद्यया च तथेतरः ॥४॥
लकड़ियाँ कम या अधिक करने से अग्नि कम या अधिक होती है। उसी अग्नि में से एकआध चिनगारी
उड़ कर आकाश की ओर चली जाती है किन्तु आत्मस्वरूप में कम और अधिक होना नहीं है। फिर उसका
'अंश' मालूम हाने के लिये अवकाश कहाँ है ? जिससे आत्मज्ञान प्राप्त हो ऐसी बुद्धि उद्धव के पास थी। लेकिन
इसलिये श्रीकृष्ण ने उसे बड़े प्रेम से 'महामते !' कहकर सम्बोधित किया। फिर बोले, "जरा ध्यान देकर सुनो।
इस श्लोक का अर्थ अत्यन्त गूढ़ है। उस धारणा को धारण करो। कहकर जगजेठी कृष्ण ने उद्धव की पीठ
थपथपायी और बोले, यह अत्यन्त गूढ़ बात तुझ पर कृपा होने के ही कारण बताता हूँ। पीठ थपथपाने के बहाने
अपनी शक्ति उसे प्रदान की और इस प्रकार उद्धव के अंतःकरण में अद्वैत ज्ञान का लक्षण प्रकट किया। हे उद्धव !
जिस प्रकार दीपक अनेक होने पर भी प्रकाश एक अभिन्न रहता है उसी प्रकार त्रिभुवन में जीव सब जगह एक
है। दीपक की ज्योतियाँ एक होती हैं किन्तु दीपक एक नहीं होते। भेद जड़ में उत्पन्न होता है किन्तु अजड़ में
ऐक्यवृत्ति होती है। चन्दन के टुकड़े अनेक होते हैं किन्तु उनमें सुगन्ध एक ही होता है। उसी प्रकार जीवरूप में
मैं अविनाश परमात्मा प्रतीत होता हूँ। अब जीव के रूप में तुम श्रीकृष्ण ही हो इसे यदि सच मान लें तो संसार
पाश आदि का जो बन्धन है वह तुम पर ही लागू होता है ऐसा कहना पड़ेगा'' ऐसी यदि तुम कल्पना करते हो तो
वह सच नहीं होगी। जिस प्रकार शरीर को चलाने के लिये प्राण की आवश्यकता होती है लेकिन उस पर शरीर
की अवस्थाएँ लागू नहीं होतीं। सूक्ष्मदेह में स्वयंभू रहने वाला जीव मेरे ही अंश के रूप में प्रतिबिम्बित हुआ है।
उसे बन्धन की भावना केवल मिथ्या आभासित होती है। घट में आकाश रहता है जिसे 'घटाकाश' कहते हैं
लेकिन वह घट नष्ट होने पर भी आकाश नष्ट नहीं होता उसी प्रकार मैं भी जीवतत्व में अविनाश रूप में रहता
हूँ। जैसे जलकुण्ड में सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखायी देने पर भी सूर्य वास्तव में आकाश से जलकुण्ड में नहीं उतरता
उसी प्रकार मैं भी जीवत्व से अलिप्त रहता हूँ। सूर्य जिस प्रकार जलकुण्ड में प्रतिबिम्बित होता है उसी प्रकार
सूक्ष्म देह में मेरा आभास होता है। वहाँ मिथ्या भोग के पागलपन का बन्धन मुझ पर कैसे लागू होगा.? अब
विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है। प्रतिबिम्ब का नाम 'जीव' और मुख्य बिम्ब मैं 'शिव' यही 'जीव
शिव' का बृहत् अर्थ है। तालाब, कुएँ, जगह-जगह दिखायी देने वाले जलकुण्ड इन सभी में सूर्य के बिम्ब
दिखायी देते हैं किन्तु आकाश में देखें तो सूर्य के इतने बिम्ब नहीं दिखाई देते। उसी प्रकार एक को अनेकत्व देने
वाला जो जीवत्व है वह मिथ्या है यह ध्यान में रखो। भागवत का मुख्य तत्त्व और ज्ञान का शुद्ध सत्त्व यही है।
जलकुण्ड में सूर्य का प्रतिबिम्ब हिलता-डुलता है, वह निश्चल है, वह मटमैला होता है आदि जो जलकुण्ड के
गुण हैं वे सब उस प्रतिबिम्ब पर मढ़े जाते हैं। वैसे देखा जाय तो शिव को कभी बाधकता नहीं होती। वास्तव में
यह कार्य अविद्या का है जो जीव के मत्थे थोपा जाता है। इसलिये जीवभेद बिलकुल मिथ्या है। उसे विद्या और
अविद्या अपने कर्म और गुण के अनुसार मुक्तता और बद्धता प्रदान करते हैं। उस एक जीवभाव को ये नित्यमुक्त
और नित्यबद्ध अवस्थायें दिखाने के लिये विद्या और अविद्या कारणीभूत होती हैं। जिस प्रकार जल में सूर्य का
प्रतिबिम्ब हिलता है तो पानी की चंचलता या स्थिरता ये अवस्थाएँ केवल प्रतिबिम्ब के लिये होती हैं, उसका
पता सूर्य को नहीं होता या जिस प्रकार अँधेरे के जुगनू को कल्पांत में भी सूर्य का दर्शन नहीं होता उसी प्रकार
जीव की बद्धता अथवा मुक्तता परमात्मा पर लागू नहीं होती। पानी में आकाश डूबा दिखाई देता है लेकिन वह
गीला नहीं हो जाता. उसी प्रकार आत्मस्वरूप भी अविद्या से अलिप्त रह कर जैसा का तैसा रहता है। एक बद्ध