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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 869 में से

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पृष्ठ 297

ग्यारहवाँ अध्याय २८१
विकार उत्पन्न होने पर भी उसकी आत्मस्थिति नहीं ढलती और संयोग से संतति होने पर उसे उसमें अपनी ही
आत्मप्रतीति होती है। इससे 'आत्मा वै पुत्र नामासि' इस श्रुति की सत्यता सिद्ध होती है क्योंकि वह सर्वकाल पुत्रों
को भी आत्मभाव से ही देखता है। वह स्वयं ही माता रहता है और स्वयं ही पिता रहता है और पुत्ररूप से स्वयं
ही क्रीड़ा करता है। जन में अथवा वन में उसे अपने सिवा कुछ भी नहीं दिखाई देता। स्त्री, पुत्र संतति ये सब
मुक्तों को आकाश में विचरण करने वाले बादलों की तरह लगते हैं। वे यथासमय आते हैं और चले जाते हैं। स्त्री
संभोग में जो सुख प्राप्त होता है वह सुख मुक्तों को सदा प्राप्त होता रहता है। इसलिये मुक्त को स्त्री सुख की
विशेष कामना नहीं होती। अब धन की दृष्टि के सम्बन्ध में बताते हैं। राजहंस के लिये गोबर का जो महत्त्व होता
है वही महत्त्व मुक्त को धन का होता है। उसे उससे कभी भी आसक्ति नहीं होती। वह उसके प्रति उदासीन ही
रहता है। जिस प्रकार व्याघ्र को मिष्ठान्न अच्छा नहीं लगता उसी प्रकार मुक्त को धन नहीं भाता क्योंकि उसे धन
का लोभ नहीं होता। जिस प्रकार कौआ चारा चुगते समय कर्कट के ढेले को स्पर्श नहीं करता उसी प्रकार मुक्त
अमूल्य रत्नमाला देखकर घृणापूर्वक थूक देता है। जिसे धन की आस्था रहती है उसे कल्पांत में भी मुक्तता नहीं
प्राप्त होती। उसी प्रकार जिसे स्त्री की वासना होती है उसे कभी परमार्थ या आत्मज्ञान प्राप्त नहीं होता। अब निद्रा
के सम्बन्ध में बताते हैं। ससुराल में श्रम से थकी हुई लड़की जिस प्रकार विश्राम के लिये मैके आती है उसी
प्रकार मुक्त की निद्रा के पास समाधि भी विश्राम के लिये आती है। जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीन
अवस्थाओं को स्पर्श न कर वह दिन रात आत्मस्वरूप में स्थित होकर आत्मा में ही सोया रहता है। इस प्रकार
आत्मस्वरूप में सोये रहने पर उसके नीचे न तो धरती रहती है न ऊपर आकाश। उसकी निद्रा का सबसे बड़ा
चमत्कार यह है कि चलते-फिरते समय भी उसकी निद्रा नहीं टूटती। खाना खाते समय भी वह अखण्ड निद्रा में
रहता है। सारांश, वह सहज भाव से निजरूप होकर रहता है। सोनेवाला और जगानेवाला वह स्वयं ही रहता है
और कौन किसे जगायेगा? वह स्वस्थ मन से निजरूप में सोया रहता है। जागृत अवस्था में भी वह सोया रहता है
और सोये रहने पर भी जागता रहता है। इस प्रकार स्वयं ही निजरूप हो जाने के कारण वह निद्रा के आश्रित नहीं
रह जाता। शय्या, शयन और शयनमन्दिर सब कुछ वही रहता है। अपने स्वरूप का स्वयं ही निवास होने के
कारण वह निरन्तर निजरूप में सोया रहता है। इस प्रकार वह जो भी कर्म करने जाता है वहीं परब्रह्म प्रकट होता
है। मुक्त को किसी नियम की पाबन्धी नहीं होती। यही मुक्त का रहस्य है। मुक्त को यदि नियम का बन्धन होगा
तो फिर साथ-साथ साधन भी आ जायेगा और साधन आने पर मुक्तता कभी नहीं मिल पायेगी। मुक्त को तो कभी
भी किसी चीज की आसक्ति नहीं होती। उसके हाथ से बचे हुए प्रारब्ध के अनुसार कर्म होते रहते हैं। जिसका
अहंकार नष्ट हो गया हो वह सचमुच मेरा ही रूप है। इसके सम्बन्ध में विचार करने की आवश्यकता नहीं है
क्योंकि वह वेदशास्त्र संमत है। जो नित्यमुक्त तथा निर्विकार रहता है वह व्यवहार में मेरे जैसा ही आचरण करता
है। लहरों के भीतर और बाहर जैसे समुद्र ही होता है उसी प्रकार उसके भीतर और बाहर मैं ही रहता हूँ। इस
प्रकार जो परब्रह्म होकर रहता है उसके लिये धर्माधर्म स्वप्न की तरह हैं। इन्द्रियों का कर्म भी उसे बाधक नहीं
होता। इसका रहस्य वही जाने!
न था बद्ध्यते विद्वांस्तत्र तत्रादयान गुणान्।
प्रकृतिस्थोऽप्यसंसक्तो यथा खं सवितानिल ॥१२॥
जिन इन्द्रियों के कर्म करने से मूर्ख को दृढ़बद्धता प्राप्त होती है, उसी इन्द्रियों से जब ज्ञाता कर्म करता है