श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
खाने से पचता नहीं इसलिये संसार चक्र में फँसकर चक्कर लगाने पड़ते हैं। फिर भी वह बड़े चाव से खाता
रहता है। वह एक फल खाता रहता है तो दूसरा उसे न खाने का इशारा करता है लेकिन जीव को उस फल की
बहुत चाह रहती है इसलिये वह लगातार उन फलों को खाता रहता है। शिवा की बात नहीं मानता और रात-
दिन फल खाता रहता है। फिर भी उसमें शक्ति नहीं होती। उसे अशक्त पाकर काल उसे अपने पाश में बाँध
लेता है। दूसरा कर्मफल को स्पर्श नहीं करता। उसे देखकर कलिकाल भी भागने लगता है। जो कर्मफल का
सेवन नहीं करता वह अपनी ज्ञानशक्ति से और भी अधिक प्रबल होता है, वह सदा परमानन्द से तृप्त रहता है
और स्वानन्द से डोलता रहता है। उद्धव को आत्मबोध हो इसलिये श्रीकृष्ण ने जीवशिव का भेद तथा आत्मज्ञान
का बोध प्रांजलता से तथा अत्यन्त प्रेम से निरूपित किया।
आत्मानमन्यं च स वेद विद्वानपिप्पलादो न तु पिप्पलादः।
योऽविद्यया युक् स तु नित्यबद्धो विद्यामयो यः स तु नित्यमुक्तः ॥ ७ ॥
जो कर्मफलों का सेवन नहीं करता, जो आत्मस्वरूप का जानकार होते हुए सचमुच ही जीव और प्रपंच का
द्रष्टा होता है वही आत्मज्ञान के कारण अलिप्त रहता है। जीव प्रपंच का ज्ञाता है लेकिन परमात्मा को नहीं
जानता इसलिये कर्मफल खाते समय बद्ध होकर व्यथा भोगता रहता है। बेचारा कर्मफलों का सेवन करता है और
अन्धा, विकलांग तथा पागल बन जाता है। वह अपने को ठीक से नहीं पहचान पाता और देह की बेड़ी में फँस
जाता है। देह सम्बन्ध में तो पग-पग पर आत्मघात होता रहता है और जन्म-मरण का अन्त न होने के कारण वह
दुःख से छटपटाता रहता है। नश्वर विषयों की लत पड़ जाने के कारण जीव उनमें बद्ध हो जाता है। अविद्या का
यह सम्बन्ध बुद्धिमान देहधारी को भी लग जाता है। जीव को विषय में जितनी रुचि रहती है, उतनी ही उसे
नित्यबद्धता होती है और जो विषय से अलिप्त रहता है उसमें नित्यमुक्तता का वास रहता है। जो विद्या की
प्रधानता से नित्यमुक्त रहता है, जो ज्ञानशक्ति से शक्तिमान रहता है, जो सर्वव्यापी होकर सबसे अलिप्त रहता है
उसे ही 'नित्यमुक्त' कहते हैं। इस प्रकार जीव की नित्यवद्धता के बारे में बताया और शिव की मुक्तता भी व्यक्त
की। अब जीव की बद्ध-मुक्तता के सम्बन्ध में भी बताते हैं। अब श्रीकृष्ण उद्धव से बद्धमुक्तों के लक्षण और
दोनों की पहचान बतायेंगे।
देहस्थोऽपि न देहस्थो विद्वान् स्वप्नाद् यथास्थितः।
अदेहस्थाऽपि देहस्थः कुमतिः स्वप्नदृग् यथा ॥ ८ ॥
अब तीन श्लोकों में बद्धमुक्तों का मिश्र लक्षण बतायेंगे और केवल मुक्तों का उत्तम लक्षण सात श्लोकों में
निरूपित करेंगे। देह में रहकर भी विदेही होना यही मुक्त का लक्षण है। इसी कारण देह में रहते हुए भी उसे
'विदेह' कहते हैं। जिस प्रकार स्वप्न का राज्य और भिक्षा, जागने पर मिथ्या ही हैं, उसी प्रकार देहादि सुख-
दुःख भी मुक्तों के लिये मिथ्या है। जो स्वप्न में मर कर अग्नि को समर्पित भी कर दिया गया वह जागने पर राख
नहीं हो जाता उसी प्रकार प्रपंच मिथ्या है यह जिसने जान लिया उसी को 'मुक्त' कहते हैं। स्वप्न की अनुकूल,
प्रतिकूल बातें का जागृति में स्मरण होता है लेकिन उनके सुख-दुःख की बाधा नहीं होती, उसी प्रकार संसार के
सम्बन्ध में जो भी बातों हैं उनकी मुक्त को बाधा नहीं होती। अब बद्ध की स्थिति सुनो। वह वास्तव में देहातीत
ही होता है किन्तु दुर्बुद्धि के कारण स्वयं को 'देह' मानता है और इसी कारण से उसे दुःख होता है। पानी में पड़े
प्रतिबिम्ब को देखकर 'मैं डूबा' कहकर काँखने लगता है और 'मुझे बचाओ, तुम्हें पुण्य मिलेगा' कहकर