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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

कोई दुःख नहीं है। युवावस्था में वृद्धावस्था का दुःख देखकर यह जान लेना चाहिये कि यह दुःख कल मेरा भी
हाथ पकड़ लेगा। देह षड्विकारों से भरा हुआ है। उसके प्रत्येक विकार में अनेक अनर्थ हैं। इसके अतिरिक्त
जिस प्रकार अग्नि में घी डाला जाय उसी प्रकार उनमें छह ऊर्मी लगी हुई हैं। इस दुःख का जो मूल है वह इस
देह के बहुत लाड़ करता है। इसलिये उस देह का पोषण करने से दुःख बढ़ता है और महादुःख की फल प्राप्ति
होती है। सारांश, देह की संगति निरन्तर दुःखदायी है यह जानकर उसकी आसक्ति छोड़ देनी चाहिये। विरक्ति
मन में प्रतिपादित करने के लिये देह गुरु का काम करता है। इस देह की सहायता से ही अविनाश पद की प्राप्ति
होती है। इस गुण के कारण भी देह को गुरु कहना चाहिये। देह उपकार भी करता है और अपकार भी। उसमें
दोनों ओर से गुरुता है। इसका विचार कर जो चतुर पुरुष अपना हित साध लेता है, वह धन्य है। तात्त्विक दृष्टि
से विचार करने पर ज्ञात होता है कि अज्ञान ही इस देह का मूल है और आत्मस्वरूप का न दिखायी देना ही
प्रकृति का आभास होना है। प्रकृति के कारण ही त्रिसूत्र की उत्पत्ति होती है, तीन गुणों से तीन प्रकार के
अहंकार उत्पन्न होते हैं और वहीं से महद्भूतों का विकार उत्पन्न होकर देह के साथ इन्द्रियों के व्यापार चलते हैं।
अर्थात्, रस्सी के कारण सर्प तो हुआ ही नहीं केवल भ्रम के कारण उसे सर्प कहते हैं। उसी प्रकार ब्रह्मवस्तु पर
पिण्ड-ब्रह्माण्ड का आरोप किया जाता है। देह का मूल यदि देखा जाय तो वह मृगजल की तरह लगता है,
सर्वत्र भ्रम का ही जाल फैला हुआ है। परब्रह्म के प्रति यह केवल आरोप है। देह न होते हुए भी उसका आभास
होता है, इसे आरोप कहते हैं। अब 'अपवाद' किसे कहते हैं यह भी बताता हूँ। मन को एकाग्र करके श्रवण
करो। देह के पंचभूतात्मक होने की बात प्रसिद्ध है। उसे 'मैं' कहना बुद्धिसंगत नहीं है क्योंकि देह मलिन है
और मैं शुद्ध हूँ। देह और मैं परस्पर अत्यन्त विपरीत हैं। मैं पृथ्वी नहीं हूँ क्योंकि वह जड़ होती है। मैं जल नहीं
हूँ क्योंकि वह द्रव रूप होता है। मैं तेज नहीं, क्योंकि उसमें दाहकता होती है। उसी प्रकार मैं वायु भी नहीं हूँ
क्योंकि उसमें चंचलता होती है। मैं आकाश नहीं क्योंकि वह शून्य होता है। 'अहं' भी मैं नहीं हूँ क्योंकि वह
दृश्य है। मैं जीव नहीं हूँ क्योंकि वह एकदेशी है। उसी प्रकार मैं माया भी नहीं हूँ, क्योंकि वह मिथ्या है। नश्वर
होने के कारण मैं देह नहीं हूँ बाधकत्व के लिये मैं विष नहीं हूँ। सारांश, इन तत्त्वों का और मेरा यहाँ सम्बन्ध
नहीं है। 'मैं ब्रह्म हूँ' यह अभिमान हंस और परमहंसों को भी रहता है। लेकिन वह भी सत्त्वावस्था का साधन
है। वह अभिमान भी मैं नहीं। जिन तत्त्वों का ऊपर वर्णन किया है उन सबका मुझमें 'अपवाद' अर्थात् अभाव
है। हे यदु ! इस प्रकार मेरी बुद्धि को जो बोध हुआ है वह मैंने तुम्हें बतलाया तुम्हारी अनन्य भक्ति और भाव
देखकर मैंने यह सारा गूढ़ ज्ञान तुम्हें बतलाया अन्यथा यह सब बतलाने की मुझे कोई आवश्यकता नहीं थी।
किन्तु हे भाग्यवान राजा ! तुम्हारी यह आस्था ही मुझे तुम्हारे पास बुलाती है। इस प्रकार संवादसुख की
एकतानता में ही उन्होंने अद्वैत बोध से सानंद ताली बजायी और आनन्द के अतिरेक के कारण दोनों ब्रह्मस्वरूप
में लीन हो गये। अवधूत ने कहा, इस देह जैसा उपकारी मित्र कोई नहीं है इसलिये उसे जतन करके रखना
चाहिये। लेकिन वह तो मूलरूप में पराया ही है। उसका अच्छी तरह जतन करने से उसका अन्त भयंकर होता
है। वह श्वान, शृगाल का भोजन बन जाता है अथवा अग्नि की आहुति बन जाता है। यदि इन दोनों अवस्था से
बच निकला तो वह कृमि कीटकों का शिकार हो जाता है। इन तीन के अतिरिक्त देह की कोई चौथी अवस्था
नहीं है। इसलिये हे राजा ! मैं देह के प्रति आसक्ति ही नहीं करता। आत्मस्वरूप के ज्ञान से मैं निःसंग होकर
पृथ्वी पर घूमता हूँ। देह के उपभोग के जितने साधन हैं वे सब बन्धन ही हैं इसे ध्यान में रखो। उसके योग से
वासना प्रबल होकर असीमित रूप से बढ़ जाती है।

२२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जायात्मजार्थपशुभृत्यगृहाप्तवर्गान् पुष्णाति यत्प्रियचिकीर्षया वितन्वन्।
स्वान्ते सकृच्छ्रमवरुद्धधनः स देहः सृष्ट्वास्य बीजमवसीदति वृक्षधर्मा ॥ २६॥
देहभाग का प्रमुख आकर्षण है स्त्रीभोग ! सब कुछ खर्च कर अपने साथी के रूप में पत्नी ले आते हैं।
लेकिन स्त्री से पाणिग्रहण करते ही प्रपंच का दुःख बढ़ने लगता है। उस स्त्री के उपभोग के लिये घर बनाना
आवश्यक हो जाता है। घर ठीक तरह से चले इसके लिये धन-धान्य आदि समृद्धि की आवश्यकता होती है।
फिर बाल बच्चे पैदा होने पर प्रपंच बढ़ते ही अपार चिन्ता उत्पन्न होती है। उन बाल बच्चों के प्रति वात्सल्य
उत्पन्न होता है। उनके लिये नौकर-चाकर, दास-दासी, जानवर आदि रखने पड़ते हैं। इसके लिये कठिन कष्ट
सहने पड़ते हैं। सुख का एक क्षण भी नहीं मिलता। समधी और दामाद का आकर्षण उत्पन्न होता है, सगे-
सम्बन्धियों के झुण्ड एकत्र होते हैं। उनका उचित स्वागत-सत्कार करने में अनेक संकट आते हैं और वह सब
सहते-सहते देह चूर-चूर हो जाता है। आश्रित परिवार का पोषण करने के लिये अनेक उपाय करता है, देश-
परदेश में भटकने लगता है और रात-दिन परिश्रम करके हैरान हो जाता है। शरीर को सुख देने के लिये कई
गुना दुःख बढ़ाता रहता है। मूर्ख लोगों का यह ढंग ही है कि वे देह के अहंकार के कारण व्यर्थ की
अभिलाषा बढ़ाते हैं। देहसुख की इच्छा से जमीन, जायदाद आदि की बेड़ी पैरों में पड़ती है। घर-बार, स्त्री-
पुत्रों का प्रेम उसे पागल कर देता है जिससे वह अपना स्वार्थ नहीं जान पाता। घरबार, बच्चे, सम्पत्ति आदि
का लोभ शरीर ने बढ़ाया रहता है। वही वासना देह के अन्त समय में दूसरे जन्म की प्राप्ति का बीजारोपण
करती है। ज्वार का दाना बाली पर चढ़ता है और फिर बाली से अलग होकर धरती पर गिर पड़ता है, पेड़
टूट जाता है किन्तु बीज धरती के भीतर शेष रहता है। उस बीज को जल और धरती मिलते ही तत्काल दूसरा
पेड़ बढ़ने लगता है। उसी प्रकार दूसरा जन्म लेने के लिये यह वासना शेष रहती है। उस पेड़ की ही तरह
बीज लिंगदेह में शेष रहता है और योनि के द्वार से पुनः जन्म दिलाता है और स्वर्ग या संसार का भ्रमण
कराता है। देह में वासना किस प्रकार बढ़ती है यह भी तुम्हें बताऊँगा। आसक्तिपूर्वक विषयों का सेवन करने
से वासना असीमित बढ़ जाती है।
जिह्वैकतोऽमुमपकर्षति कर्हि तर्षा शिश्नोऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवणं कुतश्चित् ।
घ्राणोऽन्यतश्चपलदृक् क्व च कर्मशक्तिर्बह्वयः सपत्न्य इव गेहपतिं लुनन्ति ॥ २७ ॥
जिह्वा रस की ओर आकर्षित होती है, तृष्णा प्राशन करने के लिये लालायित रहती है, शिश्न को रतिसुख
की चाह होने के कारण वह उसमें रममाण होने के लिये छटपटाता रहता है। त्वचा मृदुता चाहती है, उदर भरपेट
अन्न मिलने की इच्छा करता रहता है। कान गान, मंजुल, ध्वनि, आलाप आदि की आकांक्षा करते रहते हैं। नाक
सुगन्ध के लिये उद्यत रहते हैं। अच्छा रूप देखने के लिए आँखें लालायित रहती हैं। अनेक प्रकार की क्रीड़ाएँ
करने के लिये हाथ बेचैन रहते हैं। पैर भ्रमण करना चाहते हैं। जिस प्रकार घर में एक पति को अनेक पत्नियाँ
रहने पर सौतें आपस में खींचतान करती रहती हैं उसी प्रकार इन्द्रियों को विषय की आसक्ति होने के कारण वे
उसे अपनी ओर खींचती रहती हैं। इस प्रकार इन्द्रियों को विषय की आसक्ति होने के कारण वासना भी प्रबल
होती रहती है। वास्तव में ये वासनायें ही पुरुष को इस देह से उस देह में ले जाती रहती है। इसलिये विषय का
त्याग करने के लिये देहसंग बिलकुल छोड़ देना चाहिये। ऐसा करने के लिये मनुष्य देह ही उत्तम है क्योंकि
ज्ञानप्राप्ति इसी देह में है।

नवाँ अध्याय २२५
सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयाऽऽत्मशक्त्या वृक्षान् सरीसृपपशून् खगदंशमत्स्यान्।
तैस्तैरतुष्टहृदयः पुरुषं विधाय ब्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देवः॥ २८॥
अपने इसी स्वरूप को लोग जान सकें इसलिये श्रीअनंत ने सृष्टि के प्रारम्भ में अपनी माया के हाथों अनेक
प्रकार के शरीरों का निर्माण किया। जमीन पर चलने वाले कुछ लोग तैयार किये, कुछ आकाश में विचरण करने
वाले तैयार किये, कुछ पानी में तैरनेवाले तैयार किये तो कुछ स्थावर तथा कुछ जंगम शरीर तैयार किये। वृक्ष,
सर्प, पशु, दंश करने वाले प्राणी, राक्षस, पिशाच, बगुले, हंस, मछली, कछुए आदि समस्त योनियाँ उसी ने
बनायीं। ऐसी चौरासी लाख योनियाँ तैयार कर लेने के बाद जब उसने उनकी ओर आँख उठाकर देखा तो उसमें
उसे आत्मप्राप्ति कर लेने वाला कोई अधिकारी नहीं दिखायी दिया। ऐसी सृष्टि देखकर भगवान को समाधान
नहीं हुआ इसलिये उसने बड़ी आस्था से मानव देह की रचना की और उस मनुष्य में उसने अपना बहुत सा ज्ञान
भर दिया। इसी ज्ञान से वे इस देह में रहकर विदेहास्थिति तक पहुँचते हैं। आहार, निद्रा, भय और मैथुन ये सारी
योनियों के लिये एक जैसे हैं। किन्तु मनुष्य देह में का ज्ञान उन सबमें विशेष है। ऐसे उस मनुष्य देह को देखकर
भगवान को सन्तोष हुआ क्योंकि इसी देह को ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने का अधिकार है और इसी देह से मेरी प्राप्ति
होने लायक है ऐसा उसे लगा। मनुष्य योनि में जन्म लेकर भी जो ब्रह्मज्ञान नहीं प्राप्त करेगा वह दाढ़ीरहित भेड़
की तरह है। मनुष्य देह के ज्ञान से सच्चिदानंद पद की प्राप्ति की जा सकती है, इतना अधिकार नारायण ने
कृपापूर्वक हमें दिया है। मनुष्य देह में ही यदि ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना है तो वह मैं अगले जन्म में प्राप्त करूँगा,
ऐसा जो कहता है वह डूब गया ऐसा समझना चाहिये। उसका असली अज्ञान यही है।
लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः।
तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु यावन्निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात्॥ २९॥
चौरासी लाख योनि के जब कोटि-कोटि फेरे होते हैं तब सौभाग्यवश अकस्मात इस नरदेह की प्राप्ति होती
है। जो मनुष्यदेह में जन्म लेता है वह परमार्थ को आलिंगन देता है। ऐसा अलभ्य लाभ हुआ देख उसके पितर
भी बहुत बड़ा उत्सव मनाने लगते हैं। यदि यह कहें कि मनुष्यदेह प्राप्त करने के बाद पहले सारे भोग भोग लें
और फिर आराम से परमार्थ के बारे में विचार करें तो यहाँ इस बात का विश्वास नहीं है क्योंकि मृत्यु निश्चित
और अनिवार्य है। मृत्यु न किसी के गुणों का विचार करती है न दोषों का, देश और परदेश की चिन्ता नहीं
करती, दिन या रात का विचार नहीं करती, सीधी विनाश ही करती है। मेंढक को पकड़ने के बाद जिस प्रकार
साँप उसे निगलने लगता है उसी प्रकार जब से देह उत्पन्न होता है तब से मृत्यु उसका पीछा करती ही रहती है।
साँप मेंढक को निगलता रहता है और मेंढक मक्खियाँ पकड़ता रहता है। उसी प्रकार मृत्यु के मुख में पड़े हुए
लोग विषय के भुलावे में पड़े ही रहते हैं। इसमें जो आलस करता है वह पूरी तरह डूब ही जाता है। उसके हाथ
आया परमार्थ छूट कर वह संसार चक्र के भँवर में गोता खाता रहता है। हे यदुराजा इन सारी बातों का विचार
कर इसी देह से शीघ्रता से परमार्थ का लक्ष्य साधने के लिये तत्पर रहना चाहिये। आलस झटकार कर, नींद को
दूर हटा कर रात दिन आत्मचिंतन करते रहना चाहिये। वीर क्षत्रिय जिस प्रकार शत्रु पर विजय प्राप्त करने से
पहले विश्राम नहीं करते, उसी प्रकार, उसी तेजी से परमार्थ के पीछे लगना चाहिये। अधिक उम्र बीत जाने पर
वर का मन जितना सावधान रहता है उसी प्रकार हमें सायुज्य लग्न होने तक सावधान रहना चाहिये। राजा का
एकमेव लड़का खो जाने पर जिस प्रकार राजा उसे अपने सारे राज्य में खोजता है, उसी प्रकार हमें अपना

[२२६] श्रीमद् एकनाथी भागवत

निजसुख साधने का प्रयत्न करना चाहिये। काल का प्रहार होने से पहले ही परमार्थ साधने में सारा जीवन खर्च
कर देना चाहिये। समय व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिये। किन्तु नरदेह के अनमोल जीवन में, गृहस्थी की आशा में,
विषय की लालसा में लोग भोग में लिप्त हो गये हैं। पशु आदि योनियों में विषय के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं
है। यदि उसी विषय को नरदेह में भी पुष्ट करें तो इससे क्या लाभ होगा? यदि विवेकपूर्वक विचार करें तो
विषय तो भाग्य से ही मिलते रहते हैं। उसके लिये व्यर्थ परिश्रम करने से मूल नरदेह का ही नाश होता है। नरदेह
अत्यन्त पवित्र है। वह प्राप्त होने पर भी जो ब्रह्मज्ञान साध्य नहीं करता उसे पुच्छ विहीन पशु ही समझना
चाहिये। अपरोक्ष ज्ञान के अतिरिक्त केवल पेट के लिये ढोंगी ज्ञान के लिये प्रयास करना वैसा ही है जैसे मर्कट
दारू पीकर उछलता रहता है। ब्रह्मज्ञान प्राप्त किये बिना जो शास्त्र ज्ञानी हो गये उन्हें अँधेरे में चमकने वाले
जुगनू की तरह समझना चाहिये। अज्ञानरूपी अँधेरे में वे खूब चमकते हैं लेकिन सूर्योदय हो जाने के बाद उन्हें
कौन पूछता है? ब्रह्मज्ञान के बिना संन्यासी नाटक के संन्यासी की तरह है जो मिष्ठान्न की भिक्षा के लिये
लालायित रहते हैं। मन में विषय की अभिलाषा रखकर जो वेदाध्ययन करते हैं उन्हें बरसाती मेढ़क के समान
समझना चाहिये। मेंढ़क कीचड़ खा कर 'टर्राँव टर्राँव' करते रहते हैं वैसी ही उनकी अवस्था रहती है। विषय
प्राप्ति के लिये रखा हुआ मौन बगुले के ध्यान की तरह है और विषयबुद्धि से किया हुआ गायन उसी प्रकार है,
जैसे गधी को देखकर गधा चिल्लाता है। विषय के लिये प्रवचन आदि करना उसी प्रकार है जैसे भात की हाँडी
देखकर कौए कोलाहल करते हैं। जिस प्रकार भाँड पेट के लिये जो मन में आये वह बकते रहते हैं, उसी प्रकार
विषय प्राप्ति के लिये शास्त्रों का उल्टा-सीधा अर्थ बताकर वितंडावाद बढ़ाते हैं। मन में विषय की दृढ़ भावना
रखकर ऊपर से सदाचार का स्वांग भरते हैं। यह कुछ वैसा है जैसे कौआ बाहर से शुद्धता का ढोंग करता है और
भीतर विष्ठा चिन्तन करता है। वेश्या जिस प्रकार अपना देह विक्रय कर अपनी गृहस्थी चलाती है उसी प्रकार वे
अपनी उपजीविका के लिये अग्निहोत्र, यज्ञयाग आदि करते हैं। लेकिन चौथा पुरुषार्थ सिद्ध करना यही तो नरदेह
का सच्चा स्वार्थ है। उसे न साधकर कुछ दूसरा ही अर्थ साधना महा अनर्थ है यह समझना चाहिये। नरदेह प्राप्त
कर जो ब्रह्मज्ञान नहीं साध पाते उसे श्वान अथवा शृगाल अथवा उससे भी नीच स्तर का समझना चाहिये। उस
सम्बन्ध में विचार सुनो। पशु को लात मारिये तो भी वह उसका द्वेष नहीं करता। लेकिन मनुष्य को यदि 'तू'
कहो तो वह प्राण लेने के लिये उद्यत हो जाता है। पशु में संग्रह करने की लालसा नहीं होती। जितनां खाना है
खाता है और बाकी छोड़कर चला जाता है। लेकिन मनुष्य इतना लोभी है कि करोड़ों रुपया जेब में होने पर भी
पेटभर खा नहीं पाता। फिर कहीं किसी को देने की बात आ जाए तो प्राण ही चला जाएगा। पशुओं को सुबह या
सायंकाल के भोजन की चिन्ता नहीं रहती लेकिन मनुष्य की चिन्ता पूरे जन्म में भी नहीं छूटती। अपरिमित द्रव्य
साथ में हो तो भी अनिवार चिन्ता होती ही है। नरदेही प्राणी को सारे संसार में अविश्वास ही दिखायी देता है।
शरीर भले ही मरणासन्न हो गया हो लेकिन जमीन जायदाद लेता ही रहता है और नाती, पोतों के लिये मकान
बनवाता रहता है। ऐसी दुर्धर चिन्ता पशुओं को नहीं होती। अब तुम्हें मैथुन की वास्तविक स्थिति बताता हूँ। पशु
ऋतुकाल में ही मैथुन करते हैं और फिर स्त्री का स्पर्श नहीं करते लेकिन पुरुष प्रतिदिन स्त्रीसंग करते हैं,
गर्भावस्था में भी नहीं छोड़ते। काम, क्रोध, लोभ, निन्दा और अहंकार ये सब मनुष्य के ही भाग्य में हैं। इसलिये
आत्मज्ञान साध्य न कर केवल विषयी हो जाते हैं। वे श्वान और शृगाल से भी नीच है। उनमें मनुष्यता नाम की
वस्तु ही नहीं है। विषय में जो सुख है वह स्वर्ग और नरक दोनों में समान है। इस मृत्युलोक में जो विषयसुख
श्वान भोगता है वही सुख स्वर्ग में इन्द्र भोगता है। मनुष्य देह के अलावा जो पशु-पक्षी आदि अन्य योनियाँ हैं वे

नवाँ अध्याय २२७
विषयभोग के ही लिये हैं किन्तु नरदेह केवल विषयत्याग के लिये है। वह नरदेह कैसे प्राप्त होता है ? तो उसका
मिलना अत्यन्त कठिन है। उसका भी प्रकार तुम्हें बताता हूँ, ध्यान से सुन लो। पुण्य अधिक हो जाता है तो जीव
स्वर्ग में जाता है और पाप बढ़ जाता है तो वह नरक में जाता है। पाप और पुण्य जब पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं
तो मुक्ति प्राप्त होती है। जब पाप-पुण्य एक समान होते हैं तब मनुष्य देह प्राप्त होता है तथा कर्मभूमि में
आश्रमधर्म में बुद्धिमंत होकर जन्म लेता है। निश्चित रूप से मनुष्य देह प्राप्त करने के लिये कुछ किया नहीं जा
सकता। जिसका भाग्य उत्तम रहता है, उसे ही वह अकस्मात प्राप्त होता है। अमूल्य रत्न द्रव्य देकर क्रय किये
जा सकते हैं किन्तु चिन्तामणि हाथ नहीं आता उसी प्रकार अनेक योनियों में जन्म प्राप्त होता है लेकिन मनुष्य
देह मिलना अत्यन्त दुर्लभ है। ऐसा नरदेह प्राप्त होते हुए जो ब्रह्मसुख की साधना नहीं करता वह जन में महामूर्ख
तथा देवताओं में विश्वासघाती समझा जाता है। निजात्मप्राप्ति के लिये ही भगवान ने मनुष्ययोनि की योजना की
है। जो उसके विश्वास का घात करता है उसका पतन अवश्यंभावी है। पितरों की इच्छा यही रहती है कि हमारा
बेटा हरिभक्त हो तथा सारे कुल का उद्धार करे। लेकिन विषयासक्ति से वह सब पर पानी फेर देता है। (अवधूत
कहते हैं) मनुष्यदेह केवल सकल भाग्य का फल है, यह वचन सफल करने के लिये ही मैंने यह अटल वैराग्य
धारण किया है।
एवं संजातवैराग्यो विज्ञानालोक आत्मनि।
विचरामि महीमेतां मुक्तसङ्गोऽनहंकृतिः ॥ ३०॥
आत्मसाधना करने के लिये देह साधक है, किन्तु वही देह विषयभोग के कारण बाधक हो जाता है। यह
जानकर मैंने निश्चय करके वैराग्य धारण किया। उस वैराग्य के बल से तथा गुरुकृपा वचन की सहायता से
विषयों का इन्द्रियों से सम्बन्ध तोड़ दिया। जीव जैसे ही अविद्या को अंगीकार करता है वैसे ही वह अविद्या
कहती है, 'मैं तो विद्यमान' ही नहीं हूँ। यह मैंने अनुभव से जान लिया। इस प्रकार मिथ्यत्व से अविद्या नष्ट होने
के कारण चित्प्रकाश का पूर्ण लाभ प्राप्त हुआ और इससे देह में व्याप्त अहंता भी पूर्ण रूप से निकल गयी। ज्ञान
का साधन है अपनी देह, यदि उसके प्रति ही वैराग्य हो जाय तो देह के प्रति स्नेह कैसे उत्पन्न होगा ? इसी
अनुभव के कारण मैं निःसंग होकर पृथ्वी पर संचार करता रहता हूँ। स्वदेह में बिल्कुल ही अहंकार क्यों नहीं है
इसका उत्तर तुम्हें बताया। जब पुरुष की अहंता नष्ट हो जाती है तो देह भाग्य के अनुसार चलता है। उसी प्रकार
जैसे सूखा पत्ता वायु के धक्के से इधर-उधर लोटता रहता है। इसीलिये, हे वीर ! जब तक ब्रह्मसाक्षात्कार में वृत्ति
विलीन नहीं हो जाती तब तक जो सच्चे वैराग्य के साथ रहता है वही अव्यंग्य और परिपूर्ण पुरुषार्थी होता है।
अब शायद तुम कहोगे कि तुम्हें एक ही गुरु पर कभी विश्वास नहीं था तो उसके सम्बन्ध में सावधानीपूर्वक
सुनो। नमक और जल मिलकर जिस प्रकार समरस हो जाते हैं, उसी प्रकार गुरुवाक्य कान में पड़ते ही वृत्ति पूर्ण
रूप से लय हो जाती है। उसे साधक-बाधक से पीड़ा होती है यह कहना ही विसंगत है। जिस प्रकार मृत व्यक्ति
को औषधि या गर्भ को दूध नहीं पिलाया जा सकता उसी प्रकार उसके लिये कोई कर्त्तव्य शेष नहीं रहता है।
लेकिन ऐसी अवस्था सभी को प्राप्त नहीं होती। गुरु कान में गुरुमंत्र देता है और मन में आत्मस्वरूप का बोध
होता है लेकिन वह अधिक समय तक नहीं टिकता। बाह्य पदार्थ की ओर दृष्टि जाते ही विक्षेप उत्पन्न हो जाता
है। आसन पर बैठते ही स्वरूपस्थिति और आसन छोड़ते ही संसारस्फूर्ति। ऐसी एक देश स्थिति सच्चे योगी को
स्पर्श नहीं करती। देह आसन पर स्थिर हो या वह कर्म का आचरण कर रहा हो लेकिन जिसकी वृत्ति सर्वकाल

२२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
निश्चल होती है वही निर्मल आत्मयोगी है। समरांगण में परशुराम का सामना कर भीष्म ने उस पर निर्णायक
बाण छोड़े, उसे शर्त में जीता, फिर भी भीष्म की समवृत्ति में अन्तर नहीं पड़ा। वह अपने समाधान में स्थिर थी।
निर्णायक युद्ध में श्री समाधि न टूटे, यह साधने के लिये मैंने चौबीस गुरुओं का वन्दन किया। देह स्थिर हो तो
वृत्ति स्थिर रहती है ओर देह के चंचल होते ही वृत्ति चंचल हो जाती है, तो इसे सबल देहबुद्धि ही कहना
चाहिये। वह शुद्ध आत्मबोध नहीं है। प्रपंच देखते ही वृत्ति में विक्षेप आ जाता है। ऐसा विक्षेप दूर करने के लिये
ही मैंने बहुगुरु का साधन किया। निजगुरु ने बताये हुए परमार्थ को साधने के लिये ही मंने प्रपंच के ही अनेक
पदार्थों को गुरुपद दिया। जिससे विक्षेप उत्पन्न होता उसी को मैंने गुरुपद दिया। इस युक्ति से साधन करने के
कारण, संसार अपने आप ही परब्रह्मस्वरूप हो गया। यदि पहले गुरु ने ही बोध नहीं किया होता तो क्या पृथ्बी
आदि ने बोध कराया होता ? निजस्वार्थ साधने के लिये मैं गुरुओं के साधन में पड़ गया।
न ह्ये कस्माद् गुरोर्ज्ञानं सुस्थिरं स्यात् सुपुष्कलम्।
ब्रह्मैतदद्वितीयं वै गीयते बहुधर्षिभिः॥ ३१॥
गुरु के आत्मज्ञान देने पर हृदय में चिद्भान प्रकट होता है, लेकिन वह विद्युल्लता की तरह चंचल होता है,
उसमें स्थिरता नहीं होती। जो मूलरूप से चंचल है वह कभी दृढ़ नहीं हो सकता। वह क्षण भर के लिये भासित
होता है और क्षणभर में लुप्त हो जाता है। इससे साधक उद्विग्न रहता है। साँप के मुँह से भक्ष्य छूट जाने पर वह
जिस प्रकार छटपटाता है उसी प्रकार साधक में वेदनायें होती रहती हैं। आत्मभान का वियोग उसे जरा भी सहन
नहीं होता। वैसे ब्रह्म अद्वितीय है और नित्य है यह सभी ऋषियों को मान्य है लेकिन उनसे पूछने पर उसमें भी
अनेक विक्षेप उत्पन्न होते हैं। कोई कहता है कि ब्रह्म सगुण है तो कोई कहता है कि वह निर्गुण है। इस प्रकार
विद्वत्ता के अहंकार के कारण एक दूसरे का खण्डन कर जोर का वाद-विवाद प्रारम्भ करते हैं। कोई कहता है
ब्रह्म सप्रपंच है, कोई कहता है वह निष्प्रपंच है। इस प्रकार पाँच-पाँच जन मिलकर व्यर्थ की किचकिच बढ़ाते
हैं। प्रपंचदर्शन से विक्षेपता उत्पन्न होती है उस समय आत्मैक्य साधने के लिये सुबुद्ध साधक को नाना पदार्थों के
गुण गुरुरूप से ग्रहण करने चाहिये। विद्वान लोगों से प्रश्न पूछने से साधक के मन को समाधान नहीं होगा
इसलिये उनसे पूछने का मन नहीं करता। इसलिये जहाँ बाधा उत्पन्न होती है वहीं ऐक्य होता है इसलिये अनेक
पदार्थों को गुरुत्व देना यही उत्तम साधन मैंने नियोजित किया। गुरु के जो लक्षण मैंने बतलाये हैं वे आत्मबुद्धि के
भी साधन हैं। उसी की तेज धार से सारी बाधायें काट डाली। उसी चंचलता से आत्मज्ञान का निश्चल मूल प्राप्त
हुआ। दृष्य-पदार्थ देखने पर भी चित्स्वरूप का आभास होने लगा। पहले मेरे गुरुओं ने मुझे जो ज्ञान दिया था
वही अब अनेक गुरू कर बाधा का विनाश करने से अधिक दृढ़ हुआ। मोक्षदायी गुरु एक ही होता है लेकिन
अन्य गुरु उसका ही ज्ञान दृढ़तर करने में साधन बनते हैं। उसका यथा-तथ्य स्वरूप मैंने तुम्हें पहले बता ही दिया
है। अब कर्म करने पर भी प्रपंच का भान नहीं होता। निजबोध की पहचान हो जाने के कारण सदासर्वदा
समदृष्टि हो गयी है। अब दृश्य पदार्थ को आँखों से देखने पर भी वह दृश्य रूप में नहीं दिखायी देता। कर्म की
त्रिपुटी पूरी तरह नष्ट हो गयी। ज्ञान का प्रभाव इतना अपूर्व है। यथेच्छ भोजन करने पर भी निराहार का लक्षण
नहीं मिटता। उसी प्रकार संसार से सम्बन्ध रखने पर भी एकाकीपन नहीं टूटता। समुद्र में लहरें मचलती रहती हैं
लेकिन उसे पानी का ऐक्य नहीं टूटता। उसी प्रकार संसार में विचरण करते हुए भी मुझे दूजेपन का आभास नहीं
होता। सद्गुरु का चमत्कार अपूर्व है। सर्वत्र वही भरा हुआ है। गुरु के सिवाय रिक्त कोई वस्तु नहीं है। अब जो

मेरा 'मैं' पन है वह भी गुरु ही स्वयं हो गया है और 'तुम' कह कर बोलने वाला जो तुम्हारा 'तू' पन है वह भी
स्वयं सद्गुरु ही है। हे यदुराजा ! इस प्रकार देखने पर मेरा गुरु अकेला एक ही है। उसमें दूजेपन का प्रश्न ही
नहीं है। ऐसी यह सद्गुरु की कथा तुम्हें परमार्थ लाभ की दृष्टि से सुनायी यह कहकर अवधूत ने अत्यन्त
आनन्द से राजा को आलिंगन दिया। निजबोध के योग से वे दोनों एकरूप हो गये। अंतरंग से अंतरंग मिल गया।
सृष्टि में आनन्द प्रवाहित होने लगा। इससे वाणी स्तब्ध रह गयी। प्रश्नोत्तर करना वह भूल गयी। वह हर्ष हृदय
मन्दिर में न रह सकने के कारण स्वेद के रूप में शरीर से बाहर निकल पड़ा और आनन्दरूपी मेघ आँखों में
समाकर प्रेमाश्रु की वर्षा करने लगे। अहंकार की बेड़ियाँ टूटीं, संसार सागर के किनारे पर पहुँचे और अभेद्य
अविद्या को जीतने के कारण शरीर रोमांचित हो गया। देहभान समूल नष्ट होने के कारण शरीर थरथर काँपने
लगा, संकल्प विकल्प का लय हो गया और मन के साथ मनोरथ डूब गया। यदु ने सारा जीवभाव गुरुनाथ को
समर्पित कर दिया। वह चिह्न उसके शरीर पर बाहर भी दिखायी देने लगा। वह अवधूत साक्षात दत्तात्रेय थे,
उन्होंने यदुराजा को आलिंगन किया और उसे आत्मस्वरूप ज्ञान का अनुभव कराया। दत्तात्रेय की शिष्य परम्परा
में पहला था सहस्रार्जुन और दूसरा था यदु और तीसरा शिष्य 'जनार्दन' उन्होंने कलियुग में बनाया। गुरुप्राप्ति के
लिये जनार्दन अत्यन्त चिंतित था। उस सद्गुरु की चिन्ता में उसे तीनों अवस्थाओं का विस्मरण हो गया। किन्तु
देवता भाव का भूखा होने के कारण उसने भक्त की वह छटपटाहट जान ली और श्रीदत्त उसके पास आये और
उन्होंने उसके मस्तक पर हाथ रखा। हाथ रखते ही जनार्दन को तत्काल आत्मबोध का अनुभव हुआ और उससे
प्रपंच का मूल ही व्यर्थ हो गया। कर्म करने पर भी अकर्त्ता बने रहने का बोध श्रीदत्तात्रेय ने उन्हें कराया। देह में
रहकर भी विदेह रहने का बोध भी उसने अनुभव किया। गृहस्थाश्रम छोड़े बिना, कर्ममर्यादा का उल्लंघन किये
बिना आचरण करने से भी आत्मबोध कभी मलिन नहीं होता। ऐसा बोध मन द्वारा ग्रहण किये जाने के कारण मन
का स्वभाव ही नष्ट हो गया। जनार्दन उस अवस्था को न सँभाल सका और मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। उसे
तत्काल होश में लाकर दत्तात्रेय जी बोले, यह सत्त्वगुण की अवस्था है, इसलिये उसे भूल कर निजबोध में ही
विचरते रहो। जनार्दन पूजाविधि कर चरणों पर मस्तक रखने जा रहे हैं तभी योगमाया के योग से दत्तात्रेय अदृश्य
हो गये। (एकनाथ श्रोताओं से कहते हैं) आख्यान के बीच में यह उपाख्यान आ गया, इसके लिये श्रोतागण रुष्ट
न हों। प्रसंग के अनुसार गुरु की बात निकली इसलिये मैंने गुरु की ही कथा सुनायी। मुझसे बड़ी गलती हो
गयी। लेकिन इसे व्यर्थ की बकवास न समझें। जो गुरु का भक्त होगा वही उसका भाव समझेगा और निरन्तर गुरु
का स्मरण करता होगा वही उसका मर्म जान पायेगा। जिसकी गुरुचरणों पर दृढ़ निष्ठा होगी, जिन्हें गुरुभजनों की
चाह होगी, जिन्होंने गुरुप्रेम प्राप्त किया होगा, वही उसका माधुर्य जान पायेगा। सद्गुरु का नाम लेते ही चारों
मुक्ति मस्तक झुकाती हैं। किन्तु गुरुभक्तों को मुक्ति बिलकुल अच्छी नहीं लगती। क्योंकि गुरुचरणों में निजमुक्तता
सहज ही विद्यमान रहती है। जिनके चरणों का तीर्थ लेने से चारों ही मुक्ति पवित्र हो उठती हैं और सारे पुरुषार्थ
चरणों पर आ गिरते हैं, वे गुरुभक्त तीनों लोकों में धन्य हैं। नित्य, निराधार, निधर्म एवं निर्विकार ऐसे चैतन्य का
वास्तव में सद्गुरु ने ही जीर्णोद्धार किया इसलिये सद्गुरु ही सत्स्वरूप हैं। यदि सद्गुरु की कृपा न होती तो कोई
देवताओं का भी कुशल-क्षेम न पूछता। देवता को देवत्त्व प्रदान करने वाला सचमुच सद्गुरु ही है। वास्तव में,
सद्गुरु की कृपा के बिना भगवान होते हुए भी नहीं के बराबर हो गया था। उसे देवता के उचित स्थान पर बिठा
कर उसका भजन करने के लिये प्रेरित करने वाला एक गुरुराज ही है। उस सद्गुरु की कथा सुनाकर मैंने गलती
की। मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया। श्रोतागण इसके लिये क्षमा करें। लेकिन मैंने यह व्यर्थ ही नहीं कहा।

२३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
दत्तात्रेय के शिष्यों का नाम बताते समय मुझे जनार्दन का भी स्मरण हुआ। मैं भले ही यह कहूँ कि मैं जनार्दन का
स्मरण नहीं करता लेकिन वह मुझे स्वयं का विस्मरण नहीं होने देता। वह हठपूर्वक निरन्तर, रात-दिन मुझे
अपनी याद दिलाता रहता है। मैं जहाँ भूलने का प्रयास करता हूँ, वहीं वह आकर खड़ा हो जाता है। मैं भले ही
उसकी ओर न देखूँ लेकिन मेरा वह न देखना भी वह स्वयं ही हो जाता है। घट आकाश को छोड़ना चाहता है
लेकिन आकाश घट को नहीं छोड़ता। उसी प्रकार जनार्दन हमारे पीछे लगा हुआ है। मैं उसकी बात नहीं करता
लेकिन वही मेरे मुख में वक्ता बनकर रहता है जो मुझे बोलने को बाध्य करता है। तो अब मैं करूँ तो क्या करूँ?
किसी दृश्य पदार्थ को देखने लगता हूँ तो मुझे उसके अन्दर-बाहर जनार्दन ही दिखाई देने लगता है। कान से
कुछ सुनने लगता हूँ तो उन शब्दों में जनार्दन ही घुस जाता है। अब न मैं कुछ देखूँगा, न सुनूँगा ऐसा विचार कर
शान्त बैठता हूँ तो उस शान्ति के रूप में भी जनार्दन दिखायी देने लगता है। बस, ऐसी परिस्थिति में फँस गया हूँ।
जनार्दन किसी बात का विस्मरण नहीं होने देता। हर दृष्टि से मैं अपराधी हूँ। अब श्रोतागण ही कोई उपाय
सुझाएँ। इस पर श्रोतागण बोले, "महान आश्चर्य है। इन बातों में अहंभाव तो जरा भी नहीं दिखायी देता। इसके
बोलने का भाव देखकर तो प्रेम का उफान आता है। तुम्हारे शब्दों पर विचार करें तो वे क्षीरसागर से भी गहरे
मालूम होते हैं। तुम्हारे प्रेम का आकर्षण कुछ विचित्र है।" हम स्वानन्द में डोलना चाहते हैं। तुमने गुरु सम्बन्धी
जो निरूपण किया वह प्रेमयुक्त ब्रह्मज्ञान का ही स्वरूप है। इसलिये हमें बहुत समाधान हुआ है। तुम्हारे निरूपण
में दोष देने की जगह ही नहीं है। गुरु का स्मरण नित्य करना चाहिये यह तत्त्व गुरु ने स्वयं ही बतलाया। अमृत
के सेवन से कौन तृप्त होगा ? तिस पर जनार्दन के प्रति तुम्हें असीम प्रेम है, यह बात भी हमें ज्ञात हो गयी है।
निरूपण तो अपूर्व था ही उसे रसालता भी प्राप्त हो गयी। तुम मूलकथा का आख्यान सुनाओ या उपाख्यान,
लेकिन तुम्हारा निरूपण का माधुर्य अन्य किसी बात में कैसे आयेगा ? शुद्ध निरूपण से गुरु का वर्णन करते हो
और तिस पर स्वयं को अपराधी कहते हो। इससे मालूम होता है कि तुम्हारी बुद्धि किस तरह एकरूप हो गयी
है। अपने विनय से श्रोताओं का सम्मान अधिक बढ़ाते हो। तुम्हारी जो अपराधबुद्धि है वह भगवद्चरणों में ही
विलीन हो गयी है। तो अपराध की शुद्धि तो हो ही गयी। सच्चे ज्ञानी तुम्हीं हो। जब गुरु की स्तुति करते हो तो
मूलकथा को भूल जाते हो। प्रेम का लक्षण ऐसा ही होता है। हमें अच्छी तरह मालूम हो चुका है। कुछ अन्य
श्रोताओं ने कहा, "हमारे मन को थोड़ा आश्चर्य हो रहा है। इसलिये ग्रन्थ के अगले भाग का प्रारम्भ कर मूल
कथा सुनाओ।" संतों के इस भाषण का सम्मान कर तथा उनके चरणों को प्रणाम कर आगे की कथा सुनाता हूँ,
श्रोतागण ध्यान से सुनें। इस प्रकार उस अवधूत ने यदु को परमार्थ बताया। उस भाषण से उसका बहुत समाधान
हुआ। इसके बाद वह शान्त होकर बैठा रहा।
श्रीभगवानुवाच
इत्युक्त्वा स यदुं विप्रस्तमामन्त्र्य गभीरधीः ।
वन्दितोऽभ्यर्थितो राज्ञा ययौ प्रीतो यथागतम् ॥ ३२ ॥
श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा, "इस प्रकार राजा को ब्रह्मज्ञान देकर तथा उसका समाधान हुआ देख अवधूत
उससे विदा लेकर जाने के लिये तत्पर हुआ। तब राजा ने उसके चरण पकड़ लिये। अत्यन्त प्रेम से उसकी पूजा
कर, उसे प्रदक्षिणा कर उसने पुनः उसके चरणों पर अपना मस्तक रख दिया।'" 'जाइये' वह कह नहीं सकता था
और 'रहिये' कहने से स्वामित्व का आभास होता। वियोग तो असहनीय होने लगा। इससे वाचा बन्द हो गयी।

नवाँ अध्याय २३१
उसकी वह अवस्था देखकर श्री दत्तात्रेय के मन में करुणा उत्पन्न हुई और उन्होंने उसके मस्तक पर हाथ रखकर
प्रसन्न मुद्रा से कहा कि आज से तुम्हारा और मेरा कभी वियोग नहीं होगा। राजा को इस प्रकार का आश्वासन
देकर श्रीदत्तात्रेय निकल पड़े। जितनी प्रसन्नता से वे आये थे उतनी ही प्रसन्नता से वे चले गये। राजा को अत्यन्त
समाधान हुआ और वह निजात्मबोध से निरन्तर सुखी हुआ।
अवधूतवचः श्रुत्वा पूर्वेषां नः स पूर्वजः।
सर्वसङ्गविनिर्मुक्तः समचित्तो बभूव ह॥३३॥
उद्धव को सामने देखकर श्रीकृष्ण ने कहा, "यदुराजा, यह हमारे पूर्वजों का भी पूर्वज और राजाओं का
मुकुटमणि था। तुम यदि उसका नाम नहीं जानते तो यह अपूर्व बात है। लेकिन उसके ही नाम से हम सारे वीर
अपने को 'यादव' कहते हैं।" नन्द के पुत्र श्रीकृष्ण ने आनन्दपूर्वक आगे कहा, वही यदु हमारा पूर्वज है। उसने
ही दत्तात्रेय के साथ ब्रह्मज्ञान का संवाद किया। श्रीदत्तात्रेय के भाषण के हृद्गत पर विश्वास करने के कारण ही
यदु में सर्वसंग परित्याग की पात्रता उत्पन्न हुई। जो संग छोड़कर दूर गया उसने 'संगत्याग' किया ऐसा कहना
चाहिये लेकिन जो संग में रहकर भी स्नेह छोड़ देता है उसी को 'संगमुक्त' समझना चाहिये। आकाश सर्वत्र
सभी वस्तुओं को आवृत्त करता है लेकिन वह किसी को भी स्पर्श नहीं करता। इसी का नाम है—'संगमुक्तता'।
लेकिन यदु के पास इससे भी विशेष प्रकार की संगमुक्तता आ गयी थी। उद्धव! वह कथा भी बताता हूँ, सुनो।
सचमुच, सबके संग में रहते हुए भी दत्तात्रेय के बोध से उसे संग की भनक भी नहीं लग रही थी। इसी का नाम
है विशेषमुक्तता। पहले मेरी द्वैत से संगति थी। वह जाकर अब मैं निःसंग हो गया। ये दोनों ही बातें मिथ्या हैं।
मैं सबसे 'विनिर्मुक्त' हो गया हूँ। रस्सी कभी साँप नहीं होती लेकिन उस पर साँप होने का आरोप किया जाता
है। लेकिन वह भी रस्सी से ही नष्ट होता है। यह आत्मभ्रम भ्रान्ति के कारण ही निर्मित होता है। रस्सी तो रस्सी
के ही रूप में रहती है लेकिन जिसे भ्रम है उसके मन में वह साँप के रूप में रहता है। इस प्रकार का द्वैत का
भ्रम टूटते ही राजा को धीरे-धीरे समाधि लग गयी। ऐक्यभाव से समबुद्धि होने का नाम ही 'निजसमाधि' है।
यही समाधि राजा को प्राप्त हो जाने के कारण वह ब्रह्मस्वरूप तक पहुँच गया। कृष्ण ने उद्धव से कहा, "यदि
तुम भी ऐसे के वंश में जन्म लेकर ब्रह्मज्ञान नहीं प्राप्त करोगे तो पूर्वजों की प्रतिष्ठा में कमी आ जाएगी।" इस
पर श्रीकृष्ण ने उद्धव से तिरस्कारपूर्वक बोल कर अद्वैत पर टूट पड़ने के लिये उसकी उत्कंठा पर एक और प्रहार
किया। एक तो विषैला काला सर्प, तिस पर यदि उसकी पूँछ पर पैर रख दिया जाय तो वह क्रोध से दंश करने
के लिये टूट पड़ता है, किसी के वश में नहीं आता। उसी प्रकार उद्धव पहले से ही अनुताप दग्ध था, तिस पर
श्रीकृष्ण ने उसका तिरस्कार किया तो वह परब्रह्म को निगलने के लिये मन में व्याकुल हो उठा। कृष्ण और
उद्धव के बीच जो संवाद हुआ वह अगले अध्याय में है। उसमें गुरु-शिष्य का लक्षण बताया जायगा। चतुर
श्रोताओं को उसका श्रवण करना चाहिये। एका जनार्दन कहता है, कृष्ण के मुख से निकला भाषण अत्यन्त गूढ़
है। यद्यपि मैं ठीक प्रकार से उसका वर्णन नहीं कर सकता फिर भी उसके स्वाभाविक माधुर्य से अंतःकरण तृप्त
होता है। यदि शर्करा का करैला बनाया जाय तो उसमें कडुवाहट नहीं रहती। उसी प्रकार यह ग्रन्थ भले ही
प्राकृत भाषा में लिखा गया हो लेकिन उसमें पूर्ण रूप से स्वानंद ही भरा हुआ है। यदि सोने का पिण्ड भी बनाया
जाय तो वह पत्थर के मोल नहीं बिकेगा। उसी प्रकार भागवत यदि प्राकृत में भी हो तो भी उसमें आत्मज्ञान
की कमी नहीं होगी। मोती के लिये लोग समुद्र में डुबकी लगाते हैं लेकिन यदि वही मोती घर के कुएँ में

२३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
मिलने पर कोई उसे फेंक देता है तो वह मूर्ख ही कहलायेगा। उसी प्रकार संस्कृत भाषा का अध्ययन कर बड़ी
कठिनाई से परमार्थ से भेंट होती है, यदि वही परमार्थ देशी भाषा में प्राप्त हो जाय तो उसकी उपेक्षा नहीं करनी
चाहिये। धनवान और जानकार रत्नपरीक्षक हो तो वह धूल में पड़ा हीरा देखने पर उसे अपनी गाँठ में बाँध कर
घर ले आता है। उसी प्रकार जो भी ज्ञाता या विद्वान हो उसे यह देशी भाषा में लिखा ग्रन्थ देखकर उसकी उपेक्षा
नहीं करनी चाहिये बल्कि उसका अच्छी प्रकार परीक्षण कर चित्स्वरूप रत्न प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये।
यदि क्षुद्र दृष्टि से देखें तो साक्षात व्यासजी के ग्रन्थ पर लोग नाक भौं सिकोड़ सकते हैं। फिर यह तो मराठी में
लिखा काव्य है। इसीलिये कुटिलता छोड़कर इसे पढ़ें। जिन्हें आत्मसुख की चाह है वे प्राकृत में लिखे ग्रन्थ में
मीन मेख नहीं निकालेंगे। वे ज्ञान रस को ही ग्रहण करेंगे क्योंकि उनमें परमार्थ के प्रति उत्कंठा रहती है। जो
सचमुच ही परमार्थी हैं वे ही इस ग्रन्थ के अधिकारी हैं। जिनकी भागवत पर भक्ति है उन्हें ही निजसत्व प्राप्त
होगा। जिनकी भागवत पर भक्ति नहीं है जो व्यर्थ ही विद्वत्ता की डींग हाँकते हैं, वे ही यदि निन्दा न करें तो आगे
जाकर उन्हें भी भक्ति प्राप्त होगी। जिनके मन में सदा निन्दा ही भरी रहती है उन्हें कभी भी सद्गति प्राप्त नहीं
होती। निन्दा सबसे श्रेष्ठ पातक है। निन्दक का नाम लेने पर भी जिह्वा को दोष लगता है। इसलिये प्रायश्चित के
रूप में रामराम कहना चाहिये। किन्तु निन्दा में भी स्वार्थ ही दिखायी देता है क्योंकि निन्दक भक्त का हित ही
करते हैं। वे अपना नुकसान कराकर दूसरों के सारे दोष धो डालते हैं। इसलिये श्रोताओं को गुण और दोष
छोड़कर शान्त बैठना चाहिए। जिस ज्ञान का प्रवक्ता स्वयं श्रीकृष्ण है, वह ज्ञान अत्यन्त रसाल होगा यह कहने
की आवश्यकता नहीं है। श्रीकृष्ण और उद्धव का यह ज्ञान अज्ञान को तत्काल दूर कर देता है इसलिये एका
जनार्दन विनती करता है कि ध्यान देकर उसका श्रवण करें।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकदश स्कंधे,
श्रीकृष्ण उद्धव संवादे एकाकार टीकायां नवमोध्यायः ॥ ९ ॥
श्री कृष्णार्पणमस्तु ।

दसवाँ अध्याय
अब सद्गुरू रूप धन्वंतरी को प्रणाम करता हूँ। उसकी दृष्टि से ही मनुष्य रोग से मुक्त होता है। इस संसार
में भवरोग की बाधा दूर करने में उसके जैसा समर्थ अन्य कोई नहीं है। जिस भवरोग के संताप से लोग
आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक इन त्रिविध तापों से झुलस रहे हैं, 'मैं' और 'मेरा' जैसे संकल्पों से
वे सदा बड़बड़ाते रहते हैं, द्वैतभावना के उद्भव के कारण उनके जीभ का स्वाद नष्ट हो जाता है और मुँह
कडुआ हो जाता है, इसीलिये वे मुँह से विष की तरह कडुई बातें करते रहते हैं। व्याधि के सत्रिपात में वे विवेक
को लात मारते हैं और वायु के झटके में हाथ से धैर्य को झटक कर वासनारूप जंगल में भटकने लगते हैं।
महत्वाकांक्षाओं में सागर में डूबते-उतराते हैं, संकल्पों के मृगजल में डूबने और स्वर्ग की चोटी पर तेजी से
चढ़ने लगते हैं और पैर फिसल कर नीचे गिर पड़ते हैं। माया की कँटीली झाड़ियों की खरोंच उन्हें लगती रहती
है, लोभरूपी बैर के काँटे उन्हें कचोटते रहते हैं और वे प्रपंच से लिपट कर बैठ जाते हैं। फिर यदि कोई उन्हें
पीटता भी है तो वे वहाँ से भागते नहीं हैं। भवरोग के भ्रम में वे कैसा पागलों जैसा आचरण करते हैं जो नहीं
खाना चाहिये उसे खाने लगते हैं, जो नहीं करना चाहिये वह करते दिखायी देते हैं और स्त्रियों के पीछे पागलों
की तरह दौड़ते रहते हैं। धन के भय से उन्हें कँपकँपी छूटती है और वे काँपने लगते हैं। मन को झटका लगता
है और उनका शरीर पसीने से तरबतर हो जाता है। ऐसी स्थिति में कहीं तो मुँह छिपाकर बैठ जाते हैं। जब शरीर
में भोग विलास का उन्माद चढ़ता है तो वे जमीन अथवा खाट पर नहीं रह पाते, विधि का आवरण वे फेंक देते
हैं और कहीं भी उनकी चित्तवृत्ति स्थिर नहीं रह पाती। ज्ञानशक्ति क्षीण हो जाती है, शिथिल होकर वे छटपटाते
रहते हैं और विषयरूपी जल माँगते रहते हैं। थोड़े से जल से उनकी प्यास पूरी नहीं होती और वे पेटभर पानी
की हाँक लगाये रहते हैं। इस प्रकार सदा कुपथ्य करते रहने के कारण उनमें जीर्ण ज्वर उत्पन्न होने लगता है।
कालान्तर में क्षय का प्रकोप होकर शरीर बिलकुल क्षीण हो जाता है। क्षण-प्रतिक्षण यह क्षीणता बढ़ती जाती है
और शरीर में हुए विकारों के कारण चिन्ता उत्पन्न हो जाती है और सुख नष्ट हो जाता है। रोग का जोर इतना
विचित्र रहता है कि परमार्थ कडुवा लगने लगता है और विषय मधुर लगता है। इस रोग को निर्मूल करने के
लिये सत्कथा सुनाइये तो मुँह की भावार्थरूप दाढ़ें बन्द होकर दाँत बजना बन्द हो जाता है। अर्थात् सत्कथा
अच्छी नहीं लगती। तुलसी का रस तथा शहद का मिश्रण नाक में डालने से उसे नाक खींच नहीं पाता, उल्टे
इससे उसके सर में दर्द होने लगता है। इस प्रकार वह पूरी तरह रोगग्रस्त होकर रहता है। ऐसा यह जबरदस्त रोग
देख कर सद्गुरुरूपी चतुर वैद्य आगे बढ़ता है और कृपादृष्टि से उसकी ओर देखकर उसका रोग तत्काल ठीक
कर देता है। वह वैद्य (सद्गुरु) अत्यन्त बुद्धिमान होने के कारण रोगी का प्राण जाने पर भी उसे मरने नहीं देता।
वह प्राण के बिना ही उसे जीवित रखता है ऐसी सिद्धि सद्गुरु के पास होती है। रोगी का भाग्य महान है
इसीलिये वह गुरु कृपा कूर्मावलोकन करता है और वही रोगी के लिये अमृत पान की तरह सिद्ध होकर वह
तत्काल प्रकृतिस्थ हो जाता है। इस प्रकार प्रकृतिस्थ हो जाने के बाद वह रोगी स्वयं ही नित्यानित्य का पालन
सावधानी से करने लगता है। किन्तु इतने से उसका जीर्ण ज्वर दूर नहीं होता तथा क्षय के लक्षण भी कम होते
नहीं दिखायी देते। इसलिये सद्गुरु उसे रसायन देना शुरू करता है। रोगी को 'अर्धमात्रारूपी अक्षरस' देते ही
उसका क्षयरोग दूर होकर वह पहले जैसा 'अक्षय' (अविनाशी) हो जाता है। रोगी कहीं भीषण कुपथ्य न कर दे

२३४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इसलिये उस पर वैराग्य की नजर रखता है और निरन्तर आत्मानुसंधान का पथ्य देकर उसके संसाररूपी रोग का
निवारण करता है। रोगी पूरी तरह ठीक हो जाने पर उसे तेज भूख लगती है इसलिये वह मानसिक चिन्ता की
लाई बना कर भकाभक एक ही क्षण में खा जाता है। चार वर्णरूपी काला सफेद चना चार आश्रमरूपी अग्नि में
भून कर उसे 'अहं-सोहं' रूपी गुड़ के साथ खा जाता है। फल की आशा के झोले भरे हुए थे उसे भी वह खा
गया। गुड़ और चीनी की चाशनी की तरह कर्माकर्म के लड्डू बिना मीठा या कड़ुआ कहे वह अपनी इच्छा से
खाने लगा। 'ब्रह्माहमस्मि' की चरम प्रवृत्ति के सुन्दर पकवान उसे दिखाई पड़े उसे तत्काल खाकर वह माया के
पीछे पड़ गया। तब माया उसके डर से भाग गयी और अपने मिथ्यत्व में ही विलीन हो गयी। तब स्वानंद पुष्ट
हुआ और संसाररोग बिलकुल नष्ट हो गया। ऐसे जिस सद्गुरु वैद्य ने मेरा उपचार कर मुझे स्वस्थ किया उसकी
शरण में जाना चाहता हूँ तो चारों ओर तुम ही दिखायी देते हो। तुम से स्वयं को अलग कर तुम्हारी शरण जाना
चाहूँ तो दोनों के बीच का 'तू' पन और 'मैं' पन नष्ट हो गया। तो तुम्हारा भजन अब किस प्रकार करूँ। जिनके
जीवन-बन्धन टूट कर जो साक्षात आत्माराम हो गये वे भी तुम्हारी निष्काम भक्ति करते हैं। पूर्णावस्था को प्राप्त
लोगों की तो यह स्थिति है। जो मोक्ष को गुरुभजन से श्रेष्ठ मानते हैं, वे भी मूर्ख हैं क्योंकि बहुत कम लोग
जानते हैं कि मोक्ष तो गुरु चरणों का सेवक है। हमें तो सद्गुरु दृष्टि से ही परम स्वास्थ्य लाभ होता है। हम
सद्गुरु स्तुति से ही संसार में पूजनीय होते हैं। गुरु सेवा के कारण ही हम भाग्यवान हैं और हमारा सामर्थ्य हमें
गुरु स्तुति से ही प्राप्त हुआ है। सद्गुरु का नाम ही हमारे लिये वेदशास्त्र है, सारे मंत्रों की अपेक्षा सद्गुरु का
नाम ही हमें अधिक श्रेष्ठ मालूम होता है। सद्गुरु का तीर्थ सारे तीर्थों को पवित्र करता है और गुरु के चरण
हमारा क्षेत्र है और उस पर हमारा स्वतंत्र रूप से अधिकार है। तुम कहोगे कि अब यह स्तुति बन्द करो लेकिन
तुम्हारी शपथ लेकर कहता हूँ कि तुम्हारे उदार गुणों का वर्णन करते मन को तृप्ति नहीं हो पाती। सचमुच तुम्हारा
गुणवर्णन करने के लिये ही मैं श्रीभागवत की टीका लिखने के लिये प्रवृत्त हुआ, तुमने ही मुझे भक्तिपंथ की ओर
अग्रसर किया और तुम्हारी कथा-कीर्तन के लिये प्रवृत्त किया। संसाररूपी हाथी को विदीर्ण करने वाले हे सिंह
जनार्दन! तुम्हारी जय हो। मैं एकाएक तुम्हारी शरण में आया और तुम्हारे श्रीचरणों तक पहुँचा। श्रीभागवतशास्त्र
मुझे गुरुकृपा से प्राप्त हुआ, उसका मतितार्थ श्रवण करें। श्रीकृष्ण उद्धव से परमार्थ का उपदेश करेंगे। यदु और
अवधूत के संवाद में चौबीस गुरुओं के लक्षण सुनकर उद्धव की भावना ब्रह्ममय हो गयी। ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है,
मुझमें भी वह अंतर्बाह्य व्याप्त है, किन्तु स्वयं मुझे भी वह समझ में नहीं आता। इसका क्या उपाय किया जाय ?
उद्धव के मन की यह चिन्ता श्रीकृष्ण की समझ में आ गयी। वही उपाय श्रीकृष्ण ने अविरोध बताना शुरू किया।
श्रीभगवानुवाच
मयोदितेष्ववहितऽ स्वधर्मेषु मदाश्रयः।
वर्णाश्रमकुलाचारमकामात्मा समाचरेत् ॥ १॥
पहले वेदरूप में वर्णाश्रम धर्म मैंने ही बतलाया। नारदपंचरात्रादि ग्रन्थों में वर्णित वैष्णव धर्म यह मेरी
उपासना का रहस्य भी बतलाया। जिसका जो भी वर्ण और आश्रम हो उसको उस वर्णाश्रम धर्म के अनुसार
आचरण करना चाहिये। दूसरे के धर्म का आचरण करने से बहुत दुःख भोगना पड़ता है। उद्धव, यह बात ध्यान
में रखो कि जो कर्त्ता है उसे अत्यन्त सावधानीपूर्वक व्यवहार करना चाहिये। इस सावधानी के लक्षण ज्ञानी लोग
जानते हैं। यहाँ कर्म चार प्रकार का है—नित्य, नैमित्तिक, काम्य तथा प्रायश्चित्त ये कर्म के चार विभाग हैं। ये

दसवाँ अध्याय २३५
जानते हैं। यहाँ कर्म चार प्रकार का है—नित्य, नैमित्तिक, काम्य तथा प्रायश्चित्त ये कर्म के चार विभाग हैं। ये
कर्म करते समय वृत्ति सावधान रखनी चाहिये। कर्म का आचरण कैसे करना चाहिये इसका मर्म मैं तुम्हें अभिनव
प्रकार से बताऊँगा। नित्य और नैमित्तिक कर्म अत्यन्त आवश्यक हैं। वह प्रत्येक व्यक्ति को करना ही चाहिये वह
कर्मफल की आशा किये बिना यथाविधि करना चाहिये। नित्यकर्म जैसे-जैसे बढ़ता जाता है वैसे-वैसे नैमित्तिक
कर्म भी बढ़ने लगता है। फिर विषयप्राप्ति की इच्छा से काम्य कर्म उफनता है तब वह निषिद्ध हो जाता है।
इसलिये फल की अभिलाषा न कर नित्य नैमित्तिक कर्म समर्पण जानकर कृष्णार्पण करना चाहिये। काम्य अर्थात्
सकाम कर्मों का विशेष त्याग करना चाहिये जिस प्रकार उलटी किये हुए पदार्थ को लोग भूलकर भी नहीं देखते।
जब कामना ही छूट जाय तभी काम्य कर्मों का त्याग करना चाहिये। मन में कामना करने पर काम्य कर्मों का
त्याग सम्भव नहीं होता। मन में विविध प्रकार की कामनाओं का ताण्डव चल रहा हो और बाहर से विरक्ति का
ढोंग करना यह तो विडम्बना है। हे चतुर! उसे त्याग नहीं कहा जा सकता। कामना जब बढ़ने लगती है तो
निषिद्ध कर्म घटने लगते हैं। इसलिये कामना को ही समूल नष्ट करने से निषिद्ध कर्मों के घटने की सम्भावना
नहीं होती। या आँखों के समक्ष निषिद्ध कर्म होते देख यदि हरिनाम की गर्जना की जाय तो निषिद्ध कर्म बारह
मार्गों से भाग जाते हैं। हरिनाम के योग से सहस्र प्रायश्चित्तों का श्रेय मिलता है। जहाँ हरिनाम का जयघोष
चलता रहता है वहाँ निषिद्ध तत्काल भस्म हो जाता है। निषिद्ध अभक्तों के शरीर पर प्रहार करता है, भक्तों के
पास वह कभी भी नहीं आता। काम्य-निषिद्ध की हवा भक्तों को नहीं लगती। भगवान जब भक्तों की रक्षा करता
है तो उन्हें दोषों का सम्पर्क कैसे होगा? सहस्र प्रायश्चित्त केवल एक नामोच्चार से सम्भव होते हैं यह गोपनीय
बात किसी से न कहना। काम्य तथा निषिद्ध कर्मों का त्याग करने के सम्बन्ध में मैंने तुम्हें विस्तार से बताया है।
अब नित्य और नैमित्तिकों के कर्म विभाग के बारे में भी सुनो। ईश्वर को अर्पण करने की दृष्टि से नित्यनैमित्तिक
कर्म अवश्य करने चाहिये। वही मन को निर्मल करता है तथा परमार्थ का प्रमुख साधन है। कुछ लोगों का
विचार है कि स्वधर्म बिलकुल निष्फल है लेकिन वे मूर्ख उसका मर्म नहीं जानते। स्वधर्म का आचरण करने से
जन्म सफल होता है और स्वधर्म के योग से परमार्थ का फल मिलता है। सुवर्ण की अशुद्धि को दूर करने के
लिये जब उसके पत्रे के दोनों ओर लेप लगा कर उसे आग दिखायी जाती है तो वह पुनः चमकने लगता है। उसी
प्रकार स्वधर्म मुझे अर्पण करने से उसका कर्म सफल होता है। यह गोपनीय मर्म कर्मठों को न मालूम होने से
उन्हें कर्म के सम्बन्ध में बहुत बड़ा भ्रम रहता है। कर्म मुझे अर्पण करने की बात कठिन अवश्य लगती है लेकिन
जिसे मुझसे प्रीति है उसकी दृष्टि से मुझे समर्पित रहती है। जिसका मन कृष्ण में सुनिश्चित हो गया है उसके
सारे कर्म कृष्णार्पण हो जाते हैं। भले ही वह मुझे अर्पण न करे लेकिन वे सहज ही मुझे अर्पण हो जाते हैं। जो
रथ में निश्चल बैठा दिखायी देता है, वह अपने स्थान से बिना हिले भी चलता हुआ-सा दिखाई देता है। उसी
प्रकार उसका (भक्त) स्वकर्म अनायास ही मुझे अर्पण हो जाता है। इस प्रकार निष्काम होकर सुखपूर्वक स्वधर्म
का आचरण करें। उसके योग से रज-तम बचाकर सत्व के योग से पुरुषोत्तम को प्राप्त होते हैं। वर्ण और आश्रम
की उत्पत्ति का मूल आधार जो मैं हूँ, उसे पहचानना चाहिये। अपने स्वभाव के अनुसार कुलधर्म से मेरी अकेले
की ही उपासना करनी चाहिये। वर्ण के लिये मैं ही आश्रय भूत हूँ। 'ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू' यह वचन
प्रसिद्ध है। उसी प्रकार आश्रमों की उत्पत्ति भी मेरे ही कारण है यह बात वेद गरज-गरज कर कह रहे हैं। देव,
देवी और कुलाचार का अधिष्ठान मैं हूँ। इस प्रकार मैं सभी का आधार हूँ। उद्धव तुम्हें मैं रहस्य की एक बात
बताता हूँ, सुनो। सारे कर्मों का अध्यक्ष मैं हूँ, यह समझ लो और कर्म करते समय मेरी ही अभिलाषा करो तथा

२३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
क्रिया करते समय भी मेरी ही धारणा करो। इस प्रकार कर्मों के आदि, अन्त और मध्य में अविनाशी मैं हूँ। मुझे
अंतःकरण में रखने से वे कर्म ही निष्कर्म में हो जाते हैं, इस बात को हे उद्धव, निश्चित रूप से समझ लो।
अन्वीक्षेत विशुद्धात्मा देहिनां विषयात्मनाम्।
गुणेषु तत्त्वध्यानेन सर्व्वारम्भविपर्ययम् ॥२॥
इस प्रकार जिसका अंतःकरण स्वधर्म के योग से शुद्ध हुआ रहता है, उन्हें पहचानने का यह लक्षण है
कि वे उदासीन रहते हैं। उनकी विषय के प्रति आस्था बिलकुल नहीं होती किन्तु विषयासक्त लोगों को
अपनी विषयासक्ति के कारण सारे कर्म विपरीत ही दिखाई देते हैं। मृगजल के तालाब कितने भी भरे क्यों न
हों लेकिन उसमें धान या केले की पैदावार नहीं हो सकती। उसी प्रकार जिनकी बुद्धि ही विषय लंपट है उन्हें
आत्मसुख के फल कभी भी प्राप्त नहीं होंगे। देखो, जो विषयासक्त होते हैं वे 'आयुःकामार्थ', आयुष्य की
वृद्धि हो तथा मनोरथ सिद्ध हों—'क्षेमार्थ' मेरा निरन्तर कल्याण हो, 'धनधान्यार्थ-समृद्धि' धनधान्य की समृद्धि
हो इस प्रकार का संकल्प कर्म करने के प्रारम्भ से ही करते रहते हैं। इसी हेतु से कर्म प्रारम्भ करने के कारण
वास्तव में स्वकर्म होता ही नहीं है। बल्कि स्वधर्म के बहाने वे सर्वदा मनोरथों की ही उपासना करते रहते
हैं। बैल को दुहने का प्रयास करने से सीप भर भी दूध नहीं निकलता, उसी प्रकार मनोरथ की उपासना करने
से आत्मसुख बिलकुल प्राप्त नहीं होता। इस प्रकार का कर्म वास्तव में कर्म होता ही नहीं है और उसे करने
से वह सिद्ध भी नहीं होता। उसमें अनेक बाधायें आकर उसका विनाश हो जाता है। इसके अतिरिक्त
देवताओं की ओर से भी बाधा आने की सम्भावना रहती है। विषयसेवन में सुख है यह सोच कर उसको
प्राप्त कराने में यज्ञकर्म ही श्रेष्ठ है यह मानकर मूर्ख लोग कष्ट कर असीम दुःख पाते हैं। तीनों वेद जानकर
यज्ञकर्म में पारंगत हुए लोग स्वर्गादि फलों की इच्छा कर, मुँह नीचे कर अधःपतन को प्राप्त होते हैं। विवेक
से दृष्टि प्रगल्भ होकर जो स्वर्ग को तृणवत मानकर उसे स्वीकार नहीं करते उसके पीछे वैराग्य लग जाता
है—बल्कि वह शीघ्रता से उसके घर में प्रवेश करता है। वह वैराग्य का मायका है, विश्राम का भी विश्राम
स्थल है। इतना नहीं बल्कि साक्षात विवेक ही उस पुरुष के रूप में साकार हुआ है ऐसा समझना चाहिये।
ऐसे विवेक से बनी विवेक दृष्टि से देखने पर स्वर्गादि विषय भी मिथ्यासृष्टि मालूम होते हैं। हे जगत्श्रेष्ठ
उद्धव! उस मिथ्यत्व का निरूपण अब सुनो।
सुप्तस्य विषयालोके ध्यायतो वा मनोरथः।
नानात्मकत्वाद विफलस्तथाभेदात्मधीर्गुणैः ॥ ३ ॥
स्वप्न और मनोरथ ये दोनों मन के ही खेल हैं। जो सो रहा है उसे वे सत्य ही मालूम होते हैं लेकिन जागृत
होने पर वही मिथ्या मालूम होते हैं। उसी प्रकार कामना के उल्हास तथा इन्द्रियों की आसक्ति से बुद्धि में
इहलोक और परलोक के भोग का मिथ्या पागलपन घुसा रहता है। सीप सीप ही रहती है किन्तु धन का लोभी
उसे रजत समझ बैठता है, उसी प्रकार विषय की अभिलाषा से भेद का पागलपन उसे जकड़ लेता है। स्वप्न में
मनुष्य को मृत अवस्था में देखता है और जागृत होने पर स्वयं ही उसे झूठ कहता है, उसी प्रकार आत्मस्वरूप में
जागृति आने पर उसे जन्म-मरण दिखायी ही नहीं देता। जीव और शिव का भेद जब तक कायम रहता है तब
तक जन्म-मरण की बाधा रहती है। जब वह भेद ही मिथ्या सिद्ध हो जाता है तो अद्वैत में वह बाधा नहीं रहती।
वह भेद किस तरह दूर होता है, स्वस्वरूप से भेंट किस प्रकार होती है, उसके लिये एक उत्तम साधन बताता हूँ,
ध्यान से सुनो।

निवृत्तं कर्म सेवेत प्रवृत्तं मत्परस्त्यजेत्।
जिज्ञासायां सम्प्रवृत्तो नाद्रियेत् कर्मचोदनान् ॥ ४॥
मन में वासनाओं का मैल रहता है, इसलिये यह भेद सबल मालूम होता है। इसलिये मन से मैल निकाल
कर उसे निर्मल करते रहना चाहिये। पहले जिस नित्य नैमित्तिक कर्म के सम्बन्ध में कहा गया है उसी का नाम
'निवृत्त कर्म' है। वैसा कर्म साधकों को करना चाहिये। जो मेरे भजन में प्रवृत्त हो गया उसे काम्यकर्म पूरी तरह
छोड़ देना चाहिये। मन में किसी भी प्रकार की कामना नहीं रखनी चाहिये। यह पहले भी विस्तार से बताया ही
गया है। प्रत्येक कर्म मुझे समर्पित करने का विश्वास रखकर निरन्तर निर्मल कर्म का आचरण करने से मन के
सारे मैल धुल जाते हैं। किसान खेत जोतता है और सरकार को उसका लगान दे देता है। गाँव के कंटकों से वह
नहीं डरता। कृष्णार्पण से भी वैसी ही स्थिति प्राप्त होती है। चित्त के सारे मैल धुल जाने पर मन में 'नित्य' वस्तु
का विचार उभरता है और इह परलोक के सुखों पर लात मार कर वैराग्य से 'अनित्य' का त्याग करता है। इस
प्रकार वैराग्य अटल हो जाने पर उससे सत्त्वगुण की वृद्धि होती है। तभी वृत्ति मुझे जानने लायक निर्मल होती है।
मेरा चिंतन करने से कामक्रोध का स्मरण ही नहीं होता। उसे अत्यन्त तीव्रता से मेरी लगन लगी रहती है। वह
क्षणभर के लिये भी मेरे चिन्तन के बिना नहीं रहता। चित्त की इस अवस्था में जिसे कर्म क्रिया के प्रति अरुचि
उत्पन्न हो जाती है उसे समस्त कर्मों का संन्यास कर ब्रह्मज्ञान में प्रविष्ट हो जाना चाहिये। श्रवण मनन कर्म में
यदि कोई त्रुटि आती है तो वह मेरे भक्तों को बाधक नहीं होती क्योंकि वह कर्मों का दास नहीं है। स्वधर्म करने
का क्या फल है? तो उससे चित्त का मैल निश्चय ही दूर हो जाता है। किन्तु मेरा भक्त भजन से ही निर्मल होने
के कारण उसे स्वकर्म बाधक नहीं होता। सारांश यह कि मेरे भक्तों पर कर्मों की आज्ञा लागू नहीं होती। श्रवण-
कीर्तन करते रहने के कारण वे कर्म बन्धन में नहीं फँसते। इस प्रकार जो जिज्ञासावस्था में रहते हैं वे कर्मबन्धन
में नहीं फँसते। उद्देश्य ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना होता है, यही बात भगवान् उद्धव से कहते हैं।
यमानभीक्ष्णं सेवेत नियमान् मत्परः क्वचित्।
मदभिज्ञं गुरुं शान्तमुपासीत मदात्मकम् ॥ ५॥
वृत्ति पर नियंत्रण करने के लिये अहिंसा, सत्य आदि धर्म बाह्य नियम का विरोध न करते हुए अविश्रांत
आचरण करना चाहिये। अहिंसा-सत्य आदि का आचरण करते समय उसकी स्थिति इतनी उज्ज्वल हो जाती है
कि उसकी गुरुभक्ति पर अटूट श्रद्धा हो जाती है, दिन-रात वह गुरु का ही चिन्ता करने लगता है क्योंकि
उपनिषद में अन्तिम निर्णय के रूप में वचन है कि सद्गुरु के बिना कभी भी ब्रह्मज्ञान प्राप्त नहीं होगा। आँखों
से अच्छी तरह दिखायी देता है लेकिन यदि उसे सूर्य की सहायता न हो तो उसे सामने की वस्तु नहीं दिखायी
देगी। वह अन्धकार में ही निश्चल खड़ा रहेगा। यह सच है कि नौका पार कराती है लेकिन यदि केवट न हो तो
इधर से उधर जाना सम्भव नहीं होगा। वर्षा से भूमि में आर्द्रता आती है और टोकरी में बीज भी पड़े हैं, लेकिन
यदि तज्ञ व्यक्ति बीज न डाले तो फसल की बात करना व्यर्थ है। सहसा कोई रत्न दिखाई देता है तो मन में यह
सन्देह उठता है कि वह असली है या नकली है। फिर रत्न परीक्षक उसकी कीमत लगाता है तब कहीं उसे
प्राप्त करने के लिये लोग प्रयास करते हैं। उसी प्रकार आत्मस्वरूप सहज ही उपलब्ध रहता है, उसे श्रद्धापूर्वक
सद्गुरु के हाथ से शुद्ध कर ज्ञानी लोग आत्मसुख के लिये प्राप्त होते हैं। आत्मज्ञान सम्पादन करने के लिये
सद्गुरु की सेवा कर संत सज्जन शान्त होते हैं क्योंकि सद्गुरु आनन्दघन रहता है। तुम कहोगे कि जो अनेक

२३८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
साधन किये उनमें गुरु भी एक साधन होगा। लेकिन यही बात अगर मुमुक्षु कहता है तो वह मूर्ख कहलाएगा।
उसका निजात्मसुख डूब जाएगा। सद्गुरु साधनरूप है और साध्य उससे अलग है यह कहने से वह लुट जायगा,
पूरी तरह लुट जायेगा। जो चित्सुख से सदा सम्पन्न है, जिसे चित्स्वरूप से समाधान प्राप्त होता है वह चिन्मात्र
से कभी भी अलग नहीं रह सकता। नमक जब समुद्र में पड़ता है तभी वह समुद्र कहलाता है। दीप जब
दावाग्नि को आलिंगन देता है तभी वह दीप तेज दावाग्नि बनकर रहता है। उसी प्रकार जिसे चिद्रूप का ज्ञान
होता है वह पूर्णरूप से चिद्रूप ही बनता है। उसी प्रकार गुरु और ब्रह्म भिन्न नहीं थे इस सम्बन्ध में उपनिषद में
प्रमाण है। यदि घृत की गुड़िया बनायी जाय तो वह घृत से भिन्न न होकर घी के रूप में ही आकारित होती है,
उसी प्रकार सद्गुरु की मूर्ति भी चिद्रूप में ही साकार हुई रहती है या सच्चिदानन्द की शोभा अपनी आँखों से
देखने के लिये उसने सहज ही देह धारण किया रहता है। उसकी भेंट होने के लिये सहस्र भाग्य होना चाहिये
ऐसा कहते-कहते शायद उससे भेंट हो जाय लेकिन ऐसी भी बात नहीं है। सद्गुरु जिधर भी दृष्टिक्षेप करता है,
उधर सुख की ही सृष्टि उत्पन्न होती है। वह जहाँ कहता है वहाँ महाबोध स्वानंद से रहता है। उस सद्गुरु के
चरण दिखायी देते ही भूख-प्यास तत्काल नष्ट हो जाती है। कल्पना तो उठ ही नहीं सकती। सारांश गुरु के
चरणों में निजसुख निवास करता है। उस सद्गुरु का लक्षण बताते समय शब्द रुक जाते हैं। जो सनातन पूर्णब्रह्म
है उसे लक्षण की क्या आवश्यकता है? फिर भी एक लक्षण बतलाने की स्फूर्ति आती है। वह यह कि उसमें
सर्वत्र शान्ति दिखायी देती है। शान्ति के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं दिखायी देती। उद्धव! वह शान्ति ही
समाधान है। शान्ति ही ब्रह्मज्ञान है और शान्ति ही पूर्णब्रह्म है यह जान लो। सद्गुरु की ऐसी स्थिति जानकर
शिष्य के मन में गुरुभक्ति के प्रति प्रेम और भी अधिक बढ़ गया। इसलिए वह गुरु की खोज में निकल पड़ा
उसका अंतःकरण उसे विश्राम नहीं दिला रहा था। आठों पहर गुरु का ही लक्षण गुरु का ही ध्यान वह करने
लगा। उस सर्व समर्थ को मैं कब देख पाऊँगा? मेरा यह पाश कब छूटेगा? मन को शान्ति कब और कैसे प्राप्त
होगी? इस प्रकार वह सद्गुरु के लिये पागल हो गया। देखते-देखते यह आयु समाप्त हो गयी लेकिन मेरी
अभी सद्गुरु से भेंट नहीं होती, यह मनुष्य देह समान होते ही सब कुछ डूब जायेगा ऐसा उसे लगने लगता है।
गुरु का नाम सुनने मात्र से ही वह मन से आगे भागने लगता है और उस वार्ता के ही गले लग जाता है। उसकी
आतुरता अत्यधिक बढ़ जाती है। यदि सद्गुरु से प्रत्यक्ष भेंट नहीं होती तो वह मन से ही गुरुनाथ की पूजा
करने लगता है और परमभक्ति से पूजा करते समय उसका प्रेम इतना अधिक उफन उठता है कि वह हृदय में
नहीं समा पाता। सद्गुरु से भेंट करने के लिये वह तीर्थ और तपोवन भटकता रहता है। नित्यकर्म करते समय
भी वह एक क्षण के लिये गुरु को नहीं भूलता। सद्गुरु की प्राप्ति हो इसलिये वह हर छोटे बड़े की पूजा करने
लगता है। मेरा गुरु मुझे मिले इसलिये वह ब्राह्मणों का अत्यधिक सत्कार करता है। वह भालू की तरह निरन्तर
'गुरु-गुरु' का जप करता रहता है। गुरु के अतिरिक्त वह अन्य किसी का चिन्तन नहीं करता। उठते-बैठते खाते
समय, सोते समय कभी भी मन में गुरु का विस्मरण नहीं होने देता। जागृति में तथा स्वप्नावस्था में भी उसे गुरु
की चिन्ता लगी रहती है। कैसी विचित्र बात है। केवल गुरु का स्मरण करते ही उसकी भूख-प्यास समाप्त हो
जाती है। वह घर-बाहर के सुख को भूल कर सदा परमार्थ की ही ओर उन्मुख रहता है। सद्गुरु के प्रति
जिसका इतना प्रेम रहता है, उसकी आस्था स्पर्धा से बढ़ती ही जाती है। उसे गुरु के रूप में तत्काल मैं ही दर्शन
देता हूँ। उत्कंठा जितनी अधिक रहती है, उतनी ही भेंट अधिक निकट होती है। भेंट के लिये साधनों में 'विशेष
उत्कंठा' यही प्रमुख साधन है। अन्य कितने ही बड़े साधनों का प्रयोग क्यों न करें लेकिन उससे आत्मज्ञान का

दसवाँ अध्याय २३९
अल्पांश भी हाथ नहीं लगेगा लेकिन यदि सद्गुरु के भजन में प्रवृत्त होंगे तो आत्मज्ञान की राशियाँ सामने लग
जायेंगी। मोक्ष भी चरणों पर गिर पड़ेगा। लेकिन गुरु का भक्त उसे भी स्वीकार नहीं करता क्योंकि वह चरण
सेवा में ही तल्लीन रहता है। श्रीगुरुचरण का आकर्षण ऐसा विचित्र है कि उसके सामने मोक्षसुख का भी
विस्मरण होता है। जिसकी रुचि गुरुभजन में नहीं होती वही संसार के बन्धन में पड़ते हैं। संसार का बंधन
तोड़ने के लिये सद्गुरु की ही सेवा करना आवश्यक है। सद्गुरु की सेवा ही मेरा भजन है। क्योंकि गुरु में और
मुझमें कोई भेदभाव नहीं है। इस प्रकार गुरु भक्तों की श्रद्धा कितनी असीम होती है और उन्हें गुरुभजन के प्रति
कितना प्रेम रहता है उसे मैंने अपनी रुचि से स्पष्ट किया। कृष्ण कहते हैं, हे उद्धव! अब इसी प्रवाह में मैं तुम्हें
शिष्यों के लक्षण बताता हूँ।
अमान्यमत्सरो दक्षो निर्ममो दृढसौहृदः।
असत्वरोऽर्थजिज्ञासुरनसूयुरमोघवाक् ॥६॥
जाल में फँसी हुई मछली जिस प्रकार छटपटाती है उसी प्रकार मान-सम्मान का प्रसंग आते ही सच्चा
शिष्य संकट में पड़ जाता है। हौवा का नाम सुनते ही जिस प्रकार बच्चा घबरा उठता है उसी प्रकार सम्मान की
बात सुनते ही भय से उसे संकट का आभास होता है। तेज हवा के झोंके से जिस प्रकार केले का वृक्ष काँपने
लगता है अथवा उफनती हुई लहरों के कारण पानी में सूर्य का प्रतिबिम्ब काँप उठता है, उसी प्रकार सम्मान को
वह आँख से भी नहीं देखना चाहता। बड़प्पन को वह एक बड़ा संकट मानता है और वह उसे अपने तक नहीं
आने देता। प्रेम से सम्मान स्वीकार करने से देहाभिमान दृढ़ होगा इसलिये वह मान अभिमान छोड़ कर सदा हीन
दीन होकर रहता है। मेरा नामरूप नष्ट हो जाय और कोई मेरी ओर न देखे ऐसी स्थिति उत्पन्न हो ऐसा उपाय वह
करने लगता है। लौकिक को देखकर वह उद्विग्न हो उठता है, शरीर से और घर से वह ऊब जाता है, अकेलापन
ही उसे अच्छा लगता है इसलिये वह द्वैत का संग ही नहीं करता। उसके मन में यही अभिलाषा रहती है कि कोई
मुझे न देखे, कोई मुझे न पहचाने, कोई मुझसे न शरमाये। चोर पीछा करता है उस समय जिस प्रकार धनवान
व्यक्ति संकट के कारण छिप कर बैठ जाता है उसी प्रकार मान-सम्मान देखते ही वह देह में उपेक्षा का भाव
रखकर छिप जाता है। लोगों के बीच मैं भी हूँ यह कोई न जान पाये ऐसी स्थिति में वह रहता है इसलिये उसे
मान-सम्मान सहन नहीं होता। अहं की ममता छोड़ने के लिए वह मान-सम्मान की ओर नहीं देखता क्योंकि
कहीं उसे ग्रहण करने से अहं भाव स्थायी हो जायेगा ऐसा उसे लगता है। जिसके उदर में अभिमान समाया रहता
है वे ही हमेशा सम्मान की अपेक्षा करते रहते हैं। जो उस अभिमान को ही छोड़ने के लिये तैयार हो जाता है वह
मान-सम्मान की ओर नहीं देखता। जिसने सम्मान प्राप्त किया है उसे अपमान सहन नहीं होता अतः वहाँ सहज
ही देहाभिमान उत्पन्न होता है। इसलिये उसे सम्मान ही अच्छा नहीं लगता। वास्तव में देखा जाय तो ज्ञाता पुरुष
सम्मान प्राप्त करने की लालसा से ही अपने ज्ञान का प्रदर्शन करता रहता है। इसमें आर्थिक स्वार्थ का लोभ भी
मन में रहता है। सारांश यही कि सम्मान की इच्छा न रखना ही शिष्य का पहला लक्षण है। अब 'निर्मत्सरता' का
लक्षण भी बताता हूँ, सुनो। ज्ञान की ईर्षा के कारण भी ज्ञानियों में परस्पर बैर उत्पन्न होता है। वहाँ अपने देह के
प्रति अभिमान पूरी तरह घर बनाकर बैठ जाता है। ज्ञान के अभिमान की कथा का क्या वर्णन किया जाय? असीम
तपश्चर्या कर विश्वामित्र दूसरी सृष्टि का निर्माण कर रहा था क्योंकि उसके मन में ज्ञान का अभिमान था। दुर्वासा
को भी ज्ञान का अभिमान था इसलिये उसने अम्बरीष को व्यर्थ ही शाप दे दिया। उसके शाप के भय से मैंने

२४० श्रीमद् एकनाथी भागवत
गर्भवास सहन किया। ब्रह्मदेव को भी ज्ञान का अभिमान हुआ और उसने गोपाल वत्सों का हरण किया। ज्ञान के
अभिमान के भय से मुझे उनका रूप धारण कर रहना पड़ा। हे उद्धव! सभी प्रकार के अभिमानों में ज्ञान का
अभिमान बहुत कठिन है। वसिष्ठ और विश्वामित्र ज्ञानाभिमान के ही कारण परस्पर लड़ रहे थे। ऐसे ज्ञानाभिमान
के भय से ही मैं ग्वाला बना। याज्ञिक ब्राह्मणों ने तो मुझे मूर्ख कहा क्योंकि उन्हें कर्म का और ज्ञान का अभिमान
था। जब मेरी ही यह अवस्था है तो दूसरों के बारे में क्या कहा जाय? ज्ञानाभिमान के पाश से ज्ञानी जन
सरलतापूर्वक छूट नहीं पाते और ज्ञानाभिमान की जाति भी क्या है? वह मूर्खों के पास खड़ा नहीं रहता। ज्ञानियों
में ही बैर उत्पन्न कर ईर्ष्यापूर्वक रहता है। सारांश यह कि जिसे ईर्ष्या के बिना रहना है उसे ज्ञान का अभिमान
त्याग देना चाहिये। अन्यथा वह ज्ञानियों को ईर्ष्या से रहने को बाध्य करता है। अब ईर्ष्या की सामग्री के बारे में
सुनो। वह देह में देहाभिमान को दृढ़ करता है, ज्ञान का सहारा लेता है और द्रव्य की आशा से उसमें लोभ भी
घुस जाता है। जिसके पास इतनी सामग्री एकत्र हो जाती है वही ईर्ष्या के साथ द्वेष को चलाता है। सच्चे शिष्य को
यह सहन नहीं होता। वह ईर्ष्या का त्याग ही कर देता है। ईर्ष्या भी कैसी है? वह सदा ज्ञानी के ही पास रहती है।
पण्डितों में ईर्ष्या जबरदस्त होती है। वे इस जन्म में उसे नहीं छोड़ते। जितने भी पण्डित दिखायी देते हैं वे सब
ईर्ष्यालु ही होते हैं। वे दिखाने के लिए अत्यन्त विनम्र होकर मीठी बातें करते हैं। लेकिन उनकी बातें ईर्ष्या तथा
दूसरों के छल से भरी रहती हैं। ईर्ष्या के कारण पण्डित क्रोध करते हैं और एक-दूसरे पर गन्दे आरोप लगाकर
निन्दा करते रहते हैं। ईर्ष्या की ऐसी बाधा सच्चे शिष्य को कभी स्पर्श नहीं करती। जब ज्ञानीजनों को भी ईर्ष्या
नहीं छोड़ती तो औरों की क्या बिसात है? किन्तु शिष्य तो द्वेष की बात ही नहीं करता और ईर्ष्या को समूल तोड़
देता है। वास्तव में शिष्य को ईर्ष्या को छोड़कर ही रहना चाहिये। बिना ईर्ष्या के रहने के सम्बन्ध में एक कथा
सुनाता हूँ, सुनो। उसके सामने से कोई लाभ ही वस्तु छीन कर भी ले जाए तो वह मन में द्वेष भाव उत्पन्न नहीं
होने देता। समस्त प्राणियों में ईश्वर का वास है यह भावना मन में होने के कारण उसे द्वेष हो ही नहीं सकता।
दुर्जन निन्दारूपी वाग्बाण उसे कितना ही क्यों न बींधे लेकिन वह मन में द्वेष नहीं उत्पन्न होने देता। निन्दा में वह
अपना हित ही मानता है। जिसने मेरी निन्दा की है उसे वह हित चाहनेवाली माँ के समान समझता है। उसने मेरे
पापों का मल धो डाला है और मेरी वृत्ति निर्मल कर दी ऐसा ही वह मानता है। ऐसे विचारों से वह अपने मन को
द्वेष का स्पर्श नहीं होने देता। इसे ही 'मत्सररहित' होना कहते हैं और यह शिष्य का दूसरा लक्षण है। इसके बाद
तीसरा लक्षण है, 'दक्षता' जिसके सम्बन्ध में बताता हूँ। अपना हित साधने के लिये शिष्य की 'दक्षता' कितनी
उपयोगी होती है यह तुम्हारी समझ में आयेगा। 'सावधानी' अर्थात् जागरूकता का सूर्योदय होते ही वह निद्रा तथा
तंद्रा का अन्धकार झट नष्ट कर देता है और 'धारणा' के दिन की शुरुआत हो जाती है और धृति का मध्याह्न हो
जाता है। ऐसे दिन का उदय होते ही शमदमादि समुदाय भक्ति के मार्ग पर चलने लगता है। मार्ग में क्षण भर के
लिये भी नहीं रुकता। वहाँ पग-पग पर निजबोध का प्याऊ रहता है जहाँ राह चलने वालों की प्यास तो मिटती
ही है साथ ही तृषा की तृष्णा भी शान्त हो जाती है। इस मार्ग में गाँव के लोग (संत) मिले और वे 'सोहं' की
भावना से एक साथ हो लिये। इससे आगे का मार्ग चूकने का भय ही नहीं रह जाता। वे सीधे अपने गंतव्य स्थान
पर पहुँच जाते हैं। हे चतुर उद्धव, सुनो! 'आलस्य' या 'विलम्ब' मन को स्पर्श न करे इसी का नाम है 'दक्षता'।
यही शिष्य का तीसरा लक्षण है। पहले का पुराना संग्रह उसके पास था उसकी ममता भी वह छोड़ देता है और
आत्मज्ञान के अनुभव से उसे छोड़ने का दुःख भी उसे नहीं होता। देह के प्रति 'अहं' को दृढ़ करने से देह के
प्रति ममता जगती है। जब मन को देहाभिमान ही स्पर्श न करे तो ममता उसी क्षण नष्ट हो जाती है। शरीर

दसवाँ अध्याय २४१
मलमूत्र की गठरी है और नाशवान है यह तो दिखाई ही देता है इसलिये उसके प्रति होने वाला अहंकार नष्ट
होकर, उसके स्थान पर 'सोहं बुद्धि अर्थात् मैं ही ब्रह्म हूँ' यह भावना दृढ़तर हो जाती है। सोहंभावना को दृढ़
बना कर उसने अहंभाव तथा ममता का त्याग किया रहता है। शिष्य के मन की यही 'निर्ममता' उसका चौथा गुण
है। शिष्य का हित साधने के काम में गुरु ही माता है, गुरु ही पिता है, सगे-सम्बन्धी भी गुरु ही हैं और बन्धु और
सुहृद भी गुरु ही हैं। गुरु की सेवा यही उसका नित्यकर्म है, गुरु सेवा ही उसका सच्चा धर्म है, गुरु ही आत्माराम
है, उसी प्रकार सुहृद का सारा गौरव भी सद्गुरु ही है। उसी प्रकार सद्गुरु को ही अपना हितैषी मानना चाहिये।
हे उद्धव! सद्शिष्य का यही पाँचवाँ लक्षण है। चित्त को वह कभी विचलित नहीं होने देता। सभी प्रकार से
सर्वकाल वह आत्मा में ही निश्चल रहता है। शरीर भले ही चंचल हो जाय लेकिन उसका चित्त गुरुचरण में ही
अटल रहता है। शरीर व्यापार चलता रहता है लेकिन उसके हृदय में कोई गड़बड़ी उत्पन्न नहीं होती, गुरुचरणों में
जो ऐसी निश्चलता रखता है वही सच्चा परमार्थी शिष्य है। जिसके हृदय में चंचलता होती है वह स्वहित साधने
वाला शिष्य है ही नहीं। जिसके हृदय में निश्चलता वास करती है वही परमार्थ का साधक है। इस प्रकार की
निश्चलता धारण कर जो अपने सच्चे हित की इच्छा रखता है, वही गुरुपदेश से एक क्षण में परमार्थ का पात्र हो
जाता है। जिस प्रकार एक दीपक से दूसरा जलाने पर वह भी उसकी ही तरह हो जाता है, उसी प्रकार निश्चल
वृत्ति के साधक को गुरु प्राप्त होते ही वह तत्काल तद्रूप हो जाता है। अर्थात् अंतःकरण की निश्चलता ही शिष्य
का श्रेष्ठ लक्षण है और वही शिष्य का छठवाँ गुण है, इसे ध्यान में रखो। इसी से षड्विकारों का विनाश होता है।
षड्विकार देह में ही होते हैं। लेकिन शिष्य देहबुद्धि को स्पर्श ही नहीं करता अतः गुरुपदेश के अनुसार आचरण
करने के कारण उसके विकार भी नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार की निश्चलता साध्य कर जो अर्थ जिज्ञासा से
परमार्थ की साधना के लिये तैयार होता है, वही गुरुचरणों को भजने लगता है। जिसे अर्थ की जिज्ञासा ही नहीं है
वह गुरु का भजन ही नहीं करेगा और अगर कभी करेगा भी तो विषय के लालच से ही करेगा। विषय का स्वार्थ
छोड़कर, पूर्ण तत्त्वार्थ जानने के लिये जो भजन करता है, उसी का नाम है 'जिज्ञासा'। ऐसी तत्त्व जिज्ञासा धारण
कर वह परमार्थ की चाह बढ़ाता रहता है। इस प्रकार स्वहित के लालच के कारण उसके चित्त को क्षणभर का भी
विश्राम नहीं मिलता। परमार्थ के प्रति नितान्त प्रेम तथा 'बढ़ती हुई आस्था' शिष्य का सातवाँ लक्षण है। यह
सातवाँ लक्षण जिज्ञासा के ही बल पर परमार्थ की दहलीज चढ़ने में सफल हुआ। अस्तु! सद्गुरु अनेक जनों के
लिये शीतल छाँह है शिष्यों की तो माँ ही है। उसके प्रति जो ईर्ष्या करेगा उसकी आत्मप्राप्ति दूर हुई समझिये।
इसलिये जो भी कोई गुरु का अनुगृहीत हो उसे गुरु समान ही मानना चाहिये। उसके चित्त को ईर्ष्या का स्मरण ही
नहीं होता। वह सबसे अत्यन्त विनम्रता से आचरण करता है। इसके विपरीत यदि कोई गुरुबन्धु कनिष्ठ हो तथा
गरीब हो, उसमें उत्तम गुण भी हों तो उसे न मानना, उस पर झूठे आरोप लगाना कुशिष्य का लक्षण है। दूसरे में
उत्तम गुण हो उसे दोष देकर उसका ज्ञान झूठा है यह कहना 'ईर्ष्या' का लक्षण है। साक्षात भेंट होने पर उसके
गुणों का स्रोत गाना विनम्र होकर उसके पैर छूना लेकिन उसके पीठ घुमाते ही उसकी निन्दा करने का नाम है
'ईर्ष्या'। 'सच्छिष्य' का आचरण इस सम्बन्ध में बिलकुल शुद्ध रहता है। वह अपने को 'ईर्ष्या' का स्पर्श नहीं
होने देता। सामने वाला उत्तम हो, मध्यम हो या साधारण हो वह सबको नमन करता है। छल उसे आता ही नहीं
है। गुरु ने उसे सर्वत्र ब्रह्मभावना धारण करने का पाठ पढ़ाया रहता है। उस पर सदा ध्यान देते हुए वह सबको
समभाव से वन्दन करता है। इस प्रकार, हे उद्धव! किसी भी प्राणी का छल करने की जानकारी न होना यही
शिष्य का 'अनसूया' आठवाँ गुण है। इन आठ मनकाओं की माला जिसके हृदयकमल में निरन्तर वास करती है

२४२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वही सद्गुरु का सान्निध्य प्राप्त करता है। उस मिलन की अपूर्वता का क्या वर्णन किया जाय? इसके बाद का
नवाँ लक्षण भी नया ही है। व्यर्थ की बकवास छोड़कर वह सत्य और पवित्र भाषण करता है। सद्गुरु से वह
विनीत भाव से और मृदु वाणी से प्रश्न करता है और गुरु का वचन सत्य से भी सत्य है इसे भक्तिपूर्वक स्वीकार
करता है। नाना प्रकार की युक्तियों से अनेक प्रकार के मतों का प्रतिपादन कर असमय व्यर्थ की बहस करना,
पाखण्ड का सहारा लेकर महावाद का हो हल्ला करना, साधक-बाधक युक्ति की सहायता से शब्दच्छल करना
और अपनी ही शब्दक्रीड़ा पर प्रसन्न होना ये बातें शिष्य के मन में नहीं आतीं। सद्गुरु के सामने व्यर्थ की बातें
करना महान पाप है यह जानकर वह व्यर्थ की बकवास छोड़ देता है और मिथ्यावाद नहीं करता। शिष्य की बातें
कैसी होती हैं? मानों परिपक्व वाणी से निकला अमृत हो। प्रेमरस में सने शब्दों में वह एकान्त में स्वयं से प्रश्न
करता है। शरारती वादों के खट्टे कच्चे फल डंठल के साथ झड़ जाते हैं। वह प्रामाणिक तथा परिपक्व भाषण
करता है। कपटपूर्ण और मर्मभेदी भाषण करना उसे नहीं आता। दूसरे के ऐब को वह स्पर्श नहीं करता और
जिससे किसी के मन को दुःख हो या अधर्म हो ऐसी बातें वह नहीं करता। कभी व्यर्थ की शंका नहीं करता।
निन्दा के प्रति तो वह मूक ही रहता है। चाहे कोई बच्चा हो कोई अनाड़ी हो या पण्डित हो किसी को भी धोखा
देना वह नहीं जानता। उसे कर्कश स्वर में बात करना नहीं आता। दूसरों का उपहास करना उसे नहीं आता अथवा
बात करते समय वह किसी चीज की आशा भी नहीं करता। केवल निर्मल मन से और वैराग्य से वह बात करता
है। वह बैरभाव से बात करना नहीं जानता, शब्दच्छल से घिनौनी बात भी वह नहीं करता, अधिक बात करने से
वह ऊब जाता है, अधिकतर वह मौन ही रहता है। उसे वाद-विवाद या वितंडावाद नहीं रुचता, किसी से व्यर्थ
बात करना भी अच्छा नहीं लगता। वह किसी से हँसी मजाक भी नहीं करता और लौकिक बात भी नहीं करता।
उसे टेढ़ी बात करना नहीं आता, उसकी भाषा में कभी छल-कपट नहीं होता। वह किसी से प्रतारणा नहीं करता
और न झूठ ही बोलता है। मन में किसी का काम करने की इच्छा न होते हुए भी ऊपर से 'हाँ' कह कर वह उसे
धोखे में नहीं. डालता। वह सदा हरिनाम का पाठ करता रहता है। पश्चिम की ओर खुलने वाली खिड़कियाँ जिस
प्रकार थोड़ी-सी हवा आने पर खड़खड़ाने लगती हैं, उस प्रकार वह व्यर्थ की बकवास कर मुँह नहीं बजाता।
शब्द ब्रह्म के सम्बन्ध में बात करते समय विपक्ष द्वारा बात काटने पर उसे सहज ही क्रोध आता है। साधक के
मार्ग में यह बहुत बड़ी बाधा है यह जानकर वह व्यर्थ की बहस नहीं करता। शब्दज्ञान का वह गर्व भी नहीं
करता अथवा मौन भी नहीं रहता। वह अपनी बात का अभिमान नहीं करता, सदैव सद्गुरु का स्मरण करता रहता
है। अपनी बात से वह किसी में उद्वेग उत्पन्न नहीं करता, स्वयं बात करने का प्रयत्न नहीं करता, बात करते समय
आवेश का प्रदर्शन नहीं करता, जिससे उद्वेग उत्पन्न न हो ऐसी ही बात करता है। सत्य, मधुर, सुनने में आल्हाद
प्रदान करने वाली तथा सब के लिये हितकर सुमधुर हरिकथा का वह निरूपण करता है। सद्गुरु की प्रार्थना करते
समय भी वह अधिक बातें नहीं करता। आत्मसुख प्राप्त करने का साधन वह एक ही शब्द में कहता है। इस
प्रकार शिष्य के ये नौ लक्षण हैं। ये नवखण्ड पृथ्वी के भूषण हैं जो नारायण ने कृपापूर्वक भक्तों को प्रदान किये
हैं। यह नवरत्नों की सुन्दर माला जो सद्गुरु के कंठ में पहनायेगा वह देखते-देखते सायुज्य सिंहासन पर आसीन
होगा। इन नवरत्नों का पदक जिस शिष्य के हृदय पर सुशोभित होगा वही सद्गुरु का निश्चयपूर्वक विश्वासपात्र
बनेगा। इन नवरत्नों का अभिनव गुलदस्ता जो सद्गुरु को भेंट स्वरूप देगा वह स्वराज्य के मुकुट का महामणि
बनकर सुशोभित होगा। उद्धव! अब तुम शंका प्रस्तुत करोगे कि पत्नी, बच्चे तथा धन धान्य से सम्पन्न शिष्य को
ऐसी निर्लोभता कैसे सम्भव होगी।