श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 249, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय
अब सद्गुरू रूप धन्वंतरी को प्रणाम करता हूँ। उसकी दृष्टि से ही मनुष्य रोग से मुक्त होता है। इस संसार
में भवरोग की बाधा दूर करने में उसके जैसा समर्थ अन्य कोई नहीं है। जिस भवरोग के संताप से लोग
आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक इन त्रिविध तापों से झुलस रहे हैं, 'मैं' और 'मेरा' जैसे संकल्पों से
वे सदा बड़बड़ाते रहते हैं, द्वैतभावना के उद्भव के कारण उनके जीभ का स्वाद नष्ट हो जाता है और मुँह
कडुआ हो जाता है, इसीलिये वे मुँह से विष की तरह कडुई बातें करते रहते हैं। व्याधि के सत्रिपात में वे विवेक
को लात मारते हैं और वायु के झटके में हाथ से धैर्य को झटक कर वासनारूप जंगल में भटकने लगते हैं।
महत्वाकांक्षाओं में सागर में डूबते-उतराते हैं, संकल्पों के मृगजल में डूबने और स्वर्ग की चोटी पर तेजी से
चढ़ने लगते हैं और पैर फिसल कर नीचे गिर पड़ते हैं। माया की कँटीली झाड़ियों की खरोंच उन्हें लगती रहती
है, लोभरूपी बैर के काँटे उन्हें कचोटते रहते हैं और वे प्रपंच से लिपट कर बैठ जाते हैं। फिर यदि कोई उन्हें
पीटता भी है तो वे वहाँ से भागते नहीं हैं। भवरोग के भ्रम में वे कैसा पागलों जैसा आचरण करते हैं जो नहीं
खाना चाहिये उसे खाने लगते हैं, जो नहीं करना चाहिये वह करते दिखायी देते हैं और स्त्रियों के पीछे पागलों
की तरह दौड़ते रहते हैं। धन के भय से उन्हें कँपकँपी छूटती है और वे काँपने लगते हैं। मन को झटका लगता
है और उनका शरीर पसीने से तरबतर हो जाता है। ऐसी स्थिति में कहीं तो मुँह छिपाकर बैठ जाते हैं। जब शरीर
में भोग विलास का उन्माद चढ़ता है तो वे जमीन अथवा खाट पर नहीं रह पाते, विधि का आवरण वे फेंक देते
हैं और कहीं भी उनकी चित्तवृत्ति स्थिर नहीं रह पाती। ज्ञानशक्ति क्षीण हो जाती है, शिथिल होकर वे छटपटाते
रहते हैं और विषयरूपी जल माँगते रहते हैं। थोड़े से जल से उनकी प्यास पूरी नहीं होती और वे पेटभर पानी
की हाँक लगाये रहते हैं। इस प्रकार सदा कुपथ्य करते रहने के कारण उनमें जीर्ण ज्वर उत्पन्न होने लगता है।
कालान्तर में क्षय का प्रकोप होकर शरीर बिलकुल क्षीण हो जाता है। क्षण-प्रतिक्षण यह क्षीणता बढ़ती जाती है
और शरीर में हुए विकारों के कारण चिन्ता उत्पन्न हो जाती है और सुख नष्ट हो जाता है। रोग का जोर इतना
विचित्र रहता है कि परमार्थ कडुवा लगने लगता है और विषय मधुर लगता है। इस रोग को निर्मूल करने के
लिये सत्कथा सुनाइये तो मुँह की भावार्थरूप दाढ़ें बन्द होकर दाँत बजना बन्द हो जाता है। अर्थात् सत्कथा
अच्छी नहीं लगती। तुलसी का रस तथा शहद का मिश्रण नाक में डालने से उसे नाक खींच नहीं पाता, उल्टे
इससे उसके सर में दर्द होने लगता है। इस प्रकार वह पूरी तरह रोगग्रस्त होकर रहता है। ऐसा यह जबरदस्त रोग
देख कर सद्गुरुरूपी चतुर वैद्य आगे बढ़ता है और कृपादृष्टि से उसकी ओर देखकर उसका रोग तत्काल ठीक
कर देता है। वह वैद्य (सद्गुरु) अत्यन्त बुद्धिमान होने के कारण रोगी का प्राण जाने पर भी उसे मरने नहीं देता।
वह प्राण के बिना ही उसे जीवित रखता है ऐसी सिद्धि सद्गुरु के पास होती है। रोगी का भाग्य महान है
इसीलिये वह गुरु कृपा कूर्मावलोकन करता है और वही रोगी के लिये अमृत पान की तरह सिद्ध होकर वह
तत्काल प्रकृतिस्थ हो जाता है। इस प्रकार प्रकृतिस्थ हो जाने के बाद वह रोगी स्वयं ही नित्यानित्य का पालन
सावधानी से करने लगता है। किन्तु इतने से उसका जीर्ण ज्वर दूर नहीं होता तथा क्षय के लक्षण भी कम होते
नहीं दिखायी देते। इसलिये सद्गुरु उसे रसायन देना शुरू करता है। रोगी को 'अर्धमात्रारूपी अक्षरस' देते ही
उसका क्षयरोग दूर होकर वह पहले जैसा 'अक्षय' (अविनाशी) हो जाता है। रोगी कहीं भीषण कुपथ्य न कर दे