श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इसलिये उस पर वैराग्य की नजर रखता है और निरन्तर आत्मानुसंधान का पथ्य देकर उसके संसाररूपी रोग का
निवारण करता है। रोगी पूरी तरह ठीक हो जाने पर उसे तेज भूख लगती है इसलिये वह मानसिक चिन्ता की
लाई बना कर भकाभक एक ही क्षण में खा जाता है। चार वर्णरूपी काला सफेद चना चार आश्रमरूपी अग्नि में
भून कर उसे 'अहं-सोहं' रूपी गुड़ के साथ खा जाता है। फल की आशा के झोले भरे हुए थे उसे भी वह खा
गया। गुड़ और चीनी की चाशनी की तरह कर्माकर्म के लड्डू बिना मीठा या कड़ुआ कहे वह अपनी इच्छा से
खाने लगा। 'ब्रह्माहमस्मि' की चरम प्रवृत्ति के सुन्दर पकवान उसे दिखाई पड़े उसे तत्काल खाकर वह माया के
पीछे पड़ गया। तब माया उसके डर से भाग गयी और अपने मिथ्यत्व में ही विलीन हो गयी। तब स्वानंद पुष्ट
हुआ और संसाररोग बिलकुल नष्ट हो गया। ऐसे जिस सद्गुरु वैद्य ने मेरा उपचार कर मुझे स्वस्थ किया उसकी
शरण में जाना चाहता हूँ तो चारों ओर तुम ही दिखायी देते हो। तुम से स्वयं को अलग कर तुम्हारी शरण जाना
चाहूँ तो दोनों के बीच का 'तू' पन और 'मैं' पन नष्ट हो गया। तो तुम्हारा भजन अब किस प्रकार करूँ। जिनके
जीवन-बन्धन टूट कर जो साक्षात आत्माराम हो गये वे भी तुम्हारी निष्काम भक्ति करते हैं। पूर्णावस्था को प्राप्त
लोगों की तो यह स्थिति है। जो मोक्ष को गुरुभजन से श्रेष्ठ मानते हैं, वे भी मूर्ख हैं क्योंकि बहुत कम लोग
जानते हैं कि मोक्ष तो गुरु चरणों का सेवक है। हमें तो सद्गुरु दृष्टि से ही परम स्वास्थ्य लाभ होता है। हम
सद्गुरु स्तुति से ही संसार में पूजनीय होते हैं। गुरु सेवा के कारण ही हम भाग्यवान हैं और हमारा सामर्थ्य हमें
गुरु स्तुति से ही प्राप्त हुआ है। सद्गुरु का नाम ही हमारे लिये वेदशास्त्र है, सारे मंत्रों की अपेक्षा सद्गुरु का
नाम ही हमें अधिक श्रेष्ठ मालूम होता है। सद्गुरु का तीर्थ सारे तीर्थों को पवित्र करता है और गुरु के चरण
हमारा क्षेत्र है और उस पर हमारा स्वतंत्र रूप से अधिकार है। तुम कहोगे कि अब यह स्तुति बन्द करो लेकिन
तुम्हारी शपथ लेकर कहता हूँ कि तुम्हारे उदार गुणों का वर्णन करते मन को तृप्ति नहीं हो पाती। सचमुच तुम्हारा
गुणवर्णन करने के लिये ही मैं श्रीभागवत की टीका लिखने के लिये प्रवृत्त हुआ, तुमने ही मुझे भक्तिपंथ की ओर
अग्रसर किया और तुम्हारी कथा-कीर्तन के लिये प्रवृत्त किया। संसाररूपी हाथी को विदीर्ण करने वाले हे सिंह
जनार्दन! तुम्हारी जय हो। मैं एकाएक तुम्हारी शरण में आया और तुम्हारे श्रीचरणों तक पहुँचा। श्रीभागवतशास्त्र
मुझे गुरुकृपा से प्राप्त हुआ, उसका मतितार्थ श्रवण करें। श्रीकृष्ण उद्धव से परमार्थ का उपदेश करेंगे। यदु और
अवधूत के संवाद में चौबीस गुरुओं के लक्षण सुनकर उद्धव की भावना ब्रह्ममय हो गयी। ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है,
मुझमें भी वह अंतर्बाह्य व्याप्त है, किन्तु स्वयं मुझे भी वह समझ में नहीं आता। इसका क्या उपाय किया जाय ?
उद्धव के मन की यह चिन्ता श्रीकृष्ण की समझ में आ गयी। वही उपाय श्रीकृष्ण ने अविरोध बताना शुरू किया।
श्रीभगवानुवाच
मयोदितेष्ववहितऽ स्वधर्मेषु मदाश्रयः।
वर्णाश्रमकुलाचारमकामात्मा समाचरेत् ॥ १॥
पहले वेदरूप में वर्णाश्रम धर्म मैंने ही बतलाया। नारदपंचरात्रादि ग्रन्थों में वर्णित वैष्णव धर्म यह मेरी
उपासना का रहस्य भी बतलाया। जिसका जो भी वर्ण और आश्रम हो उसको उस वर्णाश्रम धर्म के अनुसार
आचरण करना चाहिये। दूसरे के धर्म का आचरण करने से बहुत दुःख भोगना पड़ता है। उद्धव, यह बात ध्यान
में रखो कि जो कर्त्ता है उसे अत्यन्त सावधानीपूर्वक व्यवहार करना चाहिये। इस सावधानी के लक्षण ज्ञानी लोग
जानते हैं। यहाँ कर्म चार प्रकार का है—नित्य, नैमित्तिक, काम्य तथा प्रायश्चित्त ये कर्म के चार विभाग हैं। ये