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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 869 में से

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२३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
मिलने पर कोई उसे फेंक देता है तो वह मूर्ख ही कहलायेगा। उसी प्रकार संस्कृत भाषा का अध्ययन कर बड़ी
कठिनाई से परमार्थ से भेंट होती है, यदि वही परमार्थ देशी भाषा में प्राप्त हो जाय तो उसकी उपेक्षा नहीं करनी
चाहिये। धनवान और जानकार रत्नपरीक्षक हो तो वह धूल में पड़ा हीरा देखने पर उसे अपनी गाँठ में बाँध कर
घर ले आता है। उसी प्रकार जो भी ज्ञाता या विद्वान हो उसे यह देशी भाषा में लिखा ग्रन्थ देखकर उसकी उपेक्षा
नहीं करनी चाहिये बल्कि उसका अच्छी प्रकार परीक्षण कर चित्स्वरूप रत्न प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये।
यदि क्षुद्र दृष्टि से देखें तो साक्षात व्यासजी के ग्रन्थ पर लोग नाक भौं सिकोड़ सकते हैं। फिर यह तो मराठी में
लिखा काव्य है। इसीलिये कुटिलता छोड़कर इसे पढ़ें। जिन्हें आत्मसुख की चाह है वे प्राकृत में लिखे ग्रन्थ में
मीन मेख नहीं निकालेंगे। वे ज्ञान रस को ही ग्रहण करेंगे क्योंकि उनमें परमार्थ के प्रति उत्कंठा रहती है। जो
सचमुच ही परमार्थी हैं वे ही इस ग्रन्थ के अधिकारी हैं। जिनकी भागवत पर भक्ति है उन्हें ही निजसत्व प्राप्त
होगा। जिनकी भागवत पर भक्ति नहीं है जो व्यर्थ ही विद्वत्ता की डींग हाँकते हैं, वे ही यदि निन्दा न करें तो आगे
जाकर उन्हें भी भक्ति प्राप्त होगी। जिनके मन में सदा निन्दा ही भरी रहती है उन्हें कभी भी सद्गति प्राप्त नहीं
होती। निन्दा सबसे श्रेष्ठ पातक है। निन्दक का नाम लेने पर भी जिह्वा को दोष लगता है। इसलिये प्रायश्चित के
रूप में रामराम कहना चाहिये। किन्तु निन्दा में भी स्वार्थ ही दिखायी देता है क्योंकि निन्दक भक्त का हित ही
करते हैं। वे अपना नुकसान कराकर दूसरों के सारे दोष धो डालते हैं। इसलिये श्रोताओं को गुण और दोष
छोड़कर शान्त बैठना चाहिए। जिस ज्ञान का प्रवक्ता स्वयं श्रीकृष्ण है, वह ज्ञान अत्यन्त रसाल होगा यह कहने
की आवश्यकता नहीं है। श्रीकृष्ण और उद्धव का यह ज्ञान अज्ञान को तत्काल दूर कर देता है इसलिये एका
जनार्दन विनती करता है कि ध्यान देकर उसका श्रवण करें।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकदश स्कंधे,
श्रीकृष्ण उद्धव संवादे एकाकार टीकायां नवमोध्यायः ॥ ९ ॥
श्री कृष्णार्पणमस्तु ।