श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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दिखायी देता। उसी प्रकार अविद्या का नाश हो जाने पर धर्माधर्म के झुण्ड भी निस्तेज हो जाते हैं। नवग्रहों का
समुदाय, नक्षत्रों की पंक्तियाँ, जुगनू के तेज की चमक ये सब रात्रि के साथ ही लुप्त हो जाते हैं। उसी प्रकार
अविद्या के साथ धर्माधर्म की कला भी नष्ट हो जाती है। उद्धव! समस्त धर्मों के त्याग की यही पहचान है इसे
ध्यान में रखो। इसके अतिरिक्त मेरा भजन! इसी का नाम है मुख्य भागवतपन! लेकिन तुम कहोगे कि केवल
अविद्या का ही कैसे नाश होगा ? उसके साथ अधर्म का भी नाश होगा। लेकिन अरे भई! मेरी भक्ति के बढ़ने से
अविद्या अनायास ही नष्ट हो जाती है। अविद्या का नाश होते ही सभी धर्माधर्मों का नाश होता है। अब तुम
कहोगे कि ऐसी कौन-सी भक्ति है ? तो यह वही भक्ति है जिसका मैंने पहले निरूपण किया था। वह मेरी चौथी
भक्ति है, इसे ध्यान में रखो। उसके ही योग से अविद्या का निराकरण होता है। आर्त (रोग से पीड़ित), जिज्ञासु
(मोक्ष की कामना करने वोले) तथा अर्थार्थी (धन के इच्छुक) जो भक्ति करते हैं वह वास्तव में अविद्यात्मक
होती है इसलिये मुख्य रूप से चौथी भक्ति ही मेरी भक्ति है। उस भक्ति में अविद्या का स्पर्श नहीं होता और
भजन तो अपने ही स्थान पर अनायास होता रहता है। हे उद्धव! वही मेरी प्रिय भक्ति है। जिससे अविद्या रहती है
और सभी धर्म थर-थर काँपते रहते हैं उस भक्ति का झण्डा लहराते देख उसके भय से ही अविद्या के प्राण
निकल जाते हैं और सब धर्मों की चाह तो बिना जख्मी हुए मर जाती है। अपनी भक्ति का यह प्रकार भगवान ने
बड़े प्रेम से बतलाया। अब जिससे भक्ति सजती है उन भक्तों का भजनभाव भी सुनो। बिना मेरे अनुसंधान के
स्नान, संध्या, जप, होम, दान ये सब अधर्म ही हैं। वह मेरा भजन नहीं है। परपुरुष की चाह और उसके प्रति
प्रीति तथा पति के सामने झूठा प्रेम-प्रदर्शन यह जिस प्रकार पतिव्रता का लक्षण नहीं होता, उसी प्रकार वैसी
भक्ति भी व्यभिचारिणी ही होती है। स्त्रियों के प्रति इच्छा रखकर जो ध्यान और अनुष्ठान करता है उसकी वह
कृति जारिणी स्त्री की तरह रहती है वह कोई पवित्र भक्ति नहीं है। काया, वाचा तथा मन से मेरी भक्ति में मग्न
रहना, भजन करते समय दिन या रात का ख्याल न करना इसी का नाम सच्ची भक्ति है। जप के बिना भी जिसके
मुँह में मेरा नाम है, धारण किये बिना भी मेरा ही ध्यान है और जो सारे कर्म बिना संकल्प किये मुझे ही अर्पण
करता है, प्राणायाम के बिना ही वायु का विरोध करता है, मर्यादा के बिना ही स्वरूप ज्ञान होता है, विषय के
बिना ही सदा स्वानंद में रहता है इसी का नाम है शुद्ध भक्त! भक्त कहलाने में बड़ा अच्छा लगता है। लेकिन
भजनमार्ग में हृदय विह्वल हो उठता है। अकृत्रिम भक्ति जब प्रकट होती है उसी समय, उद्धव मेरी भेंट होती है।
इस रीति से जो मेरा भजन करता है वह मुझमें और मैं उसमें निवास करता हूँ। सारे भक्तों में वही उत्तम भक्त है
और साधु यह नाम उस पर ही फबता है। पुरुषों में उत्तम पुरुष वही है। साधुओं में सर्वोत्तम साधु वही है। हे
उद्धव! मेरे विश्राम का अकृत्रिम स्थान वही है। उसके लिये मैं स्वयं अपने सर्वांग का बिस्तर बन जाता हूँ और
पग-पग पर मैं अपना प्राण उस पर न्योछावर करता हूँ। ध्यान में रखो। वह मुझे कितना प्रिय है यह पूछोगे तो मैं
कहूँगा कि उसी प्रकार जैसे जीव को प्राण प्रिय लगता है। उत्तम भक्त का यह लक्षण बताते समय भगवान भी
प्रेम में पागल हो गये। वे अधीर हो उठे। उनका अपने अंतःकरण पर नियन्त्रण न रहा। उसने उद्धव को गोद में
उठा लिया और वह प्रसन्नता से नाचने लगा। आश्चर्य से उद्धव का गला भी रुंध गया। श्रीकृष्णनाथ यह भी भूल
गये कि मैं देवता हूँ और यह एक भक्त है और यही भक्त और देवता का भाव उद्धव भी भूल गये। भक्ति के ऐसे
साम्राज्य में दोनों की जब एकरूपता हुई तो अपने भक्त की कथा सुनाने के लिये भगवान का जी मचल उठा।
ऐसे उत्तम भक्तों की कथा कृष्णनाथ को बहुत प्रिय लगती थी। इसीलिये वह उसे बार-बार सुना रहा था। श्लोक
में अनेक विचार होते हुए उन्हें दूर कर श्रीकृष्ण ने बड़ी चाह से स्वयं ही यह ग्रन्थ लिखवाया। महाराज! सचमुच