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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 869 में से

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पृष्ठ 320

३०४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
को यदि अड़हुल के फूल पर रखें तो वह लाल रंग का हो जाता है लेकिन वह फूल से बिलकुल अलिप्त रहता
है। वह उस फूल के रंग में रंग नहीं जाता। उसी प्रकार साधु वस्तुओं का संग्रह करने वालों के बीच रहता है,
ऐसा भी आभास होता है कि वह संग्रहकर्ता है, किन्तु जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति किसी अवस्था में भी वह संग्रही
भाव का स्पर्श नहीं करता। पारस जिन धातुओं को स्पर्श करता है उन धातुओं को वास्तव में सुवर्ण बना देता है
लेकिन वह सुवर्ण के अलावा दूसरे धातुओं को स्पर्श ही नहीं करता। उसी प्रकार साधु जिस चीज को अपना
कहता है वह उसे दूसरे का मालूम ही नहीं होता। श्रीकृष्ण द्वारा ही अंकित होने के कारण वह ऐक्यभाव का ही
महत्त्व बढ़ाता रहता है। जब चैतन्यस्वरूप में मन लग जाता है, सारा विश्व चैतन्यमय मालूम होता है, परिग्रह का
विस्मरण हो जाता है, ऐसी स्थिति को 'अकिंचनभाव' कहते हैं। गृहस्थी त्याग कर जंगल में गया और वहाँ भी
स्त्री का चिंतन करने लगा उस समय वह त्याग ही बाधक बना और वह पुनः परिग्रह में आ गया। कीट दीवार
पर चढ़ता रहता है लेकिन उसका यह परिश्रम व्यर्थ है क्योंकि वह पहले से भी अधिक नीचे गिर पड़ती है और
दुःख भोगती है लेकिन चींटी की बात वैसी नहीं है। वह कीट को लेकर पेड़ पर चढ़ती है उसी प्रकार सत्संग से
मूर्ख उद्धार कर सकता है लेकिन वे मूर्ख उपाय ही नहीं करते। देखा जाय तो चींटी छोटी और कीट बड़ा होता है
फिर भी चींटी कीट का उद्धार कर सकती है। उसी प्रकार जो अकिंचन पुरुष होते हैं वे भी सबका उद्धार करते
हैं। अस्तु! मूर्ख का त्याग करने का जो ढंग है वह अत्यन्त बाधक और कष्टदायक होता है क्योंकि जब तक
सत्संगति नहीं होती तब तक त्याग की स्थिति समझ में नहीं आती। मूर्ख गृहस्थी को छोड़कर जंगल में जाता है
लेकिन वहाँ भी वह देह के प्रपंच में फँस जाता है। लेकिन देह में रहते हुए भी जो देह को मिथ्या कर देता है
वही सचमुच अकिंचन बनता है। मूर्ख को त्याग भी बाधक होता है और साधु परिग्रह में रहते हुए भी मुक्त रहता
है। अंतर्बाह्य त्याग करके ही शुक और नारद तीनों लोकों में अत्यन्त पवित्र हो गये। लेकिन वे दोनों जनक राजा
के चरणों पर गिर पड़े क्योंकि जनक राज्य करते हुए भी विदेही था। मैं भी उसका सम्मान करता हूँ। देखो, साधु
का माहात्म्य कितना आश्चर्यजनक है। इसी का नाम अकिंचनता है। यह बारहवाँ लक्षण है। अब 'अनीहा' के
बारे में सुनो। अनीहा (अर्थात् निरिच्छता) दीन हो गयी थी। वह जिसके पास भी जाती, वह उसे लौटा देता।
कोई उसे पलभर के लिये भी अपने पास नहीं रहने देता था। इस प्रकार निराश्रित हो जाने के कारण वह
तिलमिला रही थी। तीनों लोक घूमते रहने पर भी उसे बैठने के लिये तिलमात्र की जगह तो नहीं ही मिली उलटे
'ईहा' (इच्छा) वैरन उसके पीछे लग गयी और जहाँ भी वह जाती वहाँ वह उसे मार खिलाती थी। उस अनीहा
को कोई द्वार पर पैर भी धरने नहीं देता था। तब वह बेचारी अत्यन्त दीन दुःखी होकर रोने लगी और अपनी
स्थिति का दुखड़ा रोने संतों के पास पहुँची। स्वभाव से ही दयालु होने के कारण उन्हें उस पर दया हो आयी और
उन्होंने हल्के हाथों से उसकी आँखें पोंछी और अपने हित के लिये उसका पालन-पोषण किया। इस प्रकार वह
संतों के बल पर बढ़ी और पुराना बैर याद कर उस ईहा का (अर्थात् इच्छा का) बदला लेने के लिये संतों से
उसका उपाय पूछ कर वह उसका छल करने के लिये प्रवृत्त हो गयी। अहं और ममता ईहा की सहेलियाँ थीं।
ईहा के साथ अनेक प्रकार के खेल खेलते हुए उसने उसे काम के हवाले किया और वह काम की स्त्री बनी।
काम का अनुमोदन मिलते ही इच्छा अत्यन्त प्रबल हो गयी और वह घर-घर में पहुँच गयी। तब उसका बदला
लेने के लिये निरिच्छा शीघ्रता से चल पड़ी। उसने संतों से असंग होने का शस्त्र माँग लिया और इच्छा पर प्रहार
करने के लिये वह पहले 'अहं' और 'ममता' इन दोनों को मारने के लिए दौड़ पड़ी। वे दोनों भय के कारण वहीं
की वहीं मर गयीं। निरिच्छा ने पीछा करते ही अहं-ममता को वृद्धावस्था प्राप्त हो गयी अर्थात् उनका अन्त हो