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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 321, कुल 869 में से

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पृष्ठ 321

ग्यारहवाँ अध्याय ३०५

गया। वह दोनों थर-थर काँपने लगीं और बिना घाव लगे ही उन्होंने प्राणोत्सर्ग किया। अनीहा (निरिच्छा) को
देखते ही काम बारहों बार दौड़ पड़ा। संकल्प का आखिरी गुट गिर पड़ा। इस प्रकार काम का रणक्षेत्र में पतन
होते ही क्रोधादि योद्धा भी एक-एक करके गिर पड़े। अन्त में इच्छा का साथ देने वाला कोई नहीं रहा क्योंकि
एक-एक को खोज-खोज कर मार दिया गया। अन्ततोगत्वा निरिच्छा के सामने खड़ा रहने वाला कोई वीर नहीं
बचा, उसने सबको मार कर चकनाचूर कर दिया। उनकी अन्तिम क्रिया करने वाला भी कोई नहीं रहा। काम का
नाश होते ही इच्छा सचमुच ही विधवा हो गयी। वह संतों से मुँह छिपाती भाग गयी। इसलिये जिसने इच्छा से
संगति की उसकी अधोगति समझनी चाहिये और जो निरिच्छा का अंकित हुआ वह गोविन्द का प्रिय हुआ ऐसा
समझना चाहिये। तुम कहोगे, यह 'अनीहा' अर्थात् 'निरिच्छता' कौन है और 'ईहा' का क्या लक्षण है? तो
जिससे उनकी भी पहचान हो सके वह सब बताऊँगा। काम्यकर्मादि के जाल से 'ईहा' (इच्छा) अत्यन्त चपल है
और जो अंतःकरण में अटल रहती है वही 'अनीहा' (निरिच्छता) है। जिससे अंतःकरण में इच्छा का गन्ध भी
उत्पन्न नहीं होता अथवा कर्म की कर्मावस्था उत्पन्न नहीं होती, उद्विग्नता का अणुमात्र भी प्राप्त नहीं होता वही
वास्तव में 'अनीहा' (अर्थात् निरिच्छता) है। ऐसी निरिच्छता जिसे प्राप्त होती है उसकी आज्ञा देवता भी मानते
हैं। वही निरिच्छता रात दिन जिसकी दासी बन कर रहती है वह अनीहा अत्यन्त गौरवपूर्ण साधु का तेरहवाँ
लक्षण बनकर रह रही है। अब चौदहवाँ लक्षण 'मितभोजन'। उसकी महत्ता का श्रवण करो। जो जिह्वा की इच्छा
से बंध नहीं जाता, कभी क्षुधा के पाश में नहीं फँसता और पसंदगी का ख्याल न कर जो भोजन के लिये तैयार
हो जाता है; अन्न की इच्छा प्राप्त करता है, जठराग्नि अन्न का भक्षण करता है और वह स्वयं साक्ष्य के रूप में
उपस्थित है यह जानकर सारे रसों का सेवन करता है, भोजन में जो भी कुछ आता है उसको दोषदृष्टि से दूर
करता है और उसे अत्यन्त पवित्र बना कर आत्मैक्य से उसका सेवन करता है। खाने लायक पदार्थ कौन से हैं
यह जो देखता ही नहीं अथवा मैं एक खाने वाला हूँ इसका जिसे स्मरण ही नहीं होता वह मितभोजी साधु प्रत्येक
कौर श्रीकृष्ण में समरस हुआ है यह मान कर सब कुछ खाकर भी बिन खाये जैसा रहता है। जिस प्रकार अग्नि
आहार को पहले अपने जैसा बनाता है और फिर उसका अंगीकार करता है उसी प्रकार साधु पहले द्वैत का
निवारण कर फिर आहार का स्वीकार करता है। इसी का नाम 'मितभोजन' है और यही साधु के आहार का
लक्षण है। योजना के बिना कम खाना रोगी के पथ्य के समान होता है। हर ग्रास पर जो अन्न ब्रह्मार्पण हो रहा,
उसी का नाम है 'परिमित भोजन' है उद्धव ! यह साधु का चौदहवाँ लक्षण है इसे ध्यान में रखो। मलिन जल का
प्रवाह लेकर अनेक नदियाँ समुद्र में मिलती हैं लेकिन वह तिल भर भी मलिन नहीं होता। वह निर्मल और
निर्विकार ही रहता है। उसी प्रकार नाना उर्मी आने पर भी जिनके मनोधर्म में चल विचल नहीं होती ऐसे संतों
की पराक्रमी शान्ति उनकी आत्मशक्ति को प्रेरित करती रहती है। जिस प्रकार नागबेल की लतर बिना आधार के
वृक्ष पर नहीं चढ़ती, उसी प्रकार संतों के बल के आधार पर ही शान्ति बढ़ती है और चित्स्वरूप के मण्डप पर
फैलती है। दसों दिशाओं को ढाँप कर बादल आकाश में छा जाते हैं लेकिन आकाश उनसे विकृत नहीं होता।
वह उन बादलों को स्पर्श भी नहीं करता। जिस प्रकार ठंडक, धूप और वर्षा की धारायें आकाश को स्पर्श नहीं
करती उसी प्रकार साधु की स्थिरता अनेक द्वंद्वों के होते हुए भी निर्द्वंद्व ही रहती है। उसी प्रकार ऊँच-नीच जैसी
अनेक अवस्थाएँ प्राप्त होने पर भी अथवा मोहममता कितनी भी प्रबल क्यों न हो फिर भी जिसमें क्षोभ उत्पन्न ही
नहीं होता उसी का नाम है, 'आत्मशांति'। संतों के कारण ही शान्ति का महत्त्व है और शान्ति के कारण.ही संत
पावन होते हैं। यह 'परस्पर लक्षण' संतों का पन्द्रहवाँ गुण है। जहाँ 'अहं' का नाम ही नहीं होता, वहीं अपने