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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 869 में से

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पृष्ठ 323

ग्यारहवाँ अध्याय ३०७
है, उसमें जिसका मन मत्स्वरूप में स्थिर होकर ध्रुव की तरह अटल रहता है उसे मननशील कहते हैं। 'मुनि'
शब्द का अर्थ मननशील ही है इसे ध्यान में रखो। यही अठारहवाँ लक्षण है। अगले श्लोक में दस लक्षणों का
अत्यन्त मधुर निरूपण है, उसे सुनने के लिये उद्धव सावधान होकर सारे शरीर को कान बना कर बैठ गया।
अप्रमत्तो गंभीरात्मा धृतिमान् जितषड्गुणः ।
अमानी मानदः कल्पो मैत्रः कारुणिकः कविः ॥ ३१ ॥
जब तक मन वृत्तिशून्य नहीं हो जाता तब तक चतुर पुरुष उस पर विश्वास नहीं करता। वृत्ति के रूप में
कहीं मन ठग न ले इस भय से वह आत्मज्ञान के कारण सावधान रहता है। दुर्वासा सरीखा ज्ञानी भी मन के
कारण क्षण-क्षण पर गुस्सा करता था। उसी क्रोध के आवेग में वह भीषण शाप देने के लिये दौड़ पड़ा। 'दुर्गंधा'
मत्स्यकन्या थी लेकिन पराशर उसके भी मोहपाश में फँस गया। नारद केवल मौका देख रहे थे लेकिन उतने ही
समय के लिये उन्हें गंगातट पर 'नारदी' बनना पड़ा। सारी सृष्टि का आजा ब्रह्मदेव लेकिन वह भी अपनी सुन्दर
कन्या को देख मन विकृत हो जाने के कारण उसका उपभोग करने के लिये उद्यत हो गया और सरस्वती के
पीछे दौड़ने लगा। इस संसार में मन की तरह लुच्चा कोई नहीं है। वह नाना प्रकार का छल कर ज्ञानी लोगों को
भी कष्ट देता है। लेकिन साधु उस मन का दमन करते हैं। अब शायद आप यह कहेंगे कि यदि 'मन' बिना ही
भोग होता है तो फिर वृत्ति क्यों क्षुब्ध होती है?' लेकिन ऐसी बात करने वाले भले ही ज्ञानी हों लेकिन वे मूर्ख
हैं। साधुओं को यह बात अच्छी नहीं लगती। वृत्ति सत्त्वगुण का आश्रय कर सूक्ष्मरूप में रहती है। वह मन को
क्षुब्ध कर 'मैं मुक्त हूँ' का आभास करा कर विषयी बना देती है। 'मुक्त हुआ' ऐसा अहंकार करना और विषयों
में आसक्त रहना, यही तो मनःक्षोभ से प्राप्त होता है। इसलिये जब तक वृत्ति है तब तक साधु को मुक्ति बिलकुल
मान्य नहीं है। मन अत्यन्त नाटकी है और नाटक बनाने वाला है। वही मुक्त होने का अहंकार करता है। इसलिये
उसका नाश करने के लिये साधु आत्मज्ञान से सावधान रहते हैं। कृष्णसर्प का मुँह हाथ में हो और यदि हाथ को
ढीला छोड़ दिया जाय तो वह तत्काल खा ही जायगा। इसलिये जब तक वह मर न जाय तब तक उसका मुँह
दबा कर ही रखना चाहिये। उसी प्रकार साधु मन का निर्दलन करते हैं। इस प्रकार निर्दलन करने में जैसी
सावधानी आवश्यक होती है वही साधु का लक्षण है। वास्तव में यह उन्नीसवाँ गुण है। अब बीसवाँ गुण सुनो।
पर्जन्यकाल में पानी से लबालब भरी हुई नदियाँ समुद्र में मिलती हैं तो समुद्र अहंकार से फूल नहीं जाता अथवा
ग्रीष्मऋतु में वे नदियाँ उतनी भर कर नहीं आतीं तो समुद्र सूख नहीं जाता। उसी प्रकार धन की अधिकता से
साधु का मन उल्हसित नहीं होता अथवा सर्वस्व चला जाने पर दीनता का भाव नहीं लाता। रात और दिन आये
या जाये, उससे सूर्य के प्रकाश में कोई कमी नहीं आती। उसी प्रकार अलग-अलग परिस्थितियाँ आने या जाने से
साधु की गम्भीरता नहीं ढलती। कितनी भी बिजली कड़के, उससे आकाश नहीं डगमगाता। उसी प्रकार विकारों
की कितनी भी लहरें क्यों न उठें लेकिन उसमें अटल रहना ही 'गांभीर्य' है। संतों की 'गंभीरता' यही है। यही
सचमुच जीव और शिव की 'शांति' है। यह संतों की बीसवीं अवस्था है। अब धैर्य का स्वरूप सुनो। जो अपने
धैर्य से मन-बुद्धि आदि इन्द्रियों और प्राण को अपने नियंत्रण में कर उन्हें नित्य आत्मसन्मुख करता है और उन्हें
वहाँ से लौटने नहीं देता या स्वयंवर में प्रबल शत्रु को अपने पराक्रम से जीत कर लायी हुई दुल्हन को वापस
नहीं जाने देता' उसी प्रकार साधु भी अपनी वृत्ति से धैर्य छूटने नहीं देता। जाल में फँसे हुए मृग को जिस प्रकार
बहेलिया वापस जंगल में नहीं जाने देता उसी प्रकार साधु भी धैर्यपूर्वक मन पर नियंत्रण कर उसे देह की ओर