श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय २९५
श्रद्धालुर्मे कथाः शृण्वन् सुभद्रालोकपावनीः ।
गायन्ननुस्मरन् कर्म जन्म चाभिनयन् मुहुः ॥ २३ ॥
मेरी कथा का श्रवण प्रारम्भ करने पर वहाँ काल का भी प्रवेश सम्भव नहीं है फिर दूसरों की क्या बात
की जाय? और वहाँ कर्मबन्धन किस बात का? हरिकथा में जो क्षण व्यतीत होता है उसे काल भी ग्रस नहीं
सकता। इसलिये हरिकथा का श्रवण यदि श्रद्धापूर्वक किया गया तो उसी को 'काल की सार्थकता' समझना
चाहिये। अब कथा का माहात्म्य सुनो। यदि श्रद्धापूर्वक कथा श्रवण की जाय तो उसके प्रत्येक अक्षर से तीनों
लोकों के पातक भस्म हो जाते हैं। अब श्रद्धा किसे कहते हैं यह भी सुनो। हरिकथा श्रवण करते समय जिसके
अर्थ की ओर मन लगा रहता है उसी का अर्थ है श्रद्धापूर्वक श्रवण करना। कथा का प्रतिपादन सुनकर भी
नास्तिक कहते हैं, "भगवान तो है ही नहीं। जो कहते हैं कि ईश्वर है वह केवल अपना पेट भरने के लिये हमें
उस पर जरा भी विश्वास नहीं है।" ऐसे नास्तिकों की बात की चिन्ता न कर जिसकी आस्तिकता बढ़ती जाती
है उसी का नाम है श्रेष्ठ श्रद्धा और उसमें अप्रतिम सुख होता है। श्रवण में अथवा ध्यान में लय, विक्षेप, कषाय
तथा रसास्वाद आदि से बाधा उत्पन्न होती है। इसलिये इन चारों बाधाओं से बचना चाहिये। हरिकथा सुनते
समय भी यदि मन में विषय की चिन्ता लगी रहे तो वह अच्छा है ही नहीं। प्रमुख विक्षेप यही है। स्त्रियों के
हावभाव का वर्णन, उनके नेत्र कटाक्षों का वर्णन एवं श्रृंगार चेष्टाओं का वर्णन सुनने में ही जिसकी श्रद्धा रहती
है उसका नाम है 'रसास्वादन'। अथवा वह हरिकथा सुनने के लिये बैठा अवश्य रहता है किन्तु उस कथा में
उसका मन बिलकुल नहीं रहता। उसका चित्त कहीं अन्यत्र ही भ्रमण करता रहता है। उसे मर्कटरूपी विक्षेप
कहते हैं। अन्यथा अनेक प्रकार के उद्वेग होने के कारण हरिकथा सुनते रहने पर भी उसमें मन नहीं लगता
अथवा नींद आ जाती है। उसे तत्काल लय विक्षेप समझना चाहिये। सुनने अथवा ध्यान में बैठने पर सगुण
अथवा निर्गुण इनमें से कोई भी रूप मन में नहीं उभरता और आँखों के आगे नीले-पीले रंग नाचने लगते हैं।
यही तीन गुणों के क्षोभ का मिश्रण है। इसे 'कषाय' कहते हैं। श्रवण और ध्यान में इस प्रकार के दोष हैं। उसी
प्रकार प्रेम तीन प्रकार का है। चतुर लोग इन तीनों प्रकार के प्रेम को पहचानते हैं। उसके लक्षण बताता हूँ,
सुनो। महान वीरों के समर में पराक्रम अथवा भीषण युद्ध का वर्णन सुनकर मन प्रसन्नता से नाच उठता है, वह
राजस प्रेम है। दुःख शोक का प्रसंग, मरने की वार्ता अथवा शोक कथाओं का सुनना भी जिसे सहन नहीं होता,
उनमें का प्रत्येक प्रसंग सुनकर आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगती है, सिसकी आने से जिसका बदन
थर-थर काँपने लगता है वह सच्चा तामस है, यह समझ लो। सगुण मूर्ति का ऐश्वर्य, शंख, चक्र, कमल, गदा
तथा पीताम्बर धारण किये गोविन्द का वर्णन सुनकर जो प्रसन्न हो उठता है, आँखों से आनंदाश्रु बहने लगते हैं,
सिसकी रूक नहीं पाती, मन कृष्णमय हुआ रहता है, वह प्रेम सात्त्विक होता है। चौथे प्रकार के प्रेम की
कल्पना भी अतर्क्य है। उद्धव! तुम मेरे अत्यन्त लाडले हो इसलिये तुम्हें उसके बारे में भी बताता हूँ। तुम्हारा
भक्ति का स्वरूप महान है। उसके कारण मुझे गुप्त बात भी बतानी पड़ती है। तुम्हारे सिवाय दूसरों को देखने
पर दूसरा अधिकारी पुरुष दिखायी नहीं देता। श्रीकृष्ण ने कहा, ध्यान दो। निर्गुण परब्रह्म के स्वरूप के बारे में
जानकर जिसका मन चित्तस्वरूप में डूब जाता है उसे पुनः होश में आने का भान ही नहीं रहता। नमक का
टुकड़ा समुद्र में डालने पर वह जिस प्रकार समुद्र के आकार का ही हो जाता है उसी प्रकार वह भी साक्षात्
ब्रह्मस्वरूप ही हो जाता है। चित्त और चैतन्य का मिलन होने पर और लिंगदेह का बन्धन टूटने पर आँखों में
अश्रुओ की बाढ़ आ जाती है, शरीर रोमांचित हो जाता है, जीव भाव की दशा टूट जाती है और भाव विह्वल