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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 869 में से

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पृष्ठ 325

रहता है। कभी एक भी शब्द नहीं बोलता। कोई पुरुष लाखों रुपया प्राप्त होने पर उसे जमीन में गाड़ कर उस पर
पत्थर रख देता है, दान देने से वह व्यर्थ चला जायगा यह सोचकर उस सम्पत्ति को जमीन की संगति में छोड़
देता है। उसी प्रकार बड़े परिश्रम से आत्मज्ञान प्राप्त कर उसको सत्पात्र को दान नहीं करता यही उस कृपणता का
लक्षण है। अर्थात् यही मक्कारी है। कोई पुरुष ज्ञान प्राप्त कर उसे देना भी चाहता है लेकिन वह उपदेश शिष्य
की समझ में नहीं आता। गुरु का वह ज्ञान सत्त्वहीन हो गया है, ऐसा समझना चाहिये। अच्छे खेत में भी उसमें
अंकुर नहीं फूटेंगे। कुछ लोग अपनी दीक्षा और अनुभव को अत्यंत गहन बता कर बड़े-बड़े श्रीमान लोगों को
शिष्य बनाने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार वे ज्ञान का व्यवसाय ही शुरु करते हैं। शिष्य का मन आकर्षित करने
के लिये उसकी रुचि के अनुसार निरूपण करना, इस प्रकार धन के लालच से उपदेश करने पर वह ज्ञान
सत्त्वहीन ही हो जाता है। बीज में पानी घुसने पर वह खेत में बोने लायक नहीं रह जाता। उसी प्रकार ज्ञान में
धनलोभ का प्रवेश हो जाने पर उस उपदेश से किसी का भी लाभ नहीं होता। ज्ञान न मिलने से शिष्य मन ही मन
कुढ़ता रहता है और गुरु गुर्राता रहता है। वह सच्चा उपदेश कर्म नहीं है। यह घर के घर में लुकाछिपी है। जो
शब्दज्ञान में पारंगत होकर ब्रह्मानन्द में डोलता रहता है और शिष्य को उपदेश देने में समर्थ रहता है वही मेरा
साक्षात् स्वरूप है। मैंने जैसा अवतार धारण किया है उसी प्रकार यह भी अवतारी रहता है। इसीलिये वह अपने
सच्चे शिष्य को चित्स्वरूप के अलंकार से बड़ी चतुराई से अलंकृत करता है। 'वह' और 'मैं' का प्रयोग करते
समय उसमें केवल बाह्य दृष्टि से अन्तर मालूम होता है। किन्तु भीतर से वे दोनों एक ही घर के रहते हैं। एक ही
रहकर वह अनेकों को उपदेश करता है। एक की ज्ञानप्राप्ति कितनी सुलक्षण होती है? लेकिन कुछ जैसे के तैसे
अज्ञान में ही रहते हैं, यह किसका दोष है? किसान बुआई करता है। भूमि अच्छी होने पर उसमें फसल
लहलहाती है और जमीन बंजर हो तो उसमें एक अंकुर भी नहीं फूटता। बीज उत्तम ही रहता है। उसी प्रकार
भक्तों में ही उपदेश का अच्छा विस्तार होता है। तर्क करने वाले लोग बंजर खेत की तरह होते हैं। शिष्य समझ
सके उस ढंग से उपदेश कर उसे परमार्थ की ओर ले जाने का जो प्रभावशाली गुण होता है उसे 'परबोधकता'
कहते हैं जो पच्चीसवाँ प्रसिद्ध गुण है। साधु की मित्रता वैसे भी उत्तम रहती है। सबसे उसकी पुरानी ही जान-
पहचान रहती है। वह सबका मित्र होने के कारण उसका व्यवहार सबके साथ एक जैसा होता है। वही सबका
सगा और सम्बन्धी, वही वास्तव में सबका प्रिय रहता है। वह सबसे अलग रहते हुए मित्रता कायम रखता है।
अपनी कैसी भी गुप्त बात क्यों न हो उसे दूसरे को सुनाने में वह दूजे का भाव नहीं रखता। सारी दुनिया की ओर
वह अपनेपन से देखता है। अंतःकरण में वह सबके प्रति निष्कपट रहता है। दूध और पानी जैसे एक हो जाते हैं,
उनमें भेद नहीं दिखायी देता उसी प्रकार साधु भी सबके साथ एक जैसा व्यवहार कर समस्त जीवों को अपने में
समरस कर लेता है। अत्यन्त मित्रता का लक्षण यह है कि दूसरों का दुःख हर कर उसे सुख प्रदान करना। उसी
प्रकार साधु भी जीवों का दुःख हर कर उन्हें सुख देता है। साधु की मित्रता की महिमा अपार है। वह सबका
पुराना ही मित्र है। इसलिये सबके साथ उसका सौजन्य नित नया ही रहता है। वह सदा निष्कपट रहता है। बन्धु
से भी अधिक मित्र महत्त्वपूर्ण है। पुत्र से भी अधिक मित्र विश्वास करने योग्य हैं। वही मित्र यदि विश्वासघात
करता है तो उसे ठग समझना चाहिये। मन, धन और कर्तव्य कर्म में जिसकी निष्कपट वृत्ति रहती है, उसी का
नाम है सच्ची मित्रता। यही पहचान ध्यान में रखनी चाहिये। इस प्रकार मैत्री का पूरा लक्षण विस्तारपूर्वक
बतलाया। यह साधु का छब्बीसवाँ लक्षण है। अब करुणा के बारे में सुनो। बदले में उपकार की इच्छा न कर, मैं
बहुत बड़ा दयावान हूँ यह अहंकार भी मन में न रख दीनजनों का दुःख निवारण करना इसी का नाम है सच्ची