श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 330, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें३१४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
आता है। इन्द्रियों को प्रेरणा देने वाली अथवा उसे नियंत्रण में रखने वाली शक्ति भी हृदयस्थ के ही अधीन है।
इसीलिये उसे ही 'हृषीकेश' (अर्थात् इन्द्रियों का स्वामी) कहते हैं। इस दृष्टि से देखें तो अपने ही हृदय में देवता
का निवास दिखाई देता है। मैं भी कैसा मूर्ख हूँ कि उसे देखने के लिये बाहर की ओर दौड़ता हूँ। वह तीर्थ में या
क्षेत्र में मिलेगा ऐसी हमारी कल्पना होती है। आत्मभाव के विना तीर्थ में भी देवता के दर्शन नहीं होंगे। सारांश,
भगवान मुझमें ही है उसके ही कारण इन्द्रियों में चेतनता रहती है और जो भी क्रिया-कर्म होते हैं वे उसके ही
कारण हाते हैं। देह तो केवल अचेतन प्रेत है। उससे कर्म नहीं होता यह स्पष्ट ही है। यह देह बिलकुल व्यर्थ है।
इन्द्रियों में चैतन्य लाना, कर्म, क्रिया अथवा कर्तव्य का पालन करना यह कार्य तो सचमुच देह से होता ही नहीं
है इसलिये मुख्य कर्ता वह हृदयस्थ परमात्मा ही है। इस प्रकार कर्तव्य के रूप में जो भी है उसे वह अपने माथे
पर नहीं लेता। सर्व कर्मों का कर्त्ता आत्मा है यह बात वह विश्वासपूर्वक मन में दृढ़ कर लेता है और फिर
अन्नपानादि का सेवन करते समय आत्माराम ही सबका भोक्ता है यह स्वीकार करता है। सारे कर्म या कर्तव्य
करते समय 'मैं' कर्त्ता हूँ यह बात उसकी समझ में ही नहीं आती। इस भोले भाव मेरा जो भजन हाता है, वह
उत्तम है। मैं वह भजन बड़ी चाह से ग्रहण करता हूँ क्योंकि वह मेरा खाद्य है इसे ध्यान में रखो। बच्चे को जिस
प्रकार सर्वभाव से माँ होती है उसी प्रकार मेरे भोले-भाले भक्तों के लिये सब कुछ मैं ही हूँ। दौड़कर माँ के गले
में पड़ने के लिये, कान में हित की गुप्त बात कहने के लिये तथा खाना, भोजन तथा विश्राम इन बातों के लिये
जिस प्रकार बालक के लिये माँ होती है उसी प्रकार मेरे भोले-भाले भक्तों के लिये प्यारी माँ के रूप में मैं हूँ।
उनके लिये अर्थ, स्वार्थ, परमार्थ सब कुछ मैं ही हूँ। बालक के लिये माँ जिस प्रकार अपने मुँह का, पेट का तथा
गाँठ का सब कुछ खर्च करती है उसी प्रकार अपने भक्तों के लिये मैं भी अपना सब कुछ खर्च करता हूँ। बच्चे
के न माँगने पर भी जिस प्रकार माँ वात्सल्य से दौड़ कर बच्चे के मुँह में अपना स्तन लगाती है उसी प्रकार मैं भी
भोले भक्तों को अपने अनुसंधान में लगाता हूँ। ज्येष्ठ पुत्र और कनिष्ठ पुत्र इन दोनों का पालन करने वाला पिता
एक ही होता है किन्तु वह बड़े बेटे को डाँटता है तो छोटे का लाड़ करता है। ज्येष्ठ यदि कोई व्यंग्य की बात
करता है तो वह उसे चाँटा लगाता है और छोटा लड़का तुतला कर बोलता है तो उसे बड़ा संतोष होता है। ज्ञानी
के मुँह से कोई गलत बात निकलती है तो उसके दोष का फल उसे भोगना पड़ता है लेकिन भोले भक्तों की कथा
असंबद्ध भी हो तो भी भगवान को उससे सचमुच ही सन्तोष होता है। कर्माकर्म का प्रायश्चित्त ज्ञानियों को ही
करना पड़ता है। भोले भक्तों को मैं कभी भी कर्म से बँधने नहीं देता। बाप भोजन करने बैठता है तो बड़े बेटे को
अपने से दूर बैठाता है और छोटे बच्चे को गोद में बिठा कर अपने हाथ से खिलाता है। उस समय बच्चे को जो
भी अच्छा लगता है वह उसे खिलाता है। वह नहीं खाता तो उसकी खुशामद करता है। उसी प्रकार ज्ञानी लोग
साधनों का उपयोग कर जब थक जाते हैं तब कहीं उन्हें मेरी प्राप्ति होती है लेकिन अपने भोले भक्तों का मैं
अनायास ही उद्धार करता हूँ। मार्गदर्शक जानते हुए भी रास्ता चूक जाता है लेकिन बच्चा बाप की गोद में रहता है
उसे किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं होती। उसी प्रकार साधनों का कष्ट केवल ज्ञानी को भोगना पड़ता है।
भोले भक्तों का उद्धार मैं ही करता हूँ इसलिये उन्हें जरा भी प्रयास नहीं करना पड़ता। मैं उसे अपने कन्धे पर
बिठाकर सायुज्य सिद्धि तक पहुँचाता हूँ। लेकिन जरा देखिये उसकी भोली बुद्धि कितनी विचित्र होती है। वह
वहाँ भी भजनविधि नहीं छोड़ता। अंतःकरण में कपट को स्थान देना, यही भजन की बाधा होती है। वह कितनी
ही युक्ति प्रयुक्ति से विचार करे लेकिन मैं उसके विचारों से बाहर ही रहता हूँ। वही केवल जो भोला भावार्थी है
उसे आचार-विचार का ज्ञान नहीं होता। बिना इधर-उधर मुड़े वह सीधे मुझमें ही आकर मिलता है। भोले भक्त